श्वास प्रश्वास की गति विच्छेद को प्राणायाम कहते है ।
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योग की दिशा में अग्रसर होने वाले साधक को प्राणायाम करना अनिवार्य है । योग के आठ अंग में चौथा अंग प्राणायाम है । जिस साधक को प्रभु दर्शन की अभिलाषा है वह प्राणायाम अवश्य करे ।
प्राणायाम करने से चित्त शीघ्र चंचल रहित, शांत और एकाग्र हो जाता है । मनु महाराज के शब्दो में धौकनी द्वारा तपाने से जैसे धातुओं का मल दूर होता है, उसी प्रकार प्राणों के निग्रह से इंद्रियों का दोष दूर हो जाते है ।
जो साधक प्रतिदिन प्राणायाम का अभ्यास करता है उनकी स्मरण शक्ति तीव्र हो जाती है । वह बलवान, पराक्रमी और जितेंद्रिय हो जाता है । प्राणायाम बुद्धि को प्रतिभाशाली, मेघावी और गूढ़ विषयों को सरलता से पकड़नेवाली बना देता है । प्राणायाम साधक के मन को शुद्ध करके उसे चिंतन के योग्य बना देता है ।
प्राण ही जीवन है । प्राणशक्ति से ही मनुष्य जीता है । प्राणायाम करनेवाला व्यक्ति काम, क्रोध, लोभ, मोह आदि वासनाओं को जलाकर स्वस्थ एवम् दीर्घ आयु को प्राप्त करता है ।
प्राणायाम भूख को बढ़ाता है, वाणी की मिठास बढ़ाता है । शरीर में लकवा, बी.पी., हायपेटेंशन आदि रोग मिटाता है । वह मन, शरीर और इंद्रियों के विकारों को समाप्त कर देता है । जैसे व्यायाम करने से शरीर स्वस्थ रहता है, उसी प्रकार प्राणायाम करने से प्राणमय कोश और अन्नमय कोश दोनों स्वस्थ रहते है ।
प्राणायाम करने से शरीर को स्वास्थ्य लाभ अवश्य होता है, किन्तु स्वास्थ्य लाभ करना प्राणायाम का मुख्य लक्ष्य नहीं है । प्राणायाम को उपनिषदो में मोक्ष प्राप्ति का साधन माना गया है । अशुद्धि का क्षय और शुद्धि का उदय प्राणायाम से होता है ।
योग दर्शन कहता है -
"श्वास प्रश्वास्योर्गति विच्छेद: प्राणायाम:"
आसन का अभ्यास हो जाने पर, श्वास और प्रश्वास की गति को रोकने (विच्छेद) का नाम प्राणायाम है ।
स्वामी दयानन्द सरस्वती के शब्दो में -
जो वस्तु बाहर से भीतर को आता है, उसको श्वास कहते हैं । इसके विपरित जो वायु भीतर से बाहर को निकलता है, उसे प्रश्वास कहते हैं । इन दोनों के विचार पूर्वक (इच्छानुसार) आने - जाने और यथेच्छ रोक देने को प्राणायाम कहते हैं । (ऋग्वेददादिभाष्य भूमिका - उपासना प्रकरण)
प्राणायाम मुख्यत: चार है - पूरक, रेचक, कुंभक और बाह्याभ्यांतर आक्षेपी।
फेफड़ों की हवा बाहर खाली करने का नाम रेचक है । बाहर से फेफड़ों में हवा भरने का नाम पूरक है । श्वास न लेना, न फेकना, ऐसी सहज अवस्था में जहां के तहां रोक रखना कुंभक (स्तंभ वृत्ति) है ।
जब श्वास भीतर से बाहर आवे, तब बाहर ही रोकता रहे और जब बाहर से भीतर को जावे तब उसको भीतर ही थोड़ा - थोड़ा रोकता रहे - इसे ही बाह्याभ्यांतरक्षेपी प्राणायाम कहते है । यह प्राणायाम प्रारंभिक अभ्यासी के लिए निषेध है ।
प्राणायाम करने से प्रकाश के उपर का पड़ा हुआ आवरण धीरे धीरे हटने लगता है ।अन्तःकरण निर्मल होने लगता है और आत्मा में उपस्थित परमात्मा का दिव्य प्रकाश प्रगट होने लगता है । जो साधक प्राणायाम करेगा उसका मन निश्चय से प्रभु के ध्यान में भली प्रकार लगेगा ।
प्राणायाम का अभ्यास करनेवाला स्वाभाविक रूप से सांस भीतर ले जाता है, बाहर निकालता है और जब चाहे रोक रखता है । इस काम के लिए उसे अपने अंगूठे या तर्जनी उस अंगुली से दबाना या थामना नहीं चाहिए । स्वामी दयानंद ने अपने लेखों में प्राणायाम के समय नाक को अंगुलियों से थामना नहीं चाहिए ऐसा स्पष्ट संकेत किया है ।
योग दर्शन १/३४ अनुसार प्राणों को बलपूर्वक बाहर निकालने और रोक रखने से चित्त की चंचलता मिटती है, फलस्वरूप अन्तःकरण में समाधि साधने में सहायता मिलती है ।
"प्राणों के साथ खेलना विषैले सांप के साथ खेलना समान है" - अतः किसी भी समर्थ मार्गदर्शक अनुसार सीखकर नियमित करना चाहिए ।
जहां शुद्ध वायु का आवागमन हो, खुला स्थान हो, वहां करना चाहिए ।
वस्त्र ढीले, शुभ्र, सुतराऊ धारण करना चाहिए।
जहां वृक्ष, वनस्पति, फूल पौधे हो, स्थान एकांत और पर्यावरण के बीच हो, जहां हलकी सूर्य की सुखद किरणों की विद्यमानता हो वहां प्राणायाम करना उत्तम है । यह क्रिया खाली पेट करनी चाहिए ।
जो शरीर से अस्वस्थ है वह प्राणायाम न करे ।
साधक को अपने सामर्थ्य अनुसार प्राणायाम करना चाहिए । कमसे कम वह ३ करे और अधिक से अधिक २१ करे ।
ऋतु अनुकूल तथा अपनी प्रकृति अनुसार प्राणायाम करना चाहिए । प्राणायाम सतर्क और सावधानी से नियमित करने से बहुत अधिक लाभ प्राप्त होते है । इस क्रिया में कभी अपने प्राण पर हठ नही करना चाहिए। । हठ योग का यहां निषेध है ।
ओ३म् आयुर्मे पाहि प्राणं मे पाह्यपानं मे पाहि व्यानं मे पाहि चक्षुर्मे पाहि श्रोत्रं मे पाहि वाचं मे पिन्व मनो मे जिन्वात्मानं मे पाहि ज्योतिर्मे यच्छ॥ यजुर्वेद १४-१७॥
हे प्रभु, मैं आपसे अपने जीवन की रक्षा की प्रार्थना करता हूं। आप मेरी तीनों प्राण शक्तियों -प्राण, अपान और वयान को सुरक्षित और सशक्त करें। प्राण दीर्घायु के लिए, अपान रोग निरोधक क्षमता के लिए और वयान समस्त शरीर को ऊर्जा प्रसारित करने के लिए। मेरी आंखें बुरा ना देखें। कान बुरा न सुनें। मेरी वाणी को मधुर और सत् शब्दों से भर दो। मेरी चेतन आत्मा, जो आप हैं, को सुरक्षित कर दो। हे ईश्वर, मुझे ज्ञान का प्रकाश दो, जो मैं ये सब समझ सकूं।
केन उपनिषद्
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सामवेद से संबंधित इस उपनिषद् का पहला शब्द " केन इषितम्.." के कारण इसका नाम केनोपनिषद् पड़ा। इस में चार खण्ड और कुल 33 श्लोक हैं।
मन और इन्द्रियां : मन इन्द्रियों के द्वारा विषयों की ओर भागता है। इन्द्रियां भोग के साधन मात्र है। कौन है जो इन्द्रियों के माध्यम से देखता, सूंघता, सुनता है ? उत्तर में उपनिषद्कार लिखता है कि शरीर में स्थित आत्मा मन के साधन के माध्यम से इन्द्रियों के द्वारा विषयों को ग्रहण करता है। जो व्यक्ति आत्मा के स्वरूप को समझ लेता है वह इन्द्रियों के वश में नहीं रहता अपितु इन को वश में कर लेता है। अपनें अमृत स्वरूप को पहचान कर वह आध्यात्मिक स्तर पर जीने लग जाता ह।
"..धीरा: प्रेत्यस्मात् लोकात् अमृता भवन्ति" ब्रह्म का स्वरूप: चेतन आत्मतत्व को आंख से नहीं देखा जा सकता, वाणी से बतलाया नहीं जा सकता । इन्द्रियों से बाहर के पदार्थों का बोध होता है। जिन सांसारिक पदार्थों का इन्द्रियां ज्ञान कराती हैं, आत्मा उन्हीं की पूजा(प्रेम) करता रहता है। ऋषि का कथन है कि वह संसार ब्रह्म नहीं है। शरीर इन्द्रियों का निर्माता संसार का आधार कण-कण में जो व्याप्त है वही ब्रह्म है। उस से महान कोई और नहीं है।
ब्रह्म के स्वरूप को पूर्ण रूप से कोई नहीं जानता। ज्ञानी जन भी उस के थोड़े से अंश को ही जानते हैं। जो व्यक्ति यह मानता है कि वह ब्रह्म को पूर्ण रूप से नहीं जानता, मानो वह ब्रह्म को जान गया है। इसके विपरीत जो घोषणा करता है कि मैं ब्रह्म को जान गया हूँ वह वस्तुतः उस को नहीं जानता।
ब्रह्म ज्ञान प्रतिबोध से सम्भव है। जब इन्द्रियों का संबंध अपने विषयों से अर्थात बाहर की ओर होता है तो जो ज्ञान होता है उसे बोध कहते है। जब इंद्रियां विषयों की ओर जाना बंद कर दे और व्यक्ति भीतर की ओर खोजता है तो मन की चंचलता समाप्त हो जाती है। भौतिक आकर्षण उसे विचलित नहीं करते, उस समय का आंतरिक अनुभव जो उसे धारणा, ध्यान, समाधि द्वारा प्राप्त होता है उसे प्रतिबोध कहते हैं । उसी से अमृत प्राप्त होता है।
यथा हि गर्भिणी हित्वा स्वं प्रियं मनसोऽनुगम।
गर्भस्य हितमाधत्ते तथा राजाप्यसंशयम्।।
राजा को गर्भिणी के समान बर्तना चाहिए।जिस प्रकार गर्भिणी अपना हित त्याग गर्भ की रक्षा करती है उसी प्रकार राजा को अपना हित त्याग सदा प्रजा के हित का ही ध्यान रखना चाहिए।
आर्यों का चक्रवर्ती राज्य!
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परमात्मा ने जब सृष्टि की रचना की और नर - नारियों की युवावस्था में उत्पत्ति हुई तब से लेकर महाभारत काल तक आर्यों का सार्वभौम चक्रवर्ती राज्य रहा ।महाभारत की लडाई व आपसी फूट से सब छिन भिन हुआ ।नौ सौ वर्षों तक मुगलों का शासन और दौ सौ वर्षों तक अंग्रजों के शासन से जो बची संस्कृति, शिक्षा रही उस का भी रूप बदल गया और धीरे-धीरे पाश्चात्य संस्कृति के रंग में रंग गया ।
आर्यों का ग़लत इतिहास बताया जाने लगा जिसका श्रेय लार्ड मैकाले को जाता है । जिसने १८५७ से लेकर १८८८ ई० तक लंदन में विचार विमर्श के पश्चात यह भ्रम फैलाया कि आर्य यहाँ के मूल निवासी नही बल्कि ईरान से आये हैं,जो आज तक प्रचलित है ।वस्तुतः किसी भी देश का पतन करना हो तो उसकी न्याय, शिक्षा संस्कृति को नष्ट कर दो वह देश हमेशा के लिए नष्ट हो जाएगा ।यही कार्य अंग्रजों ने किया जिससे आज तक पाश्चात्य संस्कृति का बोलबाला है ।
जब रघुगण राजा थे तब रावण भी यहाँ के अधीन था। श्री राम के समय में विरूद्ध हो गया तो उसको श्री राम ने मृत्यु दण्ड देकर उसके राज्य को उसके भाई विभिषण को दिया । स्वायंभुव राजा से लेकर पांडव पर्यन्त आर्यों का चक्रवर्ती राज्य था जो बाद में आपसी फूट से लड़कर छिन्न-भिन्न हुआ ।आदि सृष्टि से लेकर पांच हजार वर्ष से पूर्व समय आर्यों का सार्वभौम चक्रवर्ती राज्य इस भूमंडल पर था,सृष्टि के आदि में मनुस्मृति इसका प्रमाण है ।पांच हजार वर्षों के पूर्व वेदमत से भिन्न दुसरा कोई मत नही था ।महाभारत युद्ध के पश्चात् विद्धान, राजा,ऋषि आदि मारे गए और नाना पन्थों का प्रचलन शुरू हुआ जो आज चरम सीमा पर है ।
महाभारत युद्ध के पूर्व श्रीकृष्ण तथा अर्जुन अग्नियान नौका पर बैठकर पाताल ( अमेरिका) गये वहाँ से उद्दालक ऋषि को राजा युधिष्ठिर के यज्ञ में उपस्थिति हेतु लाये थे ।धृतराष्ट्र का विवाह गांधार जिसको आज कंधार कहते हैं वहाँ की राजकुमारी गांधारी से हुआ था ।पाण्डु की धर्मपत्नी माद्री ईरान के राजा की पुत्री थी ।अर्जुन का विवाह पाताल ( अमेरिका) वहाँ के राजा की पुत्री उलोपी से हुआ था ।चीन का राजा भगदत्त, अमेरिका का बभ्रुवाहन, योरोप देश का विडालाक्ष, यवन जिसको यूनान कहते हैं । ईरान का शाल्य आदि सब राजा राजसूय यज्ञ और महाभारत युद्ध में आये थे।
ओ३म् एतावानस्य महिमातो ज्वायाँश्च पूरूष:। पादोऽस्य विश्वा भूतानि त्रिपादस्यामृतं दिवि।। ( यजुर्वेद ३१|३ )
अर्थ:- यह सब सूर्य चन्द्र आदि लोक लोकान्तररूप चराचर जितना भी जगत् है, वह चित्र विचित्र रचना के अनुमान से ईश्वर के महत्व को सिद्ध करके -- उत्पत्ति, स्थिति और प्रलय से तीन काल में ह्रास और वृद्धि आदि से भी परमात्मा के चतुर्थ अंश में स्थित है, इसके चतुर्थ अंश की अवधि को भी प्राप्त नही होता ।इस सामर्थ्य के तीन अंश अपने अविनाशी मोक्षस्वरूप में सदा वर्तमान रहते हैं ।इस कथन से ईश्वर की अनन्तता का नाश नहीं होता, किन्तु जगत् की अपेक्षा उसका महत्व और जगत् की न्यूनता बतायी गयी है ।
परमात्मा इस जगत् में परिपूर्ण है और इस जगत् से महान् है।सब पृथ्वी आदि भूत ईश्वर के एक पाद है अर्थात एक अंश में स्थित है ।अर्थात यह जगत् परमात्मा के चतुर्थ अंश की अवधि को भी प्राप्त नही है ।जगत् की रचना करने वाले परमेश्वर के तीन पाद अर्थात तीन अंश अपने मोक्ष स्वरूप में ही सदा वर्तमान रहता है ।
प्रश्न―यह नमस्ते कहाँ से चली और इसका अर्थ क्या है?
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उत्तर―सृष्टि के आदि से लेकर महाभारत पर्यन्त सब मनुष्य परस्पर में नमस्ते ही करते थे। उनके पश्चात् जब अनेक मत मतान्तर और अनेक मजहब दुनियाँ में फैले, तो उधर सबने अलग-२ शब्द नियत किये। किसी ने 'गुड मार्निंग' 'गुड नाइट' गुडवाई किसी ने 'अस्लाम अलैकुल' 'वालेकम सलाम' 'आदाब अर्ज' आदि-२ अनेक शब्द विधर्मियों और विदेशियों ने कल्पित किए। जय शिव, जय हरी, जय गोविन्द, जय राधेश्याम, जय राम जी, जय कृष्ण जी, प्रणाम, आदि अनेक प्रयोग जारी किये। महाभारत से पहले भू-मण्डल पर आर्य लोगों का अखण्ड राज्य था लोग वैदिक धर्मी थे। परस्पर में नमस्ते ही किया करते थे। अब ऋषि दयानन्द की कृपा से लोग प्राचीन वैदिक सिद्धान्त को पुनः समझने लग गये हैं और परस्पर में नमस्ते करने लगे हैं। नमस्ते का अर्थ है―'मैं तुम्हारा मान्य करता हूँ, आदर करता हूँ।'
प्रश्न―क्या वेदों में नमस्ते करना लिखा है? और जय रामजी की, जय श्री कृष्ण की करने में नुकसान ही क्या है?
उत्तर―वेदों में ही क्या बाल्मीकि रामायण, महाभारत, उपनिषद, गीता आदि समस्त ग्रन्थों में नमस्ते ही लिखा हुआ मिलता है। कहीं भी जय राम जी, जय कृष्णजी की, जय शिव की आदि-२ लिखा हुआ नहीं मिलता। राम और कृष्ण स्वयं नमस्ते करते थे, क्योंकि वे सब वैदिक-धर्मी थे। अगर तुमसे कोई यह पूछे कि राम और कृष्ण के उत्पन्न होने से पहले लोग क्या करते थे तो इसका उत्तर क्या दे सकते हो? राम को उत्पन्न हुए लगभग १० लाख वर्ष हुए और कृष्ण को उत्पन्न हुए लगभग ५ हजार वर्ष हुए। सृष्टि तो इससे पहले की है। सृष्टि को उत्पन्न हुए तो १,९६,०८,५३,१२४ वर्ष हो चुके है।
तुम्हारा यह कहना कि जय रामजी की, जय कृष्णजी की कहने में नुकसान क्या है? नुकसान एक नहीं अनेक हैं। प्रथम तो लोगों में साम्प्रदायिक भावना जागृत होती है। दूसरे इन प्रयोगों में परस्पर के सम्मान की कोई भावना नहीं। मानव समाज में तो कोई उम्र में किसी से बड़ा है, कोई उम्र में छोटा है और कोई उम्र में बराबर। जब परस्पर में एक दूसरे से मिलना हो तो एक दूसरे के प्रति आदर और सम्मान का भाव प्रकट करना मनुष्यता और सभ्यता का चिन्ह है। ऐसा न करके जय रामजी की, जय कृष्णजी की, या जय शिव की करना शोभास्पद प्रतीत नहीं होता। फर्ज करो तुम्हें अपनी नानी, मामी या बुआ, फूफा के दर्शन हुए और उस समय उन सबसे तुमने 'जयरामजी की' या 'जय कृष्णजी की' कहा, तो ऐसा कहने में तुमने उनके सम्मान में क्या शब्द कहे? क्यों जय रामजी की बोलने में राम की जय और जय श्रीकृष्ण जी बोलने में कृष्ण की जय हुई। उनके आदर और सम्मान में तो कुछ न हुआ। 'नमस्ते' कहने से यह बात निकली 'मैं तुम्हारा मान करता हूँ।' मैं तुम्हारा आदर करता हूँ।' आदर हर एक का करना चाहिए छोटों का छोटा जैसा, बड़ों का बड़ा जैसा। बच्चे का भी आदर है, और बड़े का भी आदर है, माता-पिता का भी आदर है, पुत्र–पुत्री का भी आदर है।
प्रश्न―राम की जय और कृष्ण की जय बोलने में राम और कृष्ण का नाम जुबान पर आता है इसमें नुकसान ही क्या ?
उत्तर―नाम तो आता है पर क्या ये जरुरी है कि एक दूसरे के सम्मान के समय भी जय रामजी की और जय कृष्णजी की कहा जाये? क्या हर समय हर एक शब्द का बोलना उचित होता है? समय पर राम की और कृष्ण की जय बोलना भी अच्छा है। पूरे विश्व में सभी आर्य समाजों व गुरुकुलो में प्रातःकाल यज्ञ के पश्चात मर्यादा पुरुषोत्तम श्री राम चन्द्र व योगेश्वर श्री कृष्ण चन्द्र की जय बोली जाती है। जहाँ राम और कृष्ण का चरित्र वर्णन किया जा रहा हो, वहाँ कंस और रावण के मुकाबले पर राम–कृष्ण की जय बोलना अत्यन्त सुन्दर और शोभायमान प्रतीत होता है।
प्रश्न―क्या अच्छे शब्द हर समय नहीं बोले जा सकते हैं?
उत्तर―चाहे कितने ही सुन्दर शब्द हों, वे समय पर ही अच्छे मालूम देते हैं। देखो!'राम नाम सत्य है' कितना सुन्दर वाक्य है। परन्तु हर समय अच्छा मालूम नहीं देता। यदि हर समय मालूम दे तो जरा विवाह के अवसर पर इसे बोलकर देखो फिर पता चले कि यह वाक्य कितना भयंकर है। इस वाक्य के बोलने में कितनी बुराइयाँ और गालियाँ पल्ले पड़ती हैं, जरा अजमा कर कभी देखो तो सही।
प्रश्न―क्या प्रत्येक को नमस्ते करना चाहिए? बेटा बाप को नमस्ते करे तो ठीक भी है, परन्तु बाप बेटे को नमस्ते करे, माँ बेटी को नमस्ते करे, छोटे बड़े को, बड़ा छोटे को, नीच, ऊँच को, ऊँच नीच को, भला यह क्या बात हुई?
उत्तर―अच्छा यह बताओ, कि एक मनुष्य को अपनी माता से प्रेम करना चाहिए या नहीं?
दूसरा व्यक्ति―हाँ, करना चाहिए।
आर्यसमाजी―अपने भाई से भी प्रेम करना चाहिए या नहीं?
दूसरा व्यक्ति―हाँ करना चाहिए।
आर्यसमाजी―अपनी पुत्री से भी प्रेम करना चाहिए या नहीं?
दूसरा व्यक्ति―हाँ, करना चाहिए।
आर्यसमाजी―अपनी पत्नि से भी प्रेम करना चाहिए या नहीं?
दूसरा व्यक्ति―हाँ करना चाहिए।
आर्यसमाजी―अब मैं पूछता हूँ, सबसे ही प्रेम करना चाहिए, यह क्या बात हुई? माता से भी प्रेम, बहिन से भी प्रेम, पुत्री से भी प्रेम, पति से भी प्रेम, पिता, पुत्र और भाई से भी प्रेम। सबसे प्रेम ही प्रेम! सबके लिए एक ही शब्द। भला यह कहाँ की सभ्यता है कि प्रत्येक से प्रेम करें
दूसरा व्यक्ति―पति, पुत्र, माँ, मित्र, बेटी आदि से प्रेम करने में भावनायें तो अलग-२ हैं।
आर्यसमाजी―इसी प्रकार नमस्ते करने की भावनायें अलग-२ हैं। जैसे माता-पिता से प्रेम करते हैं तो श्रद्धा प्रकट करते हैं, भाई-बहिन से प्रेम करते हैं तो स्नेह प्रकट करते हैं, पति से प्रेम करते समय 'प्रणय' की भावना प्रकट करते हैं, वह ईश्वर से प्रेम करते हैं तो भक्ति प्रकट करते हैं। इसी प्रकार माता-पिता से नमस्ते करते हैं तो आदर प्रकट करते हैं। पुत्र-पुत्री से नमस्ते करते हैं तो आशीष या आशीर्वाद देते हैं। बराबर वालों से नमस्ते करते हैं तो प्रेम प्रकट करते हैं। बड़ों का आदर, बराबर वालों से प्रेम, छोटों पर दया यह सारी भावनायें 'नमस्ते' शब्द में मौजूद हैं। परन्तु इन समस्त भावनाओं की मन्शा एक ही है―प्रत्येक का आदर, प्रत्येक का सत्कार जैसे श्रद्धा, स्नेह, प्रणय, आदि शब्द प्रेम के ही दूसरे रुप हैं, इसी प्रकार आदर, आशीर्वाद प्रेम आदि भी नमस्ते के दूसरे रुप हैं।
दूसरा व्यक्ति―मित्र, आपने यह शंका निवारण कर दी, इसके लिए धन्यवाद।
ओ३म् स्वस्ति पन्थामनुचरेम सूर्याचन्द्रमसाविव। पुनर्ददताध्नता जानता सं गमेमहि। ( ऋग्वेद ५|५१|१५ )
अर्थ :- हम सूर्य और चन्द्रमा की भांति कल्याण-युक्त मार्ग पर चलते रहें दानी, अहिंसा कारी, ज्ञानी जनों तथा परमात्मा से हम मेल कर सदा सुख प्राप्त करे।

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