संसार है, या नहीं है, संसार का सत्य क्या है?, अथवा केवल भ्रम है।

संसार है, या नहीं है? संसार का सत्य क्या है, अथवा केवल भ्रम है? — ज्ञान विज्ञान ब्रह्मज्ञान
वैदिक विज्ञान एवं तत्वमीमांसा (Metaphysics)

संसार है, या नहीं है?
संसार का सत्य क्या है, अथवा केवल भ्रम है?

लेखक: मनोज पाण्डेय | ज्ञान विज्ञान ब्रह्मज्ञान अनुसंधान

सृष्टि के आरंभ से ही मानव चेतना के समक्ष यह अत्यंत गूढ़ और शाश्वत प्रश्न खड़ा रहा है कि—"यह संसार क्या है? क्या इसकी कोई स्वतंत्र सत्ता है, अथवा यह केवल एक चित्त का भ्रम (illusion) मात्र है?" प्राचीन भारतीय मनीषियों और दार्शनिकों ने इस सत्य की खोज में अपनी चेतना की गहराइयों को मापा है। आइए, इस गंभीर विषय पर दार्शनिक, तार्किक और पतंजलि योगसूत्र के प्रकाश में वैज्ञानिक विश्लेषण के साथ विचार करते हैं।

१. संसार का वास्तविक अर्थ: 'संयम' का सार

यदि हम व्याकरण और तत्वमीमांसा की दृष्टि से देखें, तो 'संसार' शब्द का संधि-विच्छेद करने पर हमें दो अत्यंत महत्वपूर्ण व्यावहारिक तत्व प्राप्त होते हैं—संयम और सार

इसका सीधा और व्यावहारिक अर्थ यह हुआ कि: "संसार संयम का सार है" (The world is the essence of restraint)। महर्षि पतंजलि ने अपने अष्टांग योग के विभूतिपाद में संयम शब्द को अत्यंत वैज्ञानिक ढंग से परिभाषित किया है:

त्रयमेकत्र संयमः ॥ ३.४ ॥
पदच्छेद व अर्थ: त्रयम् (तीनों — धारणा, ध्यान और समाधि), एकत्र (एक ही विषय में सम्मिलित रूप से क्रियाशील होने की स्थिति), संयम: (संयम कहलाती है)।
अर्थात्, अष्टांग योग के अंतिम तीन अंतरंग अंगों—धारणा, ध्यान और समाधि का किसी एक ही ध्येय विषय में एक साथ अनुभूत होना ही 'संयम' है।

वहीं दूसरी ओर, 'सार' का तात्पर्य किसी विचार, अनुभव, तथ्य अथवा पदार्थ का सबसे आवश्यक, मुख्य और वास्तविक भाग होता है। जैसे आम का संपूर्ण सार उसका रस है, वैसे ही हमारी चेतना का संपूर्ण व्यावहारिक अनुभव क्षेत्र इस 'संयम' के त्रिक (धारणा, ध्यान, समाधि) पर टिका हुआ है। इस प्रकार, संसार का सीधा अर्थ हमारी चेतना द्वारा अनुभूत किए जाने वाले धारणा, ध्यान और समाधि की संयुक्त प्रक्रियाओं का 'सार' है।

२. अष्टांग योग के अंतःसूत्र और जगत का निर्माण

संसार को समझने के लिए हमें संयम को निर्मित करने वाले तीनों चरणों को व्यक्तिगत रूप से समझना होगा, क्योंकि यही हमारे जगत-अनुभव के आधार स्तंभ हैं:

क) धारणा: चेतना का केंद्रीकरण

देशबन्धश्चित्तस्य धारणा ॥ ३.१ ॥
अर्थ: चित्त को शरीर के भीतर किसी स्थान विशेष (जैसे नाभि, हृदय, आज्ञा चक्र) अथवा बाह्य विषय पर केन्द्रित करना, बाँधना या ठहराना ही धारणा कहलाती है।

संसार के संदर्भ में धारणा का अर्थ यह है कि एक चेतन मनुष्य किसी 'देश' (स्थान या Space) में अपनी समग्र मानसिक ऊर्जा को संचित और केन्द्रित करता है। बिना धारणा के किसी भी बाह्य सत्ता का अस्तित्व हमारे लिए अनुभूत नहीं हो सकता।

ख) ध्यान: ज्ञान की एकरूपता

तत्र प्रत्ययैकतानता ध्यानम् ॥ ३.२ ॥
अर्थ: जिस स्थान पर धारणा का अभ्यास किया गया है, वहाँ ध्येय वस्तु के ज्ञान की वृत्ति का लगातार एक ही प्रवाह में बने रहना, अर्थात् ज्ञान की एकरूपता ही ध्यान है।

जब हमारी धारणा स्थिर हो जाती है, तब उस विषय का निरंतर चिंतन चलता है। यही सतत प्रवाह हमारे भीतर 'संसार' की सत्ता को दृढ़ता प्रदान करता है।

ग) समाधि: स्वरूप की शून्यता

तदेवार्थमात्रनिर्भासं स्वरूपशून्यमिव समाधिः ॥ ३.३ ॥
अर्थ: जब ध्यान की अवस्था में ध्यान का स्वयं का अस्तित्व लुप्तप्राय हो जाता है और केवल ध्येय वस्तु का ही आभास शेष रहता है, तब उसे समाधि कहते हैं। इस अवस्था में साधक अपने 'स्व' के स्वरूप को भूलकर केवल ध्येय मात्र में लीन हो जाता है।

३. संसार की क्षणिक सत्ता: जड़ बनाम चेतन

जब हम संसार की सत्यता पर विचार करते हैं, तो हमारे सामने दो मौलिक तत्व प्रकट होते हैं:

  1. जड़ तत्व (Matter): यह पंचमहाभूतों से बना दृश्य शरीर और भौतिक जगत है।
  2. चेतन तत्व (Consciousness / Purusha): वह दृष्टा जो इस संपूर्ण जड़ जगत का साक्षात्कार करता है।

चूँकि संसार और भौतिक शरीर 'जड़' हैं, इसलिए इनकी सत्ता कभी भी शाश्वत (Eternal) नहीं हो सकती। यह जगत पानी के बुलबुले के समान क्षणभंगुर है, जो निरंतर बनता और मिटता रहता है। आधुनिक क्वांटम भौतिकी (Quantum Physics) भी यही मानती है कि पदार्थ का कोई ठोस अस्तित्व नहीं है; यह केवल ऊर्जा तरंगों का संघनन है जो प्रेक्षक (Observer) की उपस्थिति में कण का रूप लेती है।

महत्वपूर्ण ब्रह्मज्ञान दृष्टि:

वह चेतन सत्ता जो इस जड़ संसार का साक्षात्कार करती है, वह संसार के अस्तित्व में आने से पूर्व भी थी और संसार के प्रलय (नष्ट) होने के बाद भी रहेगी। अतः केवल चेतना ही परम सत्य है। संसार केवल कुछ काल के लिए अनुभूत होने वाला एक महा-भ्रम (Cosmic Illusion) है।

४. जाग्रत स्वप्न और आत्मज्ञान

यदि संसार शाश्वत सत्य नहीं है, तो फिर हमारे चारों ओर जो विराट जगत दिखाई देता है, वह क्या है? भारतीय दर्शन इसे "जाग्रत स्वप्न" (Waking Dream) कहता है।

जिस प्रकार निद्रावस्था में देखा गया स्वप्न अत्यंत वास्तविक प्रतीत होता है—वहाँ की पीड़ा से हम रोते हैं और सुख से प्रसन्न होते हैं—परंतु आँख खुलते ही वह स्वप्न तत्क्षण विलीन हो जाता है। ठीक उसी प्रकार, जब मानव चेतना 'संयम' की परम शक्ति के द्वारा स्वयं के आत्म-स्वरूप को जान लेती है, तब इस बाह्य संसार का स्वतंत्र अस्तित्व सदा के लिए समाप्त हो जाता है।

संसार का सत्य केवल अज्ञानियों या अविवेकी जनों की दृष्टि में है। जब ज्ञान की दिव्य चक्षु का उदय होता है, तो यह जड़ शरीर और भौतिक प्रपंच शून्य हो जाते हैं। समाधि वास्तव में एक "जाग्रत मृत्यु" (Conscious Death) की अवस्था है, जहाँ शरीर और संसार के प्रति आसक्ति का पूर्णतः अंत हो जाता है और केवल शुद्ध सच्चिदानंद स्वरूप शेष रह जाता है।

निष्कर्ष

वही व्यक्ति वास्तव में 'संयमी' है जो इस संसार के सार को भली-भांति जानता है। जो जड़ को जड़ और चेतन को चेतन रूप में पृथक कर देख लेता है, वही पूर्ण ज्ञानी है। ऐसे महापुरुष के पास ही ज्ञान, विज्ञान और ब्रह्मज्ञान की वह समग्र एवं परम दृष्टि होती है जो मानव जीवन को अमरत्व प्रदान करती है।

मनोज पाण्डेय
अध्यक्ष एवं संस्थापक
ज्ञान विज्ञान ब्रह्मज्ञान अनुसंधान पीठ

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