एकविंशोऽध्यायः
समुद्रका विस्तारसे वर्णन
ततो रजन्यां व्युष्टायां प्रभातेऽभ्युदिते रवी।
कद्रूश्च विनता चैव भगिन्यो ते तपोधन ॥१॥
अमर्षिते सुसंरब्धे दास्ये कृतपणे तदा।
उग्रश्रवाजी कहते हैं-तपोधन! तदनन्तर जब रात बीती, प्रातःकाल हुआ और भगवान् सूर्यका उदय हो गया, उस समय कद्रू और विनता दोनों बहनें बड़े जोश और रोषके साथ दासी होनेकी बाजी लगाकर उच्चैःश्रवा नामक अष्वको निकटसे देखनेके लिये गई ।। १-२ ॥
महान्तमुदकागाधं क्षोभ्यमाणं महास्वनम् ।। ३ ॥
कुछ दूर जानेपर उन्होंने मार्गमें जलनिधि समद्रको देखा, जो महान होनेके साथ ही अगाध जलसे भरा था। मगर आदि जल-जन्तु उसे विक्षुब्ध कर रहे थे और उससे बड़े जोरकी गर्जना हो रही थी ॥३॥
सत्त्वैश्च बहुसाहस्रनारूपैः समावृतम् ।।४।।
वह तिमि नामक बड़े-बड़े मत्स्योंको भी निगल जानेवाले तिमिगिलों, मत्स्यों तथा मगर आदिसे व्याप्त था। नाना प्रकारकी आकृतिवाले सहस्रों जल-जन्तु उसमें भरे हुए थे ।। ४ ।।
उग्रेर्नित्यमनाधृष्यं कूर्मग्राहसमाकुलम् ।।५।।
विकट आकारवाले दूसरे-दूसरे घोर डरावने जलचरों तथा उग्र जल-जन्तुओंके कारण वह महासागर सदा सबके लिये दुर्धर्ष बना हुआ था। उसके भीतर बहुत-से कछुए और ग्राह निवास करते थे।।५।।
नागानामालयं रम्यमुत्तमं सरितां पतिम् ॥६॥
सरिताओंका स्वामी वह महासागर सम्पूर्ण रत्नोंकी खान, वरुणदेवका निवासस्थान और नागोंका रमणीय उत्तम गृह है ।।६।।
भयंकरं च सत्त्वानां पयसां निधिमर्णवम् ॥७॥
पातालकी अग्नि-बड़वानलका निवास भी उसी में है। असुरोंको तो वह जलनिधि | समुद्र भाई-बन्धुकी भांति शरण देनेवाला है तथा दूसरे थलचर जीवोंके लिये अत्यन्त भयदायक है।
अप्रमेयमचिन्त्यं च सुपुण्यजलमद्भुतम् ।।८॥
अमरोंके अमृतकी खान होनेसे वह अत्यन्त शुभ एवं दिव्य माना जाता है। उसका कोई माप नहीं है। वह अचिन्त्य, पवित्र जलसे परिपूर्ण तथा अद्भुत है ।।८।।
गम्भीरावर्तकलिलं सर्वभूतभयंकरम् ॥९॥
वह घोर समुद्र जल-जन्तुओंके शब्दोंसे और भी भयंकर प्रतीत होता था, उससे भयंकर गर्जना हो रही थी, उसमें गहरी भँवरें उठ रही थीं तथा वह समस्त प्राणियों के लिये भय-सा उत्पन्न करता था ।। ९॥
वीचीहस्तेः प्रचलितेत्यन्तमिव सर्वतः ।।१०।।
तटपर तीव्रवेगसे बहनेवाली वायु मानो झुला बनकर उस महासागरको चंचल किये देती थी। वह क्षोभ और उद्वेगसे बहुत ऊँचेतक लहरें उठाता था और सब ओर चंचल तरंगरूपी हाथोंको हिला-हिलाकर नृत्य-सा कर रहा था ।।१०।।
पाञ्चजन्यस्य जननं रत्नाकरमनुत्तमम् ॥ ११ ॥
चन्द्रमाकी वृद्धि और क्षयके कारण उसकी लहरें बहुत ऊँचे उठतीं और उतरती थीं (उसमें ज्वार-भाटे आया करते थे), अतः वह उत्ताल-तरंगोंसे व्याप्त जान पड़ता था। उसीने पांचजन्य शंखको जन्म दिया था। वह रत्नोंका आकर और परम उत्तम था ।।११।।
वराहरूपिणा चान्तर्विक्षोभितजलाविलम् ।। १२ ।।
अमिततेजस्वी भगवान् गोविन्दने वराहरूपसे पृथ्वीको उपलब्ध करते समय उस समुद्रको भीतरसे मथ डाला था और उस मथित जलसे वह समस्त महासागर मलिन-सा जान पड़ता था ।। १२ ॥
अनासादितगाधं च पातालतलमव्ययम् ॥ १३ ॥
व्रतधारी ब्रह्मर्षि अत्रिने समुद्रके भीतरी तलका अन्वेषण करते हुए सौ वर्षोंतक चेष्टा करके भी उसका पता नहीं पाया। वह पातालके नीचेतक व्याप्त है और पातालके नष्ट होनेपर भी बना रहता है, इसलिये अविनाशी है ।। १३ ।।
युगादिकालशयनं विष्णोरमिततेजसः ॥ १४ ॥
आध्यात्मिक योगनिद्राका सेवन करनेवाले अमित-तेजस्वी कमलनाभ भगवान् विष्णुके लिये वह (युगान्तकालसे लेकर) युगादिकालतक शयनागार बना रहता है ।। १४ ।।
डिम्बाहवार्दितानां च असुराणां परायणम् ।।१५॥
उसीने वज्रपातसे डरे हुए मैनाक पर्वतको अभयदान दिया है तथा जहाँ भयके मारे हाहाकार करना पड़ता है, ऐसे युद्धसे पीडित हुए असुरोंका वह सबसे बड़ा आश्रय है।।१५।।
अगाधपारं विस्तीर्णमप्रमेयं सरित्पतिम् ॥१६॥
बड़वानलके प्रज्वलित मुख में वह सदा अपने जलरूपी हविष्यकी आहुति देता रहता है और जगत्के लिये कल्याणकारी है। इस प्रकार वह सरिताओंका स्वामी समुद्र अगाध, अपार, विस्तृत और अप्रमेय है॥१६॥
अभिसार्यमाणमनिशं ददृशाते महार्णवम् ।
आपूर्यमाणमत्यर्थ नृत्यमानमिवोर्मिभिः ।। १७ ।।
सहस्रों बड़ी-बड़ी नदियाँ आपसमें होड़-सी लगाकर उस विस्तृत महासागरमें निरन्तर मिलती रहती हैं और अपने जलसे उसे सदा परिपूर्ण किया करती हैं। वह ऊँची-ऊँची लहरोंकी भुजाएँ ऊपर उठाये निरन्तर नृत्य करता-सा जान पड़ता है ।। १७ ।।
