अहोई अष्टमी पर विशेष: अनहोनी का भय, कल्पित मान्यताएँ और वेदों का शाश्वत सत्य

अहोई अष्टमी पर विशेष: अनहोनी का भय, कल्पित मान्यताएँ और वेदों का शाश्वत सत्य

अंधविश्वास और रूढ़ियों का खंडन कर 'वेदों की ओर लौटने' का एक तार्किक आह्वान

'अहोई' का वास्तविक अर्थ: अनहोनी घटना का भय

भारतीय समाज में 'अहोई अष्टमी' का व्रत अत्यंत लोकप्रिय है, किंतु इसके दार्शनिक और वास्तविक पक्ष पर विचार करना अत्यंत आवश्यक है। शब्द विन्यास की दृष्टि से देखें तो 'अहोई' का अर्थ "न होने" से है, अर्थात् "जो न हो" या "जीवन में किसी अनहोनी घटना का न घटना"

यदि हम प्रामाणिक इतिहास और सनातन शास्त्रों का अन्वेषण करें, तो 'अहोई' नाम की किसी पृथक देवी का कोई अस्तित्व नहीं मिलता। वास्तविक रूप में, जीवन में घटित होने वाली 'अनहोनी घटना' के भय और उसके मनोवैज्ञानिक प्रभाव को ही जनमानस ने 'अहोई' का नाम दे दिया है। माताएं इसी अनहोनी के भय से अपने पुत्रों को सुरक्षित रखने के उद्देश्य से इस दिन निर्जला या निराहार रहकर व्रत रखती हैं। वे यह कामना करती हैं कि कोई अदृश्य कल्पित शक्ति उनके पुत्रों की रक्षा करेगी।

"परंपरागत रूप से यह व्रत केवल पुत्रों के लिए ही विहित कहा गया है, जो प्रत्यक्ष रूप से लिंगभेद (Gender Discrimination) को बढ़ावा देता है। यद्यपि आधुनिक युग में कुछ लोगों ने मनमाने ढंग से इसके पौराणिक स्वरूप को बदलकर पुत्रियों के स्वास्थ्य और दीर्घायु के लिए भी इसे मनाना प्रारंभ कर दिया है, परंतु मूल प्रश्न जस का तस बना हुआ है।"

काल्पनिक देवियों की असारता और सनातन कर्मफल सिद्धांत

किसी 'अनहोनी घटना' के भय और उसके प्रभाव को दूर करने की मनसा (कामना) किसी कल्पित देवी से करना, इस व्रत की असारता, अंधविश्वास और मूल सनातन सिद्धांतों के विपरीत होने की पोल खोल देता है। सनातन धर्म का मूल आधार तर्क, विज्ञान और कर्मप्रधानता है। किसी एक व्यक्ति (माता) के भूखे रहने से किसी अन्य व्यक्ति (पुत्र या पुत्री) की आयु बढ़ जाए या उसके जीवन की अनहोनी टल जाए—यह भावना सत्य और तर्क की कसौटी से कोसों दूर है।

हम व्यावहारिक जगत में भी प्रतिदिन देखते हैं कि अहोई आदि के अत्यंत कठिन व्रत रखने के उपरांत भी परिवारों में अनहोनियाँ घटित हो जाती हैं, अकाल मृत्यु हो जाती है और संकट आ जाते हैं। वास्तव में, ऋषियों के सनातन सिद्धांतों के अनुसार किसी भी अनहोनी को रोकने, या उसके घटित हो जाने पर उसके दुष्प्रभाव को न्यूनतम करने का एकमात्र अचूक उपाय "धर्म का आचरण" और "वेद का पठन-पाठन" ही है।

यजुर्वेद (अध्याय ४०, मंत्र १ / ईशोपनिषद्)
ईशावास्यमिदं सर्वं यत्किञ्च जगत्यां जगत् ।
तेन त्यक्तेन भुञ्जीथा मा गृधः कस्यस्विद्धनम् ॥
वैदिक सिद्धांत १ (मा गृधः): इस चराचर जगत में जो कुछ भी है, वह सब ईश्वर से व्याप्त है। अतः इसका उपभोग त्याग भाव से करो। "लालच मत करो", क्योंकि धन या वासना का लोभ ही जीवन में सबसे बड़ी अनहोनी (अहोई) को निमंत्रण देता है।

दस वैदिक महावाक्य: जो संतानों को 'अनहोनी' से बचाते हैं

जब हमारी संतानें वेदों का स्वाध्याय करेंगी, तभी उन्हें उचित और अनुचित कर्म का वास्तविक बोध होगा। वेद के निम्नलिखित महावाक्य ही जीवन के सच्चे रक्षक हैं:

१. मा गृधः (यजुर्वेद): किसी के धन या सुख का लालच मत करो। लोभ ही विनाश का मूल है।

२. युयोध्यस्मज्जुहुराणमेनः (ऋग्वेद १.१८९.१): हमारे भीतर के पापरूपी कर्मों, छल-कपट और कुटिलताओं को हमसे दूर करो। कुटिलता का त्याग ही रक्षा है।

३. इदमहमनृतात् सत्यमुपैमी (यजुर्वेद १.५): मैं असत्य और पाखंड का मार्ग छोड़कर सत्य के आचरण को अंगीकार करता हूँ। सत्यवादी कभी पराजित नहीं होता।

४. पशून पाहि (यजुर्वेद): मूक जीव-जंतुओं की रक्षा करो, उन पर दया करो। हिंसा से जीवन में भयंकर पापों का संचय होता है।

५. दुरितानि परासुव यद्भद्रं तन्नासुव (यजुर्वेद ३०.३): हे परमात्मा! हमारे समस्त दुर्गुणों, दुर्व्यसनों और दुखों को दूर करो, तथा जो हमारे लिए कल्याणकारी (भद्र) गुण, कर्म और स्वभाव हैं, वे हमें प्रदान करो।

६. अक्षैर्मा दिव्यः कृषिमित्कृषस्व (ऋग्वेद १०.३४.१३): जुआ, सट्टा या अधर्म से धन मत कमाओ; परिश्रम (कृषि व पुरुषार्थ) से धन अर्जित करो। रिश्वतखोर और भ्रष्ट व्यक्ति का पतन निश्चित है।

७. शतहस्त समाहर सहस्रहस्त संकिर (अथर्ववेद ३.२४.५): सौ हाथों से पुरुषार्थ पूर्वक धन कमाओ और हजार हाथों से (उसका न्यूनतम १० प्रतिशत) परोपकार, समाज कल्याण और राष्ट्र सेवा में बिखेर दो।

८. स्थिरैरङैस्तुष्टवांसस्तनूभिव्यशेमहि देवहितं यदायुः (ऋग्वेद १.८९.८): हमारे अंग सुदृढ़ हों, हमारा शरीर स्वस्थ हो। हम ईश्वर के उपासक और परोपकारी बनकर देवताओं (ऋषियों) द्वारा निर्धारित दीर्घायु को भोगें।

९. धियो यो नः प्रचोदयात् (ऋग्वेद ३.६२.१० - गायत्री मंत्र): वह परमपिता परमेश्वर हमारी बुद्धियों को सन्मार्ग की ओर प्रेरित करे। जब संकट या हर्ष का समय हो, तब हमारी बुद्धि भ्रमित न हो, हमारे निर्णय उचित हों ताकि हम सतत उन्नति कर सकें।

१०. सर्वा आशा मम मित्रं भवन्तु (अथर्ववेद १९.१५.६): दिशा-विदिशा और संसार के समस्त प्राणी मेरे मित्र बन जाएं। जब हम सबके मित्र बनेंगे, तो कोई हमारा शत्रु नहीं होगा, और अनहोनी स्वतः टल जाएगी।

ऋग्वेद (मण्डल १०, सूक्त १९१, मंत्र ३)
समानी व आकूतिः समाना हृदयानि वः ।
समानमस्तु वो मनो यथा वः सुसहासति ॥
भावार्थ: तुम सबके संकल्प समान हों, तुम्हारे हृदय एक समान हों (द्वेषरहित हों) और तुम्हारा मन एक जैसा हो, जिससे तुम्हारी सामूहिक शक्ति और संगठन सुदृढ़ बना रहे। यही संगठन जीवन की विपदाओं को रोकता है।

माताओं के लिए वास्तविक व्रत: संतानों को सुसंस्कारी बनाना

उक्त वेद-वाक्यों को पढ़ने और समझने से ही हमारे पुत्र और पुत्रियाँ धर्म का यथार्थ आचरण कर सकेंगे। जब उनका चरित्र उत्तम होगा, तो वे स्वयं ही अनहोनी घटनाओं (अहोई) को टालने में सक्षम होंगे और संकट आने पर भी विचलित नहीं होंगे। अब वर्तमान युग की माताओं को चाहिए कि वे केवल अन्न-जल त्यागने के पाखंड की लत छोड़कर, अपनी संतानों को इन वैदिक तथ्यों और जीवन-मूल्यों से अवगत कराने का 'सच्चा व्रत' लें। तभी संतानें दीर्घायु, सुखी, तेजस्वी और ऐश्वर्यशाली बनेंगी।

अन्यथा, आप अहोई का ढोंग-व्रत रखती रहें और आपकी संतानें संस्कारहीन, नास्तिक, धर्महन्ता, मांसाहारी, व्यसनी (जुआरी), रिश्वतखोर, अदाता (कंजूस), शराबी, झगड़ालू और छली-कपटी हो जाएं; तो ऐसी स्थिति में संसार की कौन सी कल्पित देवी या कौन सा उपवास उस कुल की 'अनहोनी' को टाल सकेगा? कोई नहीं!

चूंकि सनातन धर्म का अकाट्य और अपरिवर्तनीय सिद्धांत है—'यादृशं वपते बीजं तादृशं लभते फलम्' (जो जैसा बीज बोएगा, उसे वैसा ही फल भोगना होगा)। अतएव, इस 'अहोई अष्टमी' के अवसर पर केवल भूखे रहने के बजाय, अपनी संतानों को वेदों के स्वाध्याय, सदाचार और पुरुषार्थ के प्रति प्रेरित करें। अंधकार से निकलकर प्रकाश की ओर कदम बढ़ाएं।

आओ वेदों की ओर लौटें! (Back to the Vedas)
— डॉ. अमित (परिशोधित एवं विस्तारित: ज्ञान विज्ञान ब्रह्मज्ञान)