सृष्टि का सूक्ष्म ब्लूप्रिंट: तम और अग्नि
तुच्छ्येनाभ्वपिहितं यदासीत्तपसस्तन्महिना जायतैकं॥
(ऋग्वेद १०.१२९.३)
१. तम की दो परतें और तृतीय चेतन
प्रारंभिक अवस्था में 'तम' की दो परतें थीं: एक पदार्थ का तम (Inert Matter) और दूसरा चेतना का तम (Unconscious State)। इन दोनों आवरणों के नीचे वह 'गुप्त सूक्ष्म' सक्रिय हुआ जो 'अप्राकृतिक सलिल' के समान सामर्थ्यवान है। यह सामर्थ्य द्वैत को पचाकर पूर्ण एकता (Singularity) स्थापित करने में सक्षम है।
अर्कस्त्रधातू रजसो विमानोऽजस्रो घर्मो हविरस्मि नाम॥
(यजुर्वेद १८.६६)
२. परमाणु नाभि और 'जातवेदा' अग्नि
ऋग्वेद जिसे 'तुच्छ' (अति-सूक्ष्म) कहता है, यजुर्वेद उसे 'अग्नि' के रूप में स्पष्ट करता है। यह परमाणु की नाभि (Nucleus) में स्थित वह शक्ति है जो जन्म से ही 'जातवेदा' (सब कुछ जानने वाली) है।
- रजसो विमानो: यह ऊर्जा ही अंतरिक्ष और लोकों का विस्तार करती है।
- हविरस्मि: जब यह ऊर्जा स्वयं की आहुति देती है, तभी स्थूल जगत का निर्माण होता है।
- महिना (महिमा): मानव शरीर में यही ऊर्जा 'नाम-रूप-संस्कार' के रूप में स्वयं को प्रकट करती है।
निष्कर्ष: सृष्टि की उत्पत्ति अंधकार से नहीं, बल्कि अंधकार के भीतर छिपे उस 'गुप्त चेतन' से हुई है, जो परमाणु के केंद्र से लेकर मानव शरीर की महिमा तक व्याप्त है। यह 'तप' ही ऊर्जा का वह अजस्र स्रोत है जो अमृत और घृत (प्रकाश) बनकर हमारी आंखों और अस्तित्व में विद्यमान है।
👉 अपनी स्थिति पर विचार करें?
एक सेठ बड़ा धनवान था। उसे अपने ऐश्वर्य धन सम्पत्ति का बड़ा अभिमान था। अपने को बड़ा दानी धर्मात्मा सिद्ध करने के लिए घर पर नित्य एक साधु को भोजन कराता था। एक दिन एक ज्ञानी महात्मा आये उसके यहाँ भोजन करने को। सेठजी ने उनकी सेवा पूजा करने का तो ध्यान नहीं रखा और उनसे अपने अभिमान की बातें करने लगा “देखो महाराज वहाँ से लेकर इधर तक यह अपनी बड़ी कोठी है, पीछे भी इतना ही बड़ा बगीचा है। पास ही दो बड़ी मीलें हैं। अमुक−अमुक शहर में भी मीलें हैं। इतनी धर्मशालायें, कुँए बनाये हुए हैं। दो लड़के विलायत पढ़ने जा रहे हैं आप जैसे साधु संन्यासियों के पेट पालन के लिए यह रोजाना का सदावर्त लगा रखा है।” सेठ अपनी बातें कहता ही जा रहा था। महात्मा जी ने सोचा इसको अभिमान हो गया है इसलिए इसका अभिमान दूर करना चाहिए। बीच में रोककर सेठ जी से कहा आपके यहाँ दुनियाँ का नक्शा है। सेठ ने कहा “महाराज बहुत बड़ा नक्शा है।” महात्मा जी ने नक्शा मंगाया। उसमें सेठ से पूछा “इस दुनियाँ के नक्शे में भारत कहाँ है।” सेठ ने बताया। “अच्छा इसमें बम्बई कहाँ है” सेठ ने हाथ रखकर बताया। महात्मा जी ने फिर पूछा “अच्छा इसमें तुम्हारी काठी, बगीचे, मीलें बताओ कहाँ हैं।” सेठ बोला महाराज दुनियाँ के नक्शे में इतनी छोटी चीजें कहाँ से आई। महात्मा ने कहा “सेठजी अब इस दुनियाँ के नक्शे में तुम्हारी कोठी बगीचे महल का कोई पता नहीं तो विश्व ब्रह्माण्ड जो भगवान के लीला ऐश्वर्य का एक खेल मात्र है उनके यहाँ तुम्हारे ऐश्वर्य का क्या स्थान होगा?” सेठ समझ गया और उसका अभिमान नष्ट हुआ। वह साधु के चरणों में गिरकर क्षमा याचना करने लगा।
थोड़ी−सी समृद्धि ऐश्वर्य पाकर
मनुष्य इतना अभिमानी और अहंकारी बन जाता है। यदि वह अपनी स्थिति की तुलना अन्य
लोगों से,
फिर भगवान के अनन्त ऐश्वर्य से करे तो उसे अपनी स्थिति का पता चले।
धन सम्पत्ति ऐश्वर्य का अभिमान वृथा है। मूर्खता ही है। प्रथम तो यहाँ की सम्पदा
पर मनुष्य का अपना अधिकार जताना अज्ञान है क्योंकि यह सदा यहीं की धरोहर है और
यहीं रहती है। यह भगवान की सम्पदायें हैं, कोई भी व्यक्ति
इन्हें नहीं ले जा सकता। तिस पर भी अपनापन मानकर थोड़े से धन ऐश्वर्य पर बौरा जाना
पागलपन, अज्ञान ही है।
अपनी स्थिति पर विचार करें: नक्शे में आपका स्थान कहाँ है?
एक अत्यंत धनवान सेठ को अपनी संपत्ति पर बड़ा अभिमान था। वह स्वयं को बड़ा दानी दिखाने के लिए नित्य साधुओं को भोजन कराता था। एक दिन एक ज्ञानी महात्मा आए, तो सेठ अपनी कोठियों, मीलों और बाग-बगीचों का बखान करने लगा।
महात्मा ने शांत भाव से एक दुनिया का नक्शा मंगाया। उन्होंने पूछा—
"सेठ जी, इसमें भारत कहाँ है?" सेठ ने उंगली रखी।
"इसमें आपका शहर कहाँ है?" सेठ ने फिर बताया।
"अब इसमें अपनी वह कोठी और मीलें दिखाइए जिनका आप गर्व कर रहे थे।"
बोध:
परमात्मा के इस अनंत ब्रह्मांड में, जहाँ करोड़ों आकाशगंगाएं और अनगिनत सूर्य हैं, वहाँ एक मनुष्य का ऐश्वर्य मात्र एक स्वप्न के समान है।
- अज्ञान: यहाँ की संपदा पर अधिकार जताना अज्ञान है क्योंकि यह यहीं की धरोहर है।
- पागलपन: थोड़े से ऐश्वर्य पर बौरा जाना आध्यात्मिक अंधापन है।
- सत्य: मनुष्य खाली हाथ आता है और खाली हाथ जाता है; केवल उसके कर्म और संस्कार ही शेष रहते हैं।

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