श्रीमन्महाभारते आदिपर्वणि संभवपर्वणि द्विसप्ततितमोऽध्यायः

श्रीमन्महाभारते आदिपर्वणि   संभवपर्वणि द्विसप्ततितमोऽध्यायः

महाभारत के आदिपर्व (संभवपर्व) के 72वें अध्याय के इन श्लोकों में कच की वापसी, देवयानी और शर्मिष्ठा के बीच विवाद, शर्मिष्ठा द्वारा देवयानी को कुएं में फेंकना और राजा ययाति द्वारा उसका उद्धार करने की कथा का वर्णन है।

वैशंपायन उवाच (श्लोक 1-2)

मूल श्लोक: कृतविद्ये कचे प्राप्ते हृष्टरूपा दिवौकसः। कचादधीत्य तां विद्यां कृतार्था भरतर्षभ।। सर्व एव समागम्य शतक्रतुमथाब्रुवन्। कालस्ते विक्रमस्याद्य जहि शत्रून्पुरन्दर।।

हिन्दी अनुवाद: वैशंपायन जी कहते हैं—हे भरतश्रेष्ठ! कच के विद्या पूरी करके लौट आने पर देवता बहुत प्रसन्न हुए। देवताओं ने कच से उस (मृतसंजीवनी) विद्या को सीखकर अपने को कृतकृत्य माना। इसके बाद सभी देवताओं ने एकत्र होकर देवराज इंद्र (शतक्रतु) से कहा—हे पुरन्दर! अब तुम्हारे पराक्रम का समय आ गया है, अतः शत्रुओं (असुरों) का नाश करो।

व्याख्या: कच के सफलतापूर्वक संजीवनी विद्या सीखकर स्वर्ग लौटने से देवताओं की शक्ति बढ़ गई है। वे अब असुरों के विरुद्ध निर्णायक युद्ध लड़ने के लिए इंद्र को प्रेरित करते हैं।

वैशंपायन उवाच (श्लोक 3-7)

मूल श्लोक: एवमुक्तस्तु सहितैस्त्रिदशैर्मघवांस्तदा। तथेत्युक्त्वा प्रचक्राम सोऽपश्यत वने स्त्रियः।। क्रीडन्तीनां तु कन्यानां वने चैत्ररथोपमे। वायुभूतः स वस्त्राणि सर्वाण्येव व्यमिश्रयत्।। ततो जलात्समुत्तीर्य कन्यास्ताः सहितास्तदा। वस्त्राणि जगृहुस्तानि यथाऽऽसन्नान्यनेकशः।। तत्र वासो देवयानयाः शर्मिष्ठा जगृहे तदा। व्यतिमिश्रमजानन्ती दुहिता वृषपर्वणः।। ततस्तयोर्मिथस्तत्र विरोधः समजायत। देवयान्याश्च राजेन्द्र शर्मिष्ठायाश्च तत्कृते।।

हिन्दी अनुवाद: समस्त देवताओं द्वारा ऐसा कहे जाने पर मघवान (इंद्र) ने 'तथापि' (अच्छा) कहकर प्रस्थान किया और उन्होंने वन में स्त्रियों को देखा। चैत्ररथ वन के समान सुंदर उस वन में क्रीड़ा कर रही कन्याओं के वस्त्रों को वायु का रूप धारण करके इंद्र ने आपस में मिला दिया (अस्त-व्यस्त कर दिया)। तब जल से बाहर निकलकर उन सभी कन्याओं ने पास पड़े हुए वस्त्रों में से अपनी इच्छा और क्रम के अनुसार अलग-अलग वस्त्र उठा लिए। उस समय, वस्त्रों के मिले होने के कारण भ्रमित हुई असुरराज वृषपर्व की पुत्री शर्मिष्ठा ने अनजाने में देवयानी का वस्त्र उठा लिया। हे राजेन्द्र! उसी वस्त्र के कारण उन दोनों (देवयानी और शर्मिष्ठा) में आपसी विरोध (झगड़ा) उत्पन्न हो गया।

व्याख्या: इंद्र के छल के कारण युवतियों के वस्त्र आपस में मिल जाते हैं। दैत्यराज वृषपर्व की पुत्री शर्मिष्ठा भूलवश ऋषि शुक्रचार्य की पुत्री देवयानी के वस्त्र पहन लेती है, जिससे दोनों के बीच अहंकार और श्रेष्ठता को लेकर तीखी बहस शुरू हो जाती है।

देवयानी उवाच (श्लोक 8)

मूल श्लोक: कस्माद्गृह्णासि मे वस्त्रं शिष्या भूत्वा ममासुरि। समुदाचारहीनाया न ते साधु भविष्यति।।

हिन्दी अनुवाद: देवयानी ने कहा—हे असुर-कन्या! तू मेरी शिष्या होकर मेरा वस्त्र क्यों ग्रहण कर रही है? शिष्टाचार से हीन तेरी इस हरकत का परिणाम अच्छा नहीं होगा।

व्याख्या: देवयानी अपने कुल के प्रभाव और गुरुपुत्री होने के अहंकार में शर्मिष्ठा को नीचा दिखाने का प्रयास करती है और उसे शिष्टाचारहीन कहती है।

शर्मिष्ठोवाच (श्लोक 9-12)

मूल श्लोक: आसीनं च शयानं च पिता ते पितरं मम। स्तौतिबन्दीव चाभीक्ष्णं नीचैः स्थितत्वा विनीतवत्।। याचतस्त्वं हि दुहिता स्तुवतः प्रतिगृह्णतः। सुताहं स्तूयमानस्य ददतोऽप्रतिगृह्णतः।। आदुन्वस्व विदुन्वस्व द्रुह्य कुप्यस्व याचकि। अनायुधा सायुधाया रिक्ता क्षुभ्यसि भिक्षुकि।। लप्स्यसे प्रतियोद्धारं न हि त्वां गणयाम्यहम्। प्रतिकूलं वदसि चेदितःप्रभृति याचकि।।

हिन्दी अनुवाद: शर्मिष्ठा ने कहा—तेरा पिता मेरे पिता (असुरराज वृषपर्व) के सामने बंदी (भाट) की तरह नीचे बैठकर बहुत विनम्रता से हमेशा उनके बैठने और लेटने पर भी उनकी स्तुति करता है। तू मांगने वाले और दूसरों की स्तुति करके प्रतिग्रह (दान) लेने वाले की पुत्री है; जबकि मैं स्तुति किए जाने वाले और दान देने वाले (किंतु बदले में कुछ न लेने वाले) राजा की पुत्री हूँ। हे मांगने वाली (याचकि)! तू चाहे उद्विग्न हो, कुपित हो या द्वेष करे; तू बिना शस्त्र की है और मैं शस्त्रों से युक्त हूँ, तू बिल्कुल रिक्त (हीन) है और भिखारिन की तरह क्षुब्ध हो रही है। आज से यदि तू मेरे प्रतिकूल बोलेगी, तो तुझे मुकाबले में ऐसा प्रतिद्वंद्वी मिलेगा कि मैं तुझे कुछ भी नहीं समझती!

व्याख्या: शर्मिष्ठा इस प्रसंग में बहुत कड़े और अपमानजनक शब्द बोलती है। वह याद दिलाती है कि देवयानी के पिता (शुक्रचार्य) उनके आश्रित हैं और वृषपर्व से दान व आश्रय लेते हैं, जबकि वह स्वयं दातार (राजा) की पुत्री है। यह कुलीनता और आश्रित-आश्रयदाता का अहंकार उनके बीच हिंसक संघर्ष का कारण बनता है।

वैशंपायन उवाच (श्लोक 13-16)

मूल श्लोक: समुच्छ्रयं देवयानीं गतां सक्तां च वाससि। शर्मिष्ठा प्राक्षिपत्कूपे ततः स्वपुरमागमत्। हतेयमिति विज्ञाय शर्मिष्ठा पापनिश्चया।। अनवेक्ष्य ययौ वेश्म क्रोधवेगपरायणा। प्रविश्य स्वगृहं स्वस्था धर्ममासुरमास्थिता।। अथ तं देशमभ्यागाद्ययातिर्नहुषात्मजः। श्रान्तयुग्यः श्रान्तहयो मृगलिप्सुः पिपासितः।। स नाहुषः प्रेक्षमाण उदपानं गतोदकम्। ददर्श राजा तां तत्र कन्यामग्निशिखामिव। तामपृच्छत्स दृष्ट्वैव कन्याममरवर्णिनीम्।।

हिन्दी अनुवाद: वैशंपायन जी कहते हैं—अहंकार में चूर और वस्त्रों में उलझी हुई देवयानी को पापी निश्चय वाली शर्मिष्ठा ने (धक्का देकर) कुएं में फेंक दिया और यह मानकर कि 'यह मर चुकी है', वह बिना देखे ही क्रोध के वेग में अपने घर लौट गई। घर में प्रवेश कर वह आंसुओं या पश्चाताप से मुक्त होकर असुर-धर्म (क्रूरता) का पालन करती हुई सुख से बैठ गई। इसके बाद, नहुष के पुत्र राजा ययाति शिकार की इच्छा से, थके हुए घोड़ों और रथ के साथ, प्यासे उस देश में आ पहुँचे। पानी की तलाश करते हुए वे राजा जब सूखे या जलहीन कुएं के पास पहुँचे, तो उन्होंने वहाँ अग्नि शिखा के समान चमकती हुई उस कन्या को देखा। देवयानी को देखते ही अमर स्त्री के समान उस रूपवती कन्या से राजा ने पूछा—

व्याख्या: शर्मिष्ठा गुस्से में आकर देवयानी को सूखे कुएं में धकेल देती है और उसे मरा हुआ समझकर चली जाती है। दैवयोग से उसी समय राजा ययाति शिकार खेलते हुए प्यासे भटकते हुए उसी कुएं के पास पहुँचते हैं और कुएं के अंदर फँसी हुई देवयानी पर उनकी दृष्टि पड़ती है।

ययाति और देवयानी का संवाद (श्लोक 17-27)

मूल श्लोक: सान्त्वयित्वा नृपश्रेष्ठः साम्ना परमवल्गुना। का त्वं ताम्रनखी श्यामा सुमृष्टमणिकुण्डला।। दीर्घं ध्यायसि चात्यर्थं कस्माच्छ्वसिषि चातुरा। कथं च पतिताऽस्यस्मिन्कूपे वीरुत्तृणावृते।। दुहिता चैव कस्य त्वं वद सत्यं सुमध्यमे। योऽसौ देवैर्हतान्दैत्यानुत्थापयति विद्यया।। तस्य शुक्रस्य कन्याहं स मां नूनं न बुध्यते। एष मे दक्षिणो राजन्पाणिस्ताम्रनखाङ्गुलिः।। समुद्धर गृहीत्वा मां कुलीनस्त्वं हि मे मतः। जानामि हि त्वां संशान्तं वीर्यवन्तं यशस्विनम्।। तस्मान्मां पतितामस्मात्कूपादुद्धर्तुमर्हसि।। तामथो ब्राह्मणीं कन्यां विज्ञायनहुषात्मजः। गृहीत्वा दक्षिणे पाणावुज्जहार ततोऽवटात्। उद्धृत्य चैनां तरसा तस्मात्कूपान्नराधिपः।। गच्छ भद्रे यथाकामं न भयं विद्यते तव। इत्युच्यमाना नृपतिं देवयानीदमुत्तरम्।। उवाच मामुपादाय गच्छ शीघ्रं प्रियो हि मे। गृहीताहं त्वया पाणौ तस्माद्भर्ता भविष्यसि।। इत्येवमुक्तो नृपतिराह क्षत्रकुलोद्भवः। त्वं भद्रे ब्राह्मणी तस्मान्मया नार्हसि सङ्गमम्।। सर्वलोकगुरुः काव्यस्त्वं तस्य दुहिता शुभे। तस्मादपि भयं मेऽद्य ततः कल्याणि नार्हसि।।

हिन्दी अनुवाद: राजा ययाति ने अत्यंत मधुर वचनों से सांत्वना देते हुए पूछा—हे ताम्रनखी, श्यामा, सुंदर मणियों के कुंडल धारण करने वाली सुमध्यमे! तुम कौन हो? तुम इतनी गहरी चिंता क्यों कर रही हो और क्यों आर्त होकर लंबी सांसें ले रही हो? लताओं और तिनकों से ढके इस कुएं में तुम कैसे गिर पड़ी हो? तुम किसकी पुत्री हो? सच-सच बताओ। देवयानी ने कहा—जो देवताओं द्वारा मारे गए दैत्यों को अपनी विद्या (मृतसंजीवनी) से जीवित कर देते हैं, उन शुक्रचार्य की मैं पुत्री हूँ। लगता है वे इस समय मेरे बारे में नहीं जान रहे हैं। हे राजन्! ताम्रवर्ण के नखों वाली मेरी यह दाहिना हाथ (हथेली) देखो। तुम मेरा हाथ पकड़कर कुएं से बाहर निकालो, क्योंकि मैं तुम्हें उच्च कुल का मानती हूँ। मैं जानती हूँ कि तुम शांत, पराक्रमी और यशस्वी हो। इसलिए तुम इस कुएं में गिरी हुई मुझको बाहर निकालने के योग्य हो। वैशंपायन जी कहते हैं—नहुषनंदन ययाति ने उस कन्या को ब्राह्मण-कन्या जानकर अपने दाहिने हाथ से पकड़कर कुएं से बाहर खींच लिया। कुएं से बाहर निकालने के बाद राजा ने कहा—हे भद्रे! अब तुम अपनी इच्छा के अनुसार जहाँ चाहो जाओ, अब तुम्हें कोई भय नहीं है। ययाति के ऐसा कहने पर देवयानी ने उत्तर दिया—तुम मुझे अपने साथ लेकर शीघ्र चलो, तुम मुझे प्रिय हो। तुमने मेरा हाथ पकड़ा है, इसलिए तुम मेरे पति बनोगे। यह सुनकर क्षत्रिय कुल में उत्पन्न हुए राजा ययाति ने कहा—हे भद्रे! तुम ब्राह्मण-कन्या हो, इसलिए तुम मेरे साथ विवाह (संगम) के योग्य नहीं हो। तुम्हारे पिता काव्य (शुक्रचार्य) समस्त लोकों के गुरु हैं और तुम उन्हीं की पुत्री हो। इसलिए हे कल्याणि! मुझे आज उनका भी भय है, अतः तुम्हारा यह प्रस्ताव उचित नहीं है।

व्याख्या: राजा ययाति मानवता के नाते देवयानी का हाथ पकड़कर उसे कुएं से बाहर निकालते हैं। प्राचीन संस्कृति और धर्म के अनुसार, यदि कोई कुंवारी कन्या किसी पुरुष द्वारा स्पर्श की जाती है या उसका हाथ पकड़ा जाता है, तो उसे विवाह का आधार मान लिया जाता है। देवयानी इसी नियम का हवाला देकर ययाति से विवाह करने का आग्रह करती है, परंतु ययाति एक क्षत्रिय राजा होने और शुक्रचार्य की पुत्री (ब्राह्मण कन्या) होने के कारण प्रारंभ में संकोच करते हैं और इस संबंध से डरते हैं।

देवयानी उवाच (श्लोक 28)

मूल श्लोक: यदि मद्वचनान्नाद्य मां नेच्छसि नराधिप। त्वामेव वरये पित्रा तस्माल्लप्स्यसि गच्छ हि।।

हिन्दी अनुवाद: देवयानी ने कहा—हे नराधिप (राजा)! यदि तुम आज मेरे कहने से मुझसे विवाह करना नहीं चाहते हो, तो मैं अपने पिता के माध्यम से तुम्हारा ही वरण करवाऊँगी (अर्थात पिता की आज्ञा या बल से तुम्हें ही प्राप्त करूँगी)। इसलिए अब तुम जाओ, तुम बच नहीं सकोगे।

व्याख्या: देवयानी अपनी जिद्द पर अड़ी हुई है। जब ययाति ब्राह्मण-कन्या होने और राजा होने के सामाजिक-धार्मिक भयों के कारण इनकार करते हैं, तब देवयानी उन्हें चेतावनी देती है कि वे अपने महाप्रतापी पिता शुक्रचार्य के प्रभाव से अंततः उन्हीं को अपना पति बनाएँगी।

वैशंपायन उवाच (श्लोक 29-34)

मूल श्लोक: आमन्त्रयित्वा सुश्रोणीं ययातिः स्वपुरं ययौ। गते तु नाहुषे तस्मिन्देवयान्यप्यनिन्दिता।। क्वचिद्गत्वा च रुदती वृक्षमाश्रित्य धिष्ठिता। ततश्चिरायमाणायां दुहितर्यथ भार्गवः।। संस्मृत्योवाच धात्रीं तां दुहितुः स्नेहविक्लवः। धात्रि त्वमानय क्षिप्रं देवयानीं समुध्यमाम्।। इत्युक्तमात्रे सा धात्री त्वरिताऽऽनयितुं गता। यत्रयत्र सशीभिः सा गता पदममार्गत।। सा ददर्श तथा दीनां श्रमार्तां रुदतीं स्थिताम्। वृत्तान्तं किमिदं भद्रे शीघ्रं वद पिताह्वयत्।। एवमुक्ताह धात्रीं तां शर्मिष्ठावृजिनं कृतम्। उवाच शोकसंतप्ता घूर्णिकामागतां पुरः'।।

हिन्दी अनुवाद: वैशंपायन जी कहते हैं—सुंदरी देवयानी से विदा लेकर राजा ययाति अपने नगर को चले गए। नहुषनंदन ययाति के चले जाने पर अनिंदिता (सुंदर अंगों वाली) देवयानी भी वहाँ से कुछ दूर जाकर एक वृक्ष के सहारे बैठकर रोने लगी। इधर, पुत्री के लौटने में बहुत देर होने पर भृगुवंशी शुक्रचार्य पुत्री के स्नेह से विह्वल होकर अपनी धाय (परिचारिका) से बोले—हे धात्रि! तुम शीघ्र जाकर सुंदर कटिप्रदेश वाली देवयानी को यहाँ ले आओ। उनके इतना कहते ही वह धात्री तुरंत उसे लाने के लिए चल पड़ी और सखियों के साथ वह जहाँ-जहाँ गई थी, उसके पैरों के चिह्नों को खोजती हुई आगे बढ़ी। उसने वहाँ दीन, श्रम से पीड़ित और रोती हुई बैठी हुई देवयानी को देखा और कहा—हे भद्रे! यह सब क्या वृत्तान्त है, शीघ्र बताओ, तुम्हारे पिता तुम्हें बुला रहे हैं। घूर्णिका नाम की उस धात्री के ऐसा कहने पर, शोक से संतप्त और सामने खड़ी उस घूर्णिका से देवयानी ने शर्मिष्ठा द्वारा किए गए उस पापपूर्ण कृत्य को कहा।

व्याख्या: ययाति के जाने के बाद देवयानी अकेली बैठकर अपने अपमान और पीड़ा पर विलाप करती है। उधर आश्रम में जब देवयानी समय पर नहीं लौटती, तो शुक्रचार्य अपनी दासी (घूर्णिका) को उसे ढूँढने भेजते हैं। दासी जब देवयानी को रोते हुए पाती है, तब देवयानी उसे शर्मिष्ठा द्वारा कुएं में धकेले जाने की पूरी घटना बताती है।

देवयानी उवाच (श्लोक 35-36)

मूल श्लोक: त्वरितं घूर्णिके गच्छ शीघ्रमाचक्ष्व मे पितुः।। नेदानीं संप्रवेक्ष्यामि नगरं वृषपर्वणः।

हिन्दी अनुवाद: देवयानी ने कहा—हे घूर्णिके! तुम तुरंत जाओ और मेरे पिता से शीघ्र जाकर कह दो कि अब मैं असुरराज वृषपर्व के नगर में प्रवेश नहीं करूँगी।

व्याख्या: देवयानी के भीतर शर्मिष्ठा के प्रति भयंकर रोष और अपमान की भावना है। वह स्पष्ट कर देती है कि वह उस नगर में अब एक पल भी नहीं रुकेगी जहाँ उसके साथ ऐसा घोर अपमान हुआ है।

वैशंपायन उवाच (श्लोक 37-46)

मूल श्लोक: सा तत्र त्वरितं गत्वा घूर्णिकाऽसुरमन्दिरम्।। दृष्ट्वा काव्यमुवाचेदं संभ्रमाविष्टचेतना। आचचक्षे महाप्राज्ञं देवयानीं वने हताम्।। शर्मिष्ठया महाभाग दुहित्रा वृषपर्वणः। श्रुत्वा दुहितरं काव्यस्तत्र शर्मिष्ठया हताम्।। त्वरया निर्ययौ दुःखान्मार्गमाणः सुतां वने। दृष्ट्वा दुहितरं काव्यो देवयानीं ततो वने।। बाहुभ्यां संपरिष्वज्य दुःखितो वाक्यमब्रवीत्। आत्मदोषैर्नियच्छन्ति सर्वे दुःखसुखे जनाः।। मन्ये दुश्चरितं तेऽस्ति यस्येयं निष्कृतिः कृता। देवयान्युवाच। निष्कृतिर्मेऽस्तु वा मास्तु शृणुष्वावहितो मम।। शर्मिष्ठया यदुक्ताऽस्मि दुहित्रा वृषपर्वणः।। सत्यं किलैतत्सा प्राह दैत्यानामसि गायनः।। एवं हि मे कथयति शर्मिष्ठा वार्षपर्वणी। वचनं तीक्ष्णपरुषं क्रोधरक्तेक्षणा भृशम्।। स्तुवतो दुहिता नित्यं याचतः प्रतिगृह्णतः। अहं तु स्तुयमानस्य ददतोऽप्रतिगृह्णतः।। इदं मामाह शर्मिष्ठा दुहिता वृषपर्वणः। क्रोधसंरक्तनयना दर्पपूर्णा पुनः पुनः।। यद्यह स्तुवतस्तात दुहिता प्रतिगृह्णतः। प्रसादयिष्ये शर्मिष्ठामित्युक्ता तु सखी मया।। उक्ताप्येवं भृशं मां सा निगृह्य विजने वने। कूपे प्रक्षेपयामास प्रक्षिप्य गृहमागमत्।।

हिन्दी अनुवाद: वैशंपायन जी कहते हैं—वह घूर्णिका तुरंत असुरों के महल में गई और घबराई हुई चेतना से महाप्राज्ञ काव्य (शुक्रचार्य) से बोली—हे महाभाग! वृषपर्व की पुत्री शर्मिष्ठा ने वन में देवयानी को मार डाला (कुएं में फेंक दिया) है। शर्मिष्ठा द्वारा अपनी पुत्री के मारे जाने का यह समाचार सुनकर शुक्रचार्य दुःखी हो गए और तुरंत वेग से अपनी पुत्री को ढूँढने के लिए वन में निकल पड़े। वन में अपनी पुत्री देवयानी को देखकर शुक्रचार्य ने उसे दोनों बाहों से गले लगा लिया और दुःखी होकर बोले—सभी लोग अपने-अपने कर्मों (दोषों) के अनुसार ही सुख-दुःख प्राप्त करते हैं। मैं समझता हूँ कि तुम्हारा भी कोई दुश्चरित (पूर्वजन्म का या इस जन्म का कोई दोष) रहा होगा, जिसकी यह निष्कृति (प्रायश्चित्त या फल) हुई है। देवयानी ने कहा—मेरा प्रायश्चित्त हो या न हो, आप मेरे इस वचन को पूरी सावधानी से सुनिए। वृषपर्व की पुत्री शर्मिष्ठा ने मुझसे जो-जो कहा है, क्या वह सच है कि आप दैत्यों के गायक (या उनकी स्तुति करने वाले भाट) हैं? वार्षपर्वणी (वृषपर्व की पुत्री) शर्मिष्ठा क्रोध से एकदम लाल आँखें करके मुझे अत्यंत तीखे और परुष (कठोर) वचन कह रही थी। उसने कहा—'तू प्रतिदिन स्तुति करने वाले और (दूसरों से) मांगने तथा प्रतिग्रह लेने वाले की पुत्री है; जबकि मैं स्तुति किए जाने वाले और दान देने वाले (किंतु बदले में कुछ न लेने वाले) की पुत्री हूँ।' वृषपर्व की पुत्री शर्मिष्ठा ने क्रोध से लाल नेत्रों और अहंकार से भरकर बार-बार मुझसे यह बात कही। हे तात! मैंने सखी भाव से उससे कहा था—'यदि स्तुति करने वाले की पुत्री होने के कारण मैं ऐसी हूँ, तो भी मैं शर्मिष्ठा को प्रसन्न करूँगी।' मेरे ऐसा बार-बार प्रेम से कहने पर भी उसने मुझे निर्जन वन में पकड़कर कुएं में फेंक दिया और कुएं में गिराकर वह अपने घर लौट आई।

व्याख्या: धात्री घूर्णिका सीधे शुक्रचार्य के पास पहुँचकर देवयानी के साथ हुई अनहोनी की सूचना देती है। शुक्रचार्य व्याकुल होकर वन में पहुँचते हैं और देवयानी को गले लगाते हैं। देवयानी अपने पिता को शर्मिष्ठा द्वारा कहे गए अपमानजनक शब्दों (कि शुक्रचार्य दैत्यों के आश्रित और स्तुति करने वाले हैं) का ब्योरा देती है, जिससे शुक्रचार्य को भी असुरों के प्रति अपने अपमान का गहरा अहसास होता है और कथा आगे के गंभीर संघर्ष की ओर बढ़ती है।

श्लोकार्थ एवं संदर्भ


  • संदर्भ: यह श्लोक महाभारत के आदिपर्व (संभवपर्व) के 72वें अध्याय (श्लोक 47) का अंतिम भाग है, जिसमें देवयानी अपने पिता शुक्रचार्य को शर्मिष्ठा द्वारा किए गए दुर्व्यवहार की पूरी बात बता रही है।
  • हिन्दी अनुवाद: देवयानी ने आगे कहा—"मेरे इस प्रकार बार-बार प्रेम से समझाने पर भी उस शर्मिष्ठा ने मुझे निर्जन वन में पकड़कर कुएं में फेंक दिया और मुझे कुएं में गिराकर वह अपने घर लौट आई।"

व्याख्या इस पंक्ति में देवयानी अपने ऊपर हुए अत्याचार और शर्मिष्ठा की क्रूरता का जीवंत वर्णन अपने पिता के सामने कर रही है। जब शर्मिष्ठा ने देवयानी को उसके कुल और आश्रित होने को लेकर ताने दिए, तब देवयानी ने शांति से बात को सुलझाने की कोशिश की थी। इसके बावजूद अहंकार में अंधी हुई दैत्यराज वृषपर्व की पुत्री शर्मिष्ठा ने न केवल उसका अपमान किया, बल्कि बलपूर्वक उसे एक सूखे और लताओं से ढके कुएं में धकेल दिया और उसे मरा हुआ समझकर बिना किसी पश्चाताप के अपने घर लौट गई। यह घटना महाभारत की कथा में आगे चलकर एक बड़े राजनीतिक और सामाजिक द्वंद्व का मुख्य कारण बनती है।

शुक्र उवाच (श्लोक 48-54)

मूल श्लोक: स्तुवतो दुहिता न त्वं याचतः प्रतिगृह्णतः। अस्तोतुः स्तूयमानस्य दुहिता देवयान्यसि।। वृषपर्वैव तद्वेद शक्रो राजा च नाहुषः। अचिन्त्यं ब्रह्म निर्द्वन्द्वमैश्वरं हि बलं मम।। जानामि जीविनीं विद्यां लोकेस्मिञ्शाश्वतीं ध्रुवम्। मृतः संजीवते जन्तुर्यया कमललोचने।। कत्थनं स्वगुणानां च कृत्वा तप्यति सज्जनः। ततो वक्तुमशक्तोऽस्मित्वं मे जानासि यद्बलम्।। तसमादुत्तिष्ठ गच्छामः स्वगृहं कुलनन्दिनि। क्षमां कृत्वा विशालाक्षि क्षमासारा हि साधवः।। यच्च किंचित्सर्वगतं भूमौ वा यदि वा दिवि। तस्याहमीश्वरो नित्यं तुष्टेनोक्तः स्वयंभुवा।। अहं जलं विमुञ्चामि प्रजानां हितकाम्यया। पुष्णाम्यौषधयः सर्वा इति सत्यं ब्रवीमि ते।।

हिन्दी अनुवाद: शुक्रचार्य ने कहा—हे देवयानि! तू स्तुति करने वाले और (दूसरों से) मांगकर प्रतिग्रह लेने वाले की पुत्री नहीं है, बल्कि तू स्तुति न करने वाले और (बदले में कुछ न लेकर) स्तुति किए जाने वाले (अर्थात सर्वसमर्थ) की पुत्री है। इस बात को असुरराज वृषपर्व, देवराज इंद्र और राजा नहुष अच्छी तरह जानते हैं। मेरा ब्रह्मबल अचिन्त्य, द्वंद्वरहित और ऐश्वर्ययुक्त है। हे कमललोचने! मैं इस लोक की उस शाश्वत और ध्रुव 'जीवनी विद्या' (मृतसंजीवनी) को अच्छी तरह जानता हूँ, जिससे मरा हुआ प्राणी भी जीवित हो जाता है। सज्जन पुरुष अपने गुणों की डींग हाँककर (कत्थन करके) दुःखी होते हैं, इसलिए मैं अपने मुँह से अपनी प्रशंसा नहीं करना चाहता; तू तो मेरे उस बल को भली-भांति जानती ही है। इसलिए हे कुलनन्दिनि विशालाक्षि! उठो, हम अपने घर चलें। क्षमा धारण करो, क्योंकि साधु पुरुष क्षमा की ही मूर्ति होते हैं। भूमि पर या आकाश में जो कुछ भी सर्वगत (व्याप्त) है, उस पर मैं सदा ईश्वर (नियंता) हूँ—ऐसा मुझे प्रसन्न हुए स्वयं ब्रह्माजी ने कहा है। मैं ही प्रजाओं के हित की इच्छा से जल की वर्षा करता हूँ और समस्त औषधियों का पोषण करता हूँ—यह मैं तुमसे सत्य कह रहा हूँ।

व्याख्या: शुक्रचार्य अपनी पुत्री देवयानी को ढांढस बंधाते हैं और शर्मिष्ठा द्वारा कहे गए अपमानजनक वचनों का खंडन करते हैं। वे समझाते हैं कि वे किसी के आश्रित या साधारण भाट नहीं हैं, बल्कि वे मृतसंजीवनी विद्या के ज्ञाता और अपार ब्रह्मबल व ऐश्वर्य के स्वामी हैं। वे प्रकृति और जल-वर्षा पर नियंत्रण रखने वाले महान ऋषि हैं, इसलिए उन्हें किसी असुरराज के ताने से दुःखी होने की आवश्यकता नहीं है। वे देवयानी को क्रोध त्यागकर और क्षमा को अपनाकर घर चलने के लिए समझाते हैं।

वैशंपायन उवाच (श्लोक 55)

मूल श्लोक: एवं विषादमापन्नां मन्युना संप्रपीडिताम्। वचनैर्मधुरैः श्लक्ष्णैः सान्त्वयामास तां पिता।।

हिन्दी अनुवाद: वैशंपायन जी कहते हैं—इस प्रकार विषाद को प्राप्त हुई और क्रोध (तथा शोक) से संतप्त हुई अपनी पुत्री देवयानी को पिता (शुक्रचार्य) ने मधुर और कोमल वचनों से सांत्वना दी।

व्याख्या: यहाँ महाभारत के आदिपर्व के 72वें अध्याय का समापन होता है, जहाँ शुक्रचार्य अपनी पुत्री को प्रेमपूर्वक समझा-बुझाकर शांत करते हैं, किंतु देवयानी के मन में बैठा यह अपमान आगे चलकर वृषपर्व और असुरों के साथ एक बड़े राजनीतिक और सामाजिक संघर्ष का रूप लेगा।

।। इति श्रीमन्महाभारते आदिपर्वणि

संभवपर्वणि द्विसप्ततितमोऽध्यायः।। 72 ।।

संभवपर्वणि एकसप्ततितमोऽध्यायः

संभवपर्वणि त्रिसप्ततितमोऽध्यायः