ऋग्वेद १.२५.११
अतीत और भविष्य के कर्मों का दर्शन — जीव, संस्कार और जन्म-मरण से मुक्ति का गुप्त विज्ञान
अतो विश्वान्यद्भुता चिकित्वाँ अभि पश्यति ।
कृतानि या च कर्त्वा ॥११॥
यह मंत्र ऋग्वेद १.२५ के उस क्रम को एक अत्यंत सूक्ष्म स्तर पर ले जाता है जिसमें ऋषि पहले काल, फिर प्राण, फिर शरीर, फिर चेतना, फिर बुद्धि और अनुशासन, और अब अंततः कर्म, संस्कार तथा जन्म-मरण की पूरी प्रक्रिया के ज्ञान तक पहुँचते हुए दिखाई देते हैं।
पिछले मंत्र में जिस अवस्था का वर्णन आया था—
नि षसाद धृतव्रतो वरुणः पस्त्यास्वा ।
साम्राज्याय सुक्रतुः ॥
उसमें जीव शरीर में स्थित रहते हुए भी अपनी चेतना को शरीर की सीमाओं से ऊपर उठाने में समर्थ होता है। बुद्धि जब प्राकृतिक नियमों और ऋत को धारण करती है, तब चेतना उस व्यापक नियामक सत्ता के निकट प्रतिष्ठित होती है। शरीर तब केवल भौतिक बंधन नहीं रहता, बल्कि चेतना के रूपांतरण का साधन बन जाता है।
अब उसी अवस्था से आगे ऋषि कहते हैं—
अतो
अर्थात् इसी स्थिति से, इसी उपलब्धि के आधार से, इसी व्यापक चेतना के केंद्र से—
विश्वानि अद्भुता
वह समस्त अद्भुत घटनाओं, आश्चर्यजनक व्यवस्थाओं और इस विराट सृष्टि में व्याप्त उन रहस्यमय प्रक्रियाओं को—
चिकित्वाँ अभि पश्यति
ज्ञानवान होकर पूर्ण रूप से देखता और पहचानता है।
और फिर मंत्र का अंतिम भाग इस दर्शन को केवल वर्तमान तक सीमित नहीं रखता—
कृतानि या च कर्त्वा।
जो कुछ हो चुका है और जो कुछ किया जाना है।
अर्थात् चेतना की दृष्टि अब केवल वर्तमान शरीर और वर्तमान जीवन की घटनाओं तक सीमित नहीं रहती। वह अपने अस्तित्व के पीछे कार्य कर चुके कर्मों को और आगे संभावित कर्म-परिणामों की दिशा को भी देखने में समर्थ होती है।
यहीं से यह मंत्र पुनर्जन्म, संस्कार, सूक्ष्म शरीर, कारण शरीर और कर्मबंधन के अत्यंत गहन विज्ञान से जुड़ जाता है।
“अतो” — पिछले मंत्र की उपलब्धि से आगे
मंत्र का पहला शब्द है—
अतो
यह छोटा-सा शब्द पिछले मंत्र और इस मंत्र के बीच एक बहुत बड़ी कड़ी स्थापित करता है।
पिछले मंत्र में जीव ने क्या प्राप्त किया?
वह शरीर में स्थित होकर भी शरीर तक सीमित नहीं रहा।
उसकी बुद्धि धृतव्रत हुई।
उसने नियम और ऋत को धारण किया।
वह वरुण की व्यापक नियामक सत्ता में प्रतिष्ठित हुआ।
वह सुक्रतुः हुआ—श्रेष्ठ बुद्धि और श्रेष्ठ कर्म से युक्त।
और फिर—
साम्राज्याय
वह व्यापक सत्ता और आंतरिक स्वाधिकार की स्थिति तक पहुँचा।
अब अतो कहता है—
यहीं से आगे।
यही इस मंत्र की कुंजी है।
जिस जीव की चेतना अभी तक केवल शरीर के भीतर चल रही प्रक्रियाओं को अनुभव करती थी, अब वह उन प्रक्रियाओं के कारणों और परिणामों को देखने लगती है।
वर्तमान शरीर उसके लिए अंतिम वास्तविकता नहीं रहता।
वह पूछ सकता है—
यह शरीर मुझे क्यों मिला?
इस जीवन की परिस्थितियाँ किस कारण से निर्मित हुईं?
मेरी प्रवृत्तियाँ कहाँ से आईं?
मेरी इच्छाएँ और संस्कार किस आधार पर हैं?
मेरे वर्तमान कर्म आगे क्या उत्पन्न करेंगे?
और यदि इन कारणों को समझ लिया जाए तो क्या भविष्य की दिशा बदली जा सकती है?
यहीं से मंत्र का विज्ञान साधारण जीवन-विज्ञान से निकलकर कर्म और जन्म-विज्ञान में प्रवेश करता है।
“विश्वानि” — समस्त विश्व का विस्तार
इसके बाद आता है—
विश्वानि
अर्थात् समस्त, संपूर्ण, अनेक रूपों में व्याप्त।
यहाँ विश्व केवल पृथ्वी या दिखाई देने वाला भौतिक संसार नहीं है।
ऋषि की दृष्टि में विश्व का अर्थ उन सभी स्तरों तक विस्तृत हो सकता है जिनमें जीव अनुभव करता है और जिनमें प्रकृति अपनी विविध व्यवस्थाओं को प्रकट करती है।
एक शरीर स्वयं एक विश्व है।
एक कोशिका स्वयं एक सूक्ष्म संसार है।
मानव मन अपने भीतर स्मृति, विचार, कल्पना, भावना और संस्कारों का एक विश्व धारण करता है।
पृथ्वी एक विश्व है।
सौरमंडल एक व्यापक विश्व है।
आकाशगंगाएँ एक और विराट स्तर खोलती हैं।
और आध्यात्मिक दृष्टि से स्थूल, सूक्ष्म और कारण स्तरों का अपना-अपना आयाम है।
इसलिए विश्वानि में केवल बाहरी ब्रह्मांड का विस्तार नहीं, बल्कि अस्तित्व के अनेक स्तरों का विस्तार भी दिखाई देता है।
जीव जब सामान्य इंद्रियबोध तक सीमित होता है तब वह केवल वर्तमान दृश्य विश्व को देखता है।
लेकिन चेतना के विस्तार के साथ उसके लिए अस्तित्व की परतें खुलती जाती हैं।
“अद्भुता” — अद्भुत घटनाओं का दर्शन
अब ऋषि कहते हैं—
अद्भुता
अर्थात् अद्भुत, आश्चर्यजनक, विस्मयकारी।
यहाँ अद्भुत का अर्थ केवल चमत्कार नहीं है।
जिस व्यवस्था को सामान्य मनुष्य सामान्य समझकर छोड़ देता है, उसके भीतर छिपे कारण-क्रम को देख लेना भी अद्भुत ज्ञान है।
मनुष्य जन्म लेता है।
वह बढ़ता है।
उसके भीतर स्मृतियाँ बनती हैं।
प्रवृत्तियाँ बनती हैं।
व्यक्तित्व विकसित होता है।
वह कर्म करता है।
कर्म के परिणाम आते हैं।
उन परिणामों से नई इच्छाएँ और संस्कार बनते हैं।
फिर वही संस्कार आगे के कर्मों को प्रभावित करते हैं।
यह पूरा चक्र सामान्य दृष्टि से केवल जीवन की घटनाएँ है।
लेकिन ऋषि की दृष्टि में यही एक गहन कर्म-तंत्र है।
इसी प्रकार एक बीज से वृक्ष उत्पन्न होता है और वृक्ष फिर असंख्य बीज उत्पन्न करता है।
बीज में वृक्ष की संभावना है और वृक्ष में भविष्य के बीज की संभावना।
वर्तमान में दिखाई देने वाला वृक्ष केवल वर्तमान नहीं है; उसमें अतीत का बीज और भविष्य के असंख्य वृक्ष दोनों छिपे हैं।
ठीक इसी प्रकार वर्तमान जीव केवल वर्तमान शरीर नहीं है।
उसके भीतर अतीत के संस्कारों का प्रभाव और भविष्य के कर्मों की संभावनाएँ भी विद्यमान हैं।
यही अद्भुता की गहराई है।
“चिकित्वाँ” — केवल देखना नहीं, जानकर देखना
मंत्र का सबसे महत्वपूर्ण शब्दों में से एक है—
चिकित्वाँ
यह केवल आँखों से देखना नहीं है।
यह जानने वाला, समझने वाला, विवेकपूर्वक पहचानने वाला ज्ञान है।
आँखें किसी वस्तु को देख सकती हैं, लेकिन उसके कारण को नहीं जानतीं।
एक वैज्ञानिक microscope से कोशिका देख सकता है और उसके भीतर की संरचना को समझ सकता है।
एक astronomer telescope से दूरस्थ आकाशीय पिंडों को देख सकता है और उनके प्रकाश, गति तथा संरचना का अध्ययन कर सकता है।
इसी प्रकार ऋषि की चेतना जब सूक्ष्म होती है तो वह केवल घटना को नहीं देखती—वह घटना के पीछे के कारण-क्रम को देखती है।
यही चिकित्वाँ है।
यहाँ ज्ञान का अर्थ सूचना का संग्रह नहीं है।
यह कारण और परिणाम की प्रत्यक्ष पहचान है।
जीव देखता है कि उसके भीतर कोई संस्कार क्यों उत्पन्न हुआ।
वह देखता है कि कौन-सी प्रवृत्ति किस पुराने कारण से जुड़ी है।
वह देखता है कि कौन-सा कर्म किस प्रकार का परिणाम उत्पन्न करता है।
और वह यह भी देखता है कि वर्तमान में किया गया कर्म भविष्य की दिशा को किस प्रकार बदल सकता है।
“अभि पश्यति” — चारों ओर से पूर्ण दर्शन
इसके बाद आता है—
अभि पश्यति
केवल पश्यति—देखता है—नहीं।
अभि पश्यति में चारों ओर से, पूर्णतः, सामने रखकर देखने का भाव आता है।
यहाँ चेतना किसी घटना को आंशिक रूप से नहीं देखती।
वह उसके कारण, वर्तमान प्रभाव और भविष्य की दिशा को एक साथ देखने की क्षमता प्राप्त करती है।
सामान्य मनुष्य वर्तमान घटना को देखता है।
वह कहता है—
“यह मेरे साथ अभी हो रहा है।”
लेकिन विस्तृत चेतना पूछती है—
“यह क्यों हो रहा है?”
फिर उससे आगे—
“इसके पीछे कौन-से संस्कार हैं?”
और फिर—
“यदि मैं इसी प्रकार कर्म करता रहा तो आगे इसका परिणाम क्या होगा?”
इस प्रकार—
अतीत → वर्तमान → भविष्य
एक ही ज्ञान-क्षेत्र में जुड़ जाते हैं।
यही इस मंत्र की सबसे बड़ी गहराई है।
“कृतानि” — जो किया जा चुका है
अब मंत्र हमें सीधे कर्म के क्षेत्र में ले जाता है—
कृतानि
जो किए जा चुके हैं।
अर्थात् अतीत में संपन्न कर्म।
लेकिन यहाँ केवल इस वर्तमान जन्म के कर्मों को रखना पर्याप्त नहीं है, क्योंकि मंत्र की आपकी व्याख्या जिस पूर्ण कर्म-संस्कार व्यवस्था की ओर जा रही है, उसमें जीव का वर्तमान अस्तित्व भी किसी पूर्व कारण-श्रृंखला से जुड़ा हुआ है।
मनुष्य अपने वर्तमान जीवन में अनेक संस्कार लेकर आता है।
किसी को बचपन से ही संगीत की सहज प्रवृत्ति दिखाई देती है।
किसी में गणित की विशेष रुचि होती है।
किसी में किसी प्रकार की विशेष प्रवृत्ति अत्यंत तीव्र होती है।
आधुनिक विज्ञान ऐसे अनेक अंतर समझाने के लिए genetics, environment, development और learning जैसे कारकों का अध्ययन करता है।
लेकिन आध्यात्मिक कर्म-विज्ञान इससे भी एक गहरे प्रश्न की ओर जाता है—
क्या वर्तमान व्यक्तित्व की पूरी दिशा केवल इसी वर्तमान जन्म में निर्मित हुई है?
यहीं से पुनर्जन्म और संस्कार का प्रश्न सामने आता है।
ऋषि की दृष्टि में जीव का वर्तमान केवल वर्तमान शरीर से आरंभ नहीं होता।
वर्तमान शरीर के पीछे एक पूर्व कारण-क्रम है।
पुनर्जन्म — वर्तमान शरीर की पृष्ठभूमि
आपने इस मंत्र की व्याख्या में एक महत्वपूर्ण बात रखी है—
यदि जीव अतीत के कृतानि को देख सकता है, तो वह उन कारणों को भी देख सकता है जिनके कारण वर्तमान शरीर प्राप्त हुआ।
यहाँ पुनर्जन्म का प्रश्न सीधे सामने आता है।
सामान्य अवस्था में मनुष्य अपने जन्म से पहले की कोई स्मृति नहीं रखता।
उसे अपना वर्तमान जीवन ही अपनी पूरी यात्रा दिखाई देता है।
लेकिन यदि चेतना ऐसी अवस्था प्राप्त कर ले जहाँ स्मृति और संस्कारों के सूक्ष्म स्तरों का दर्शन संभव हो, तब वर्तमान जन्म उसके लिए एक अकेली घटना नहीं रहता।
वह एक निरंतरता का एक चरण बन जाता है।
पूर्व कर्मों के संस्कार।
उन संस्कारों से उत्पन्न प्रवृत्तियाँ।
उन प्रवृत्तियों के आधार पर कर्म।
और कर्मों से आगे आने वाले परिणाम।
यह क्रम ही जन्म-मरण की निरंतरता को बनाए रखता है।
यही कारण है कि भारतीय दर्शन में जन्म को केवल शरीर का अचानक प्रकट हो जाना नहीं माना गया, बल्कि कर्म और संस्कार की पूर्ववर्ती व्यवस्था से जोड़ा गया है।
“या च कर्त्वा” — जो अभी किया जाना है
मंत्र अब अतीत से भविष्य की ओर मुड़ता है—
या च कर्त्वा
जो किया जाना है।
यहीं इस मंत्र की अद्भुतता और बढ़ जाती है।
यदि केवल अतीत को देखना ही उद्देश्य होता तो जीव केवल अपने कर्मों का इतिहास जानता।
लेकिन ऋषि यहाँ भविष्य की ओर भी संकेत करते हैं।
अर्थात् जीव संभावित कर्मों और उनके परिणामों की दिशा को देखने में समर्थ होता है।
यह भविष्य की किसी एक निश्चित घटना को देखने मात्र का विषय नहीं है।
यह कारण-श्रृंखला की पहचान है।
यदि यह कर्म किया जाएगा तो यह परिणाम उत्पन्न होगा।
यदि यह संस्कार सक्रिय रहेगा तो यह प्रवृत्ति बढ़ेगी।
यदि यह प्रवृत्ति कर्म में बदलेगी तो उसके परिणाम होंगे।
और यदि वर्तमान में उस मूल कारण को बदल दिया जाए, तो भविष्य की पूरी दिशा बदल सकती है।
यहीं मनुष्य के लिए सबसे बड़ी स्वतंत्रता खुलती है।
भविष्य पहले से बंद नहीं है
इस मंत्र की आपकी व्याख्या का एक अत्यंत महत्वपूर्ण बिंदु यही है कि भविष्य केवल भाग्य की तरह पहले से बंद नहीं है।
यदि जीव अपने अतीत के संस्कारों को जानता है और भविष्य की कर्म-श्रृंखला को भी देख सकता है, तो वर्तमान कर्म उसके लिए परिवर्तन का क्षेत्र बन जाता है।
अर्थात्—
अतीत कारण दे सकता है, लेकिन वर्तमान चेतना दिशा बदल सकती है।
यही साधना का महत्व है।
यदि किसी वृक्ष की जड़ में रोग है और मनुष्य केवल उसकी शाखाएँ काटता रहे, तो रोग फिर प्रकट होगा।
लेकिन यदि मूल कारण को पहचाना जाए और वहीं उपचार किया जाए, तब भविष्य का विकास बदल सकता है।
इसी प्रकार कर्म-संस्कार की जड़ को पहचानना और उसे रूपांतरित करना ही जन्म-मरण की श्रृंखला से मुक्ति की दिशा बनता है।
संस्कार — सूक्ष्म बीज
यहाँ संस्कार की अवधारणा अत्यंत महत्वपूर्ण हो जाती है।
कर्म केवल बाहरी घटना नहीं है।
कर्म मन में एक प्रभाव छोड़ता है।
एक विचार बार-बार दोहराया जाए तो प्रवृत्ति बनती है।
प्रवृत्ति बार-बार कर्म में बदलती है।
कर्म पुनः उसी प्रवृत्ति को मजबूत करता है।
इस प्रकार मनुष्य अपने ही कर्मों से अपने भीतर एक सूक्ष्म संरचना बनाता है।
यही संस्कार का विज्ञान है।
संस्कार को एक प्रकार के सूक्ष्म बीज के रूप में समझा जा सकता है।
बीज दिखाई नहीं देता, लेकिन उसके भीतर भविष्य के वृक्ष की संभावना रहती है।
इसी प्रकार संस्कार स्थूल शरीर पर दिखाई न देने पर भी व्यवहार, इच्छा, प्रतिक्रिया और कर्म की दिशा को प्रभावित कर सकता है।
इसलिए अतीत के कर्मों को केवल इतिहास मानना पर्याप्त नहीं है।
उनका प्रभाव वर्तमान चेतना में जीवित रहता है।
सूक्ष्म शरीर और कारण शरीर
यहीं भारतीय दर्शन का सूक्ष्म शरीर और कारण शरीर का विचार इस मंत्र से जुड़ता है।
स्थूल शरीर वह है जो दिखाई देता है।
लेकिन मन, बुद्धि, इंद्रियाँ और संस्कार स्थूल शरीर से सूक्ष्म स्तर पर कार्य करते हैं।
इसी सूक्ष्म व्यवस्था के कारण एक व्यक्ति का व्यक्तित्व दूसरे व्यक्ति से अलग होता है।
कारण शरीर की धारणा इससे भी गहरे उस कारण-बीज की ओर संकेत करती है जहाँ से अनुभव और जन्म की संभावनाओं की मूल संरचना जुड़ी हुई मानी जाती है।
इस दृष्टि से वर्तमान शरीर एक परिणाम है।
उसके पीछे सूक्ष्म कारण हैं।
और उन कारणों के पीछे कर्म-संस्कार की और गहरी व्यवस्था है।
इसलिए यदि जीव केवल शरीर को बदलता है लेकिन संस्कारों को नहीं बदलता, तो केवल बाहरी रूपांतरण से जन्म-मरण का चक्र समाप्त नहीं होता।
मुक्ति के लिए कारण-बीज तक पहुँचना आवश्यक है।
योगदर्शन का तारतम्य — कर्माशय और जन्म
यहाँ पतञ्जलि योगदर्शन का अत्यंत महत्वपूर्ण सूत्र सामने आता है—
क्लेशमूलः कर्माशयो दृष्टादृष्टजन्मवेदनीयः ॥
योगदर्शन कहता है कि क्लेशों को मूल मानने वाला कर्माशय ऐसे कर्म-संचय का आधार है जिसका फल दृष्ट और अदृष्ट जन्मों में अनुभव किया जा सकता है।
यह मंत्र के—
कृतानि या च कर्त्वा
के साथ एक गहरा तारतम्य बनाता है।
कर्म केवल समाप्त हुई घटना नहीं है।
उसका एक संस्कारात्मक संचय होता है।
वही आगे फल देने की क्षमता रखता है।
और जब तक उसका मूल कारण बना रहता है, जन्म और अनुभव की श्रृंखला चलती रहती है।
इसी क्रम में योगदर्शन आगे कहता है—
सति मूले तद्विपाको जात्यायुर्भोगाः ॥
जब मूल कारण विद्यमान रहता है तब उसका फल जाति, आयु और भोग के रूप में प्रकट होता है।
यहाँ “जाति” को जन्म-प्रकार, “आयु” को जीवन की अवधि और “भोग” को अनुभव के रूप में देखा जाता है।
अर्थात् कर्म का मूल केवल अतीत की स्मृति नहीं है; वह भविष्य के अनुभव की संरचना से भी जुड़ा हुआ है।
दग्धबीज — जब कर्म का मूल अपनी शक्ति खो देता है
यहीं आपकी व्याख्या का दग्धबीज वाला विचार अत्यंत महत्वपूर्ण हो जाता है।
साधारण बीज में भविष्य का वृक्ष बनने की शक्ति होती है।
लेकिन यदि बीज को इस प्रकार परिवर्तित कर दिया जाए कि उसमें अंकुरण की क्षमता न रहे, तो वह बीज जैसा दिखाई देने पर भी नया वृक्ष उत्पन्न नहीं कर सकता।
इसी प्रकार कर्म-संस्कार भी केवल स्मृति के रूप में रह सकते हैं, लेकिन यदि उनकी फल उत्पन्न करने वाली मूल शक्ति समाप्त हो जाए तो वे भविष्य के बंधन का कारण नहीं रहते।
यहाँ “दग्धबीज” की उपमा भारतीय योग और वेदान्तीय परंपरा में इसी प्रकार के आध्यात्मिक रूपांतरण को व्यक्त करती है।
योगदर्शन का अंतिम लक्ष्य इसी कर्म-बीज की पुनरावृत्ति को समाप्त करने की दिशा में जाता है।
जब क्लेश समाप्त होते हैं, कर्माशय क्षीण होता है और चेतना अपने वास्तविक स्वरूप में प्रतिष्ठित होती है, तब जन्म की बाध्यकारी प्रक्रिया समाप्त होती है।
वर्तमान कर्म से भविष्य बदलना
यही कारण है कि इस मंत्र में भविष्य की ओर संकेत इतना महत्वपूर्ण है।
यदि भविष्य केवल निश्चित होता, तो साधना का कोई वास्तविक अर्थ नहीं होता।
लेकिन यदि वर्तमान चेतना अपने संस्कारों को पहचानकर कर्म की दिशा बदल सकती है, तो वर्तमान क्षण ही परिवर्तन का केंद्र बन जाता है।
अतीत—
कृतानि
है।
वर्तमान—
चिकित्वाँ
का क्षेत्र है।
और भविष्य—
कर्त्वा
की दिशा है।
अर्थात् वर्तमान ज्ञान अतीत को पहचानता है और भविष्य को पुनर्गठित करता है।
यहाँ मनुष्य केवल भाग्य का उपभोक्ता नहीं रहता।
वह अपने कर्म-तंत्र को समझकर उसका रूपांतरण करने वाला बन जाता है।
आधुनिक विज्ञान की दृष्टि — अतीत कैसे वर्तमान को प्रभावित करता है
आधुनिक विज्ञान भी इस बात को अनेक स्तरों पर स्वीकार करता है कि वर्तमान जीवित व्यवस्था अपने अतीत की सूचनाएँ और प्रभाव अपने भीतर लेकर चलती है।
Genetics में DNA पूर्ववर्ती जैविक सूचना का वाहक है।
Developmental biology दिखाती है कि शरीर की वर्तमान संरचना विकास की अनेक पूर्ववर्ती अवस्थाओं से होकर बनती है।
Neuroscience में learning और memory के कारण पूर्व अनुभव भविष्य के व्यवहार को प्रभावित करते हैं।
Psychology में conditioning और learned patterns यह दिखाते हैं कि पुराने अनुभव आगे की प्रतिक्रियाओं और निर्णयों को प्रभावित कर सकते हैं।
Epigenetics में भी यह अध्ययन किया जाता है कि gene expression पर्यावरण और जीवन-परिस्थितियों से किस प्रकार प्रभावित हो सकता है।
इस वैज्ञानिक दृष्टि से वर्तमान जीव एक पूर्णतः अलग और शून्य से आरंभ होने वाली व्यवस्था नहीं है।
उसके भीतर अतीत की सूचना और प्रभाव मौजूद हैं।
लेकिन यहाँ एक महत्वपूर्ण अंतर भी है।
आधुनिक विज्ञान इन प्रक्रियाओं को मुख्यतः genetic, developmental, neural, behavioral और environmental mechanisms के माध्यम से समझता है। पूर्वजन्म के संस्कारों और सूक्ष्म शरीर की अवधारणा वैज्ञानिक Biology का स्थापित निष्कर्ष नहीं है।
ऋषि-दृष्टि इससे अलग एक व्यापक आध्यात्मिक कर्म-सिद्धांत प्रस्तुत करती है जिसमें वर्तमान जीवन की पृष्ठभूमि वर्तमान जन्म से भी पीछे तक जाती है।
यहीं वैदिक और आधुनिक वैज्ञानिक दृष्टियों को उनके-अपने क्षेत्र में रखकर देखा जा सकता है।
चेतना का विज्ञान — स्मृति से आगे
स्मृति और चेतना एक ही वस्तु नहीं हैं।
मनुष्य को बहुत-सी बातें याद नहीं रहतीं, फिर भी वे उसके व्यवहार को प्रभावित कर सकती हैं।
इसी प्रकार चेतना के गहरे स्तर पर संस्कारों की धारणा स्मृति की सामान्य मानसिक प्रक्रिया से अधिक व्यापक है।
यदि किसी पूर्व अनुभव का पूरा विवरण याद न भी हो, तो उसकी प्रवृत्ति वर्तमान व्यवहार में दिखाई दे सकती है।
यही बात संस्कार के विचार को समझने के लिए महत्वपूर्ण है।
संस्कार का अर्थ केवल “मुझे घटना याद है” नहीं है।
संस्कार का अर्थ यह भी है कि किसी पूर्व अनुभव ने चेतना की प्रवृत्ति को प्रभावित किया है।
इसलिए ऋषि का चिकित्वाँ केवल पुराने घटनाक्रम को फिल्म की तरह देखने वाला ज्ञान नहीं है।
यह उस कारण-तंत्र को जानने की क्षमता है जो वर्तमान जीवन के भीतर काम कर रहा है।
अभि पश्यति — अपने ही जन्म का कारण देखना
इस बिंदु पर मंत्र की आपकी व्याख्या और अधिक गहरी हो जाती है।
सामान्य जीव अपने शरीर को देखता है।
ज्ञानी जीव शरीर को देखने वाले को पहचानता है।
और जब चेतना और अधिक सूक्ष्म होती है, तब जीव अपने वर्तमान शरीर के पीछे के कारणों को देखने की दिशा में बढ़ता है।
तब प्रश्न उठता है—
मैं इस शरीर में क्यों हूँ?
यह प्रश्न केवल दार्शनिक नहीं रहता।
यह अस्तित्व का प्रत्यक्ष प्रश्न बन जाता है।
यदि चेतना अपने पूर्व संस्कारों और कर्मों की संरचना को देख सके तो उसे अपने वर्तमान जन्म की पृष्ठभूमि दिखाई दे सकती है।
और यदि वह आगे के कर्म-परिणामों को भी देख सके तो वह समझ सकती है कि वर्तमान जीवन के निर्णय आगे किस दिशा में ले जाएंगे।
इसलिए—
अभि पश्यति
के भीतर केवल भविष्यवाणी नहीं, बल्कि अस्तित्व के कारण-क्रम का दर्शन है।
भविष्य को बदलने की स्वतंत्रता
यहाँ एक और गहरा रहस्य सामने आता है।
यदि जीव अपने भविष्य के संभावित परिणामों को देखता है, तो उसका उद्देश्य केवल उन्हें देखकर भयभीत होना नहीं है।
उद्देश्य है—
कारण को बदलना।
यदि किसी कर्म का परिणाम बंधन है, तो कर्म की दिशा बदली जाए।
यदि किसी संस्कार से पुनरावृत्ति हो रही है, तो संस्कार के मूल को जाना जाए।
यदि किसी इच्छा से कर्म पैदा हो रहा है और कर्म से नया संस्कार बन रहा है, तो उस श्रृंखला को वर्तमान में ही रोका जाए।
यही साधना है।
इसलिए आध्यात्मिक जीवन संसार से भागना नहीं है।
यह उस तंत्र को समझना है जिसके कारण संसार के भीतर जीव बार-बार उन्हीं चक्रों में घूमता है।
ज्ञान उस चक्र को प्रकाशित करता है।
विवेक उसकी दिशा बदलता है।
तप उसकी शक्ति को परिवर्तित करता है।
और अंततः आत्मज्ञान उस मूल पहचान को बदल देता है जिससे कर्मबंधन की पूरी संरचना बनी थी।
गीता का तारतम्य — कर्म, ज्ञान और बंधन
भगवद्गीता में भी कर्म और ज्ञान के संबंध को बार-बार स्पष्ट किया गया है।
भगवान कहते हैं—
कर्मण्येवाधिकारस्ते मा फलेषु कदाचन ।
यहाँ कर्म का क्षेत्र वर्तमान है।
फल भविष्य में प्रकट होता है।
लेकिन मनुष्य का अधिकार वर्तमान कर्म पर है।
इस दृष्टि से ऋग्वेद का—
कृतानि या च कर्त्वा
एक गहरा कर्म-काल संबंध प्रस्तुत करता है।
जो हो चुका है वह वर्तमान में परिणाम के रूप में उपस्थित है।
जो किया जाना है वह वर्तमान निर्णयों से निर्मित होगा।
अतः वर्तमान चेतना दोनों के बीच का सेतु है।
गीता में आगे ज्ञान के द्वारा कर्मबंधन से ऊपर उठने की बात आती है—
यथैधांसि समिद्धोऽग्निर्भस्मसात्कुरुतेऽर्जुन ।
ज्ञानाग्निः सर्वकर्माणि भस्मसात्कुरुते तथा ॥
यहाँ ज्ञान को अग्नि की उपमा दी गई है।
इसी को आपकी व्याख्या में दग्धबीज के साथ जोड़ा जा सकता है।
ज्ञान केवल जानकारी नहीं है।
जब ज्ञान चेतना की मूल पहचान को बदल देता है, तब कर्म के बंधनकारी स्वरूप की शक्ति समाप्त होने लगती है।
ज्ञानाग्नि और दग्धबीज
अग्नि लकड़ी को केवल गर्म नहीं करती।
वह उसके मूल स्वरूप को बदल देती है।
लकड़ी राख बन जाने के बाद पहले जैसी लकड़ी नहीं रहती।
इसी प्रकार ज्ञान जब केवल बुद्धि की सूचना नहीं रहता बल्कि चेतना का प्रत्यक्ष बोध बन जाता है, तब जीव की कर्म-संबंधी पहचान बदल जाती है।
पहले—
मैं कर्ता हूँ और फल मेरा है।
फिर—
मैं कर्म की प्रकृति को देखता हूँ।
फिर—
मैं कर्म के कारण-संस्कार को पहचानता हूँ।
और अंततः—
मैं उस चेतन सत्ता को पहचानता हूँ जो कर्मों की पूरी प्रक्रिया की साक्षी है।
यही परिवर्तन कर्मबंधन की जड़ को कमजोर करता है।
इसलिए ज्ञानाग्नि का अर्थ सभी बाहरी कर्मों का अचानक समाप्त हो जाना नहीं है।
यह कर्म के बंधनकारी कारण का दहन है।
सूक्ष्म और कारण शरीर से मुक्ति
जब संस्कारों की शक्ति समाप्त होती जाती है, तब सूक्ष्म शरीर की वह संरचना भी धीरे-धीरे अपनी बाध्यकारी भूमिका खोती है जिसके कारण मन, इंद्रियाँ, इच्छाएँ और पुराने संस्कार जीव को पुनः उसी कर्मचक्र में खींचते हैं।
यहाँ स्थूल शरीर की मृत्यु ही मुक्ति नहीं है।
शरीर तो जन्म लेकर एक दिन समाप्त होता ही है।
मुक्ति का प्रश्न यह है कि—
क्या वह कारण समाप्त हुआ जिसके कारण पुनः नया शरीर आवश्यक हो?
यदि इच्छा बनी है, तो कर्म की संभावना है।
यदि कर्म की संभावना है, तो संस्कार बन सकता है।
यदि संस्कार की शक्ति है, तो पुनः अनुभव की आवश्यकता हो सकती है।
लेकिन यदि मूल संस्कार दग्ध हो जाएँ, इच्छाओं का बंधन समाप्त हो जाए और जीव अपनी वास्तविक चेतन सत्ता में प्रतिष्ठित हो जाए, तो पुनर्जन्म की बाध्यता समाप्त होती है।
यही जन्म-मरण से मुक्ति का गहरा अर्थ है।
योगदर्शन का अंतिम तारतम्य
योगदर्शन में साधना की यात्रा अंततः ऐसी स्थिति की ओर जाती है जहाँ चित्त की वृत्तियाँ शांत होकर पुरुष का स्वरूप प्रकाशित होता है।
अंतिम दिशा है—
स्वरूपप्रतिष्ठा।
और जब संस्कारों की पुनरुत्पादक शक्ति समाप्त होती है, तब चेतना के लिए पुनरावृत्त बंधन की आवश्यकता नहीं रहती।
इसलिए ऋग्वेद १.२५.११ को केवल “भूत और भविष्य देखने की सिद्धि” के रूप में पढ़ना इसके व्यापक अर्थ को छोटा कर देगा।
यहाँ उस सिद्धि का उद्देश्य स्वयं सिद्धि में रुकना नहीं है।
उद्देश्य है—
कारण को देखना।
कारण को देखकर—
कर्म को समझना।
कर्म को समझकर—
संस्कार को पहचानना।
संस्कार को पहचानकर—
उसकी मूल शक्ति को रूपांतरित करना।
और मूल कारण के समाप्त होने पर—
जन्म-मरण के बंधन से मुक्त होना।
सिद्धि साधन है, अंतिम लक्ष्य नहीं
इस मंत्र में अद्भुत ज्ञान की बात आती है।
अतीत को देखना।
भविष्य की संभावनाओं को देखना।
कर्मों की श्रृंखला को जानना।
यह सामान्य अनुभव नहीं है।
लेकिन वैदिक और योगिक परंपरा में ऐसी सिद्धियों का मूल्य तभी है जब वे आत्मज्ञान की दिशा में ले जाएँ।
यदि कोई व्यक्ति भविष्य देख सकता है लेकिन अपने भीतर की इच्छा, अहंकार और आसक्ति से मुक्त नहीं हुआ, तो भविष्य का ज्ञान भी उसके लिए नया बंधन बन सकता है।
इसलिए ऋषि की दृष्टि में असली उपलब्धि यह नहीं कि जीव कितनी दूर देख सकता है।
असली उपलब्धि यह है कि—
वह अपने बंधन के मूल को देख पा रहा है।
और उससे भी आगे—
वह उस मूल को समाप्त करने में समर्थ हो रहा है।
यही इस मंत्र का आध्यात्मिक केंद्र है।
काल पर विजय का अर्थ
इस सूक्त के प्रारंभिक मंत्रों से लेकर यहाँ तक काल की एक निरंतर धारा दिखाई देती है।
पहले समय की व्यवस्था।
फिर समय के भीतर प्राण की गति।
फिर प्राण से शरीर।
फिर शरीर में चेतना।
फिर चेतना में बुद्धि।
फिर बुद्धि में ऋत और अनुशासन।
और अब चेतना अपने कर्मों के अतीत और भविष्य को देखने लगती है।
इस प्रकार जीव काल का केवल उपभोक्ता नहीं रहता।
वह काल के भीतर अपने कर्मों की संरचना को समझने लगता है।
यहाँ काल पर विजय का अर्थ घड़ी को रोक देना नहीं है।
इसका अर्थ है—
काल द्वारा संचालित अज्ञान की श्रृंखला को पहचान लेना।
जब जीव जानता है कि कौन-सा संस्कार उसे किस कर्म की ओर ले जा रहा है, तब वह उस कर्म की दिशा बदल सकता है।
यही काल के बंधन से चेतना की मुक्ति का प्रारंभ है।
आधुनिक विज्ञान और भविष्य की संभावना
आधुनिक विज्ञान भी भविष्य को एक जटिल causal system के रूप में देखता है।
यदि प्रारंभिक परिस्थितियाँ और governing laws ज्ञात हों, तो किसी system के संभावित व्यवहार का mathematical modeling किया जा सकता है।
Weather models, epidemiological models, population models, genetic models और अनेक अन्य वैज्ञानिक प्रणालियाँ वर्तमान data के आधार पर संभावित भविष्य का अनुमान लगाती हैं।
लेकिन आधुनिक विज्ञान में भविष्य का prediction सामान्यतः probabilities, models और उपलब्ध information की सीमाओं से जुड़ा होता है।
ऋषि-दृष्टि इससे कहीं अधिक आंतरिक क्षेत्र की बात करती है—जीव अपने ही कर्म-संस्कारों की कारण-श्रृंखला को जानकर अपनी दिशा बदल सकता है।
यहाँ दोनों दृष्टियों में एक सुंदर समानता दिखाई देती है—
भविष्य वर्तमान कारणों से जुड़ा है।
लेकिन आध्यात्मिक विज्ञान एक कदम आगे प्रश्न रखता है—
क्या कारण को बदलकर भविष्य को भी बदला जा सकता है?
साधना का उत्तर है—हाँ, वर्तमान चेतना में परिवर्तन के माध्यम से कर्म की दिशा बदली जा सकती है।
“कृतानि” से “कर्त्वा” तक — वर्तमान ही निर्णायक क्षेत्र
इस मंत्र की पूरी रचना को यदि तीन स्तरों में देखें तो एक अद्भुत सूत्र मिलता है—
१. कृतानि — जो हो चुका
अतीत।
संस्कार।
पूर्व कर्म।
पूर्व कारण।
वर्तमान शरीर और जीवन की पृष्ठभूमि।
२. अभि पश्यति — जो अभी जाना जा रहा है
वर्तमान चेतना।
ज्ञान।
विवेक।
साक्षीभाव।
कारण-परिणाम का दर्शन।
३. कर्त्वा — जो किया जाना है
भविष्य।
संभावना।
नया कर्म।
नई दिशा।
और अंततः जन्म-मरण की श्रृंखला को बदलने की संभावना।
इसलिए मनुष्य का वास्तविक सामर्थ्य वर्तमान में जागृत ज्ञान है।
अतीत को मिटाया नहीं जा सकता, लेकिन उसके संस्कारों की वर्तमान शक्ति बदली जा सकती है।
भविष्य अभी पूर्ण रूप से घटित नहीं हुआ, इसलिए वर्तमान कर्म उसके निर्माण में भाग लेता है।
यही मानव चेतना की महान स्वतंत्रता है।
जीव का अंतिम रूपांतरण
अब इस मंत्र को पिछले मंत्र के साथ जोड़ने पर पूरी यात्रा स्पष्ट हो जाती है।
पिछले मंत्र में जीव—
शरीर में स्थित था।
फिर उसने—
बुद्धि को धृतव्रत बनाया।
फिर—
वरुण की व्यापक सत्ता में प्रतिष्ठित हुआ।
फिर—
सुक्रतु हुआ।
और अब—
चिकित्वाँ अभि पश्यति।
अर्थात् वह केवल जीवन जीता नहीं है।
वह अपने जीवन को देखता है।
फिर केवल वर्तमान जीवन को नहीं देखता।
वह अपने जीवन के पीछे के कारणों को देखता है।
फिर केवल अतीत नहीं देखता।
वह भविष्य की दिशा को भी देखता है।
और अंततः वह समझता है कि—
जन्म स्वयं अंतिम घटना नहीं है।
जन्म के पीछे कारण है।
कारण के पीछे कर्म है।
कर्म के पीछे संस्कार है।
संस्कार के पीछे चेतना की प्रवृत्ति है।
और उस प्रवृत्ति के मूल में अज्ञान या आत्मज्ञान की स्थिति है।
जब मूल ज्ञान में परिवर्तित होता है, तब पूरी श्रृंखला बदल जाती है।
जन्म-मरण का अंत — शरीर के अंत से नहीं, कारण के अंत से
यही इस मंत्र का सबसे गहरा निष्कर्ष है।
शरीर की मृत्यु होना मोक्ष नहीं है।
शरीर तो प्रकृति के नियम से बदलता रहता है।
वास्तविक मुक्ति तब है जब जीव उस कारण-श्रृंखला से मुक्त हो जाए जो उसे पुनः शरीर धारण करने के लिए बाध्य करती है।
यदि संस्कार जीवित हैं तो यात्रा जारी है।
यदि कर्माशय जीवित है तो फल की संभावना है।
यदि इच्छा जीवित है तो कर्म की संभावना है।
यदि अहंकार जीवित है तो कर्तृत्व और भोक्तृत्व की पहचान बनी रहती है।
लेकिन जब ज्ञान उस मूल अज्ञान को समाप्त करता है, तब कर्म की बंधनकारी शक्ति समाप्त होती है।
यही दग्धबीज है।
बीज दिखाई दे सकता है, लेकिन उसमें अंकुरण की शक्ति नहीं रहती।
इसी प्रकार पूर्व कर्मों की स्मृति या उनका कोई सूक्ष्म अवशेष ज्ञानवान चेतना को पुनः बंधन में डालने में समर्थ नहीं रहता।
ऋग्वेद १.२५.११ का समग्र वैज्ञानिक-आध्यात्मिक सूत्र
अब पूरे मंत्र को एक क्रम में रखें—
अतो — पिछले आध्यात्मिक उत्कर्ष से आगे।
विश्वानि — समस्त अस्तित्व और उसके विविध आयाम।
अद्भुता — आश्चर्यजनक घटनाएँ और सूक्ष्म व्यवस्थाएँ।
चिकित्वाँ — ज्ञानवान, कारण को पहचानने वाली चेतना।
अभि पश्यति — पूर्ण और व्यापक दर्शन।
कृतानि — अतीत में किए गए कर्म और उनके संस्कार।
या च कर्त्वा — आगे किए जाने वाले कर्म और भविष्य की संभावित दिशाएँ।
इस प्रकार मंत्र का पूरा प्रवाह बनता है—
ईश्वर-सानिध्य → चेतना का विस्तार → शरीर की सीमा से ऊपर उठना → कर्म-संस्कार का दर्शन → अतीत का ज्ञान → भविष्य की संभावना का ज्ञान → वर्तमान कर्म में स्वतंत्रता → संस्कारों का रूपांतरण → कर्मबीज का दहन → पुनर्जन्म की बाध्यता से मुक्ति।
यही इस मंत्र का गुप्त विज्ञान है।
इस सूक्त में चेतना की यात्रा
अब ऋग्वेद १.२५ के इन मंत्रों को एक साथ देखें तो ऋषि की दृष्टि में चेतना की यात्रा और अधिक स्पष्ट होती है।
काल से यात्रा प्रारंभ होती है।
फिर—
वात की गति आती है।
वात से—
प्राण की व्यवस्था।
प्राण से—
शरीर।
शरीर में—
जीव की प्रतिष्ठा।
फिर—
बुद्धि का विकास।
बुद्धि में—
व्रत और ऋत।
ऋत में—
वरुण की व्यापक व्यवस्था।
और वहाँ से—
सुक्रतु।
फिर—
चिकित्वाँ।
और अंततः—
अभि पश्यति।
अब जीव केवल जगत को नहीं देख रहा।
वह अपने अस्तित्व की पूरी यात्रा को देख रहा है।
वह देख रहा है कि वह कहाँ से आया।
क्यों आया।
किस कर्म से आया।
कौन-से संस्कार उसे संचालित कर रहे हैं।
और वर्तमान में कौन-सा कर्म उसे आगे किस दिशा में ले जाएगा।
यही वह अवस्था है जहाँ जीव पहली बार अपने ही जन्म-मरण के तंत्र का निरीक्षक बनता है।
अंतिम अनुभूति — देखने वाला स्वयं मुक्त होने लगता है
इस मंत्र का अंतिम रहस्य शायद यही है कि जिस क्षण जीव अपने कर्म-संस्कारों को वस्तु की तरह देखना शुरू करता है, उसी क्षण वह उनसे थोड़ा ऊपर उठ जाता है।
जब क्रोध केवल “मैं” है, तब जीव क्रोध में बंधा है।
जब जीव देखता है—
मेरे भीतर क्रोध की प्रवृत्ति उत्पन्न हो रही है।
तब देखने वाला और प्रवृत्ति अलग दिखाई देने लगते हैं।
जब इच्छा ही “मैं” है, तब इच्छा बंधन है।
जब जीव देखता है—
मेरे भीतर इच्छा उत्पन्न हुई है।
तब वह इच्छा का साक्षी बन सकता है।
इसी प्रकार जब जीव अपने संस्कारों को देखता है, तब वह धीरे-धीरे संस्कार से अलग अपनी चेतन सत्ता को पहचानने लगता है।
और यही मुक्ति की दिशा है।
कृतानि अब केवल मेरा अतीत नहीं हैं।
वे देखे जा रहे हैं।
कर्त्वा अब केवल मेरा निश्चित भविष्य नहीं है।
वह वर्तमान चेतना के सामने एक संभावना है।
और चिकित्वाँ अभि पश्यति वह चेतना है जो दोनों को देखकर अपने वर्तमान को जाग्रत करती है।
इसलिए इस मंत्र का अंतिम संदेश केवल भूत और भविष्य देखने की कोई असाधारण सिद्धि नहीं है।
इससे कहीं अधिक गहरा संदेश है—
जिस चेतना को अपने अतीत के संस्कार दिखाई देने लगते हैं और अपने भविष्य के कर्मों की दिशा दिखाई देने लगती है, वह अपने वर्तमान कर्म को बदलने की स्वतंत्रता प्राप्त कर लेती है।
और जब वह वर्तमान कर्म के माध्यम से उन मूल संस्कारों को दग्ध कर देती है जिनसे जन्म-मरण की पुनरावृत्ति होती थी, तब जीव के लिए शरीर अंतिम सीमा नहीं रह जाता।
स्थूल शरीर समाप्त हो सकता है, लेकिन मुक्ति का अर्थ केवल स्थूल शरीर का समाप्त होना नहीं है।
मुक्ति उस कारण का समाप्त होना है जिसके कारण पुनः स्थूल, सूक्ष्म और कारण शरीर की आवश्यकता उत्पन्न होती थी।
तब जीव अपने कर्मों का भोक्ता मात्र नहीं रहता।
वह अपने कर्म-संस्कारों का ज्ञाता बनता है।
ज्ञाता से साक्षी बनता है।
साक्षी से अपने वास्तविक स्वरूप में प्रतिष्ठित होता है।
और अंततः वही चेतना, जो कभी अपने ही शरीर और कर्मों के बंधन में व्याकुल थी, उसी शरीर को साधन बनाकर उस व्यापक ईश्वर-सत्ता में प्रतिष्ठित हो जाती है जिसकी ओर इस पूरे सूक्त की यात्रा निरंतर संकेत करती आ रही है।
अतः —
वात से प्राण,
प्राण से शरीर,
शरीर से जीव,
जीव से बुद्धि,
बुद्धि से ऋत,
ऋत से वरुण-बोध,
वरुण-बोध से कर्म-दर्शन,
कर्म-दर्शन से संस्कार-दर्शन,
संस्कार-दर्शन से वर्तमान कर्म की स्वतंत्रता,
और वर्तमान की जाग्रत चेतना से कर्मबीज का दहन।
यही ऋग्वेद १.२५.११ में दिखाई देने वाली चेतना की वह यात्रा है जिसमें जीव केवल संसार को देखने वाला नहीं रहता—वह अपने ही जन्म, कर्म, संस्कार और भविष्य की पूरी प्रक्रिया को देखने वाला ज्ञाता बन जाता है।
और जब देखने वाला अपने बंधन के मूल को देख लेता है, तब मुक्ति बाहर से प्राप्त होने वाली वस्तु नहीं रहती।
वह उसी ज्ञान के भीतर प्रकट होने लगती है।
