प्रामाणिक आध्यात्मिक एवं प्रज्ञा कथाएं (भाग-3)
श्रुति, स्मृति, इतिहास और महापुरुषों के जीवन से संकलित श्लोकबद्ध २० अन्य दिव्य प्रसंग।
(कथा पढ़ने के लिए उसके शीर्षक पर क्लिक करें)
तक्षक नाग के डसने से सातवें दिन मृत्यु होने के श्राप के बाद राजा परीक्षित ने सब कुछ त्याग दिया और गंगा तट पर अनशन पर बैठ गए। वहां कई ऋषि आए, परंतु कोई भी उन्हें सात दिनों में मोक्ष का अचूक मार्ग नहीं बता सका। तभी परम अवधूत शुकदेव जी वहां प्रकट हुए। परीक्षित ने व्याकुल होकर पूछा कि जिसकी मृत्यु निकट हो, उसे क्या करना चाहिए? शुकदेव जी ने उन्हें अभय देते हुए कथा श्रवण का मार्ग बताया।
श्रोतव्यः कीर्तितव्यश्च स्मर्तव्यश्चेच्छताभयम्॥ **अर्थ:** इसलिए हे भरतवंशी राजन! जो पुरुष सर्वथा अभय (मोक्ष) होना चाहता है, उसे सर्वआत्मा, सर्वशक्तिमान भगवान श्रीहरि की लीलाओं का ही श्रवण, कीर्तन और स्मरण करना चाहिए।
यह कथा सिखाती है कि जीवन की अनिश्चितता को स्वीकार कर चेतना को परमात्मा में लीन कर देना ही एकमात्र परम पुरुषार्थ है।
कालकेय नाम के भयंकर असुर समुद्र के भीतर छिपकर रात में ऋषियों का वध कर देते थे और दिन में समुद्र में विलीन हो जाते थे। देवताओं के लिए समुद्र के भीतर जाकर उनका वध करना असंभव था। तब सभी महर्षि अगस्त्य के पास पहुँचे। अगस्त्य मुनि ने अपनी योगशक्ति और मंत्रबल के प्रभाव से एक ही चुल्लू में संपूर्ण विशाल समुद्र का आचमन (पान) कर लिया, जिससे असुर प्रकट हो गए और धर्म की रक्षा हुई।
न हि सुप्तस्य सिंहस्य प्रविशन्ति मुखे मृगाः॥ **अर्थ:** कोई भी कार्य अदम्य पुरुषार्थ और उद्यम से ही सिद्ध होता है, केवल इच्छा करने से नहीं; जैसे सोए हुए सिंह के मुंह में हिरण स्वयं प्रवेश नहीं करता।
यह कथा प्रतीकात्मक रूप से दर्शाती है कि दृढ़ संकल्प और आत्मबल के सामने संसार की बड़ी से बड़ी बाधा (समुद्र) भी लघु हो जाती है।
भील पुत्री शबरी मतंग ऋषि के आश्रम में रहती थी। गुरु ने प्राण त्यागते समय कहा था कि एक दिन साक्षात भगवान राम तुम्हारी कुटिया में आएंगे। शबरी बूढ़ी हो गई, लेकिन रोज रास्ते को साफ करती और प्रभु के लिए मीठे बेर चुनकर लाती। जब राम वहां पहुँचे, तो उन्होंने शबरी के झूठे बेरों को बड़े चाव से खाया और उसे जाति-पात से परे हटकर वास्तविक भक्ति का उपदेश दिया।
भगति हीन नर सोहइ कैसा। बिनु जल बारिद देखिअ जैसा॥ **अर्थ:** जाति, कुल, धर्म, बड़प्पन, धन, बल, कुटुम्ब, गुण और चतुरता—इन सबके होने पर भी भक्ति से हीन मनुष्य वैसा ही लगता है जैसे बिना जल का बादल।
यह प्रसंग सिद्ध करता है कि परमात्मा केवल आंतरिक भाव और पवित्र प्रेम के भूखे हैं, बाह्य सामाजिक योग्यताओं के नहीं।
महर्षि पतंजलि जब अपने शिष्यों को योगशास्त्र और व्याकरण का उपदेश दे रहे थे, तो उन्होंने बीच में एक पर्दा लगा रखा था। उन्होंने शर्त रखी थी कि कोई भी पर्दा हटाकर पीछे नहीं देखेगा। एक दिन एक जिज्ञासु शिष्य ने उत्सुकतावश पर्दा हटा दिया। उसने देखा कि महर्षि साक्षात सहस्रफण वाले शेषनाग के रूप में एक साथ हजार मुखों से ज्ञान की वर्षा कर रहे थे। शिष्य अपनी चंचलता पर अत्यंत लज्जित हुआ।
यह कथा हमें सिखाती है कि गूढ़ आध्यात्मिक रहस्यों को समझने के लिए नियमों का पालन और मन का पूर्ण अनुशासन अनिवार्य है।
सावित्री जानते हुए भी कि अल्पायु सत्यवान की आयु केवल एक वर्ष शेष है, उससे विवाह करती है। जब निश्चित दिन यमराज सत्यवान के प्राण लेकर जाने लगे, तो सावित्री उनके पीछे-पीछे चल पड़ी। यमराज ने उसे वापस जाने को कहा, किंतु सावित्री ने अपने पातिव्रत धर्म और शास्त्रोक्त वचनों से यमराज को निरुत्तर कर दिया। उसकी प्रज्ञा और निष्ठा से प्रसन्न होकर यमराज ने सत्यवान के प्राण वापस कर दिए।
तस्माद्धर्मो न हन्तव्यो मा नो धर्मो हतोऽवधीत्॥ **अर्थ:** मरा हुआ धर्म (जिसका त्याग कर दिया गया हो) मनुष्य का नाश करता है, और रक्षित किया हुआ धर्म मनुष्य की रक्षा करता है। इसलिए धर्म का त्याग कभी नहीं करना चाहिए।
यह कथा सिद्ध करती है कि सत्य और धर्म पर अडिग रहने वाली चेतना नियति और मृत्यु के विधान को भी बदल सकती है।
महर्षि दधीचि की अस्थियों से बने वज्र से जब इंद्र ने भयंकर असुर वृत्रासुर पर प्रहार किया, तब भी वृत्रासुर भयभीत नहीं हुआ। वह साक्षात ब्रह्मज्ञानी था और युद्धभूमि में भी भगवान विष्णु के ध्यान में मग्न था। उसने इंद्र से कहा, "इंद्र! तुम प्रहार करो, जीत या हार तो परमात्मा के हाथ में है। मैं इस नश्वर देह को त्यागकर अपने प्रभु में लीन होने के लिए तैयार हूँ।" वृत्रासुर का यह समर्पण देखकर स्वयं इंद्र चकित रह गए।
न नौ पश्यन्ति यद्रूपं तद् ज्ञानं ज्ञानमुच्यते॥ **अर्थ:** हे चतुर पुरुष! मैं और तुम अलग नहीं हैं, जो हमारे भीतर एक ही आत्मस्वरूप को देखता है, वही वास्तविक ज्ञान है।
यह प्रसंग स्पष्ट करता है कि कभी-कभी शत्रु के रूप में दिखने वाला जीव भी उच्च आध्यात्मिक चेतना से संपन्न हो सकता है।
महर्षि अगस्त्य के शिष्य सुतीक्ष्ण जी स्वभाव से अत्यंत सीधे और निष्कपट थे। एक बार उनसे अनजाने में एक छोटी सी भूल हो गई, तो गुरु ने कौतुकवश कह दिया, "जब तक भगवान राम से न मिल लो, मेरे आश्रम में मत आना।" सुतीक्ष्ण वन में जाकर सीधे बैठ गए और प्रभु राम का ध्यान करने लगे। उनकी निष्कपट सरलता देखकर स्वयं श्री राम लक्ष्मण और सीता सहित उनकी कुटिया में पहुँच गए।
अध्यात्म में चतुरता काम नहीं आती; सुतीक्ष्ण की यह कथा प्रमाणित करती है कि केवल बालक जैसी सरलता ही ईश्वर को आकर्षित करती है।
मार्कण्डेय ऋषि को केवल १६ वर्ष की अल्पायु का वरदान मिला था। जब उनकी आयु पूर्ण हुई और यमराज के दूत उनके प्राण लेने आए, तो वे शिवलिंग से लिपट गए और महामृत्युंजय मंत्र का जाप करने लगे। स्वयं यमराज ने जब अपना पाश फेंका, तो शिवलिंग फट गया और साक्षात भगवान शिव 'कालकेतु' रूप में प्रकट हो गए। शिव जी ने मार्कण्डेय को अमरत्व का वरदान दिया और काल को पीछे हटना पड़ा।
उर्वारुकमिव बन्धनान्मृत्योर्मुक्षीय मामृतात्॥ **अर्थ:** हम त्रिनेत्रधारी शिव की आराधना करते हैं जो जीवन में सुगंध और पुष्टि बढ़ाते हैं। जिस प्रकार ककड़ी पक जाने पर बेल के बंधन से मुक्त हो जाती है, वैसे ही हम मृत्यु के बंधन से मुक्त हों, अमरत्व से नहीं।
यह कथा हमें सिखाती है कि शरणागति यदि पूर्ण हो, तो चेतना काल (समय) की सीमाओं से परे निकलकर शाश्वत हो जाती है।
ब्रह्मा के मानस पुत्र सनक, सनन्दन, सनातन और सनत्कुमार सदा ५ वर्ष के बालक के रूप में रहते हैं। एक बार वे भगवान विष्णु के दर्शन के लिए वैकुंठ पहुँचे। वैकुंठ के द्वारपाल जय और विजय ने उनके बाल स्वरूप को देखकर समझा कि ये कोई साधारण बालक हैं और उन्हें छठे द्वार पर ही रोक दिया। ऋषियों ने कहा कि वैकुंठ में समत्व बुद्धि होनी चाहिए, यहाँ भेदभाव का कोई स्थान नहीं है और उन्होंने जय-विजय को मृत्युलोक में जन्म लेने का श्राप दे दिया।
शुनि चैव श्वपाके च पण्डिताः समदर्शिनः॥ **अर्थ:** ज्ञानी महापुरुष विद्या और विनय से युक्त ब्राह्मण में, गाय में, हाथी में, कुत्ते में और चांडाल में भी एक ही समतत्व (परमात्मा) को देखते हैं।
स्वयं भगवान विष्णु ने आकर ऋषियों का सत्कार किया और सिखाया कि अध्यात्म में किसी को कमतर आंकना ही पतन का कारण बनता है।
राजा जनक को गर्व था कि वे राजसिंहासन पर बैठकर भी 'विदेह' (देह से मुक्त) हैं। उनकी इस स्थिति की परीक्षा लेने के लिए 'सुलभा' नाम की एक परम ज्ञानी सन्यासिनी भिक्षा मांगने के बहाने उनकी राजसभा में आई। उसने अपनी योगशक्ति से राजा जनक के चित्त में प्रवेश कर लिया। जनक क्रुद्ध हो गए कि एक स्त्री उनके अंतःकरण में कैसे प्रवेश कर सकती है? सुलभा ने हंसकर कहा कि यदि आप विदेह हैं, तो स्त्री और पुरुष का भेद आपको क्यों दिख रहा है?
जनक ने अपनी सूक्ष्म भूल को स्वीकारा और सुलभा के ज्ञान को नमन किया। यह प्रसंग आत्मज्ञान में लिंग भेद के मिथ्या होने को प्रमाणित करता है।
उपकोसल कमल नाम का एक शिष्य महर्षि सत्यकाम जाबाल के आश्रम में बारह वर्षों तक तपस्या करता रहा। गुरु ने अन्य शिष्यों को दीक्षा दे दी, परंतु उपकोसल को नहीं दी और वे यात्रा पर चले गए। उपकोसल दुःखी होकर अनशन पर बैठ गया। तब आश्रम की गार्हपत्य, आह्वनीय और दक्षिणाग्नि (अग्नियों) ने प्रत्यक्ष होकर उसे उपदेश दिया कि प्राण, आनंद और आकाश ही वास्तव में ब्रह्म हैं।
जब सत्यकाम वापस आए, तो उन्होंने देखा कि उपकोसल का मुख ब्रह्मतेज से चमक रहा था। गुरु ने उसके ज्ञान की पुष्टि की। यह कथा सिद्ध करती है कि सच्ची तड़प हो तो प्रकृति स्वयं गुरु बन जाती है।
मतंग ऋषि वन में कठोर तप कर रहे थे। एक दिन एक क्रोधी स्वभाव के शंख मुनि वहां आए और बिना किसी कारण के मतंग जी को कटु वचन कहने लगे। मतंग ऋषि शांत रहे और मुस्कुराकर उनका स्वागत किया। शंख मुनि का क्रोध उनके मौन के सामने गल गया। उन्होंने पूछा, "ऋषिवर! मेरी कटु वाणी से आपको कष्ट क्यों नहीं हुआ?" मतंग जी ने कहा कि वाणी का आघात केवल अहंकार को लगता है, आत्मा को नहीं।
स्वाध्यायाभ्यसनं चैव वाङ्मयं तप उच्यते॥ **अर्थ:** जो विक्षेप न पैदा करने वाला, सत्य, प्रिय और हितकर हो—ऐसा वचन बोलना तथा शास्त्रों का अभ्यास करना ही वाणी का तप कहलाता है।
यह प्रसंग हमें सिखाती है कि प्रतिक्रिया न देना और मौन रहना ही सबसे बड़ी आध्यात्मिक शक्ति है।
परम वैष्णव राजा अंबरीष एकादशी का व्रत रख रहे थे। व्रत के पारण के समय महाक्रोधी दुर्वासा ऋषि उनके महल पहुँचे। दुर्वासा जी नदी पर स्नान करने चले गए और लौटने में देर कर दी। पारण का समय बीता जा रहा था, इसलिए अंबरीष ने केवल चरणामृत लेकर व्रत खोला। दुर्वासा ने इसे अपना अपमान समझा और अपनी जटा से एक भयंकर कृत्य (राक्षसी) उत्पन्न कर दी। तभी भगवान का सुदर्शन चक्र प्रकट हुआ और उसने कृत्य को नष्ट कर दुर्वासा का पीछा किया।
साधुभिर्ग्रस्तहृदयो भक्तैर्भक्तजनप्रियः॥ **अर्थ:** (भगवान विष्णु ने दुर्वासा से कहा-) हे ब्राह्मण! मैं सर्वथा अपने भक्तों के अधीन हूँ, मैं स्वतंत्र नहीं हूँ। साधु पुरुषों ने मेरे हृदय को अपने प्रेम से वश में कर रखा है।
दुर्वासा को अंततः राजा अंबरीष के चरणों में गिरकर ही क्षमा मांगनी पड़ी। यह कथा प्रमाणित करती है कि अहंकार चाहे कितना भी बड़ा हो, वह निष्काम भक्ति के सामने परास्त हो जाता है।
महर्षि जाबाली वन में रहते थे और कभी किसी से कुछ मांगते नहीं थे। वे केवल खेतों में गिरे हुए अन्न के दानों (उंछवृत्ति) को चुनकर जीवन यापन करते थे। राजा दशरथ ने उन्हें बहुमूल्य रत्न और स्वर्ण दान देना चाहा, परंतु जाबाली ने मना कर दिया। उन्होंने कहा कि जितना शरीर के लिए आवश्यक है, उतना प्रकृति स्वयं दे देती है। संचय करना चित्त को अशांत करता है।
न च तद्धनलुब्धानां इतस्ततो धावताम्॥ **अर्थ:** संतोष रूपी अमृत से तृप्त और शांत चित्त वाले मनुष्यों को जो सुख प्राप्त होता है, वह धन के लोभ में यहाँ-वहाँ भटकने वाले मनुष्यों को कभी नहीं मिल सकता।
यह प्रामाणिक प्रसंग सिखाता है कि अध्यात्म का सच्चा पैमाना बाहरी समृद्धि नहीं, बल्कि आंतरिक संतोष है।
जब श्री राम चित्रकूट से वन की ओर आगे बढ़ गए, तो भरत जी उनकी चरण पादुका (खड़ाऊँ) को अपने सिर पर रखकर अयोध्या लौटे। उन्होंने स्वयं राजमहल का त्याग कर दिया और नंदीग्राम में एक छोटी सी कुटिया बनाकर जमीन के भीतर गड्ढा खोदकर रहने लगे। वे राजा नहीं, बल्कि श्री राम की चरण पादुकाओं को सिंहासन पर बिठाकर उनके सेवक के रूप में शासन संभाल रहे थे।
यह प्रसंग सिखाता है कि कर्तव्य का पालन करते हुए भी अहंकार को पूरी तरह कैसे शून्य रखा जा सकता है।
ऋषियों की सभा में विवाद हुआ कि ब्रह्मा, विष्णु और महेश में सबसे श्रेष्ठ और सत्वगुणी कौन है? महर्षि भृगु परीक्षा लेने गए। वे ब्रह्मा और शिव के पास गए, जहां वे क्रोधित हो गए। अंत में भृगु वैकुंठ पहुँचे और क्षीरसागर में सो रहे भगवान विष्णु की छाती पर जोर से लात मार दी। विष्णु जी तत्काल उठे, उन्होंने क्रोध नहीं किया, बल्कि भृगु के पैर दबाते हुए पूछा, "ऋषिवर! आपकी कोमल कलाई में चोट तो नहीं लगी?"
अतणे पतितो वह्निः स्वयमेवोपशाम्यति॥ **अर्थ:** जिसके हाथ में क्षमा रूपी तलवार है, उसका दुष्ट व्यक्ति क्या बिगाड़ सकता है? जैसे तिनके से रहित स्थान पर गिरी हुई आग स्वयं ही शांत हो जाती है।
भृगु ऋषि की आंखें भर आईं और उन्होंने विष्णु को ही सर्वश्रेष्ठ सत्वगुणी घोषित किया। यह कथा क्षमा की पराकाष्ठा को दर्शाती है।
कर्दम ऋषि के वन जाने के बाद माता देवहूति ने अपने पुत्र साक्षात भगवान कपिल से प्रार्थना की, "पुत्र! मैं इस संसार के माया-जाल और इंद्रियों की चंचलता से थक चुकी हूँ। मुझे वह मार्ग बताओ जिससे अज्ञान का अंधकार नष्ट हो जाए।" कपिल मुनि ने अपनी माता को प्रकृति, पुरुष और २५ तत्वों के विवेक का उपदेश दिया, जिसे 'सांख्य दर्शन' कहा जाता है।
युक्तः परः पुरुष इत्यविशेष ईशते॥ **अर्थ:** सत्व, रज और तम—ये प्रकृति के तीन गुण हैं। इन गुणों से परे जो पुरुष (आत्मा) है, वही सबका नियंता और साक्षी है।
इस उपदेश से माता देवहूति का चित्त पूरी तरह शांत हो गया और उन्होंने समाधि प्राप्त की। यह कथा ज्ञान योग का प्रामाणिक स्तंभ है।
महर्षि गौतम के आश्रम में जब सत्यकाम दीक्षा लेने आए, तो महर्षि ने उन्हें ४०० दुर्बल और बीमार गायें दीं और कहा, "जब तक ये गायें बढ़कर एक हजार न हो जाएं, तब तक आश्रम मत लौटना।" सत्यकाम ने बिना किसी शिकायत के कई वर्षों तक वन में रहकर उन गायों की सेवा की। जब वे एक हजार हो गईं, तो वायु, अग्नि और सूर्य तत्वों ने उन्हें स्वयं ब्रह्मविद्या का उपदेश दिया।
उपदेक्ष्यन्ति ते ज्ञानं ज्ञानिनस्तत्त्वदर्शिनः॥ **अर्थ:** उस ज्ञान को तुम गुरु के चरणों में साष्टांग प्रणाम करके, निष्कपट भाव से प्रश्न पूछकर और उनकी निश्छल सेवा करके ही प्राप्त कर सकते हो।
यह प्रसंग स्पष्ट करता है कि सेवा भाव से जब अंतःकरण शुद्ध हो जाता है, तो ज्ञान स्वतः ही स्फुरित होने लगता है।
महाराष्ट्र के रूढ़िवादी पंडितों ने संत ज्ञानेश्वर और उनके भाई-बहनों का बहिष्कार कर दिया था क्योंकि वे उन्हें संन्यासी की संतान मानते थे। पंडितों ने कहा कि तुम वेदों की बात करते हो, क्या यह भैंसा भी वेद बोल सकता है? ज्ञानेश्वर महाराज ने मुस्कुराते हुए उस भैंसे के सिर पर अपना हाथ रख दिया। तत्क्षण उस मूक पशु के मुख से शुद्ध ऋग्वेद के मंत्रों का उच्चारण होने लगा। सभी पंडित स्तब्ध रह गए।
यह प्रामाणिक प्रसंग सिद्ध करता है कि आत्मा रूपी चैतन्य तत्व जड़ और चेतन, मनुष्य और पशु—सभी में समान रूप से व्याप्त है।
बृहदारण्यक उपनिषद के अंतिम शास्त्रार्थ में राजा जनक ने याज्ञवल्क्य से पूछा, "भगवन! जब मनुष्य गहरे ध्यान में चला जाता है, जहाँ न शब्द है, न रूप, न मन, तो वह किस स्थिति में होता है?" याज्ञवल्क्य ने उत्तर दिया, "राजन! वही अद्वैत स्थिति है, जहाँ द्रष्टा और दृश्य का भेद समाप्त हो जाता है। वही अमृतत्व है।" जनक इस ज्ञान को सुनते ही पूर्णतः शांत और ब्रह्मी स्थिति में लीन हो गए।
यह कथा उपनिषदों के उस परम शिखर को छूती है जहाँ पहुँचकर मनुष्य संसार के सारे बंधनों से मुक्त हो जाता है।

0 टिप्पणियाँ
If you have any Misunderstanding Please let me know