अथर्ववेद काण्ड ३ सूक्त ९ सरल संस्कृत शब्दार्थ और हिन्दी भावार्थ
०३।००९।०१
क॒र्शप॑स्य विश॒पस्य॒ द्यौः पि॒ता पृ॑थि॒वी मा॒ता ।
यथा॑भिच॒क्र दे॒वास्तथाप॑ कृणुता॒ पुनः॑॥१॥
✍क्षेमकरण दास त्रिवेदी 👉
भाषार्थः (कर्शफस्य) निर्बल का और (विशफस्य) प्रबल का (द्यौः) प्रकाशमान परमेश्वर (पिता) पिता और (पृथिवी) विस्तीर्ण परमेश्वर (माता) निर्मात्री, माता है। (देवाः) हे विजयी पुरुषों ! (यथा) जैसे [शत्रुओं को] (अभिचक्र) तुमने हराया था, (तथा) वैसे ही (पुनः) फिर [उन्हें] (अपकृणुत) हटा दो ॥१॥
भावार्थः जगत् के माता-पिता परमेश्वर ने वृष्टि द्वारा सूर्य और पृथिवी के संयोग से सब निर्बल और प्रबल जीवों को उत्पन्न किया है, इसलिये सब सबल और निर्बल मिलकर अविद्या, निर्धनता आदि शत्रुओं को मिटाकर आनन्द से रहें ॥१॥
✍विश्वनाथ विद्यालंकार👉
भाषार्थ: (कर्शफस्य१)= करशफस्य [सायण] शफ अर्थात खुरों द्वारा काम करनेवाले या खुररूपी "कर" अर्थात् हाथोंवाले का, (विशफस्य) तथा शफों से बिहीन का (पिता द्यौः) पिता है द्युलोक, (माता) तथा माता है (पृथिवी) पथिवी। (देवा:) द्यौः और पूथिवी आदि दिव्यतत्त्वों ने (यथा) जिस प्रकार (अभि चक्रे) हमारे संमुख यह सृष्टि पैदा की है, (तथा) उसी प्रकार (पुनः) फिर (अपकृणुत) तुम इस सृष्टि को अपकृत अर्थात् अपगत करो।
टिप्पणी: [प्राणी-सृष्टि दो प्रकार की है, खुरोंवाली तथा खुरों से रहित। दोनों प्रकार की सृष्टियाँ द्यूलोक तथा पुथिबी से उत्पन्न हुई हैं। जैसे ये उत्पन्न हुई हैं वैसे फिर अपगत होकर उत्पन्न होती रहेंगी। यह उत्पत्ति तथा प्रलय का चक्र अनादिकाल से चल रहा है।]
[१. करोति कर्माणि शफैः यः, सः कर्शफः, अश्वादिः। तथा शफैः विहीन: विशफ: मनुष्यादिः।]
०३।००९।०२
अ॑श्रे॒ष्माणो॑ अधारय॒न्तथा॒ तन्मनु॑ना कृ॒तम् ।
कृ॒णोमि॒ वध्रि॒ विष्क॑न्धं मुष्काब॒र्हो गवा॑मिव ॥२।
✍क्षेमकरण दास त्रिवेदी 👉
भाषार्थः (अश्रेष्माणः) दाह [डाह] न करनेवाले पुरुषों ने [जगत् को] (अधारयन्) धारण किया है, (तथा) उसी प्रकार से ही (तत्) वह [जगत् का धारण] (मनुना) सर्वज्ञ परमेश्वर करके (कृतम्) किया गया है। (विष्कन्धम्) विघ्न को (वध्रि) निर्बल (कृणोमि) मैं करता हूँ, (गवाम् इव) जैसे बैलों के (मुष्काबर्हः) अण्डकोष तोड़नेवाला [बैलों को निर्बल कर देता है] ॥२॥
भावार्थः पक्षपातरहित परमेश्वर संसार का धारण-पोषण करता है, उसी प्रकार धर्मात्मा पुरुष किसीसे वैर न करके उपकार करते आये हैं, वैसे ही प्रत्येक मनुष्य विघ्नों को हटाकर उन्नति करे, जैसे दुर्दमनीय बैल को असह्यबल से हीन करके कृषि आदि में चलाते हैं ॥२॥
✍विश्वनाथ विद्यालंकार👉
भाषार्थ: (अश्रेष्मान:) न दुग्ध हुए तत्वों ने (अधारयन्) हमारा धारण-पोषण किया हुआ है, (तथा) उस प्रकार का (तत्) वह विधान (मनुना) मनस्वी परमेश्वर ने (कृतम्) किया है। (मुष्काबर्ह:) मुष्कों अर्थात् अण्डकोषों का हनन (इव गवाम्) जैसे बैलों का किया जाता है, वैसे (वध्रि) बधिया तथा (विष्कन्धम्) अवशोषण (कृणोमि) मैं कर देता हूँ [जगत् का]। बर्ह= हिंसायाम् (भ्वादिः)।
टिप्पणी: ['अश्रेष्माणः' जो प्रलय में दग्ध नहीं हुए उन्होंने हम सबका धारण-पोषण किया है। यह परमेश्वर ने विधान कर रखा है। परमेश्वर ही संसार का विधान करता और वह ही संसार को बधिया१ करता अर्थात् उत्पत्ति से रहित करता और अवशोषित करता है (प्रलय में); अश्रेष्माण:२ = अ+श्रिषु (दाह, भ्वादिः)। विष्कन्धम् = विशेषेण शोषणम्, (स्कन्दिर् शोषणे भ्वादिः)।]
[१. प्रलयकाल में जगत् शक्तिरहित हो जाता है, यह जगह का बधियापन है।
२. अश्रेष्माण:= दग्ध न होनेवाले तत्व तीन हैं, परमेश्वर, जीव और प्रकृति। प्रलयाग्नि भी इन्हें दग्ध नहीं कर सकती। इन तीनों ने जगत् का धारण-पोषण किया हुआ है। परमेश्वर तो कर्तृत्वरूप में जगत् का घर धारण-पोषण करता है। जीव निज कर्मों के फलस्वरूप भोगापवर्ग के लिए दृश्य जगत् की उत्पत्ति में कारण हुआ जगत् का धारण-पोषण करता है। प्रकृति तो साक्षात् रूप में दृश्य जगत् में परिणत हुई उसका धारण-पोषण कर रही है।]
०३।००९।०३
पि॒शङ्गे॒ सूत्रे॒ खृग॑लं॒ तदा ब॑ध्नन्ति वे॒धसः॑ ।
श्र॑व॒स्युं शुष्मं॑ काब॒वं वध्रिं॑ कृण्वन्तु ब॒न्धुरः॑॥ ३॥
✍क्षेमकरण दास त्रिवेदी 👉
भाषार्थः (वेधसः) बुद्धिमान् पुरुष (पिशंगे) व्यवस्था वा अवयवों से युक्त वा दृढ़ (सूत्रे) सूत में (तत्) विस्तीर्ण (खृगलम्) खनती वा छिद्र में गलानेवाले, विघ्न को (आ) सब ओर से (बध्नन्ति) बाँधते हैं। (बन्धुरः=०−राः) बन्धुजन (श्रवस्युम्) प्रसिद्ध, (शुष्मम्) सुखानेवाले (काववम्) स्तुतिनाशक शत्रु को (बध्रिम्) निवीर्य (कृण्वन्तु) कर देवें ॥३॥
भावार्थः विद्वान् लोग वेद द्वारा छोटे-छोटों के मेल से बड़ी-२ विपत्तियों को हटा देते हैं, इससे सब बान्धव मिलकर बाहरी और भीतरी दोषों को मिटाकर सुख भोगें ॥३॥
✍विश्वनाथ विद्यालंकार👉
भाषार्थ: (पिशङ्गे)= नानावर्णी (सूत्रे) प्रकृतिरूपी सूत्र में, (वेधसः) विधातृ तत्त्व, (तत्) उस (खृगलम्) खर वस्तुओं का आस्रावण करनेवाले आदित्य को (आबध्नन्ति) द्युलोक में बांधे रखते हैं, उसे जोकि (श्रवस्युम्) विश्रुत है, (शुष्मम्) बलशाली है, (काववम्) रुपवान है, उसे विधातृतत्व (वध्रिम्) बधिया सदृश (कुर्वन्तु) करें, (बन्धुरः) जैसे कि बन्धुत्व सम्पन्न परमेश्वर, प्रलय में इसे बधिया कर देता है। "कृण्वन्तु" गर्मी के कारण व्याकुल हो जाने से यह याचना हुई है।
टिप्पणी: [प्रकृति नाना वर्णोंवाली है, लोहित, शुक्ल तथा कृष्णा है। यथा "अजामेकां लोहितशुक्लकृष्णां वह्वीः प्रजा: सृजमानां सरुपा:" (श्वेता० उप० अध्याय ४, संदर्भ ५)। इस प्रकृतिरूपी सूत्र में आदित्य आदि पिरोए हुए हैं, जैसेकि सूत्र में मणियां पिरोहित होती हैं। अथर्ववेद में प्रकृति को सूत्र और परमेश्वर को "सूत्रस्य सूत्रम्" कहा है (१०।८।३७, ३८)। शुष्मम् बलनाम (निघं० २।९)। अथवा शुष्मम्= सुखा देनेवाला, शुष शोषणे (दिवादि:), आदित्य की गर्मी सुखा देती है। काबवम्=रूपवान, कबृ वर्णे (भ्वादिः), काबवम्= कबृ+ अण्+ वः (मत्वर्थीयः) खृगलम्१= खर वस्तु है बर्फ आदि, गल=स्रवर्णे (चुरादिः), स्रवणम्=द्रवीभूत होना, बहना, गला देना।]
[१. खृगल है आदित्य। यह खर अर्थात् कठोर वस्तुओं को गला देता है, स्रवित अर्थात् द्रवीभूत कर देता है। पृथिवी के गेट में खर-पदार्थ पिगली-अवस्था में हैं, जोकि पृथिवी के उदगाररूप में पृथिवीतल पर प्रकट होते रहते हैं, और जो ज्वालामुखी पर्वतों द्वारा उत्क्षिप्त होते रहते हैं। पृथ्वी के पेट में वह गर्मी आदित्य की है। पथिती आग्नेय-आदित्य से ही प्रकट हुई है। अतः आदित्य को 'खुगल' कहा है। खृगल है खरगल, खर वस्तुओं को गला देनेवाला स्रवित अर्थात् द्रवीभूत कर देनेवाला। पृथिवी पर के पर्वत उत्क्षेपरूप ही है।]
०३।००९।०४
येना॑ श्रवस्यव॒श्चर॑थ दे॒वा इ॑वासुरमा॒यया॑ ।
शुनां॑ क॒पिरि॑व॒ दूष॑णो॒ बन्धु॑रा काब॒वस्य॑ च ॥४॥
✍क्षेमकरण दास त्रिवेदी 👉
भाषार्थः (येन) जिस [बल] के साथ (श्रवस्यवः) हे प्रसिद्ध महापुरुषों ! (देवाः इव) विजयी लोगों के समान (असुरमायया) प्रकाशमान ईश्वर की बुद्धि से (चरथ) तुम आचरण करते हो, [उसी बल के साथ] (शुनाम्) कुत्तों के (दूषणः) तुच्छ जाननेवाले (कपिः इव) बन्दर के समान (बन्धुरा) बन्धनशक्ति [नीतिविद्या] (च) निश्चय करके (काववस्य) स्तुतिनाशक शत्रु की [तुच्छ करनेवाली होती है] ॥४॥
भावार्थः शास्त्रबल से प्रसिद्ध पुरुष अन्य महात्माओं का अनुकरण करके तीव्र बुद्धि के साथ उदाहरण बनते हैं, इसी प्रकार सब पुरुष नीतिबल से शत्रुओं पर प्रबल रहें, जैसे बन्दर वृक्ष पर चढ़कर कुत्तों से निर्भय रहता है ॥४॥
✍विश्वनाथ विद्यालंकार👉
भाषार्थ: [हे प्रजाजनो !] (श्ववस्यवः) यश चाहने की इच्छावाले तुम (येन) जिस विधि से (चरथ) विचरते हो, (इव) जैसे की (असुरमाया) आसुरी माया से प्रेरित हुए (देवाः) देवकोटि के सज्जन विचरते हैं, (च) और (काबवस्य) रूप के (बन्धुराः) बन्धु हुए तुम विचरते है [वे तुम दूषित हो] (इव) जैसेकि (शुनाम्) कुत्तों में से (कपि:) बन्दर (दूषण:) दूषित होता है।
टिप्पणी: [जैसे सर्वसाधारणजन यश की इच्छा से विचरते हैं वैसे देवकोटि के राज्जन भी यदि आसुरीमाया से प्रेरित हुए विचरते हैं तो वे दुषित हो जाते हैं, क्योंकि वे रूप के बन्धु होते हैं। कुत्ते कामवासनाओंवाले होते हैं, परन्तु बन्दर उनकी अपेक्षया भी अधिक कामवासनावाला होता है, अतः वह दूषित है। बन्धुरा में विसर्गलोष छान्दस है। दूषणः कर्तरि ल्यूट (सायण)। देवकोटि के सज्जन भी आसुरीमाया के वशीभूत होकर कुपथ में प्रवृत्त हो जाते हैं, जैसेकि कवि ने कहा है कि,-"अपथे पदमर्पयन्ति हि गुणवन्तोऽपि रजोनिमीलिताः"।]
०३।००९।०५
दुष्ट्यै॒ हि त्वा॑ भ॒त्स्यामि॑ दूषयि॒ष्यामि॑ काब॒वम् ।
उदा॒शवो॒ रथा॑ इव श॒पथे॑भिः सरिष्यथ ॥५॥
✍क्षेमकरण दास त्रिवेदी 👉
भाषार्थः (दुष्ट्यै) दुष्टता [हटाने] के लिए, (हि) ही (काववम्) स्तुति नाशक (त्वा) तुझको (भत्स्यामि) मैं बाँधूँगा और (दूषयिष्यामि) दोषी ठहराऊँगा। (आशवः) शीघ्रगामी (रथाः इव) रथों के समान (शपथेभिः=०−थैः) हमारे शाप अर्थात् दण्ड वचनों से (उत् सरिष्यथ) तुम सब बन्धन में चले जाओगे ॥५॥
भावार्थः राजा नाम में धब्बा लगानेवाले दुष्ट को कारागार में रखकर उसके दोष प्रसिद्ध कर दे और उसके सहायकों को भी उचित दण्ड देवे ॥५॥
✍विश्वनाथ विद्यालंकार👉
भाषार्थ: [हे प्रजानन !] (दुष्ट्यै) तेरी दूषित वृत्ति के निवारण के लिये (त्वा) तुझे (भत्स्यामि) मैं कल्याणमार्गी बनाऊँगा, (काबवम्) रूपादि विषयोंवाले तुझको (दूषयिष्यामि) मैं विकृत कर दूंगा [पूर्वावस्था से विभिन्न अवस्था वाला कर दूंगा]। (उदाशवः) उन्नति के मार्ग पर शीघ्र चलनेवाले (रथा: इव) रथों के सदृश, (शपथेभी:) मेरे शपथों के कारण, (सरिष्यथ) तुम शीघ्रता से चल सकोगे।
टिप्पणी: [दुष्ट्यै = तुमर्थे चतुर्थी। भत्स्यामि= भदि कल्याणे सुखे च (भ्वादि:)। "शपथेभिः" द्वारा वक्ता ने निज दृढ़ संकल्प सूचित किया है, जिस द्वारा व्यक्ति शीघ्र कल्याणमार्ग में चल सकेगा। शपथेभिः= शपथों में दृढ़संकल्प होते हैं। यथा "अद्या मुरीय यदि यातुधानो अस्मि" (निरुक्त ७।१।३); तथा (अथर्व० ८।४।१५)।]
०३।००९।०६
एक॑शतं॒ विष्क॑न्धानि॒ विष्ठि॑ता पृथि॒वीमनु॑ ।
तेषां॒ त्वामग्रे॒ उज्ज॑हरुर्म॒णिं वि॑ष्कन्ध॒दूष॑णम् ॥६ ॥
✍क्षेमकरण दास त्रिवेदी 👉
भाषार्थः (एकशतम्) एक सौ एक (विष्कन्धानि) विघ्न (पृथिवीम् अनु) पृथिवी पर (विष्ठिता=०−तानि) फैले हुए हैं [हे शूर !] (तेषाम् अग्रे) उनके सन्मुख (विष्कन्धदूषणम्) विघ्ननाशक (मणिम) प्रशंसनीय मणिरूप (त्वाम्) तुझको उन्होंने [देवताओं ने] (उत् जहरुः) ऊँचा उठाया है ॥६॥
भावार्थः प्रतिष्ठित लोग राजा को ‘एकशतम्’ अनेक विघ्नों से रक्षा के लिए अग्रगामी बनाते हैं, इसलिये राजा अपने धर्म का यथार्थ पालन करे ॥६॥
✍विश्वनाथ विद्यालंकार👉
भाषार्थ: (एकशतम्) एक सौ एक (विष्कन्धानि) शोषण (पृथिवीमनु) पृथिवी में (विष्ठिता) विविधरूप में स्थित हैं। (तेषाम्) उनके निवारण के लिए, (मणिम्१) तुझ पुरुष-रत्न को [देवों ने] (अग्रे) पहिले (उज्जहरुः) चुना है, (विष्कन्धदूषणम्) शोषकों के विनाशकरूप में।
टिप्पणी: [१. मणि = रत्न। (आप्टे)। रत्न="जातौ जातौ यदुत्कृष्टं तद्रत्नममिधीयते" (मल्लिनाथ)। मनुष्यों में उत्कृष्ट मनुष्य को भी मणि और रत्न कह सकते हैं, यथा चन्द्रमणि आदि।]
[विष्ठिता=विष्ठितानि। विष्कन्ध हैं रोग, जोकि शरीर और शारीरिक शक्तियों का शोषण कर देते हैं, "स्कन्दिर् गतिशोषणयोः" (भ्वादिः)। ये रोग १०१ हैं। मनुष्य का जीवन है शतायुः और एक वर्ष वह मातृयोनि में निवास करता है। जीवन वर्षों की संख्यानुसार शोषक रोगों को १०१ कहा है। उज्जहरु:=उत्+हृञ् हरणे (भ्वादिः), ऊपर की ओर हरण करना, ऊंचा करना, चुनना।]

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