अमीरी और दरिद्रता का वैचारिक भ्रम: स्वभाव, आदत और माया का चक्रव्यूह
वैदिक सिद्धांत, मानसिक व्याधि और मायानगरी के छलावे का एक आध्यात्मिक विवेचन
एक अनसुलझी वैश्विक समस्या: दरिद्रता की लाइलाज बीमारी
केवल भारत ही नहीं, अपितु संपूर्ण विश्व के सामने आज जो सबसे बड़ी अनसुलझी समस्याएं हैं, उनमें से एक प्रमुख समस्या 'दरिद्रता' (गरीबी) है। इस समस्या के स्थायी समाधान के लिए विश्वभर की सरकारें और आधुनिक नीतिकार लंबे समय से प्रयासरत हैं, किंतु इसका कोई पूर्ण और अचूक समाधान आज तक प्राप्त नहीं हो सका है। यह दरिद्रता आधुनिक अर्थशास्त्रियों के सम्मुख एक लाइलाज बीमारी की तरह खड़ी है।
अक्सर यह देखने में आता है कि जब कोई सरकार अपनी लोक-कल्याणकारी योजनाओं या भारी खर्चों के बल पर जनता को कृत्रिम रूप से समृद्ध या अमीर बनाने का प्रयास करती है, तो वही जनता कुछ ही दशकों में पहले से भी अधिक भीषण दरिद्रता की गर्त में गिर जाती है। काल के चक्र में बड़े-बड़े धनी और संपन्न परिवारों, समाजों या प्रांतों को वैभव से दरिद्रता की ओर जाते देखा गया है; और इसके विपरीत, जो कभी घोर अभाव में जीवन व्यतीत कर रहे थे, उन्होंने पुरुषार्थ या अनुकूल परिस्थितियों के कारण स्वयं को कुछ ही वर्षों में अत्यंत समृद्ध बना लिया है।
स्वभाव और आदत (लत) का सूक्ष्म दार्शनिक अंतर
दरिद्र से धनी बनना अत्यंत कठिन पुरुषार्थ है, जबकि धनी से दरिद्र बनना अत्यंत सरल और तीव्र प्रक्रिया है। संसारी प्रपंचों, विज्ञापनों और भ्रामक दुष्प्रचारों के प्रभाव में आकर मनुष्य धन का संचय तो कर लेता है, परंतु अंततः उसे यह बोध होता है कि बाह्य अमीरी एक मानसिक व्याधि (रोग) के अतिरिक्त कुछ नहीं है। अमीरी वास्तव में एक भयंकर लत (Addiction) है; ठीक वैसी ही लत जैसे किसी को धूम्रपान, मदिरापान, मांसाहार, वेश्यागमन या द्यूत (जुआ) खेलने की लग जाती है।
तथाकथित समृद्ध समाज में इन विकृतियों को एक साधारण बात या 'लाइफस्टाइल' मान लिया जाता है। यही गंदी लतें मनुष्य को हर समय और अधिक धन कमाने के लिए विवश करती हैं। इस अंधी दौड़ में मानव स्वयं को मनुष्यता की श्रेणी से बहुत नीचे गिरा लेता है। वह केवल रूप-रंग और शक्ल से मनुष्य दिखाई देता है, किंतु उसकी वृत्तियाँ और आदतें जंगली पशुओं के समान हिंसक और आत्मकेंद्रित हो जाती हैं। वह अपने ही समान अन्य मनुष्यों को पशु समझने लगता है और उनके साथ क्रूर व्यवहार करता है।
विचारणीय पक्ष यह है कि यह क्रूरता मनुष्य का 'स्वभाव' नहीं, बल्कि उसकी 'आदत' है। आदत को अभ्यास द्वारा बदला जा सकता है, किंतु स्वभाव अपरिवर्तनीय होता है। उदाहरण के लिए, मनुष्य अपनी रुचि के अनुसार क्या खाता है और क्या नहीं खाता—यह उसका अपना चुनाव (आदत) है। परंतु भोजन ग्रहण करना शरीर का 'स्वभाव' है; कोई भी देहधारी जीव भूख की स्वाभाविक प्रवृत्ति का सर्वथा त्याग नहीं कर सकता। मनपसंद भोजन न मिलने पर भी स्वयं को जीवित रखने के लिए मनुष्य जो भी रूखा-सूखा अन्न उपलब्ध पाता है, उसे ग्रहण कर लेता है। जैसे अग्नि का स्वभाव उष्णता (गर्मी) है और जल का स्वभाव शीतलता है, वैसे ही आत्मा और शरीर के अपने अपरिवर्तनीय स्वभाव होते हैं।
सङ्गात्संजायते कामः कामात्क्रोधोऽभिजायते ॥
प्रोटोकॉल का बंधन और 'समय ही धन है' का छलावा
आज के युग में बंधन और पराधीनता को ही अमीरी की पहचान मान लिया गया है। जो व्यक्ति जितने अधिक बंधनों और नियमों में जकड़ा है, समाज उसे उतना ही बड़ा अमीर मानता है। उदाहरण के लिए, किसी राजनेता या प्रधानमंत्री का विशेष 'प्रोटोकॉल' होता है, जिसका एक-एक मिनट महीनों पहले से निर्धारित और आवंटित होता है। इसी प्रकार कोई प्रसिद्ध अभिनेता या धनवान व्यक्ति स्वयं को समय की बेड़ियों में बांधकर रखता है। उनके जीवन का बहुमूल्य समय केवल और केवल 'धन के संग्रह' (Money Accumulation) की वेदी पर बलि चढ़ जाता है।
यहीं से यह भ्रामक नारा निकला कि 'समय ही धन है' (Time is Money)। इसका अर्थ यह निकाला गया कि जीवन के अनमोल क्षणों को केवल धन कमाने में व्यय करना ही बुद्धिमानी है। परंतु इस प्रकार अर्जित किए गए धन का उपयोग अंततः विलासिता, गंदी लतों और आत्मविनाश के साधनों में ही होता है।
इसके विपरीत, जो विवेकशील और विचारवान पुरुष होते हैं, वे अकूत धन अर्जित करने के बाद भी अपनी सादगी और आंतरिक 'अपरिग्रह' (जिसको अज्ञानी लोग कंगाली या दरिद्रता समझ लेते हैं) का परित्याग नहीं करते। वे अपनी मूल सादगी को नहीं छोड़ सकते क्योंकि आत्म-संतोष उनका स्वाभाविक गुण है। इसके विपरीत, जो लोग भीतर से अशांत हैं, वे केवल बाह्य चकाचौंध, महंगे पहनावे और झूठे हाव-भाव से स्वयं को अमीर प्रदर्शित करने का स्वांग (अभिनय) करते हैं, जबकि वास्तविकता में वे अपने हृदय से 'महादरिद्र' और कंगाल होते हैं।
मायानगरी का पाखंड और श्वान-अस्थि न्याय (कुत्ते और हड्डी का उदाहरण)
यह स्थिति वैसी ही है जैसे कोई अभिनेता बड़े पर्दे पर किसी महापुरुष या चरित्र का अभिनय करता है और भोली-भाली जनता उसके अभिनय को देखकर भाव-विभोर हो जाती है। जिस कलाकार ने रामायण में 'श्रीराम' या महाभारत में 'श्रीकृष्ण' का अभिनय किया, लोग अज्ञानवश उन्हें ही साक्षात देवी-देवता मानकर उनकी पूजा और गुणगान करने लगते हैं। जबकि सत्य इसके बिल्कुल विपरीत होता है; साधारण जन कई बार वास्तविक जीवन में चरित्रहीन या व्यसनी कलाकारों को अपने हृदय के सिंहासन पर बैठा लेते हैं। उनके अंधानुकरण से समाज भी चरित्रहीनता, विलासिता और वासना के जाल में सुख खोजने लगता है।
शास्त्रों में इस अज्ञान को 'श्वान-अस्थि न्याय' कहा गया है। जिस प्रकार एक भूखा कुत्ता सूखी हड्डी को अपने तीखे दांतों से चबाता और कुरेदता है, तो उसके अपने ही मसूड़ों से खून टपक कर उसकी जीभ पर गिरने लगता है। वह जड़बुद्धि और महामूर्ख जीव यह समझता है कि यह स्वादिष्ट रक्त उस सूखी हड्डी में से निकल रहा है! ठीक यही दशा सांसारिक मनुष्यों की है। वे भौतिक संपदा और इंद्रिय-विषयों के चक्कर में इस प्रकार फंसते हैं कि उनका पूरा जीवन ही समाप्त हो जाता है। यह समस्त भौतिक जगत, प्रपंच और भोग सामग्रियां मनुष्य को वास्तव में समृद्ध नहीं, बल्कि आंतरिक रूप से खोखला, कंगाल और नष्ट करने के साधन हैं। इसी छलावे को हमारे ऋषियों ने 'माया' कहा है, और जहाँ इस माया का सबसे वीभत्स और सघन व्यापार होता है, उसे 'मायानगरी' (चकाचौंध वाली दुनिया) कहा जाता है।
इस मायानगरी के दलदल में लोग पूरी तरह धंसते जा रहे हैं। जैसे काम-पीड़ित प्रेमिका अपने प्रेमी के विरह में व्याकुल होकर रोती है, जिसे कवियों ने 'नागमती वियोग वर्णन' जैसी कविताओं में बड़े सुंदर शब्दों में चित्रित किया है; साधारण मनुष्य भी उसी तड़प और व्याकुलता के साथ इन नाशवान भौतिक सुखों के पीछे पागल बना रहता है। यह सब केवल एक 'मानसिक लत' है।
मायामयममिदं निखिलं हित्वा ब्रह्मपदं त्वं प्रविश विदित्वा ॥
निष्कर्ष: निजता का बोध और सनातन वैदिक सिद्धांत
इस वैश्विक दरिद्रता और मानसिक कंगाली से मुक्ति का एकमात्र मार्ग है—'अपनी निजता (आत्मानुभूति) की उपलब्धि'। जब तक हम स्वयं के भीतर स्थित शांत स्वरूप को नहीं पहचानेंगे, तब तक हम अपनी इस मानसिक बीमारी को दूर नहीं कर पाएंगे। जो व्यक्ति स्वयं को केवल बाह्य धन के कारण 'अमीर' समझता है, वह भी एक मानसिक रोग (अहंकार) का शिकार है; और जो बाह्य साधनों के अभाव में स्वयं को दीन-हीन और 'गरीब' मानकर रोता है, वह भी मानसिक अवसाद की बीमारी से ग्रस्त है।
जो सत्य, शुभ, शाश्वत और सनातन वैदिक सिद्धांत है, वह पूर्णतः अपरिवर्तनीय है। वह परमात्मा और आत्म-तत्त्व सब में हमेशा से समान रूप से विद्यमान है। हम अपनी ही इस आंतरिक समृद्धि से अपरिचित हैं, यही हमारा सबसे बड़ा 'अज्ञान' है। यह अज्ञानता मायानगरी के भौतिक साधनों, सिनेमा या कृत्रिम धन से कभी दूर नहीं हो सकती।
अत: इस मायानगरी के छलावे से सावधान रहना ही वास्तविक निर्धनता और अमीरी के भ्रम को दूर करने का एकमात्र मार्ग है। बाह्य अमीरी केवल एक मृगमरीचिका (छलावा) है। जिस दिन हमारे देश और संपूर्ण विश्व को इस परम सत्य का साक्षात्कार हो जाएगा, उसी दिन समाज की सभी कृत्रिम विषमताएं समाप्त हो जाएंगी और संपूर्ण मानवता आत्मिक रूप से सुखी, संतुष्ट और सच्चे ऐश्वर्य से संपन्न हो जाएगी।
