द्वाविंशोऽध्यायः
नागोंद्वारा उच्चैःश्रवाकी पूँछको काली बनाना; कद्रू और विनताका समुद्रको देखते हुए आगे बढ़ना।
नागाश्च संविदं कृत्वा कर्तव्यमिति तद्वचः ।
निःस्नेहा वै दहेन्माता असम्प्राप्तमनोरथा ।।१।।
प्रसन्ना मोक्षयेदस्मांस्तस्माच्छापाच्च भामिनी।
कृष्णं पुच्छं करिष्यामस्तुरगस्य न संशयः ॥२॥
उग्रश्रवाजी कहते हैं-महर्षियो! इधर नागोंने परस्पर विचार करके यह निश्चय किया कि 'हमें माताकी आज्ञाका पालन करना चाहिये। यदि इसका मनोरथ पूरा न होगा तो वह स्नेहभाव छोड़कर रोषपूर्वक हमें जला देगी। यदि इच्छा पूर्ण हो जानेसे प्रसन्न हो गयी तो वह भामिनी हमें अपने शापसे मुक्त कर सकती है। इसलिये हम निश्चय ही उस घोड़ेकी पूँछको काली कर देंगे' ॥ १-२॥
एतस्मिन्नन्तरे ते तु सपत्न्यो पणिते तदा ॥३॥
ततस्ते पणितं कृत्वा भगिन्यो द्विजसत्तम ।
जग्मतुः परया प्रीत्या परं पारं महोदधेः ॥ ४ ॥
कद्रूश्च विनता चैव दाक्षायण्यो विहायसा।
आलोकयन्त्यावक्षोभ्यं समुद्र निधिमम्भसाम्॥५॥
वायुनातीव सहसा क्षोभ्यमाणं महास्वनम्।
तिमिगिलसमाकीर्ण मकररावृतं तथा ॥६॥
संयुतं बहुसाहस्रः सत्त्वेर्नानाविधैरपि ।
घोरेोरमनाधृष्यं गम्भीरमतिभैरवम् ॥ ७॥
ऐसा विचार करके वे वहाँ गये और काले रंगके बाल बनकर उसकी पूँछमें लिपट गये। | द्विजश्रेष्ठ! इसी बीचमें बाजी लगाकर आयी हुई दोनों सौतें और सगी बहनें पुनः अपनी शर्तको दुहराकर बड़ी प्रसन्नताके साथ समुद्र के दूसरे पार जा पहुंची। दक्षकुमारी कद्रू और विनता आकाशमार्गसे अक्षोभ्य जलनिधि समुद्रको देखती हुई आगे बढ़ीं। वह महासागर अत्यन्त प्रबल वायुके थपेड़े खाकर सहसा विुक्षब्ध हो रहा था। उससे बड़े जोरकी गर्जना होती थी। तिमिगिल और मगरमच्छ आदि जलजन्तु उसमें सब ओर व्याप्त थे। नाना प्रकारके भयंकर जन्तु सहस्रोंकी संख्यामें उसके भीतर निवास करते थे। इन सबके कारण वह अत्यन्त घोर और दुर्धर्ष जान पड़ता था तथा गहरा होनेके साथ ही अत्यन्त भयंकर था ।।३-७॥
नागानामालयं चापि सुरम्य सरितां पतिम् ॥ ८॥
नदियोंका वह स्वामी सब प्रकारके रत्नोंकी खान, वरुणका निवासस्थान तथा नागोंका सुरम्य गृह था ।। ८॥
भयंकराणां सत्त्वानां पयसो निधिमव्ययम् ॥९॥
वह पातालव्यापी बड़वानलका आश्रय, असुरोंके छिपनेका स्थान, भयंकर जन्तुओंका घर, अनन्त जलका भण्डार और अविनाशी था ।।९।।
अप्रमेयमचिन्त्यं च सुपुण्यजलसम्मितम् ।। १०॥
वह शुध, दिव्य, अमरोंके अमृतका उत्तम उत्पत्ति-स्थान, अप्रमेय, अचिन्त्य तथा परम पवित्र जलसे परिपूर्ण था ।। १०॥
आपूर्यमाणमत्यर्थ नृत्यन्तमिव चोर्मिभिः ॥ ११ ॥
बहुत-सी बड़ी-बड़ी नदियाँ सहस्रोंकी संख्यामें आकर उसमें यत्र-तत्र मिलतीं और उसे अधिकाधिक भरती रहती थीं। वह भुजाओंके समान ऊंची लहरोंको ऊपर उठाये नृत्य-सा कर रहा था ।।११।।
गम्भीरं विकसितमम्बरप्रकाशम्।
पातालज्वलनशिखाविदीपिताङ्गंगर्जन्तं द्रुतमभिजग्मतुस्ततस्ते ॥ १२ ॥
इस प्रकार अत्यन्त तरल तरंगोंसे व्याप्त, आकाशके समान स्वच्छ, बड़वानलकी शिखाओंसे उद्भासित, गम्भीर, विकसित और निरन्तर गर्जन करनेवाले महासागरको देखती हुई वे दोनों बहनें तुरंत आगे बढ़ गयीं ।। १२ ।।
इति श्रीमहाभारते आदिपर्वणि आस्तीकपर्वणि सोपणे समुद्रदर्शनं नामद्वाविंशोऽध्यायः ।। २२ ।।
इस प्रकार श्रीमहाभारत आदिपर्वके अन्तर्गत आस्तीकपर्वमें गरुडचरितके प्रसंगमें समुद्रदर्शन नामक बाईसवाँ अध्याय पूरा हुआ ।।२२।।
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