श्रीमन्महाभारते आदिपर्वणि संभवपर्वणि शततमोऽध्यायः

श्रीमन्महाभारते आदिपर्वणि संभवपर्वणि शततमोऽध्यायः

श्लोक 1-6

वैशंपायन उवाच। अथान्तरिक्षे दुष्यन्तं वागुवाचाशरीरिणी। ऋत्विक्पुरोहिताचार्यैर्मन्त्रिभिश्चाभिसंवृतम्।। (1-100-1) माता भस्त्रा पितुः पुत्रो यस्माज्जातः स एव सः। भरस्व पुत्रं दौष्यन्तिं सत्यमाह शकुन्तला।। (1-100-2) सर्वेभ्यो ह्यङ्गमङ्गेभ्यः साक्षादुत्पद्यते सुतः। आत्मा चैव सुतो नाम तेनैव तव पौरव।। (1-100-3) आहितं ह्यात्मनाऽऽत्मानं परिरक्ष इमं सुतम्। अनन्यां त्वं प्रतीक्षस्व मावमंस्थाः शकुन्तलाम्।। (1-100-4) स्त्रियः पवित्रमतुलमेतद्दुष्यन्त धर्मतः। मासि मासि रजो ह्यासां दुरितान्यपकर्षति।। (1-100-5) ततः सर्वाणि भूतानि व्याजह्रस्तं समन्ततः। देवा ऊचुः। आहितस्त्वत्तनोरेष मावमंस्थाः शकुन्तलाम्।। (1-100-6)

हिंदी अनुवाद: वैशंपायन जी ने कहा— तत्पश्चात, ऋत्विक्, पुरोहित, आचार्य और मंत्रियों से घिरे हुए राजा दुष्यंत के लिए आकाशवाणी हुई। उस अशरीरी वाणी ने कहा— "माता केवल चमड़े का थैला (भस्त्रा) है, पिता ही पुत्र के रूप में उत्पन्न होता है, अतः जो उत्पन्न हुआ है वह स्वयं पिता ही है। तुम दुष्यंत इस दौष्यन्त (पुत्र) का पालन-पोषण करो, शकुंतला बिल्कुल सत्य कह रही है। साक्षात् शरीर के सभी अंगों से अंगों की उत्पत्ति होती है, आत्मा ही पुत्र कहलाती है, इसलिए हे पौरव! यह तुम्हारा ही रूप है। तुमने अपने ही आत्मा को इसमें स्थापित किया है, अतः इस पुत्र की रक्षा करो और शकुंतला का कभी अपमान मत करो। हे दुष्यंत! धर्म की दृष्टि से स्त्रियों का यह अतुलनीय पवित्रपन है कि मास-प्रतिक मास उनका रज उनके समस्त पापों को हर लेता है।" इसके बाद सभी भूतों (देवताओं) ने चारों ओर से पुकार कर कहा— "यह तुम्हारे ही शरीर से उत्पन्न हुआ है, अतः शकुंतला का अनादर मत करो।"

व्याख्या: जब राजा दुष्यंत ने हठधर्मिता दिखाते हुए शकुंतला और उनके पुत्र को अस्वीकार कर दिया था, तब प्रकृति और अंतरिक्ष से दिव्य शक्तियों ने हस्तक्षेप किया। आकाशवाणी और देवताओं के वचनों ने यह स्पष्ट कर दिया कि शकुंतला निर्दोष हैं और बालक दुष्यंत का ही अंश है।

श्लोक 7-12

रेतोधाः पुत्र उन्नयति नरदेव यमक्षयात्। त्वं चास्य धाता गर्भस्य सत्यमाह शकुन्तला।। (1-100-7) पतिर्जायां प्रविशति स तस्यां जायते पुनः। अन्योन्यप्रकृतिर्ह्येषा मावमंस्थाः शकुन्तलाम्।। (1-100-8) जाया जनयते पुत्रमात्मनोऽङ्गाद्द्विधा कृतम्। तस्माद्भरस्व दुष्यन्त पुत्रं शाकुन्तलं नृप।। (1-100-9) सुभूतिरेषा न त्याज्या जीवितं जीवयात्मजम्। शाकुन्तलं महात्मानं दुष्यन्त भर पौरवम्।। (1-100-10) भर्तव्योऽयं त्वया यस्मादस्माकं वचनादपि। तस्मादभवत्वयं नाम्ना भरतो नाम ते सुतः।। (1-100-11) भरताद्भारती कीर्तिर्येनेदं भारतं कुलम्। अपरे ये च पूर्वे च भारता इति तेऽभवन्।। (1-100-12)

हिंदी अनुवाद: "हे नरदेव! वीर्य स्थापित करने वाला पिता ही पुत्र के माध्यम से यमराज के क्षय (नरक) से अपनी रक्षा करता है, और तुम ही इस गर्भ के विधायक हो; शकुंतला सत्य कह रही है। पति ही पत्नी में प्रवेश करता है और वही उसमें पुनः जन्म लेता है, पति-पत्नी की प्रकृति एक जैसी ही होती है, अतः शकुंतला का अपमान मत करो। पत्नी अपने अंगों से विभाजित करके अपने ही रूप (पुत्र) को जन्म देती है, इसलिए हे नृप दुष्यंत! तुम शाकुंतल (शकुंतला के पुत्र) का पालन करो। यह महान सौभाग्य है, इसका परित्याग नहीं करना चाहिए; तुम अपने इस महात्मन् आत्मज को जीवन दो और इसका भरण-पोषण करो। चूँकि यह हमारे वचनों से भी तुम्हारे द्वारा पाले जाने योग्य है, अतः आज से इस तुम्हारे पुत्र का नाम 'भरत' होगा। इसी भरत से 'भारती' कीर्तिविस्तार होगा और जिससे यह 'भारत' कुल कहलाएगा, तथा इसके पूर्व और पश्चात के सभी लोग 'भारत' नाम से ही जाने जाएँगे।"

व्याख्या: देवताओं और आकाशवाणी के माध्यम से बालक के नामकरण का आधार भी स्पष्ट कर दिया गया। यही बालक आगे चलकर महान चक्रवर्ती सम्राट 'भरत' बना, जिनके नाम पर इस महान देश और वंश का नाम 'भारत' पड़ा।

श्लोक 13-17

वैशंपायन उवाच। एवमुक्त्वा ततो देवा ऋषयश्च तपोधनाः। पतिव्रतेति संहृष्टाः पुष्पवृष्टिं ववर्षिरे।। (1-100-13) तच्छ्रुत्वा पौरवो वाक्यं व्याहृतं वे दिवौकसाम्। सिंहासनात्समुत्थाय प्रणम्य च दिवौकसः।। (1-100-14) पुरोहितममात्यांश्च संप्रहृष्टोऽब्रवीदिदम्। शृण्वन्त्वेतद्भवन्तोऽपि देवदूतस्य भाषितम्।। (1-100-15) शृण्वन्तु देवतानां च महर्षीणां च भाषितम्। अहमप्येवमेवैनं जानामि सुतमात्मजम्।। (1-100-16) यद्यहं वचनादस्या गृह्णीयामिममात्मजम्। भवेद्धि शङ्का लोकस्य नैवं शुद्धो भवेदयम्।। (1-100-17)

हिंदी अनुवाद: वैशंपायन जी ने कहा— देवालयों के देवताओं और तपोधन ऋषियों द्वारा शकुंतला को 'पतिव्रता' कहकर पुकारते हुए अत्यंत प्रसन्नता के साथ पुष्पों की वर्षा की गई। आकाश में गूँजते हुए उन देववचनों को सुनकर पौरववंशी दुष्यंत सिंहासड से उठ खड़े हुए और देवताओं को प्रणाम किया। इसके बाद उन्होंने अत्यंत प्रसन्न होकर अपने पुरोहित और मंत्रियों से कहा— "आप लोग भी देवदूत (आकाशवाणी) के इस कथन को सुनें। देवताओं और महर्षियों के इस भाषण को सुनकर जान लीजिए कि मैं भी अच्छी तरह जानता हूँ कि यह मेरा ही अपना पुत्र है। किंतु यदि मैं बिना किसी लोक-प्रमाण के केवल शकुंतला के कहने पर ही इस पुत्र को स्वीकार कर लेता, तो संसार के मन में शंका बनी रहती और इस प्रकार न तो इस बालक की और न ही शकुंतला की शुद्धि सर्वमान्य होती।"

व्याख्या: दुष्यंत यहाँ अपनी सफाई देते हैं कि उन्होंने सभा में जो कठोरता दिखाई थी, उसके पीछे कारण यह था कि समाज और प्रजा के मन में शकुंतला या बालक के चरित्र को लेकर भविष्य में कोई उंगली न उठे। दिव्य प्रमाण मिल जाने से अब जनता के समक्ष उनका यह संबंध पूरी तरह निष्कलंक और सिद्ध हो गया था।

श्लोक 18-20

वैशंपायन उवाच। तां विशोध्य तदा राजा देवैः सह महर्षिभिः। हृष्टः प्रमुदितश्चापि प्रतिजग्राह तं सुतम्।। (1-100-18) ततस्तस्य तदा राजा पितृकर्माणि सर्वशः। कारयामास मुदितः प्रीतिमानात्मजस्य ह। मूर्ध्नि चैनं समाघ्राय सस्नेहं परिषस्वजे।। (1-100-19) सभाज्यमानो विप्रैश्च स्तूयमानश्च बन्दिभिः। मुदं स परमां लेभे पुत्रस्पर्शनजां नृपः।। (1-100-20)

हिंदी अनुवाद: वैशंपायन जी ने कहा— तब देवताओं और महर्षियों के साथ मिलकर राजा दुष्यंत ने शकुंतला को (लोक-नजरों में पूरी तरह) शुद्ध और निर्दोष प्रमाणित कर दिया, और अत्यंत हर्षित व प्रमुदित होकर अपने उस पुत्र को स्वीकार कर लिया। इसके बाद प्रसन्नता से भरे हुए राजा ने अपने उस पुत्र के सभी आवश्यक पितृकर्म (संस्कार आदि) संपन्न करवाए, स्नेहपूर्वक उसके मस्तक को सूँघा और उसे अपने हृदय से लगा लिया। उस समय ब्राह्मणों द्वारा आशीर्वाद दिए जाने पर और बंदियों (भाटों-चारणों) द्वारा स्तुति किए जाने पर राजा दुष्यंत ने अपने पुत्र के स्पर्श से उत्पन्न होने वाली परम आनंद की प्राप्ति की।

व्याख्या: महाभारत का यह प्रसंग अंततः एक सुखांत और न्यायपूर्ण मोड़ पर पहुँचता है। दुष्यंत अपनी भूल सुधारते हुए शकुंतला का सम्मान बहाल करते हैं और अपने पुत्र भरत को पूरे अधिकार व उल्लास के साथ अपनाते हैं, जिससे राजसभा आनंद और उत्सव में डूब जाती है।

श्लोक 21-25

स्वां चैव भार्यां धर्मज्ञः पूजयामास धर्मतः। अब्रवीच्चैव तां राजा सान्त्वपूर्वमिदं वचः।। (1-100-21) लोकस्यायं परोक्षस्तु संबन्धो नौ पुराऽभवत्। कृतो लोकसमक्षोऽद्य संबन्धो वै पुनः कृतः।। (1-100-22) तस्मादेतन्मया तस्य तन्निमित्तं प्रभाषितम्।। (1-100-23) शङ्केत वाऽयं लोकोऽथ स्त्रीभावान्मयि संगतम्। तस्मादेतन्मया चापि तच्छुद्ध्यर्थं विचारितम्।। (1-100-24) ब्राह्मणाः क्षत्रिया वैश्याः शूद्राश्चैव पृथग्विधाः। त्वां देवि वूजयिष्यन्ति निर्विशङ्कां पतिव्रताम्।। (1-100-25)

हिंदी अनुवाद: धर्मज्ञ राजा दुष्यंत ने अपनी पत्नी शकुंतला का धर्मपूर्वक सत्कार किया और सान्त्वना (प्रेमपूर्ण) देते हुए उनसे यह वचन कहे— "हम दोनों का पूर्व में जो संबंध हुआ था, वह संसार की दृष्टि सेरोक्ष (गुप्त) था, किंतु आज लोक के सामने वह संबंध पुनः स्थापित और सार्वजनिक कर दिया गया है। मैंने जो सभा में कठोर बातें कही थीं, उसका कारण यही था कि कहीं साधारण लोग स्त्री-स्वभाव के कारण हमारे इस संबंध पर शंका न करें। इसलिए समाज की नजरों में तुम्हारी पवित्रता और शुद्धि सिद्ध करने के लिए ही मैंने वह सब विचारपूर्वक किया था। हे देवी! अब ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य और शूद्र— सभी वर्णों के लोग निर्भय होकर तुम्हारी एक सच्ची पतिव्रता के रूप में पूजा करेंगे।"

व्याख्या: राजा दुष्यंत सभा में अपने द्वारा किए गए कठोर व्यवहार के लिए शकुंतला से प्रेमपूर्वक क्षमा माँगते हैं और स्पष्ट करते हैं कि उनका वह नाटक मात्र लोक-मर्यादा और भविष्य में शकुंतला पर उठने वाले किसी भी सामाजिक लांछन को हमेशा के लिए मिटाने के लिए आवश्यक था।

श्लोक 26-29

पुत्रश्चायं वृतो राज्ये त्वमग्रमहिषी भव।। (1-100-26) यच्च कोपनयात्यर्थं त्वयोक्तोऽस्म्यप्रियं प्रिये। प्रणयिन्या विशालाक्षितत्क्षान्तं ते मया शुभे।। (1-100-27) अनृतं वाप्यनिष्टं वा दुरुक्तं वातिदुष्कृतम्। त्वयाप्येवं विशालाक्षि क्षन्तव्यं मम दुर्वचः। क्षान्त्या पतिकृते नार्यः पातिव्रत्यं व्रजन्ति ताः।। (1-100-28) एवमुक्त्वा तु राजर्षिस्तामनिन्दितगामिनीम्। अन्तःपुरं प्रवेश्याथ दुष्यन्तो महिषीं प्रियाम्।। (1-100-29)

हिंदी अनुवाद: "इस बालक को राज्य पर नियुक्त किया गया है और तुम हमारी पटरानी (अग्रमहिषी) बनो। हे विशालाक्षी प्रिये! क्रोध में भरकर तुमने मुझसे जो अप्रिय वचन कहे थे, प्रेमवश मैंने तुम्हारे वे सारे शब्द क्षमा कर दिए हैं। हे विशालाक्षी! असत्य, अनिष्ट, कठोर या अत्यंत दुष्ट वचन— तुमने जो भी मुझसे कहा हो, उसे भी तुम्हें मेरा वह दुर्वचन समझकर क्षमा कर देना चाहिए। क्षमाशीलता के द्वारा ही नारियाँ अपने पातिव्रत्य धर्म को सिद्ध करती हैं।" ऐसा कहकर राजर्षि दुष्यंत ने अनिंदितगामिनी (निर्दोष गति वाली) अपनी प्रिय पत्नी शकुंतला को अंतःपुर (राजमहल) में प्रवेश कराया।

व्याख्या: दुष्यंत शकुंतला को अपनी पटरानी का पद सौंपते हैं। वे पारस्परिकता की बात करते हैं— जिस प्रकार उन्होंने शकुंतला का क्रोध माफ किया, उसी प्रकार वे शकुंतला से अनुरोध करते हैं कि वह भी उनके द्वारा कहे गए अपमानजनक वचनों को भूल जाए।

श्लोक 30-36

वासोभिरन्नपानैश्च पूजयित्वा तु भारत। स मातरमुपस्थाय रथन्तर्यामभाषत।। (1-100-30) मम पुत्रो वने जातस्तव शोकप्रणशनः। ऋणादद्य विमुक्तोऽहं तव पौत्रेण शोभने।। (1-100-31) विश्वामित्रसुता चेयं कण्वेन च विवर्धिता। स्नुषा तव महाभागे प्रसीदस्व शकुन्तलाम्।। (1-100-32) पुत्रस्य वचनं श्रुत्वा पौत्रं सा परिषस्वजे। पादयोः पतितां तत्र रथन्तर्या शकुन्तलाम्।। (1-100-33) परिष्वज्य च बाहुभ्यां हर्षादश्रुण्यवर्तयत्। उवाच वचनं सत्यं लक्षये लक्षणानि च।। (1-100-34) तव पुत्रो विशालाक्षि चक्रवर्ती भविष्यति। तव भर्ता विशालाक्षि त्रैलोक्यविजयी भवेत्।। (1-100-35) दिव्यान्भोगाननुप्राप्ता भव त्वं वरवर्णिनि। एवमुक्त्या रथ्तर्या परं हर्षमवाप सा।। (1-100-36)

हिंदी अनुवाद: हे भारतवंशी! उत्तम वस्त्रों, अन्नों और पान से सबका सत्कार करने के बाद राजा दुष्यंत ने अपनी माता (रथन्तरी/राजमाता) के पास जाकर उनसे कहा— "हे शोभने! वन में उत्पन्न हुआ यह मेरा पुत्र तुम्हारे सारे शोकों का नाश करने वाला है। आज तुम्हारे इस पौत्र (पोते) के कारण मैं पितृ-ऋण से मुक्त हो गया हूँ। महाभागे! यह विश्वामित्र की पुत्री है और कण्व ऋषि द्वारा पाली-बढ़ाई गई है, यह तुम्हारी पुत्रवधू शकुंतला है, इस पर प्रसन्न हो जाओ।" पुत्र के ऐसे वचन सुनकर राजमाता ने अपने पोते को गले से लगा लिया और चरणों में पड़ी हुई शकुंतला को अपनी दोनों बाहों से उठाकर प्रेम और हर्ष के आँसू बहाए। उन्होंने सत्य वचन कहते हुए और शकुंतला के शुभ लक्षणों को देखकर कहा— "हे विशालाक्षी! तुम्हारा यह पुत्र चक्रवर्ती सम्राट बनेगा और तुम्हारे पति (दुष्यंत) त्रैलोक्य विजयी हों। हे वरवर्णिनि! तुम दिव्य भोगों को प्राप्त करो।" राजमाता के इन वचनों से शकुंतला को परम हर्ष प्राप्त हुआ।

व्याख्या: राजमहल में प्रवेश के उपरांत राजा दुष्यंत अपनी माता (रथन्तरी) के समक्ष शकुंतला और उनके पुत्र का परिचय कराते हैं। राजमाता स्नेहपूर्वक शकुंतला को अपनाती हैं और उनके उज्जवल भविष्य का आशीर्वाद देती हैं।

श्लोक 37-40

शकुन्तलां तदा राजा शास्त्रोक्तेनैव कर्मणा। ततोऽग्रमहिषीं कृत्वा सर्वाभरणभूषिताम्।। (1-100-37) ब्राह्मणेभ्यो धनं दत्त्वा सैनिकानां च भूपतिः। दौष्यन्तिं च ततो राजा पुत्रं शाकुन्तलं तदा।। (1-100-38) भरतं नामतः कृत्वा यौवराज्येऽभ्यषेचयत्। भरते भारमावेश्य कृतकृत्योऽभवन्नृपः।। (1-100-39) ततो वर्षशतं पूर्णं राज्यं कृत्वा नराधिपः। गत्वा वनानि दुष्यन्तः स्वर्गलोकमुपेयिवान्।। (1-100-40)

हिंदी अनुवाद: तत्पश्चात राजा दुष्यंत ने शास्त्रोक्त विधियों के अनुसार शकुंतला को समस्त आभूषणों से अलंकृत करके अपनी मुख्य पटरानी (अग्रमहिषी) के पद पर प्रतिष्ठित किया। भूपति दुष्यंत ने ब्राह्मणों और सैनिकों को भारी दान दिया। इसके बाद उन्होंने शकुंतला के पुत्र दौष्यन्त (शाकुंतल) का नाम 'भरत' रखकर उसे युवराज के पद पर अभिषेक कर दिया। राज्य का सारा भार भरत के कंधों पर सौंपकर राजा दुष्यंत पूरी तरह कृतकृत्य (संतुष्ट) हो गए। तदनन्तर, पूरे सौ वर्षों तक सफलतापूर्वक राज्य का संचालन करने के बाद नराधिप दुष्यंत वन की ओर प्रस्थान कर गए और अंततः स्वर्गलोक को प्राप्त हुए।

व्याख्या: यह संपूर्ण आख्यान एक भव्य और सुखांत समापन की ओर बढ़ता है। शकुंतला को उनका अधिकार और सम्मान मिल जाता है, बालक भरत युवराज बनते हैं, जिनके नाम से देश का नाम 'भारत' अमर होता है, और राजा दुष्यंत अपने सभी कर्तव्यों का निर्वाह कर अंत में वानप्रस्थ आश्रम अपनाते हुए स्वर्गगामी होते हैं।

।। इति श्रीमन्महाभारते आदिपर्वणि संभवपर्वणि शततमोऽध्यायः।। 100 ।।

संभवपर्वणि एकोनशततमोऽध्यायः