श्रीमन्महाभारते आदिपर्वणि संभवपर्वणि त्रयोदशाधिकशततमोऽध्यायः

श्लोक 1

जामदग्न्येन रामेण पितुर्वधममृष्यता। राजा परशुना पूर्वं हैहयाधिपतिर्हतः।। (1-113-1)

  • हिंदी अनुवाद: भीष्म जी ने कहा—पूर्वकाल में जमदग्नि के पुत्र भगवान परशुराम ने अपने पिता के वध को सहन न करते हुए हैहयों के आधिपत्य वाले राजा (कार्तवीर्यार्जुन) का वध किया था।
  • व्याख्या: यह श्लोक बताता है कि अन्याय और पिता के वध पर किस प्रकार परशुराम ने क्षत्रिय राजाओं का संहार किया था।

श्लोक 2

शतानि दशबाहूनां निकृत्तान्यर्जुनस्य वै। लोकस्याचरितो धर्मस्तेनाति किल दुश्चरः।। (1-113-2)

  • हिंदी अनुवाद: परशुराम जी ने सहस्त्रबाहु अर्जुन की सैकड़ों भुजाओं को काट डाला था। इस संसार में आचरित होने वाला धर्म वास्तव में बहुत ही कठिन है।
  • व्याख्या: कार्तवीर्यार्जुन की विशाल शक्ति का दमन कर परशुराम ने शक्ति और धर्म के संतुलन की ऐतिहासिक मिसाल दी।

श्लोक 3

पुनश्च धनुरादाय महास्त्राणि प्रमुञ्चता। निर्दग्धं क्षत्रमसकृद्रथेन जयता महीम्।। (1-113-3)

  • हिंदी अनुवाद: पुनः बार-बार धनुष उठाकर और दिव्य महाअस्त्रों को छोड़ते हुए, रथ पर सवार होकर पृथ्वी को जीतने वाले परशुराम ने क्षत्रियों को कई बार जला डाला (संहार किया)।
  • व्याख्या: इस श्लोक में परशुराम के तीव्र और निरंतर चले अभियान का वर्णन है जिसके तहत उन्होंने क्षत्रियों का कई बार अंत किया।

श्लोक 4

एवमुच्चावचैरस्त्रैर्भार्गवेण महात्मना। त्रिःसप्तकृत्वः पृथिवी कृता निःक्षत्रिया पुरा।। (1-113-4)

  • हिंदी अनुवाद: इस प्रकार महात्मा भार्गव (परशुराम) ने विभिन्न प्रकार के अस्त्रों के द्वारा प्राचीनकाल में इस पृथ्वी को इक्कीस बार क्षत्रियहीन कर दिया था।
  • व्याख्या: इतिहास में परशुराम का यह कार्य अत्यंत प्रसिद्ध है जब उन्होंने पूरी पृथ्वी को इक्कीस बार क्षत्रियों से विहीन कर डाला था।

श्लोक 5

एवं निःक्षत्रिये लोके कृते तेन महर्षिणा। ततः संभूय सर्वाभिः क्षत्रियाभिः समन्ततः।। (1-113-5)

  • हिंदी अनुवाद: जब महर्षि परशुराम द्वारा इस संसार को निःक्षत्रिय कर दिया गया, तब चारों ओर की सभी क्षत्रियाणियों ने एकत्रित होकर...
  • व्याख्या: जब वंश और समाज की रक्षा का संकट खड़ा हुआ, तब क्षत्रियाणियों ने कुल को बचाने के लिए नए मार्ग का अनुसरण किया।

श्लोक 6

उत्पादितान्यपत्यानि ब्राह्मणैर्वेदपारगैः। पाणिग्राहस्य तनय इति वेदेषु निश्चितम्।। (1-113-6)

  • हिंदी अनुवाद: ...वेदपारंगत ब्राह्मणों के द्वारा संतानें उत्पन्न कराईं। वेदों में यह निश्चित किया गया है कि ऐसी स्थिति में उत्पन्न संतान पाणिग्रही (वैध पति) की ही संतान मानी जाती है।
  • व्याख्या: यह धार्मिक विधान है कि संकटकाल में कुल की निरंतरता बनाए रखने के लिए इस प्रकार उत्पन्न संतानों को भी मान्यता दी गई है।

श्लोक 7

धर्मं मनसि संस्थाप्य ब्राह्मणांस्ताः समभ्ययुः। लोकेऽप्याचरितो दृष्टः क्षत्रियाणां पुनर्भवः।। (1-113-7)

  • हिंदी अनुवाद: अपने मन में धर्म को स्थापित करके उन क्षत्रियाणियों ने उन ब्राह्मणों का आश्रय लिया। इस प्रकार संसार में क्षत्रियों का पुनर्जन्म (वंश का पुनरुत्थान) आचरित देखा गया है।
  • व्याख्या: धर्म की रक्षा और वंश चलाने के पवित्र उद्देश्य से यह मार्ग अपनाया गया, जिसे समाज ने स्वीकार किया।

श्लोक 8

ततः पुनः समुदितं क्षत्रं समभवत्तदा। इमं चैवात्र वक्ष्येऽहमितिहासं पुरातनम्।। (1-113-8)

  • हिंदी अनुवाद: उस प्रकार तब क्षत्रिय कुल का पुनः उदय हुआ। अब मैं इसी विषय में एक प्राचीन इतिहास और कहता हूँ, उसे सुनो।
  • व्याख्या: भीष्म जी सत्यवती को यह स्पष्ट करने के लिए आगे एक और प्राचीन और प्रासंगिक कथा सुनाने जा रहे हैं।

श्लोक 9

अथोचथ्य इति ख्यात आसीद्धीमानृषिः पुरा। ममता नाम तस्यासीद्भार्या परमसंमता।। (1-113-9)

  • हिंदी अनुवाद: प्राचीनकाल में उचथ्य नाम के एक प्रसिद्ध बुद्धिमान ऋषि थे। ममता नामक उनकी एक पत्नी थीं, जो उन्हें अत्यंत प्रिय थीं।
  • व्याख्या: यह कथा आगे दीर्घतमा ऋषि के जन्म और उससे जुड़ी मर्यादाओं की पृष्ठभूमि तैयार करती है।

श्लोक 10

उचथ्यस्य यवीयांस्तु पुरोधास्त्रिदिवौकसाम्। बृहस्पतिर्बृहत्तेजा ममतामन्वपद्यत।। (1-113-10)

  • हिंदी अनुवाद: उचथ्य के छोटे भाई तथा देवताओं के पुरोहित, बृहत्तेजस्वी बृहस्पति जी ने ममता (भाभी) के प्रति आकृष्ट होकर संबंध बनाना चाहा।
  • व्याख्या: देवताओं के गुरु बृहस्पति द्वारा अपनी भाभी ममता के पास जाने का प्रसंग यहाँ से आरंभ होता है।

श्लोक 11

उवाच ममता तं तु देवरं वदतां वरम्। अन्तर्वत्नी त्वहं भ्रात्रा ज्येष्ठेनारम्यतामिति।। (1-113-11)

  • हिंदी अनुवाद: तब ममता ने वक्ताओं में श्रेष्ठ उन देवर (बृहस्पति) से कहा—"मैं अपने बड़े भाई (तुम्हारे बड़े भाई उचथ्य) के गर्भ से गर्भवती हूँ, अतः इस समय ऐसा करना उचित नहीं है।"
  • व्याख्या: ममता ने मर्यादा का पालन करते हुए बृहस्पति को रोकने का प्रयास किया क्योंकि वह पहले से गर्भवती थीं।

श्लोक 12

अयं च मे महाभाग कुक्षावेव बृहस्पते। औचथ्यो देवमत्रापि षडङ्गं प्रत्यधीयत।। (1-113-12)

  • हिंदी अनुवाद: "हे महाभाग बृहस्पति! उचथ्य का यह पुत्र अभी मेरी कोख में ही है और यह देवताओं के समान वेदों के छह अंगों का अध्ययन कर रहा है।"
  • व्याख्या: गर्भ में पल रहा बालक कितना ज्ञानी और चेतन है, इसका परिचय ममता बृहस्पति को देती हैं।

श्लोक 13

अमोघरेतास्त्वं चापि द्वयोर्नास्त्यत्र संभवः। तस्मादेवं गते त्वद्य उपारमितुमर्हसि।। (1-113-13)

  • हिंदी अनुवाद: "तुम भी अमोघरेता (व्यर्थ न जाने वाले वीर्य वाले) हो और यहाँ दो जीवों (एक गर्भस्थ और दूसरा आने वाला) का एक साथ रहना संभव नहीं है। इसलिए ऐसी स्थिति में तुम्हें इस कार्य से निवृत्त होना चाहिए।"
  • व्याख्या: ममता ने वैज्ञानिक और तार्किक रूप से समझाया कि एक ही गर्भ में दो जीवों का निर्वाह संभव नहीं हो पाएगा।

श्लोक 14

वैशंपायन उवाच। एवमुक्तस्तदा सम्यक् बृहस्पतिरुदारधीः। कामात्मानं तदात्मानं न शशाक नियच्छितुम्।। (1-113-14)

  • हिंदी अनुवाद: वैशंपायन जी कहते हैं—इस प्रकार ममता द्वारा भली-भांति समझाए जाने पर भी उदार बुद्धि वाले बृहस्पति काम के वश में होने के कारण अपने मन को नियंत्रित नहीं कर सके।
  • व्याख्या: काम वासना के तीव्र वेग के आगे बृहस्पति अपनी बुद्धि और संयम को स्थिर नहीं रख पाए।

श्लोक 15

स बभूव ततः कामी तया सार्धमकामया। उत्सृजन्तं तु तं रेतः स गर्भस्थोऽभ्यभाषत।। (1-113-15)

  • हिंदी अनुवाद: तब वे अनिच्छुक ममता के साथ कामक्रीड़ा करने लगे। जब वे अपना वीर्यपात करने लगे, तब गर्भ में स्थित बालक ने उनसे कहा—
  • व्याख्या: यहाँ गर्भस्थ बालक के अद्भुत पराक्रम और चेतना का प्रसंग आता है जो वीर्यपात के समय सीधे संवाद करता है।

श्लोक 16

भोस्तात मा गमः कामं द्वयोर्नास्तीह संभवः। अल्पावकाशो भगवन्पूर्वं चाहमिहागतः।। (1-113-16)

  • हिंदी अनुवाद: "हे तात! काम के वश में मत होइए, यहाँ दो जीवों का रहना संभव नहीं है। हे भगवन! यहाँ बहुत थोड़ा अवकाश (स्थान) है और मैं यहाँ पहले से आया हुआ हूँ।"
  • व्याख्या: गर्भस्थ शिशु ने अपने तर्कों से बृहस्पति को रोकने की पूरी चेष्टा की।

श्लोक 17

अमोघरेताश्च भवान्न पीडां कर्तुमर्हति। अश्रुत्वैव तु तद्वाक्यं गर्भस्थस्य बृहस्पतिः।। (1-113-17)

  • हिंदी अनुवाद: "आप अमोघरेता हैं, अतः आपको मुझे यह पीड़ा नहीं देनी चाहिए।" किंतु गर्भस्थ बालक के उस वाक्य को अनसुना करके ही बृहस्पति...
  • व्याख्या: बृहस्पति ने गर्भस्थ बालक की चेतावनी और वेद-गर्भ की बात को नजरअंदाज कर दिया।

श्लोक 18

जगाम मैथुनायैव ममतां चारुलोचनाम्। शुक्रोत्सर्गं ततो बुद्ध्वा तस्या गर्भगतो मुनिः।। (1-113-18)

  • हिंदी अनुवाद: सुंदर नेत्रों वाली ममता के साथ मैथुन करने लगे। तब गर्भ में स्थित मुनि ने बृहस्पति का वीर्यपात होते हुए जानकर...
  • व्याख्या: जब बृहस्पति नहीं माने और वीर्य का पतन होने लगा, तब गर्भस्थ बालक ने अपनी रक्षा के लिए कदम उठाया।

श्लोक 19

पद्भ्यामारोधयन्मार्गं शुक्रस्य च बृहस्पतेः। स्थानमप्राप्तमथ तच्छुक्रं प्रतिहतं तदा।। (1-113-19)

  • हिंदी अनुवाद: अपने दोनों पैरों से बृहस्पति के शुक्र के मार्ग को रोक दिया। वह शुक्र अपने उचित स्थान को प्राप्त न कर सके, बीच में ही रुक गया।
  • व्याख्या: गर्भस्थ बालक ने अपने पैरों से वीर्य के मार्ग को अवरुद्ध कर दिया जिससे वह नीचे नहीं गिर पाया।

श्लोक 20

पपात सहसा भूमौ ततः क्रुद्धो बृहस्पतिः। तं दृष्ट्वा पतितं शुक्रं शशाप स रुषान्वितः।। (1-113-20)

  • हिंदी अनुवाद: वह शुक्र अचानक पृथ्वी पर गिर पड़ा। तब बृहस्पति बहुत क्रुद्ध हुए और उस गिरे हुए शुक्र को देखकर रोष से भरकर शाप देने लगे।
  • व्याख्या: वीर्य के पृथ्वी पर गिरने से कुपित होकर बृहस्पति ने गर्भस्थ बालक को शाप दे दिया।

श्लोक 21

उचथ्यपुत्रं गर्भस्थं निर्भर्त्स्य भगवानृषिः। यन्मां त्वमीदृशे काले सर्वभूतेप्सिते सति।। (1-113-21)

  • हिंदी अनुवाद: भगवान ऋषि बृहस्पति ने गर्भ में स्थित उचथ्य पुत्र को धमकाते हुए कहा—"चूँकि तुमने ऐसे समय में, जो सभी भूतों को अभीष्ट है (काम-क्रीड़ा का अवसर)..."
  • व्याख्या: बृहस्पति ने अपने काम में बाधा डालने और वीर्य को गिरने से रोकने के कारण गर्भस्थ शिशु पर अपना गुस्सा निकाला।

श्लोक 22

एवमात्थ वचस्तस्मात्तमो दीर्घं प्रवेक्ष्यसि। स वै दीर्घतमा नाम शापादृषिरजायत।। (1-113-22)

  • हिंदी अनुवाद: "...मुझसे ऐसा वचन कहा है, इसलिए तुम दीर्घकाल तक अंधकार को प्राप्त होगे (अंधे हो जाओगे)।" बृहस्पति के इसी शाप के कारण वे 'दीर्घतमा' नाम के ऋषि के रूप में जन्मे।
  • व्याख्या: इसी शाप के फलस्वरूप वे बालक जन्म से अंधे हुए और उनका नाम दीर्घतमा पड़ा।

श्लोक 23

बृहस्पतेर्बृहत्कीर्तेर्बृहस्पतिरिवौजसा। जात्यन्धो वेदवित्प्राज्ञः पत्नीं लेभे स विद्यया।। (1-113-23)

  • हिंदी अनुवाद: महान कीर्ति वाले बृहस्पति के तेज के समान ही ओजस्वी, जन्म से अंधे, वेदज्ञ और प्राज्ञ उन दीर्घतमा ऋषि ने अपनी विद्या के बल पर एक पत्नी प्राप्त की।
  • व्याख्या: जात्यंध होने के बावजूद दीर्घतमा अत्यधिक ज्ञानी और वेदों के ज्ञाता थे, जिन्होंने अपनी योग्यता से विवाह किया।

श्लोक 24

तरुणं रूपसम्पन्नां प्रद्वेषीं नाम ब्राह्मणीम्। स पुत्राञ्जनयामास गौतमादीन्महायशाः।। (1-113-24)

  • हिंदी अनुवाद: महायशस्वी उन दीर्घतमा ऋषि ने रूपवती और तरुण प्रद्वेषी नामक ब्राह्मणी से विवाह किया और उससे गौतमादि पुत्रों को उत्पन्न किया।
  • व्याख्या: दीर्घतमा और प्रद्वेषी के मिलन से गौतम आदि कई पुत्र उत्पन्न हुए जो आगे चलकर ऋषि कुल को बढ़ाने वाले बने।

श्लोक 25

ऋषेरुचथ्यस्य तदा सन्तानकुलवृद्धये। धर्मात्मा च महात्मा च वेदवेदाङ्गपारगः।। (1-113-25)

  • हिंदी अनुवाद: ऋषि उचथ्य के वंश और संतान की वृद्धि के लिए, वे धर्मात्मा, महात्मा और वेद-वेदांगों के पारंगत विद्वान दीर्घतमा ने यह कार्य किया।
  • व्याख्या: कुल की परंपरा को आगे बढ़ाने के लिए यह संतानोंत्पत्ति हुई थी।

श्लोक 26

गोधर्मं सौरभेयाच्च सोऽधीत्य निखिलं मुनिः। प्रावर्तत तदा कर्तुं श्रद्धावांस्तमशङ्कया।। (1-113-26)

  • हिंदी अनुवाद: उस मुनि ने गौओं (सौरभेयी) से 'गोधर्म' को पूरी तरह सीखकर बिना किसी संकोच और श्रद्धा के उसका आचरण करना आरंभ कर दिया।
  • व्याख्या: 'गोधर्म' का अर्थ यहाँ पशुओं की तरह केवल काम-संबंधी खुली स्वतंत्रता से है, जिसे दीर्घतमा ने नियम विरुद्ध अपना लिया था।

श्लोक 27

ततो वितथमर्यादं तं दृष्ट्वा मुनिसत्तमाः। क्रुद्धा मोहाभिभूतास्ते सर्वे तत्राश्रमौकसः।। (1-113-27)

  • हिंदी अनुवाद: तब मर्यादा को तोड़ चुके (वितथमर्याद) उन दीर्घतमा को देखकर आश्रम में रहने वाले सभी श्रेष्ठ मुनि मोह से ग्रसित होकर क्रोधित हो उठे।
  • व्याख्या: जब दीर्घतमा ने समाज और आश्रम की मर्यादाओं का उल्लंघन किया, तो अन्य ऋषियों को उस पर रोष आया।

श्लोक 28

अहोऽयं भिन्नमर्यादो नाश्रमे वस्तुमर्हति। तस्मादेनं वयं सर्वे पापात्मानं त्यजामहे।। (1-113-28)

  • हिंदी अनुवाद: उन्होंने आपस में कहा—"अहो! इस व्यक्ति ने मर्यादा तोड़ दी है, यह आश्रम में रहने योग्य नहीं है। इसलिए हम सब इस पापात्मा को यहाँ से त्याग देते हैं (निकाल देते हैं)।"
  • व्याख्या: मर्यादाभंग के कारण आश्रमवासियों ने दीर्घतमा का बहिष्कार करने का निर्णय लिया।

श्लोक 29

इत्यन्योन्यं समाभाष्य ते दीर्घतमसं मुनिम्। पुत्रलाभाच्च सा पत्नी न तुतोष पतिं तदा।। (1-113-29)

  • हिंदी अनुवाद: इस प्रकार आपस में विचार करके उन लोगों ने दीर्घतमा मुनि का त्याग किया। इधर पुत्रों की प्राप्ति होने पर भी उनकी वह पत्नी (प्रद्वेषी) अपने पति से संतुष्ट नहीं हुई।
  • व्याख्या: समाज के बहिष्कार के साथ-साथ उनकी पत्नी भी अब उनका आदर या भरण-पोषण नहीं करना चाहती थी।

श्लोक 30

प्रद्विषन्तीं पतिर्भार्यां किं मां द्वेक्षीति चाब्रवीत्। प्रद्वेष्युवाच। भार्याया भरणाद्भर्ता पालनाच्च पतिः स्मृतः।। (1-113-30)

  • हिंदी अनुवाद: अपने प्रति द्वेष रखने वाली पत्नी से पति (दीर्घतमा) ने कहा—"तुम मुझसे द्वेष क्यों करती हो?" इस पर प्रद्वेषी बोली—"भार्या का भरण-पोषण करने के कारण ही 'भर्ता' और रक्षा करने के कारण 'पति' नाम सार्थक होता है।"
  • व्याख्या: पत्नी ने तंग आकर कहा कि जब आप जात्यंध और असमर्थ हैं तथा मेरा पालन नहीं कर पा रहे हैं, तो आप मेरे पति कैसे हुए।

श्लोक 31

अहं त्वद्भरणाशक्ता जात्यन्धं ससुतं तदा। नित्यकालं श्रमेणार्ता न भरेयं महातपः।। (1-113-31)

  • हिंदी अनुवाद: "मैं तुम्हारा तथा इन बच्चों का भरण-पोषण करने में असमर्थ हूँ। हे महातपस्वी! मैं नित्यकाल परिश्रम से पीड़ित रहती हूँ, अतः अब मैं तुम्हारा भार वहन नहीं कर सकती।"
  • व्याख्या: गरीबी और असहाय स्थिति का हवाला देकर पत्नी ने दीर्घतमा का त्याग करने की बात कही।

श्लोक 32

भीष्म उवाच। तस्मास्तद्वचनं श्रुत्वा ऋषिः कोपसमन्वितः। प्रत्युवाच ततः पत्नीं प्रद्वेषीं ससुतां तदा।। (1-113-32)

  • हिंदी अनुवाद: भीष्म जी कहते हैं—पत्नी की वह बात सुनकर कोप से भरे हुए ऋषि दीर्घतमा ने अपनी पत्नी प्रद्वेषी और उसके पुत्रों से उत्तर में कहा—
  • व्याख्या: पत्नी के कड़वे वचनों से क्रोधित होकर दीर्घतमा ने स्त्री जाति और समाज के लिए एक बड़ा ऐतिहासिक विधान रच दिया।

श्लोक 33

नीयतां क्षत्रियकुले धनार्थश्च भविष्यति। प्रद्वेष्युवाच। त्वया दत्तं धनं विप्र नेच्छेयं दुःखकारणम्।। (1-113-33)

  • हिंदी अनुवाद: "मुझे क्षत्रिय कुल में ले चलो, वहाँ धन भी मिल जाएगा।" इस पर प्रद्वेषी बोली—"हे विप्र! तुम्हारे द्वारा दिया हुआ धन मैं नहीं चाहती, क्योंकि वह दुःख का कारण होगा।"
  • व्याख्या: प्रद्वेषी ने ऋषि के प्रस्ताव को ठुकरा दिया और उनके दिए धन को लेने से इनकार कर दिया।

श्लोक 34

यथेष्टं कुरु विप्रेन्द्र न भेरयं पुरा यथा। दीर्घतमा उवाच। अद्यप्रभृति मर्यादा मया लोके प्रतिष्ठिता।। (1-113-34)

  • हिंदी अनुवाद: "हे विप्रेन्द्र! आप अपनी इच्छा अनुसार जो चाहें करें, मैं पहले की तरह आपका भरण-पोषण नहीं करूँगी।" तब दीर्घतमा ने कहा—"आज से मैं संसार में एक नई मर्यादा स्थापित करता हूँ—"
  • व्याख्या: यहीं से स्त्री-धर्म और विवाह की आधुनिक या कनिष्ठ मर्यादाओं का नियमन दीर्घतमा द्वारा किया जाता है।

श्लोक 35

एक एव पतिर्नार्या यावज्जीवं परायणम्। मृते जीवति वा तस्मिन्नापरं प्राप्नुयान्नरम्।। (1-113-35)

  • हिंदी अनुवाद: "स्त्री के लिए जीवन भर के लिए एकमात्र पति ही उसका परायण (सर्वस्व) होगा। पति के जीवित रहते या उसके मृत हो जाने पर भी वह स्त्री किसी अन्य पुरुष को प्राप्त न करे (दूसरा विवाह न करे)।"
  • व्याख्या: दीर्घतमा ऋषि ने स्त्री के लिए एकनिष्ठता और आजीवन एक ही पति के नियम की मर्यादा स्थापित की।

श्लोक 36

अभिगम्य परं नारी पतिष्यति न संशयः। अपतीनां तु नारीणामद्यप्रभृति पातकम्।। (1-113-36)

  • हिंदी अनुवाद: "जो नारी अन्य पुरुष के पास जाएगी, वह निस्संदेह पतन को प्राप्त होगी। आज से पतिहीन (स्वेच्छाचारिणी) रहने वाली नारियों को महापाप लगेगा।"
  • व्याख्या: इस श्लोक में व्यभिचार और पति के अलावा अन्य पुरुषों से संबंध रखने को गंभीर पाप घोषित किया गया।

श्लोक 37

यद्यस्ति चेद्धनं सर्वं वृथाभोगा भवन्तु ताः। अकीर्तिः परिवादाश्च नित्यं तासां भवन्तु वै।। (1-113-37)

  • हिंदी अनुवाद: "यदि उनके पास धन हो भी, तो उनके सभी भोग व्यर्थ हों। उनकी अपकीर्ति हो और सदा उनकी निंदा (परिवाद) होती रहे।"
  • व्याख्या: मर्यादा का उल्लंघन करने वाली स्त्रियों के लिए दीर्घतमा ने कड़े सामाजिक और नैतिक दंड का शाप दिया।

श्लोक 38

इति तद्वचनं श्रुत्वा ब्राह्मणी भृशकोपिता। गङ्गायां नीयतामेष पुत्रा इत्येवमब्रवीत्।। (1-113-38)

  • हिंदी अनुवाद: ऋषि के ऐसे वचन सुनकर वह ब्राह्मणी बहुत अधिक क्रोधित हो उठी और अपने पुत्रों से बोली—"इस बूढ़े को ले जाकर गंगा नदी में फेंक आओ!"
  • व्याख्या: पत्नी की क्रूरता देखिए कि उसने अपने अंधे पति को गंगा में बहा देने का आदेश अपने ही बेटों को दे दिया।

श्लोक 39

लोभमोहाभिभूतास्ते पुत्रास्तं गौतमादयः। वद्ध्वोडुपे परिक्षिप्य गङ्गायां समवासृजन्।। (1-113-39)

  • हिंदी अनुवाद: लोभ और मोह से अभिभूत हुए उन गौतम आदि पुत्रों ने क्रूरतापूर्वक उन दीर्घतमा मुनि को एक बेड़े (नाव) से बाँधकर गंगा नदी में प्रवाहित कर दिया।
  • व्याख्या: कुसंस्कारों और क्रूरता के कारण पुत्रों ने अपने ही पिता को बहती धारा में छोड़ दिया।

श्लोक 40

कस्मादन्धश्च वृद्धश्च भर्तव्योऽयमिति स्म ते। चिन्तयित्वा ततः क्रूराः प्रतिजग्मुरथो गृहान्।। (1-113-40)

  • हिंदी अनुवाद: "यह अंधा और वृद्ध व्यक्ति आखिर क्यों पाला जाए?" ऐसा सोचकर उन क्रूर पुत्रों ने पिता को बहाया और अपने घर वापस लौट गए।
  • व्याख्या: स्वार्थ और क्रूरता की पराकाष्ठा दिखाते हुए पुत्रों ने अपने ही पिता का त्याग कर दिया।

श्लोक 41

सोऽनुस्रोतस्तदा विप्रः प्लवमानो यदृच्छया। जगाम सुबहून्देशानन्धस्तेनोडुपेन ह।। (1-113-41)

  • हिंदी अनुवाद: वह अंधे विप्र (दीर्घतमा) उस बेड़े के सहारे दैवयोग से जल की धारा के साथ बहते हुए बहुत से देशों में चले गए।
  • व्याख्या: भाग्य के सहारे वे अंधे ऋषि बहते-बहते नदी के निचले क्षेत्रों के अन्य राज्यों तक पहुँच गए।

श्लोक 42

तं तु राजा बलिर्नाम सर्वधर्मविदां वरः। अपश्यन्मज्जनगतः स्रोतसाऽभ्याशमागतम्।। (1-113-42)

  • हिंदी अनुवाद: सभी धर्मों को जानने वालों में श्रेष्ठ बलि नामक राजा स्नान करने के लिए जल में गए थे, तभी उन्होंने धारा के पास आते हुए उन ऋषि को देखा।
  • व्याख्या: राजा बलि धर्मात्मा थे और नदी में स्नान के समय उनकी नजर बहते हुए दीर्घतमा पर पड़ी।

श्लोक 43

जग्राह चैनं धर्मात्मा बलिः सत्यपराक्रमः। ज्ञात्वा चैवं स वव्रेऽथ पुत्रार्थे भरतर्षभ।। (1-113-43)

  • हिंदी अनुवाद: सत्यपराक्रमी और धर्मात्मा राजा बलि ने उन्हें पकड़कर सुरक्षित बाहर निकाला। हे भरतवंशियों में श्रेष्ठ! उनके गुणों को जानकर राजा ने पुत्र प्राप्ति के लिए उन्हें चुन लिया (उनसे प्रार्थना की)।
  • व्याख्या: राजा बलि ने पहचान लिया कि यह कोई साधारण व्यक्ति नहीं बल्कि तेजस्वी ऋषि हैं, और उन्होंने उनसे संतान प्राप्ति की इच्छा जताई।

श्लोक 44

तं पूजयित्वा राजर्षिर्विश्रान्तं मुनिमब्रवीत्। सन्तानार्थं महाभाग भार्यासु मम मानद। पुत्रान्धर्मार्थकुशलानुत्पादयितुमर्हसि।। (1-113-44)

  • हिंदी अनुवाद: राजर्षि बलि ने उनकी पूजा की और जब वे विश्राम कर चुके, तब उनसे कहा—"हे महाभाग! मानद! मेरे वंश की संतान के लिए आप मेरी पत्नियों में धर्म और अर्थ में कुशल पुत्र उत्पन्न करें।"
  • व्याख्या: राजा बलि ने नियोग प्रथा के अनुसार अपनी पत्नियों के गर्भ से महान और वीर पुत्र उत्पन्न करने का निवेदन किया।

श्लोक 45-46

भीष्म उवाच। एवमुक्तः स तेजस्वी तं तथेत्युक्तवानृषिः। तस्मैस राजा स्वां भार्यां सुदेष्णां प्राहिणोत्तदा।। (1-113-45/46) अंधं वृद्धं च तं मत्वा न सा देवी जगाम ह। स्वां तु धात्रेयिकां तस्मै वृद्धाय प्राहिणोत्तदा।। (1-113-46/47 - अनुसार)

  • हिंदी अनुवाद: भीष्म जी कहते हैं—ऐसा कहे जाने पर तेजस्वी ऋषि ने 'तथास्तु' कहकर स्वीकार किया। तब राजा बलि ने अपनी पत्नी सुदेष्णा को उनके पास भेजा। किंतु रानी सुदेष्णा ने उन्हें अंधा और वृद्ध मानकर स्वयं उनके पास जाने से इनकार कर दिया और अपनी दासी (धात्री की पुत्री) को उस वृद्ध ऋषि के पास भेज दिया।
  • व्याख्या: रानी सुदेष्णा ने संकोच और अरुचि के कारण खुद न जाकर अपनी दासी को ऋषि के पास भेजा।

श्लोक 47

तस्यां काक्षीवदादीन्स शूद्रयोनावृषिस्तदा। जनयामास धर्मात्मा पुत्रानेकादशैव तु।। (1-113-47)

  • हिंदी अनुवाद: धर्मात्मा ऋषि ने शूद्रयोनि (दासी) से उत्पन्न हुई उस स्त्री के गर्भ से काक्षीवान आदि ग्यारह तेजस्वी पुत्रों को उत्पन्न किया।
  • व्याख्या: दासी के गर्भ से दीर्घतमा ऋषि के प्रताप से काक्षीवान आदि ११ महान ज्ञानी पुत्रों का जन्म हुआ।

श्लोक 48

काक्षीवदादीन्पुत्रांस्तान्दृष्ट्वा सर्वानधीयतः। उवाच तमृषिं राजा ममेम इति भारत।। (1-113-48)

  • हिंदी अनुवाद: हे भारत! उन सभी काक्षीवान आदि वेद पढ़ने वाले पुत्रों को देखकर राजा ने उस ऋषि से कहा—"ये सब मेरे पुत्र हैं।"
  • व्याख्या: जब वे पुत्र बड़े होकर विद्वान बने, तो राजा बलि ने उन्हें अपने पुत्र के रूप में स्वीकार करना चाहा।

श्लोक 49

नेत्युवाच महर्षिस्तं ममेम इति चाब्रवीत्। शूद्रयोनौ मया हीमे जाताः काक्षीवदादयः।। (1-113-49)

  • हिंदी अनुवाद: महर्षि ने कहा—"नहीं, ये मेरे (या मेरे वीर्य से उत्पन्न) हैं।" और बोले—"काक्षीवान आदि ये सभी बालक शूद्रयोनि में मेरे द्वारा उत्पन्न किए गए हैं।"
  • व्याख्या: ऋषि ने स्पष्ट किया कि यद्यपि वे तुम्हारे राज्य में हैं, परंतु वे मेरे तप और वीर्य से उत्पन्न ब्रह्मवेत्ता पुत्र हैं।

श्लोक 50

अंधं वृद्धं च मां दृष्ट्वा सुदेष्णा महिषी तव। अवमन्य ददौ मूढा शूद्रां धात्रेयिकां मम।। (1-113-50)

  • हिंदी अनुवाद: "तुम्हारी मूर्ख महिषी सुदेष्णा ने मुझे अंधा और वृद्ध समझकर मेरा अपमान किया और अपनी दासी (धात्री की पुत्री) को मेरे पास भेज दिया था।"
  • व्याख्या: ऋषि ने राजा बलि को रानी के द्वारा किए गए अनादर और दासी को भेजने का पूरा सत्य बता दिया।

श्लोक 51

भीष्म उवाच। ततः प्रसादयामास पुनस्तमृषिसत्तमम्। बलिः सुदेष्णां स्वां भार्यां तस्मै स प्राहिणोत्पुनः।। (1-113-51)

  • हिंदी अनुवाद: भीष्म जी कहते हैं—इसके पश्चात राजा बलि ने उन श्रेष्ठ ऋषि को प्रसन्न किया और अपनी पटरानी सुदेष्णा को पुनः उनके पास भेजा।
  • व्याख्या: अपनी भूल सुधारते हुए राजा बलि ने रानी सुदेष्णा को ऋषि के पास भेजकर सत्य और धर्म के अनुसार संतान प्राप्ति का मार्ग चुना।

श्लोक 52

तां स दीर्घतमाङ्गेषु स्पृष्ट्वा देवीमथाब्रवीत्। भविष्यन्ति कुमारास्ते तेजसाऽऽदित्यवर्चसः।। (1-113-52)

  • हिंदी अनुवाद: तब दीर्घतमा ऋषि ने अपने अंगों से उस देवी (सुदेष्णा) को स्पर्श करके कहा—"अब तुम्हारे गर्भ से सूर्य के समान तेजस्वी कुमार उत्पन्न होंगे।"
  • व्याख्या: ऋषि के स्पर्श और आशीर्वाद से रानी सुदेष्णा के गर्भ से महान पराक्रमी पुत्रों के जन्म का योग बना।

श्लोक 53

अङ्गो वङ्गः कलिङ्गश्च पुण्ड्रः सुह्मश्च ते सुताः। तेषां देशाः समाख्याताः स्वनामकथिता भुवि।। (1-113-53)

  • हिंदी अनुवाद: (रानी सुदेष्णा से) तुम्हारे अंग, वंग, कलिंग, पुण्ड्र और सुह्म नाम के पाँच पुत्र होंगे। पृथ्वी पर उनके नाम से ही उनके देशों के नाम प्रसिद्ध हुए।
  • व्याख्या: प्राचीन भारत के इन प्रसिद्ध पाँच राजवंशों और देशों की स्थापना दीर्घतमा ऋषि के वरदान से राजा बलि के यहाँ हुई थी।

श्लोक 54

अङ्गस्याङ्गोऽभवद्देशो वङ्गो वङ्गस्य च स्मृतः। कलिङ्गविषयश्चैव कलिङ्गस्य च स स्मृतः।। (1-113-54)

  • हिंदी अनुवाद: अंग पुत्र के नाम से 'अंग देश', वंग पुत्र के नाम से 'वंग देश' और कलिंग पुत्र के नाम से 'कलिंग विषय' प्रसिद्ध हुआ।
  • व्याख्या: राजकुमारों के नामों पर ही उन-उन भूभागों का नामकरण इतिहास में हुआ।

श्लोक 55

पुण्ड्रस्य पुण्ड्राः प्रख्याताः सुह्माः सुह्मस्य च स्मृताः। एवं बलेः पुरा वंशः प्रख्यातो वै महर्षिजः।। (1-113-55)

  • हिंदी अनुवाद: पुण्ड्र से पुण्ड्र देश और सुह्म से सुह्म देश ख्यात हुए। इस प्रकार प्राचीनकाल में महर्षि (दीर्घतमा) के द्वारा राजा बलि का वंश प्रसिद्ध हुआ।
  • व्याख्या: यह इस बात का प्रमाण है कि महर्षियों के माध्यम से किस प्रकार बड़े-बड़े राजवंशों का विस्तार और स्थापना हुई।

श्लोक 56

एवमन्ये महेष्वासा ब्राह्मणैः क्षत्रिया भुवि। जाताः परमधर्मज्ञा वीर्यवन्तो महाबलाः। एतच्छ्रुत्वा त्वमप्यत्र मातः कुरु यथेप्सितम्।। (1-113-56) 

  • हिंदी अनुवाद: इसी प्रकार पृथ्वी पर अन्य बड़े-बड़े धनुर्धर क्षत्रिय भी ब्राह्मणों के माध्यम से उत्पन्न हुए, जो परम धर्मज्ञ, वीर और महाबली थे। हे माता! इस इतिहास को सुनकर अब तुम भी यहाँ अपनी इच्छा के अनुसार जो उचित हो, वह करो।
  • व्याख्या: भीष्म ने सत्यवती को ऐतिहासिक उदाहरणों से यह पूरी तरह समझा दिया कि कुरुवंश की रक्षा के लिए नियोग का मार्ग अपनाना पूरी तरह शास्त्रसम्मत और परंपराओं से पुष्ट है।
इति श्रीमन्महाभारते आदिपर्वणि संभवपर्वणि त्रयोदशाधिकशततमोऽध्यायः (113)

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