ओ३म् एकयास्तुवत प्रजाऽ अधीयन्त प्रजापतिरधिपतिरासीत्। तिसृभिरस्तुवत ब्रह्मासृज्यत ब्रह्मणस्पतिरधिपतिरासीत्। पञ्चभिरस्तुवत भूतान्यसृज्यन्त भूतानां पतिरधिपतिरासीत्। सप्तभिरस्तुवत सप्तऽ ऋषयोऽसृज्यन्त धाताधिपतिरासीत्॥ यजुर्वेद १४-२८॥
अर्थ :- इस ब्रह्मांड के निर्माता ईश्वर है। वो ही तो है जिन्होंने हमारी आत्मा को मनुष्य शरीर दिया है। उनकी स्तुति एक वाणी से करे। उन्होंने हमारे जीवन को चलाने और मुक्ति प्राप्त करने के लिए सर्वश्रेष्ठ ज्ञान, वेद दिये। उस ईश्वर ने पांच महाभूत- पृथ्वी, जल, तेज, वायु आकाश बनाऐ। जिससे समस्त प्रकृति का निर्माण हुआ। मानव शरीर भी प्रकृति का एक अंश है। हमें उसकी स्तुति पांच (शरीर, मन, बुद्धि ,स्मृति, चेतना) से करनी चाहिए। ईश्वर ने सप्त ऋषय - दो कान, दो नासिका, दो आंख और एक मुख बनाए। इन सप्त ऋषय से भूतों का मनुष्य ज्ञान प्राप्त करे और उनमें उस रचीयता के महत्व के दर्शन करे। वह सब को धारण करने वाला है। वह सब का स्वामी है ।हमें उसकी स्तुति करनी चाहिये।
यह मंत्र अत्यंत गूढ़ है। इसमें सृष्टि के विकास को संख्या (1, 3, 5, 7) के माध्यम से क्रमिक रूप में व्यक्त किया गया है। यदि इसे वैज्ञानिक दृष्टि से पढ़ें, तो यह जटिलता (Complexity), संगठन (Organization), सूचना (Information) और संरचना (Structure) के क्रमिक विकास का संकेत देता है। ध्यान रहे कि यह एक दार्शनिक-वैज्ञानिक व्याख्या है, आधुनिक विज्ञान का प्रत्यक्ष कथन नहीं।
मंत्र:
ॐ एकयास्तुवत प्रजा अधीयन्त प्रजापतिरधिपतिरासीत्।
तिसृभिरस्तुवत ब्रह्मासृज्यत ब्रह्मणस्पतिरधिपतिरासीत्।
पञ्चभिरस्तुवत भूतान्यसृज्यन्त भूतानां पतिरधिपतिरासीत्।
सप्तभिरस्तुवत सप्त ऋषयोऽसृज्यन्त धाताधिपतिरासीत्॥
शब्द-दर-शब्द व्याख्या
१. ॐ
संपूर्ण ब्रह्माण्ड की मूल ध्वनि, मूल कंपन (Primordial Vibration) का प्रतीक।
वैज्ञानिक दृष्टि: ब्रह्माण्ड में प्रत्येक वस्तु किसी न किसी आवृत्ति (Frequency) पर कंपन करती है। "ॐ" को समस्त ऊर्जा और सूचना के आदिस्रोत का प्रतीक माना जा सकता है।
२. एकया
एक + या = एक के द्वारा।
वैज्ञानिक संकेत: सृष्टि की शुरुआत एक मूल अवस्था (Singularity) या एकीकृत क्षेत्र (Unified State) से।
३. अस्तुवत
स्तुति की, सक्रिय किया, अभिव्यक्त किया।
वैज्ञानिक अर्थ: किसी संभावित अवस्था (Potential State) का सक्रिय होकर प्रकट होना।
४. प्रजाः
उत्पन्न होने वाले सभी जीव, पदार्थ, ऊर्जा और संरचनाएँ।
वैज्ञानिक अर्थ: सभी प्रकार की प्रणालियाँ (Systems), कण, तारे, आकाशगंगाएँ और जीवन।
५. अधीयन्त
स्थापित हुए, व्यवस्थित हुए, ज्ञानपूर्वक संगठित हुए।
वैज्ञानिक अर्थ: Self-Organization — पदार्थ का नियमबद्ध होकर संरचना बनाना।
६. प्रजापतिः
सृष्टि का नियामक सिद्धांत।
वैज्ञानिक दृष्टि: वे प्राकृतिक नियम (Laws of Nature) जो ब्रह्माण्ड को संचालित करते हैं।
७. अधिपतिः आसीत्
प्रधान नियामक था।
वैज्ञानिक अर्थ: मूलभूत प्राकृतिक नियम ही समस्त व्यवस्था को नियंत्रित करते हैं।
दूसरी पंक्ति
तिसृभिः
तीन के द्वारा।
वैज्ञानिक संकेत: तीन मूल आयाम (लंबाई, चौड़ाई, ऊँचाई), या किसी प्रणाली के तीन आधारभूत घटक, या त्रिगुण जैसी त्रिस्तरीय व्यवस्था।
ब्रह्म
विस्तार, ज्ञान, सार्वभौमिक व्यवस्था।
वैज्ञानिक अर्थ: कॉस्मिक सूचना (Cosmic Information), ब्रह्माण्डीय व्यवस्था।
असृज्यत
उत्पन्न हुआ।
ब्रह्मणस्पतिः
ज्ञान और वाणी का अधिपति।
वैज्ञानिक अर्थ: सूचना का संगठन, नियमों का गणितीय स्वरूप, सूचना का संरक्षण।
तीसरी पंक्ति
पञ्चभिः
पाँच के द्वारा।
वैज्ञानिक संकेत: वेदों के पाँच महाभूत (पृथ्वी, जल, अग्नि, वायु, आकाश) पदार्थ के पाँच गुणात्मक वर्ग हैं, जिन्हें आधुनिक विज्ञान में पदार्थ की विभिन्न अवस्थाओं या ऊर्जा-क्षेत्रों के प्रतीक रूप में समझा जा सकता है।
भूतानि
समस्त भौतिक तत्व।
वैज्ञानिक अर्थ: Matter, Energy और उनसे बनी संरचनाएँ।
भूतानाम् पतिः
पदार्थ को नियंत्रित करने वाले नियम।
वैज्ञानिक दृष्टि: प्राकृतिक बल (Fundamental Interactions) और भौतिक नियम।
चौथी पंक्ति
सप्तभिः
सात के द्वारा।
वैज्ञानिक संकेत: सात एक पूर्णता का प्रतीक है। प्रकृति में अनेक सात-आधारित संरचनाएँ मिलती हैं, जैसे दृश्य प्रकाश के सात प्रमुख रंग, संगीत के सात स्वर आदि। वैदिक परंपरा में यह पूर्ण विकास का प्रतीक है।
सप्त ऋषयः
सात ऋषि।
वैज्ञानिक व्याख्या: इन्हें केवल ऐतिहासिक व्यक्तियों के रूप में नहीं, बल्कि सृष्टि के सात मौलिक ज्ञान-सिद्धांत या सात संगठनात्मक शक्तियों के प्रतीक के रूप में भी देखा जा सकता है।
असृज्यन्त
उत्पन्न हुए।
धाता
धारण करने वाला।
वैज्ञानिक अर्थ: वे नियम जो ब्रह्माण्ड की संरचना को स्थिर रखते हैं।
अधिपतिः
सर्वोच्च नियामक।
समग्र वैज्ञानिक व्याख्या
यह मंत्र सृष्टि के क्रमिक विकास का संकेत देता है—
- एक (१) → मूल एकीकृत अवस्था, जहाँ सब कुछ संभाव्यता में निहित है।
- तीन (३) → व्यवस्था, आयाम या मूल संरचनात्मक सिद्धांतों का प्रकट होना।
- पाँच (५) → पदार्थ और ऊर्जा की विविध अभिव्यक्तियों का विकास।
- सात (७) → ज्ञान, संगठन, नियम और जटिल संरचनाओं की पूर्णता।
आधुनिक जटिलता विज्ञान (Complexity Science) और स्व-संगठन (Self-Organization) के संदर्भ में भी यह विचार मिलता है कि सरल प्रारंभिक अवस्थाओं से क्रमशः अधिक जटिल संरचनाएँ विकसित होती हैं। इस दृष्टि से मंत्र सृष्टि के क्रमिक संगठन का दार्शनिक चित्र प्रस्तुत करता है।
यह ध्यान रखना आवश्यक है कि मंत्र आधुनिक वैज्ञानिक सिद्धांतों (जैसे बिग बैंग या क्वांटम सिद्धांत) का प्रत्यक्ष वर्णन नहीं करता, बल्कि प्रतीकात्मक भाषा में सृष्टि, व्यवस्था और ज्ञान के उद्भव का दार्शनिक निरूपण करता है। यही कारण है कि इसकी वैज्ञानिक व्याख्या रूपकात्मक (interpretive) मानी जाएगी, न कि आधुनिक प्रयोगात्मक विज्ञान का प्रत्यक्ष प्रतिपादन।
भर्तृहरि वैराग्य शतक में विद्या की प्रशंसा करते हुए कहा गया है -
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येषां न विद्या न तपो न दानं न शील न गुणों न धर्म:। ते मृत्यु लोके भूवि भारभूत मनुष्यरूपेण मृगाश्चरन्ति ।।
जिस मनुष्य ने न विद्या प्राप्त की है , न ही धर्म अथवा ज्ञान प्राप्ती के लिये तप किया है , न कष्ट सहन किया है , न कभी दान किया है , न उसने शील और दुसरे गुणों को धारण किया है , ऐसा मनुष्य इस पृथ्वी पर भार ही है।वह मनुष्य पशु रूप में पशु के समान ही विचरण कर रहा है।
सभी ऋषि , मुनियों और वेद का भी यही मानना है कि बिना ज्ञान के मुक्ति संभव नही है।इसलिए वेदों में ज्ञान प्राप्ती मनुष्य मात्र के लिये आवश्यक बताई गई है।इस विषय में यजुर्वेद का कहना है।
यथेमां वाचं कल्याणी भावदानी जनैभ्य:।
ब्रह्म राजन्याभ्यां शूद्रयचार्यायच स्वाय चारणाय च.।।
हें मनुष्यों जैसे मैं ईशवर ब्राह्मण और क्षत्रियों को , वैश्य को , शूद्रों को , स्त्रियों को सेवको आदि को , सबका कल्याण करने वाली वेद वाणी का उपदेश करता हूँ। वैसे आप भी करे।मंत्र में स्पष्ट रूप से ज्ञानार्जन प्रत्येक व्यक्ति के लिये सुलभ करने को कहां गया है।
फिर अथर्ववेद के काण्ड- ४ 'सुक्त २१' के सातो मंत्रों में विद्या की ही प्रशंसा की गयी है।अथर्ववेद का यह भी मानना है कि विद्या( वेदों ) का प्रादुर्भाव परब्रह्म परमेश्वर के द्वारा सृष्टि के प्रारम्भ से ही हुआ है। उसने अपने ज्ञान (वेद ) में से मनुष्य के लियें आवश्यक वेदों के ज्ञान का दान सृष्टि के प्रारम्भ में ही कर दिया है। विद्या ( वेदों ) का ज्ञान कल्याण करने वाला होता है और वह सृष्टि के प्रारम्भ में ही परमात्मा के द्वारा दिया जाता है।
सर्वेषामेव दानानां ब्रह्मदानं विशिष्यते।
वार्यन्नगो-महीवासस्तिलकाञ्चनसर्पिषाम्। (मनुस्मृति )
संसार में जितने दान है अर्थात् जल, अन्न, गौ पृथ्वी , वस्त्र , तिल, सुवर्ण, धृत आदि इन सब दानों से वेद विद्या का दान अति श्रेष्ठ है।
कोई कितना ही ज्ञानी और विद्यावान हो , यदि वह अपने आचरण में विद्या और ज्ञान का उपयोग नही करता तो वह मूर्ख ही नही महामूर्ख हैं। वह उस जानवर की तरह है जिस पर बहुत सी किताबें लदी होती है पर वह उन पुस्तकों के ज्ञान से लाभ नही उठा पाता। जैसे तपेली और कलछी को स्वादिष्ट व्यंजन के स्वाद का आनन्द नही मिलता।
मनुष्य के शरीर और मन में शक्तियों का अकूत भंडार भरा पडा है। उनको नष्ट होने से बचाया जा सके और उस बचत का सदुपयोग किया जा सके तो अभीष्ट दिशा में आशाजनक सफलताएं प्राप्त की जा सकती हैं। इस तथ्य को न समझकर हम अपनी बहुमूल्य शक्तियों का निरर्थक अपव्यय करते रहते हैं और ईश्वर प्रदत्त शक्ति भंडार को खोकर खोखला, रूग्ण, अशक्त और असफल जीवन जीते हुए मौत के दिन गिना करते हैं।
शरीर और मन अपने अपने आहरों द्वारा शक्तियों का निरंतर उत्पादन करते रहते हैं और हमारा सामर्थ्य भंडार निरंतर बढता रहता है। इस उत्पादन को यदि अपव्यय से बचाकर रचनात्मक दिशा में प्रयुक्त किया जा सके तो निःसंदेह किसी भी क्षेत्र में आशाजनक प्रगति की जा सकती है। संयम का अर्थ है शक्तियों के अपव्यय को रोकना। यह अपव्यय अधिकतर हमारी इंद्रियों द्वारा ही होता है। इनमें सबसे प्रमुख हैं जीभ और जनेंद्रियां।
जीभ के द्वारा हम निरर्थक बकवास, निंदा, चुगली, शेखी तथा गप्पें हांकने में अपनी शक्तियों का नाश करते हैं। यदि जीभ को असत्य व कटु न बोलने के संयम से बांध दिया जाए तो हमारी वाणी आश्चर्यजनक रूप से प्रभावशाली हो सकती है। उसे आशीर्वाद व वरदान देने की भी क्षमता प्राप्त हो जाएगी। मौन को तप माना गया है। तपस्वियों जैसा मौन रहना तो हर एक के लिए संभव नहीं है पर अनर्गल बकवास पर तो नियंत्रण रखा ही जा सकता है। उतना ही नपा तुला बोलें जो अपने तथा दूसरों के लिए आवश्यक एवं हितकारी हो।
जीभ का दूसरा असंयम है चटोरापन। विकृत जायके के लिए हम अवांछनीय, अभक्ष्य पदार्थ खाते रहते हैं। स्वाद की उत्तेजना में हम खा तो अधिक जाते हैं पर वह पचता नहीं। अपच से शरीर में जो सड़न पैदा होती है वह पाचन तंत्र को कमजोर करती है और दुर्बलता को जन्म देती है। यही अंततः शरीर के विभिन्न अंगो में पहुंचकर विभिन्न रोगों को उत्पन्न करती है। 'स्वाद से स्वास्थ्य आवश्यक है' यह तथ्य हम भूल जाते हैं और उसका दुष्परिणाम भुगतते हैं।
जननेन्द्रिय का संयम तो सबसे महत्वपूर्ण है। इसका असंयम शरीर के सार तत्व को नष्ट कर देता है। इस सार तत्व से ही शरीर में ओजस, चेहरे पर चमक, वाणी में प्रभाव, आंखों में ज्योति, मस्तिष्क में मेधा और स्वभाव में साहस का प्रवाह होता है। इस सार तत्व का जितना भी अपव्यय होता है, मनुष्य शारीरिक व मानसिक दृष्टि से उतना ही दुर्बल होता जाता है। कामुक व्यक्ति न निरोग रह सकता है और न दीर्घ जीवन का आनंद उठा सकता है।
संयम अर्थात शक्तियों का संचय। असंयम अर्थात सामर्थ्य की बरबादी। यह मोटा तथ्य है कि बरबादी से मनुष्य दिवालिया हो जाता है और जो थोडा थोडा बचाता रहता है वह बूंद बूंद से ही अपना घडा भर लेता है।
ओ३म् शं नो अग्निर्ज्योतिरनीको अस्तु शं नो मित्रावरूणावश्विना शम्। शं न सुकृतां सुकृतानि सन्तु शं न इषिरो अभि वातु वात:।। (ऋग्वेद ७|३५|४)
अर्थ:- ज्योतियों की ज्योति ज्ञास्वरूप परमेश्वर हमारे लिए शान्तिदायक हो, दिन और रात हमें शान्ति कारक हो, सूर्य और चन्द्रमा हमें शान्ति देने वाले हो, धर्मात्माओं के सुकर्म हमें शान्ति कारक हो, गतिशील पवन हमारे लिए सब ओर से शान्ति देने वाली हो।

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