श्रीमन्महाभारते आदिपर्वणि संभवपर्वणि चतुर्दशाधिकशततमोऽध्यायः

श्रीमन्महाभारते आदिपर्वणि संभवपर्वणि चतुर्दशाधिकशततमोऽध्यायः

श्लोक 1

भीष्म उवाच। पुनर्भरतवंशस्य हेतुं सन्तानवृद्धये। वक्ष्यामि नियतं मातस्तन्मे निगदतः शृणु।। (1-114-1)

  • हिंदी अनुवाद: भीष्म जी ने कहा—हे माता! भरतवंश की संतान की वृद्धि के लिए मैं निश्चित उपाय कहता हूँ, मेरे कहते हुए इसे सुनो।
  • व्याख्या: भीष्म जी सत्यवती को कुरुवंश की रक्षा और संतान वृद्धि के लिए आगे का मार्ग सुझाने की बात कहते हैं।

श्लोक 2

ब्राह्मणो गुणवान्कश्चिद्धनेनोपनिमन्त्र्यताम्। विचित्रवीर्यक्षेत्रेषु यः समुत्पादयेत्प्रजाः।। (1-114-2)

  • हिंदी अनुवाद: "किसी गुणवान ब्राह्मण को धन देकर आमंत्रित किया जाए, जो विचित्रवीर्य के क्षेत्र (उनकी पत्नियों) में संतान उत्पन्न करे।"
  • व्याख्या: भीष्म जी पूर्व में चर्चा की गई प्राचीन पद्धति (नियोग) के अनुसार ही किसी योग्य ब्राह्मण को आमंत्रित कर वंश चलाने का सुझाव देते हैं।

श्लोक 3

वैशंपायन उवाच। भीष्मस्य तु वचः श्रुत्वा धर्महेत्वर्थसंहितम्। माता सत्यवती भीष्मं पुनरेवाभ्यभाषत।। (1-114-3)

  • हिंदी अनुवाद: वैशंपायन जी कहते हैं—धर्म और अर्थ से युक्त भीष्म के उन वचनों को सुनकर माता सत्यवती ने भीष्म से फिर कहा—
  • व्याख्या: सत्यवती भीष्म की बात सुनती हैं, किंतु उनके मन में कुछ और ही विचार व रहस्य छिपा है जिसे वह अब प्रकट करती हैं।

श्लोक 4

औचथ्यमधिकृत्येदमङ्गं च यदुदाहृतम्। पौराणी श्रुतिरित्येषा प्राप्तकालमिदं कुरु।। (1-114-4)

  • हिंदी अनुवाद: "उचथ्य और अंग देश के राजा बलि का जो इतिहास तुमने उदाहरण के रूप में कहा है, वह पौराणिक श्रुति है। अब समय आ गया है, अतः तुम स्वयं इस कार्य को करो।"
  • व्याख्या: सत्यवती कहती हैं कि जिस प्रकार प्राचीनकाल में ऋषियों ने वंश बढ़ाया, उसी प्रकार तुम स्वयं इस कर्तव्य का पालन करो।

श्लोक 5

त्वं हि पुत्र कुलस्यास्य ज्येष्ठः श्रेष्ठश्च भारत। यथा च ते पितुर्वाक्यं मम कार्यं तथाऽनघ।। (1-114-5)

  • हिंदी अनुवाद: "हे पुत्र भारत! तुम इस कुल के ज्येष्ठ और श्रेष्ठ हो। हे अनघ (पापरहित)! जिस प्रकार तुम्हारे पिता (शांतनु) का वाक्य मेरे लिए पूज्य है, उसी प्रकार मेरा यह कहना भी तुम्हारे लिए कर्तव्य है।"
  • व्याख्या: सत्यवती माता होने के नाते भीष्म को अधिकारपूर्वक अपना आदेश मानकर वंश बचाने का आग्रह करती हैं।

श्लोक 6

मम पुत्रस्तव भ्राता यवीयान्सुप्रियश्च ते। बाल एव गतः स्वर्गं भारतो भरतर्षभ।। (1-114-6)

  • हिंदी अनुवाद: "हे भरतवंशियों में श्रेष्ठ! मेरा पुत्र और तुम्हारा छोटा भाई विचित्रवीर्य, जो तुम्हें अत्यंत प्रिय था, अभी बालक अवस्था में ही स्वर्ग सिधार गया।"
  • व्याख्या: सत्यवती छोटे भाई अकाल मृत्यु को प्राप्त विचित्रवीर्य की स्थिति का स्मरण कराती हैं।

श्लोक 7

इमे महिष्यौ तस्येह काशिराजसुते उभे। रूपयौवनसंपन्ने पुत्रकामे च भारत।। (1-114-7)

  • हिंदी अनुवाद: "हे भारत! उसके ये दोनों महिषियाँ (अम्बिका और अम्बालिका)—जो काशीराज की कन्याएँ हैं—रूप और यौवन से संपन्न तथा पुत्र की कामना वाली हैं।"
  • व्याख्या: राजकुमारियों की स्थिति का हवाला देकर सत्यवती नियोग की अनिवार्यता को बल देती हैं।

श्लोक 8

धर्म्यमेतत्परं ज्ञात्वा सन्तानाय कुलस्य च। आभ्यां मम नियोगात्तु धर्मं चरितुमर्हसि।। (1-114-8)

  • हिंदी अनुवाद: "इसे परम धर्म मानकर हमारे कुल की संतान के लिए मेरी आज्ञा से तुम इन दोनों के साथ इस धर्म का आचरण करो।"
  • व्याख्या: सत्यवती पुनः जिद करती हैं कि भीष्म ही स्वयं आगे आकर अपनी बहुओं से संतान उत्पन्न करें।

श्लोक 9

भीष्म उवाच। असंशयं परो धर्मस्त्वयाः मातः प्रकीर्तितः। त्वमप्येतां प्रतिज्ञां तु वेत्थ या मयि वर्तते।। (1-114-9)

  • हिंदी अनुवाद: भीष्म जी ने कहा—"हे माता! जो तुमने कहा है, वह निःसंदेह परम धर्म है, किंतु मेरी उस प्रतिज्ञा को तुम अच्छी तरह जानती हो जो मुझ पर है।"
  • व्याख्या: भीष्म अपनी ब्रह्मचर्य और सत्य की प्रतिज्ञा को एक बार फिर दृढ़ता से याद दिलाते हैं।

श्लोक 10

अमरत्वस्य वा हेतोस्त्रैलोक्यसदनस्य वा। उत्सृजेयमहं प्राणान्न तु सत्यं कथंचन।। (1-114-10)

  • हिंदी अनुवाद: "अमरत्व के लिए अथवा तीनों लोकों के राज्य के लिए भी मैं अपने प्राण त्याग सकता हूँ, किंतु किसी भी स्थिति में अपने सत्य (प्रतिज्ञा) का त्याग नहीं कर सकता।"
  • व्याख्या: भीष्म अपनी प्रतिज्ञा के प्रति अपनी अटूट निष्ठा को सर्वोच्च स्थान देते हैं।

श्लोक 11

सत्यवत्युवाच। जानामि त्वयि धर्मज्ञ सत्यं सत्यपराक्रम। इच्छंस्त्वमिह लोकांस्त्रीन्सृजेरन्यानरिन्दम।। (1-114-11)

  • हिंदी अनुवाद: सत्यवती बोली—"हे धर्मज्ञ! हे सत्यपराक्रमी! मैं जानती हूँ कि तुम सत्यवादी हो। हे शत्रुओं को संताप देने वाले! यदि तुम चाहो तो अपनी शक्ति से दूसरे तीनों लोकों की भी रचना कर सकते हो।"
  • व्याख्या: सत्यवती भीष्म की महानता और उनकी असीम शक्ति को पूरी तरह स्वीकार करती हैं।

श्लोक 12

यथा तु नः कुलं चैव धर्मश्च न पराभवेत्। सुहृदश्च प्रहृष्टाः स्युस्तथा त्वं कर्तुमर्हसि।। (1-114-12)

  • हिंदी अनुवाद: "परंतु ऐसा उपाय करो जिससे हमारा कुल और धर्म नष्ट न हो तथा हमारे सभी मित्र प्रसन्न हों।"
  • व्याख्या: सत्यवती का एकमात्र उद्देश्य कुल की रक्षा और वंश का कलंक मिटाना है।

श्लोक 13

भीष्म उवाच। त्वमेव कुलवृद्धासि गौरवं तु परं त्वयि। सोपायं कुलसन्ताने वक्तुमर्हसि नः परम्।। (1-114-13)

  • हिंदी अनुवाद: भीष्म जी ने कहा—"माता! तुम ही इस कुल की वृद्धा (सबसे सम्मानित) हो और तुम पर हमारा परम गौरव है। इसलिए कुल की संतान के संबंध में तुम ही कोई दूसरा उपाय बताओ।"
  • व्याख्या: चूँकि भीष्म स्वयं नियोग करने में असमर्थ हैं, वे सत्यवती से कहते हैं कि चूँकि वह कुल की संरक्षिका हैं, अतः वे कोई अन्य वैकल्पिक उपाय सुझाएँ।

श्लोक 14

स्त्रियो हि परमं गुह्यं धारयन्ति सदा कुले। पुरुषांश्चैव मायाभिर्बह्वीभिरुपगृह्णते।। (1-114-14)

  • हिंदी अनुवाद: "स्त्रियाँ ही कुल में सदा परम रहस्य को धारण करती हैं और अपनी अनेक प्रकार की मायाओं (चतुराई/गुप्त बातों) से पुरुषों को वश में कर लेती हैं।"
  • व्याख्या: भीष्म गूढ़ वचन कहते हैं कि स्त्रियों के पास वंश और जन्म से जुड़े ऐसे कई गुप्त सत्य होते हैं जो वे जानती हैं।

श्लोक 15

सा सत्यवति संपश्य धर्मं सत्यपरायणे। यथा न जह्यां सत्यं च न सीदेच्च कुलं हि नः।। (1-114-15)

  • हिंदी अनुवाद: "हे सत्यपरायणा सत्यवती! तुम ऐसा धर्म देखो जिससे न तो मैं अपने सत्य का त्याग करूँ और न ही हमारा यह कुल नष्ट हो।"
  • व्याख्या: भीष्म सत्यवती को ऐसा रास्ता खोजने को कहते हैं जिससे दोनों पक्षों (भीष्म का सत्य और कुल की रक्षा) की रक्षा हो सके।

श्लोक 16

वैशंपायन उवाच। ततः सत्यवती भीष्मं वाचा संसज्जमानया। विहसन्तीव सव्रीडमिदं वचनमब्रवीत्।। (1-114-16)

  • हिंदी अनुवाद: वैशंपायन जी कहते हैं—इसके पश्चात सत्यवती ने गद्गद वाणी से, कुछ हँसते हुए और लज्जित होते हुए भीष्म से यह वचन कहा—
  • व्याख्या: सत्यवती अब अपने जीवन के एक अत्यंत गुप्त और प्राचीन रहस्य को भीष्म के सामने खोलने के लिए संकोच के साथ तैयार होती हैं।

श्लोक 17

सत्यमेतन्महाबाहो यथा वदसि भारत। विश्वासात्ते प्रवक्ष्यामि सन्तानाय कुलस्य नः।। (1-114-17)

  • हिंदी अनुवाद: "हे महाबाहो भारत! तुम जो कह रहे हो वह सत्य है। अपने कुल की संतान के लिए मैं तुम्हारे विश्वास पर ही तुम्हें वह बात बताती हूँ।"
  • व्याख्या: सत्यवती भीष्म के प्रति अटूट विश्वास दिखाते हुए अपने जीवन का सबसे बड़ा गुप्त प्रसंग बयां करती हैं।

श्लोक 18

न ते शक्यमनाख्यातुमापद्धर्मं तथाविधम्। त्वमेव नः कुले धर्मस्त्वं सत्यं त्वं परा गतिः।। (1-114-18)

  • हिंदी अनुवाद: "इस प्रकार के आपद्धर्म को तुमसे छिपाना संभव नहीं है। तुम ही हमारे कुल में धर्म हो, तुम ही सत्य हो और तुम ही हमारी परम गति हो।"
  • व्याख्या: सत्यवती मानती हैं कि संकट की इस घड़ी में केवल भीष्म ही उनके सबसे बड़े आराधक और मार्गदर्शक हैं।

श्लोक 19

तस्मान्निशम्य सत्यं मे कुरुष्व यदनन्तरम। शृणु भीष्म वचो मह्यं धर्मार्थसहितं हितम्।। (1-114-19)

  • हिंदी अनुवाद: "इसलिए मेरी इस सच्ची बात को सुनकर इसके पश्चात जो उचित हो, वह करो। हे भीष्म! मेरे धर्म और अर्थ से युक्त इस हितकारी वचन को सुनो।"
  • व्याख्या: सत्यवती अपने पूर्व जीवन का एक ऐसा रहस्य बताने जा रही हैं जिससे कुरुवंश के जन्म का नया मार्ग खुलेगा।

श्लोक 20

न च विस्रम्भकथितं भवान्सूचितुमर्हति। यस्तु राजा वसुर्नाम श्रुतस्ते भरतर्षभ।। (1-114-20)

  • हिंदी अनुवाद: "विश्वास के साथ कही गई इस बात को तुम किसी के सामने प्रकट मत करना। हे भरतर्षभ! जिस वसु नामक राजा का नाम तुमने सुना है..."
  • व्याख्या: सत्यवती अपने जन्म से जुड़ा रहस्य बताने से पहले भीष्म से गोपनीयता की प्रतिज्ञा करवाती हैं।

श्लोक 21

तस्य शुक्लादहं मत्स्या धृता कुक्षौ पुरा किल। मातरं मे जलाद्धृत्वा दाशः परमधर्मवित्।। (1-114-21)

  • हिंदी अनुवाद: "...पूर्वकाल में उनके वीर्य (शुक्ल) से एक मदी (मछली) के गर्भ में मैं धारण की गई थी। परम धर्मज्ञ दाशराज (निषादराज) ने मेरी माता को जल से बाहर निकाला था।"
  • व्याख्या: सत्यवती बताती हैं कि वे जन्म से साधारण पुत्री नहीं थीं, बल्कि एक मत्स्यी के गर्भ से राजा वसु के अंश से उत्पन्न हुई थीं और उनका पालन-पोषण निषादराज (दाशराज) ने किया था।

श्लोक 22

मां तु स्वगृहमानीय दुहितृत्वेऽभ्यकल्पयत्। धर्मयुक्तः स धर्मेण पिता चासीत्ततो मम।। (1-114-22)

  • हिंदी अनुवाद: "वे मुझे अपने घर ले आए और अपनी पुत्री के रूप में मेरा पालन-पोषण किया। वे धर्मयुक्त थे, इसलिए धर्मानुसार वे ही मेरे पिता हुए।"
  • व्याख्या: दाशराज ने सत्यवती को अपनी पुत्री माना, जिसके कारण वे मत्स्यगंधा और दाशराज-कन्या के रूप में जानी गईं।

श्लोक 23

धर्मयुक्तस्य धर्मार्थं पितुरासीत्तरी मम। सा कदाचिदहं तत्र गता प्रथमयौवनम्।। (1-114-23)

  • हिंदी अनुवाद: "धर्मपरायण पिता के धर्मार्थ (नौका चलाने के कार्य में हाथ बंटाने के लिए) मेरी एक नौका (तरी) थी। जब मैं प्रथम यौवन (युवावस्था) को प्राप्त हुई, तब एक दिन मैं वहाँ गई थी।"
  • व्याख्या: सत्यवती अपने युवाकाल में यमुना नदी पार कराने के लिए नाव चलाने का काम करती थीं, उसी दौरान उनका संपर्क एक महान ऋषि से हुआ था।

श्लोक 24

अथ धर्मविदां श्रेष्ठः परमर्षिः पराशरः। आजगाम तरीं धीमांस्तरिष्यन्यमुनां नदीम्।। (1-114-24)

  • हिंदी अनुवाद: "तभी धर्मज्ञों में श्रेष्ठ, बुद्धिमान परमर्षि पराशर यमुना नदी पार करने के लिए मेरी नौका पर आए।"
  • व्याख्या: महर्षि पराशर का यमुना तट पर आना सत्यवती के जीवन का सबसे बड़ा मोड़ साबित हुआ।

श्लोक 25

स तार्यमाणो यमुनां मामुपेत्याब्रवीत्तदा। सान्त्वपूर्वं मुनिश्रेष्ठः कामार्तो मधुरं वचः। उक्त्वा जन्म कुलं मह्यं नासि दाशसुतेति च।। (1-114-25)

  • हिंदी अनुवाद: "जब मैं उन्हें यमुना पार करा रही थी, तब मुनिश्रेष्ठ पराशर ने मेरे पास आकर कामार्त होकर मधुर वाणी में सांत्वनापूर्ण बातें कहीं और मेरे जन्म तथा कुल के विषय में बताया कि 'तुम केवल दाशराज की पुत्री नहीं हो (अर्थात तुम्हारा रहस्य वे जानते थे)।'"
  • व्याख्या: महर्षि पराशर अपनी योगदृष्टि से सत्यवती के दिव्य जन्म के रहस्य को भली-भांति जानते थे।

श्लोक 26

तमहं शापभीता च पितुर्भीता च भारत। वरैरसुलभैरुक्ता न प्रत्याख्यातुमुत्सहे।। (1-114-26)

  • हिंदी अनुवाद: "हे भारत! तब मैं महर्षि के शाप से तथा पिता (दाशराज) के भय से डर गई थी। किंतु उनके द्वारा दिए जाने वाले दुर्लभ वररों से विचलित होकर मैं उन्हें अस्वीकार करने का साहस नहीं कर सकी।"
  • व्याख्या: महर्षि पराशर के तेज और उनके द्वारा दिए गए वरदानों के प्रभाव से सत्यवती ने उनका प्रस्ताव स्वीकार कर लिया था।

श्लोक 27

प्रेक्ष्य तांस्तु महाभागान्पारावारे ऋषीन्स्थितान्। यमुनातीरविन्यस्तान्प्रदीप्तानिव पावकान्।। (1-114-27)

  • हिंदी अनुवाद: "उस समय यमुना के तट पर प्रदीप्त अग्नि के समान तेजस्वी महान भाग्यशाली ऋषियों को दोनों किनारों पर बैठे हुए देखकर..."
  • व्याख्या: पराशर ऋषि के साथ घटित प्रसंग के समय का प्राकृतिक और पावन परिवेश यहाँ वर्णित है।

श्लोक 28

पुरस्तादरुणश्चैव तरुणः संप्रकाशते। येनैषा ताम्रवस्त्रेव द्यौः कृता प्रविजृम्भिता।। (1-114-28)

  • हिंदी अनुवाद: "...आगे अरुणोदय (सूर्योदय से पूर्व की लालिमा) इस प्रकार चमक रहा था जैसे आकाश ने लाल वस्त्र धारण कर लिया हो।"
  • व्याख्या: प्रातःकाल के समय का अत्यंत सुंदर और रमणीय चित्रण किया गया है।

श्लोक 29

उक्तमात्रो मया तत्र नीहारमसृजत्प्रभुः। पराशरः सत्यधृतिर्द्वीपे च यमुनाम्भसि।। (1-114-29)

  • हिंदी अनुवाद: "मेरे द्वारा ऐसा कहे जाने पर सत्यप्रतिज्ञ प्रभु पराशर ऋषि ने यमुना के जल के बीच एक द्वीप पर अपनी शक्ति से चारों ओर घना कोहरा (नीहार) उत्पन्न कर दिया।"
  • व्याख्या: महर्षि पराशर ने अपनी योगशक्ति से यमुना नदी के बीचों-बीच कोहरे का पर्दा डाल दिया ताकि वह प्रसंग पूरी तरह गुप्त रह सके।

श्लोक 30

अभिभूय स मां बालां तेजसा वशमानयत्। तमसा लोकमावृत्य नौगतामेव भारत।। (1-114-30)

  • हिंदी अनुवाद: सत्यवती ने आगे कहा—"हे भारत! नौका पर बैठी हुई मुझ बालिकायुक्त को अपने तेज से अभिभूत कर और चारों ओर अंधकार फैलाकर उन्होंने (ऋषि पराशर ने) मुझे अपने वश में कर लिया था।"
  • व्याख्या: सत्यवती बताती हैं कि पराशर ऋषि ने अपनी योगशक्ति और तेज से यमुना नदी के बीचों-बीच उन्हें अपने वश में किया था।

श्लोक 31

मत्स्यगन्धो महानासीत्पुरा मम जुगुप्सितः। तमपास्य शुभं गन्धमिमं प्रादात्स मे मुनिः।। (1-114-31)

  • हिंदी अनुवाद: "पहले मेरे शरीर से एक बुरा (मछली जैसा) दुर्गंध निकलता था, जिसे 'मत्स्यगंध' कहते थे। उस मुनि ने उस दुर्गंध को दूर करके मुझे यह सुगंधित (दिव्य सुगंध) रूप प्रदान किया।"
  • व्याख्या: पराशर ऋषि के स्पर्श और वरदान से सत्यवती के शरीर से आने वाली मछली की दुर्गंध सदा के लिए एक कोसों दूर तक फैलने वाली सुगंध में बदल गई, जिससे वे 'योजनगंधा' कहलाईं।

श्लोक 32

ततो मामाह स मुनिर्गर्भमुत्सृज्य मामकम्। द्वोपेऽस्या एव सरितः कन्यैव त्वं भविष्यसि।। (1-114-32)

  • हिंदी अनुवाद: "तत्पश्चात उस मुनि ने मुझसे कहा—'मेरे गर्भ को धारण करने के बाद भी तुम इस नदी के द्वीप पर कन्या ही बनी रहोगी।'।"
  • व्याख्या: पराशर ऋषि ने उन्हें यह वरदान दिया था कि संतान होने के बावजूद उनका कन्यात्व (कुंवारीपन) भंग नहीं होगा और वे पवित्र बनी रहेंगी।

श्लोक 33

कन्यात्वं च ददौ प्रीतः पुनर्विद्वांस्तपोधनः। तस्य वीर्यमहं दृष्ट्वा तथा युक्तं महात्मनः।। (1-114-33)

  • हिंदी अनुवाद: उस विद्वान तपोधन (पराशर) ने प्रसन्न होकर मुझे पुनः कन्या होने का वरदान दिया। महात्मा पराशर के उस अद्भुत वीर्य के प्रभाव को देखकर...
  • व्याख्या: सत्यवती ऋषि के ऐश्वर्य और योगबल से पूरी तरह विस्मित हो गई थीं।

श्लोक 34

विस्मिता व्यथिता चैव प्रादामात्मानमेव च। ततस्तदा महात्मा स कन्यायां मयि भारत। प्रहृष्टोऽजनयत्पुत्रं द्वीप एव पराशरः।। (1-114-34)

  • हिंदी अनुवाद: "...मैं विस्मित और व्यथित होकर उनके प्रति समर्पित हो गई। हे भारत! तब उन महात्मा पराशर ने मुझ कन्या (अविवाहित रूप में ही) पर प्रसन्न होकर यमुना के द्वीप पर ही एक पुत्र को उत्पन्न किया।"
  • व्याख्या: यमुना के द्वीप पर जन्म लेने के कारण ही उस बालक का नाम 'द्वैपायन' पड़ा, जो आगे चलकर महर्षि व्यास बने।

श्लोक 35

पाराशर्यो महायोगी स बभूव महानृषिः। कन्यापुत्रो मम पुरा द्वैपायन इति श्रुतः।। (1-114-35)

  • हिंदी अनुवाद: पराशर ऋषि के वे महायोगी पुत्र महान ऋषि हुए। वे कन्या (मेरे) से उत्पन्न हुए मेरे वे पुत्र प्राचीनकाल में 'द्वैपायन' नाम से प्रसिद्ध हुए।
  • व्याख्या: सत्यवती अपने पहले पुत्र वेद व्यास के जन्म का पूरा परिचय देती हैं जो पराशर ऋषि के अंश से उत्पन्न हुए थे।

श्लोक 36

यो व्यस्य वेदांश्चतुरस्तपसा भगवानृषिः। लोके व्यासत्वमापेदे कार्ष्ण्यात्कृष्णत्वमेव च।। (1-114-36)

  • हिंदी अनुवाद: जो भगवान ऋषि अपनी तपस्या के बल पर चारों वेदों का विभाग (व्यास) करने के कारण इस संसार में 'व्यास' नाम से प्रसिद्ध हुए तथा अपने श्याम वर्ण (साँवले रंग) के कारण 'कृष्ण' कहलाए।
  • व्याख्या: वेदों का विभाजन करने के कारण उन्हें 'वेद व्यास' और रंग सांवला होने के कारण 'कृष्ण द्वैपायन' कहा गया।

श्लोक 37

सत्यवादी शमपरस्तपस्वी दग्धकिल्बिषः। सद्योत्पन्नः स तु महान्सह पित्रा ततो गतः।। (1-114-37)

  • हिंदी अनुवाद: वे सत्यवादी, शांतिप्रिय, तपस्वी और समस्त पापों से रहित थे। वे जन्म लेते ही बड़े हो गए और अपने पिता (पराशर) के साथ तुरंत वहाँ से चले गए थे।
  • व्याख्या: व्यास जी जन्म लेते ही वयस्क और परम ज्ञानी हो गए थे तथा तपस्या के लिए पिता के साथ प्रस्थान कर गए थे।

श्लोक 38

स नियुक्तो मया व्यक्तं त्वया चाप्रतिमद्युतिः। भ्रातुः क्षेत्रेषु कल्याणमपत्यं जनयिष्यति।। (1-114-38)

  • हिंदी अनुवाद: "अप्रतिमत्युति (अद्भुत कांति वाले) वे व्यास जी मेरे द्वारा और तुम्हारे द्वारा स्पष्ट रूप से नियुक्त किए जाने पर तुम्हारे भाई (विचित्रवीर्य) के क्षेत्र (पत्नियों) में कल्याणकारी संतान उत्पन्न करेंगे।"
  • व्याख्या: सत्यवती कहती हैं कि वे मेरे ही पहले पुत्र (वेद व्यास) हैं, जिन्हें बुलाकर हम अपनी बहुओं से संतानोत्पत्ति का कार्य करवा सकते हैं।

श्लोक 39

स हि मामुक्तवांस्तत्र स्मरेः कृच्छ्रेषु मामिति। तं स्मरिष्ये महाबाहो यदि भीष्म त्वमिच्छसि।। (1-114-39)

  • हिंदी अनुवाद: "उन्होंने मुझसे जाते समय कहा था कि 'संकट के समय मेरा स्मरण करना।' हे महाबाहो भीष्म! यदि तुम्हारी इच्छा हो, तो मैं उनका स्मरण करूँ।"
  • व्याख्या: सत्यवती ने बताया कि व्यास जी ने संकट में याद करने को कहा था, और अब वह उचित अवसर आ गया है।

श्लोक 40

तव ह्यनुमते भीष्म नियतं स महातपाः। विचित्रवीर्यक्षेत्रेषु पुत्रानुत्पादयिष्यति।। (1-114-40)

  • हिंदी अनुवाद: "हे भीष्म! तुम्हारी अनुमति होने पर वे महातपस्वी निश्चित रूप से विचित्रवीर्य के क्षेत्र में पुत्र उत्पन्न करेंगे।"
  • व्याख्या: सत्यवती भीष्म से अपनी सहमति देने का आग्रह करती हैं ताकि व्यास जी को बुलाया जा सके।

श्लोक 41

वैशंपायन उवाच। महर्षेः कीर्तने तस्य भीष्मः प्राञ्जलिरब्रवीत। देशकालौ च जानासि क्रियतामर्थसिद्धये।। (1-114-41)

  • हिंदी अनुवाद: वैशंपायन जी कहते हैं—उन महर्षि (व्यास) के स्मरण करने पर भीष्म ने हाथ जोड़कर कहा—"आप देश और काल को अच्छी तरह जानती हैं, अतः कार्य की सिद्धि के लिए वही किया जाए।"
  • व्याख्या: भीष्म ने सत्यवती के इस प्रस्ताव को सहर्ष स्वीकार कर लिया क्योंकि इसमें उनका सत्य भी सुरक्षित रहता है और कुल की रक्षा भी हो जाती है।

श्लोक 42-43

अर्थमर्थानुबन्धं च धर्मं धर्मानुबन्धनम्। कामं कामानुबन्धं च विपरीतान्पृथक्पृथक्।। (1-114-42) यो विचिन्त्य धिया धीरो व्यवस्यति स बुद्धिमान्। तदिदं धर्मयुक्तं च हितं चैव कुलस्य नः।। (1-114-43)

  • हिंदी अनुवाद: "जो धीर पुरुष अर्थ, अर्थ के संबंध, धर्म, धर्म के संबंध, काम, काम के संबंध तथा इनके विपरीत विषयों को अपनी बुद्धि से भली-भांति सोच-विचारकर निश्चय करता है, वही बुद्धिमान है। यह प्रस्ताव धर्मयुक्त है और हमारे कुल के लिए हितकारी भी है।"
  • व्याख्या: भीष्म तार्किक रूप से पुष्टि करते हैं कि सत्यवती का यह निर्णय धर्म, अर्थ और कुल हित की दृष्टि से पूरी तरह श्रेष्ठ है।

श्लोक 44

उक्तं भवत्या यच्छ्रेयस्तन्मह्यं रोचते भृशम्। वैशंपायन उवाच। ततस्तस्मिन्प्रतिज्ञाते भीष्मेण कुरुनन्दन।। (1-114-44)

  • हिंदी अनुवाद: "माता ने जो श्रेष्ठ मार्ग बताया है, वह मुझे अत्यंत प्रिय (रोचक) है।" वैशंपायन जी कहते हैं—हे कुरुनन्दन! जब भीष्म द्वारा ऐसा प्रतिज्ञात (स्वीकृत) कर लिया गया...
  • व्याख्या: भीष्म की स्वीकृति मिलने के बाद सत्यवती ने अपने पुत्र व्यास का आह्वान करने का मन बनाया।

श्लोक 45

कृष्णद्वैपायनं काली चिन्तयामास वै मुनिम्। स वेदान्विब्रुवन्धीमान्मातुर्विज्ञाय चिन्तितम्।। (1-114-45)

  • हिंदी अनुवाद: तब सत्यवती (काली) ने कृष्णद्वैपायन मुनि का स्मरण (चिंतन) किया। वेदों का उपदेश कर रहे बुद्धिमान मुनि ने अपनी माता के उस चिंतन को मन से जान लिया।
  • व्याख्या: योगशक्ति संपन्न व्यास जी दूर बैठे ही अपनी माता सत्यवती की मानसिक पुकार को तुरंत भाप गए।

श्लोक 46

प्रादुर्बभूवाविदितः क्षणेन कुरुनन्दन। तस्मै पूजां ततः कृत्वा सुताय विधिपूर्वकम्।। (1-114-46)

  • हिंदी अनुवाद: हे कुरुनन्दन! वे बिना किसी को दिखे ही एक ही क्षण में वहीं प्रकट हो गए। तब सत्यवती ने विधिपूर्वक अपने उस पुत्र की पूजा की।
  • व्याख्या: व्यास जी अपनी योगशक्ति से पलभर में माता के पास प्रकट हो गए, और सत्यवती ने उनका आदर-सत्कार किया।

श्लोक 47

परिष्वज्य च बाहुभ्यां प्रस्रवैरभ्यषिञ्चत। मुमोच बाष्पं दाशेयी पुत्रं दृष्ट्वा चिरस्य तु।। (1-114-47)

  • हिंदी अनुवाद: दाशराज की पुत्री (सत्यवती) ने अपनी भुजाओं से पुत्र को गले लगाया और उनके स्तनों से (वात्सल्यवश) दूध बह निकला। बहुत दिनों के बाद पुत्र को देखकर उनकी आँखों से आँसू छलक आए।
  • व्याख्या: माता सत्यवती का वात्सल्य अपने जेठे पुत्र व्यास को देखकर उमड़ पड़ा।

श्लोक 48

तामद्भिः परिषिच्यार्तां महर्षिरभिवाद्य च। मातरं पूर्वजः पुत्रो व्यासो वचनमब्रवीत।। (1-114-48)

  • हिंदी अनुवाद: दुःखी माता को जल से सींचकर (शांत करके) और प्रणाम करके, उनके बड़े पुत्र महर्षि व्यास ने यह वचन कहा—
  • व्याख्या: व्यास जी ने अपनी माता को संबल देते हुए उनकी इच्छा पूछने के लिए वक्ता के रूप में बात आगे बढ़ाई।

श्लोक 49

भवत्या यदभिप्रेतं तदहं कर्तुमागतः। शाधि मां धर्मतत्त्वज्ञे करवाणि प्रियं तव।। (1-114-49)

  • हिंदी अनुवाद: "आपका जो अभिप्राय (इच्छा) है, उसे पूरा करने के लिए ही मैं आया हूँ। हे धर्मतत्त्व को जानने वाली माता! आप मुझे आज्ञा दीजिए, मैं आपका प्रिय कार्य करूँ।"
  • व्याख्या: व्यास जी ने एक आज्ञाकारी पुत्र की तरह अपनी माता को पूर्ण सहयोग देने का वचन दिया।

श्लोक 50-51

तस्मै पूजां त토ऽकार्षीत्पुरोधाः परमर्षये। स च तां प्रतिजग्राह विधिमन्मन्त्रपूर्वकम्।। (1-114-50) पूजितो मन्त्रपूर्वं तु विधिवत्प्रीतिमाप सः। तमासनगतं माता पृष्ट्वा कुशलमव्ययम्।। (1-114-51)

  • हिंदी अनुवाद: तब पुरोहित ने उन परमर्षि (व्यास) की मन्त्रपूर्वक पूजा की और उन्होंने विधिपूर्वक उसे स्वीकार किया। मन्त्रों से विधिवत् पूजित होकर वे अत्यंत प्रसन्न हुए। उनके आसन पर बैठने के पश्चात माता ने उनका अव्यय (अखंड) कुशल-समाचार पूछा।
  • व्याख्या: आश्रम और राजमहल के विधि-विधानों के अनुसार व्यास जी का स्वागत और सत्कार संपन्न हुआ।

श्लोक 52-54

सत्यवत्यथ वीक्ष्यैनमुवाचेदमनन्तरम्। मातापिित्रोः प्रजायन्ते पुत्राः साधारणाः कवे।। (1-114-52) तेषां पिता यथा स्वीमी तथा माता न संशयः। विधानविहितः स त्वं यथा मे प्रथमः सुतः।। (1-114-53) विचित्रवीर्यो ब्रह्मर्षे तथा मेऽवरजः सुतः। यथैव पितृतो भीष्मस्तथा त्वमपि मातृतः।। (1-114-54)

  • हिंदी अनुवाद: इसके पश्चात सत्यवती ने उन्हें देखकर कहना आरंभ किया—"हे कवि! माता और पिता के जो पुत्र होते हैं, वे दोनों के साधारित (समान रूप से) होते हैं। उनमें पिता जितना अपना स्वामी (पिता) होता है, उतनी ही माता भी होती है, इसमें संशय नहीं है। हे ब्रह्मर्षि! जिस प्रकार विधि-विधान से तुम मेरे प्रथम पुत्र हो, वैसे ही विचित्रवीर्य मेरा छोटा पुत्र है। जिस प्रकार पिता की ओर से भीष्म तुम्हारे भाई हैं, उसी प्रकार माता की दृष्टि से तुम भी उनके भाई हो।"
  • व्याख्या: सत्यवती व्यास जी को उनके पारिवारिक संबंधों और अधिकारों का बोध कराती हैं कि वे कुरुवंश के ही अभिन्न अंग हैं।

श्लोक 55-56

भ्राता विचित्रवीर्यस्य यथा वा पुत्र मन्यसे। अयं शान्तनवः सत्यं पालयन्सत्यविक्रमः।। (1-114-55) बुद्धिं न कुरुतेऽपत्ये तथा राज्याऽनुशासने। स त्वं व्यपेक्षया भ्रातुः सन्तानाय कुलस्य च।। (1-114-56)

  • हिंदी अनुवाद: "हे पुत्र! तुम विचित्रवीर्य के भाई हो, ऐसा समझो। यह सत्यपराक्रमी शांतनु पुत्र भीष्म सत्य का पालन करते हुए संतान उत्पन्न करने और राज्य का शासन करने की इच्छा नहीं रखते। इसलिए भाई के प्रति करुणा और कुल की संतान के लिए..."
  • व्याख्या: सत्यवती व्यास जी को समझाती हैं कि चूँकि भीष्म अपनी प्रतिज्ञा से बंधे हैं, इसलिए वंश को बचाने की पूरी जिम्मेदारी अब उन्ही (व्यास) पर है।

श्लोक 57-59

भीष्मस्य चास्य वचनान्नियोगाच्च ममानघ। अनुक्रोशाच्च भूतानां सर्वेषां रक्षणाय च।। (1-114-57) आनृशंस्याच्च यद्ब्रूयां तच्छ्रुत्वा कर्तुमर्हसि। यवीयसस्व भ्रातुर्भार्ये सुरसुतोपमे।। (1-114-58) रूपयौवनसंपन्ने पुत्रकामे च धर्मतः। तयोरुत्पादयापत्यं समर्थो ह्यसि पुत्रक।। (1-114-59)

  • हिंदी अनुवाद: "हे अनघ! भीष्म के इस वचन से, मेरी आज्ञा (नियोग) से, प्राणियों पर दया करने से, सबकी रक्षा करने के लिए तथा दयालुतावश मैं जो कहती हूँ, उसे सुनकर तुम्हें करना चाहिए। तुम्हारे छोटे भाई की जो दोनों पत्नियाँ देवकन्याओं के समान रूप-यौवन से संपन्न और पुत्र की कामना वाली हैं, हे पुत्रक! तुम धर्मपूर्वक उन दोनों में संतान उत्पन्न करने में समर्थ हो।"
  • व्याख्या: सत्यवती अपने बड़े बेटे व्यास से धर्म और कुल की रक्षा के लिए अम्बिका और अम्बालिका से नियोग द्वारा संतान उत्पन्न करने का आधिकारिक अनुरोध करती हैं।

श्लोक 60-61

अनुरूपं कुलस्यास्य संतत्याः प्रसवस्य च। व्यास उवाच। वेत्थ धर्मं सत्यवति परं चापरमेव च।। (1-114-60) तथा तव महाप्राज्ञे धर्मे प्रणिहिता मतिः। तस्मादहं त्वन्नियोगाद्धर्ममुद्दिश्य कारणम्।। (1-114-61)

  • हिंदी अनुवाद: "यह इस कुल की संतति और प्रसव के पूरी तरह अनुकूल है।" व्यास जी ने कहा—"हे सत्यवति! तुम परापर (लौकिक और पारलौकिक) धर्म को जानती हो। हे महाप्राज्ञे! तुम्हारी बुद्धि हमेशा धर्म में ही लगी रहती है। इसलिए तुम्हारे इस नियोग रूपी धर्म के कारण..."
  • व्याख्या: व्यास जी माता सत्यवती के ज्ञान की सराहना करते हुए उनकी आज्ञा को सिरोधार्य करने की सहमति देते हैं।

श्लोक 62-63

ईप्सितं ते करिष्यामि दृष्टं ह्येतत्सनातनम्। भ्रातुः पुत्रान्प्रदास्यामि मित्रावरुणयोः समान्।। (1-114-62) व्रतं चरेतां ते देव्यौ निर्दिष्टमिह यन्मया। संवत्सरं यथान्यायं ततः शुद्धे भविष्यतः।। (1-114-63)

  • हिंदी अनुवाद: "...मैं तुम्हारी इच्छा अवश्य पूरी करूँगा, क्योंकि यह सनातन धर्म देखा गया है। मैं तुम्हारे भाई के लिए मित्र और वरुण के समान तेजस्वी पुत्र प्रदान करूँगा। किंतु वे दोनों देवियाँ (अम्बिका और अम्बालिका) मेरे द्वारा बताए गए व्रत का यथान्याय एक वर्ष तक पालन करें, उसके पश्चात वे शुद्ध होंगी।"
  • व्याख्या: व्यास जी कहते हैं कि वे श्रेष्ठ पुत्र देंगे, लेकिन इसके लिए दोनों रानियों को कठिन व्रतों और नियमों का पालन करना होगा।

श्लोक 64

नहि मामव्रतोपेता उपेयात्काचिदङ्गना। सत्यवत्युवाच। सद्यो यथा प्रपद्येते देव्यौ गर्भं तथा कुरु।। (1-114-64)

  • हिंदी अनुवाद: "व्रत के बिना कोई भी स्त्री मेरे समीप न आए।" सत्यवती बोली—"हे पुत्र! वे दोनों देवियाँ तुरंत (शीघ्र ही) गर्भ को प्राप्त करें, ऐसा उपाय करो।"
  • व्याख्या: सत्यवती को राज्य के संकट और वंश के विलंब की चिंता है, इसलिए वह एक वर्ष प्रतीक्षा करने के बजाय तुरंत गर्भधारण करवाने का आग्रह करती हैं।

श्लोक 65-66

अराजकेषु राष्ट्रेषु प्रजाऽनाथा विनश्यति। नश्यन्ति च क्रियाः सर्वा नास्ति वृष्टिर्न देवता।। (1-114-65) कथं चाराजकं राष्ट्रं शक्यं धारयितुं प्रभो। तस्माद्गर्भं समाधत्स्व भीष्मः संवर्धयिष्यति।। (1-114-66)

  • हिंदी अनुवाद: "अराजक राष्ट्रों में अनाथ प्रजा नष्ट हो जाती है, सभी धार्मिक क्रियाएँ समाप्त हो जाती हैं, न वर्षा होती है और न देवताओं की कृपा रहती है। हे प्रभो! बिना राजा के राष्ट्र को कैसे धारण किया जा सकता है? इसलिए आप तुरंत गर्भ की स्थापना कीजिए, भीष्म उस (उत्पन्न बालक) का पालन-पोषण और संवर्धन करेंगे।"
  • व्याख्या: देश में राजा न होने से आने वाली विपत्तियों का भय दिखाकर सत्यवती व्यास जी से तत्काल गर्भ स्थापित करने की विनती करती हैं।

श्लोक 67-69

व्यास उवाच। यदि पुत्रः प्रदातव्यो मया भ्रातुरकालिकः। विरूपतां मे सहतां तयोरेतत्परं व्रतम्।। (1-114-67) यदि मे सहते गन्धं रूपं वेषं तथा वपुः। अद्यैव गर्भं कौसल्या विशिष्टं प्रतिपद्यताम्।। (1-114-68) तस्यापि च शतं पुत्रा भवितारो न संशयः। गोप्तारः कुरुवंशस्य भवत्याः शोकनाशनाः।। (1-114-69)

  • हिंदी अनुवाद: व्यास जी ने कहा—"यदि मेरे द्वारा भाई के लिए अकालिक (तत्काल) ही पुत्र दिया जाना आवश्यक है, तो वे दोनों मेरे इस रूप और व्रत (कठिन स्थिति) को सहन करें। यदि वे मेरी दुर्गंध, रूप, वेष और शरीर को सहन कर सकती हैं, तो कौसल्या (अम्बिका) आज ही श्रेष्ठ गर्भ को प्राप्त हो। उसके सौ पुत्र होंगे, इसमें कोई संशय नहीं है, जो कुरुवंश के रक्षक और तुम्हारे शोक का नाश करने वाले होंगे।"
  • व्याख्या: व्यास जी अपनी तपस्वी अवस्था के उग्र रूप, जटा-मण्डल और शरीर की गंध को सहन करने की शर्त रखते हैं और तुरंत गर्भ देने को तैयार होते हैं।

श्लोक 70-71

वैशंपायन उवाच। एवमुक्त्वा महातेजा व्यासः सत्यवतीं तदा। शयने सा च कौसल्या शुचिवस्त्रा ह्यलङ्कृता।। (1-114-70) समागममाकाङ्क्षेदिति सोऽन्तर्हितो मुनिः। ततोऽभिगम्य सा देवी स्नुषां रहसि संगताम्।। (1-114-71)

  • हिंदी अनुवाद: वैशंपायन जी कहते हैं—महातेजस्वी व्यास जी सत्यवती से ऐसा कहकर अंतर्ध्यान हो गए और कह गए कि वह कौसल्या (अम्बिका) पवित्र वस्त्र पहनकर और सज-धजकर शयनकक्ष में इस समागम की आकांक्षा करे। इसके पश्चात वे देवी (सत्यवती) एकांत में अपनी उस बहू के पास गईं...
  • व्याख्या: व्यास जी के निर्देशानुसार सत्यवती ने अपनी बड़ी बहू अम्बिका को पूरी तैयारी के साथ उस पवित्र मिलन के लिए तैयार करने का उपक्रम किया।

श्लोक 72-74

धर्म्यमर्थसमायुक्तमुवाच वचनं हितम्। कौसल्ये धर्मतन्त्रं त्वां यद्ब्रवीमि निबोध तत्।। (1-114-72) भरतानां समुच्छेदो व्यक्तं मद्भाग्यसंक्षयात्। व्यथितां मां च संप्रेक्ष्य पितृवंशं च पीडितम्।। (1-114-73) भीष्मो बुद्धिमदान्मह्यं कुलस्यास्य विवृद्धये। सा च बुद्धिस्त्वय्यधीना पुत्रि प्रापय मां तथा।। (1-114-74)

  • हिंदी अनुवाद: ...और उससे धर्म और अर्थ से युक्त हितकारी वचन कहे—"हे कौसल्ये! मैं जो धर्मतन्त्र की बात कहती हूँ, उसे सुनो। स्पष्ट है कि मेरे दुर्भाग्य के संक्षय (नाश) के कारण ही भरतवंश का नाश होने जा रहा है। मेरी व्यथा को और पीड़ित पितृवंश को देखो। इस कुल की वृद्धि के लिए बुद्धिमान भीष्म ने जो उपाय सोचा है, वह सब तुम पर ही आधारित है। हे पुत्री! मेरी इस इच्छा को पूरा करो।"
  • व्याख्या: सत्यवती अत्यंत आत्मीयता और संताप के साथ अम्बिका को समझाती हैं कि कुरुवंश को बचाने की अब इकलौती चाबी उसी के हाथों में है।

श्लोक 75-77

नष्टं च भारतं वंशं पुनरेव समुद्धर। पुत्रं जनय सुश्रोणि देवराजसमप्रभम्।। (1-114-75) स हि राज्यधुरं गुर्वीमुद्वक्ष्यति कुलस्य नः। सा धर्मतोऽनुनीयैनां कथंचिद्धर्मचारिणीम्। भोजयामास विप्रांश्च देवर्षीनतिथींस्तथा।। (1-114-77)

  • हिंदी अनुवाद: "हे सुश्रोणि! नष्ट हो रहे इस भारत वंश का पुनः उद्धार करो और देवराज इंद्र के समान कांति वाले पुत्र को जन्म दो। वही हमारे कुल की इस भारी राज्य-धुरी को संभालेगा।" इस प्रकार सत्यवती ने धर्मपूर्वक उस धर्मचारिणी बहु को मनाकर (तैयार किया) और ब्राह्मणों, देवर्षियों तथा अतिथियों को भोजन कराया।
  • व्याख्या: माता सत्यवती के समझाने और धार्मिक अनुष्ठानों के पूरा होने के बाद अम्बिका व्यास जी से मिलने के लिए मानसिक रूप से तैयार हो जाती हैं।
।। इति श्रीमन्महाभारते आदिपर्वणि संभवपर्वणि चतुर्दशाधिकशततमोऽध्यायः।। 114 ।।

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