ऋषयो दीर्घसन्ध्यत्वाद्दीर्घमायुरवाप्नुयुः।

 

अर्थात् ऋषियों ने दीर्घकाल तक संन्ध्या अर्थात् ईश्वर-भक्ति करने से ही दीर्घ आयु को प्राप्त किया है।

   व्यक्ति की प्रतिष्ठा का आकलन उसके जीवन- मूल्यों से किया जाता है। जीवन-मूल्य सफलता के लिए जरूरी हैं। हममें से बहुत से लोग उन्ही जीवन मूल्यों का पालन करते हैं जो हमें हमारे पूर्वजों से मिलते हैं या फिर हम श्रेष्ठ जनों का अनुसरण कर अपने जीवन मूल्य का स्वयं निर्धारण करते हैं। जहां तक संभव होता है हम उन आदर्शो की ओर चलने की कोशिश भी करते हैं। लेकिन कभी ऐसे अवसर भी आते हैं जब हम मात्र दूसरों को खुश करने के लिये या फिर किसी अन्य स्वार्थवश अपने मूल्यों को बदल देते हैं। यदि हम सिर्फ आदर्शो की बातें करें किन्तु उन्हें अपने आचरण में न लागू करें तो हम मूल्यहीन ही कहे जाएंगे। जीवन मूल्य हमारे दिन प्रतिदिन के व्यवहार में झलकने चाहिए हमारी वाणी में दिखनी चाहिए। हमारे आचरण से प्रदर्शित होने चाहिए। याद रखें, जो व्यक्ति मूल्यहीन जीवन जीते हैं वे समाज के लिए बोझ माने जाते हैं। निठल्ले व्यक्ति समाज का कभी भी मार्ग-दर्शन नहीं करते।

   मनुष्य मस्तिष्क, हृदय और भावना से युक्त प्राणी है। वेद, उपनिषद भी हमे यही संदेश देते हैं कि व्यक्ति सत्य के प्रति आग्रही, सत्यनिष्ठ और जीवन मूल्यों को मानने वाला होना चाहिए सदाचार से जीवन उत्तम बनता है और उससे सामाजिक जीवन आनंदित होता है। हम जिन मानव मूल्यों का पालन करते हैं वो हमारी बुद्धि एवं सोच को भी प्रभावित करते हैं।  मान लीजिए हमें यह निर्णय करना हो कि संयम और व्यभिचार में क्या ठीक है?अगर हम सचमुच सशक्त जीवन मूल्यों का पालन करने वाले हैं तो हमारी आत्मा की आवाज बता देगी कि संयम प्रशंसनीय है और उत्तम है और व्यभिचार घिनौना कर्म है।

   व्यक्ति के मन में संसार की वस्तुओं को देखकर, काम क्रोध लोभ ईर्ष्या द्वेष अभिमान आदि दोषों का कचरा तो रोज़ बिना बुलाए आता ही है। जो जीवन मूल्यों को स्थापित रखने में निरन्तर बाधा पैदा करता है। यदि हम अपने मन की शुद्धि नहीं करेंगे, तो यह कचरा एक दिन इतना बढ़ जाएगा, कि आपका जीना भी कठिन हो जाएगा। 

आइए अपने अंदर उत्तम गुणों की, उत्तम संस्कारों की स्थापना करें। जैसे कि वेदों को पढ़ना, ऋषियों के ग्रंथ पढ़ना, बच्चों को अच्छे संस्कार देना, उत्तम गुणों को, अच्छे संस्कारों को यदि आप धारण करेंगे, तो आपके मन की शुद्धि होती रहेगी, और आप शांति पूर्वक अपना जीवन जी सकेंगे।

  हम समाज और राष्ट्र के लिए उपयोगी बनें, यही हमारी सार्थकता है। याद रखे जब हम सुधरेंगे तभी जग भी सुधरेगा।इसलिए वेद के अनुयायियों व अन्य सभी को सत्य के ग्रहण करने और असत्य के छोड़ने में सर्वदा उद्यत रहना चाहिये। 

 ओ३म् पूर्णा दर्वि परापत सुपूर्णा पुनरापत । वस्नेव विक्रीणावहाऽइषमूर्जं शतक्रतो।( यजुर्वेद ३|१९ )

अर्थ  :- हे जगदीश  ! जो सुगन्धित द्रव्यों से पूर्ण आहुति आकाश में जाकर वृष्टि से पूर्ण हुई, फिर अच्छे प्रकार से पृथ्वी में उत्तम जल रस को प्राप्त कराती है, उससे हे असंख्यात कर्म व प्रजा वाले प्रभु ! हम दोनों ( याज्ञिक और यज्ञमान) उत्तम अन्नादि पदार्थ और पराक्रमयुक्त वस्तुओं को प्राप्त करें ।

     प्रभु चिन्तन को मनुष्य को अपनी दिनचर्या का एक मुख्य अंग बना लेना चाहिए। प्रभु-भक्ति आत्मिक भोजन तो है ही, किन्तु इससे शरीर भी स्वस्थ, बलवान और निरोग बनता है।

  उस सर्वशक्तिमान् का एकाग्रचित्त होकर चिंतन करने से साधक को शारीरिक,मानसिक तथा आत्मिक शक्ति प्राप्त होगी,इसमें कुछ भी संदेह नहीं।ईश्वर-भक्ति के द्वारा जो मनुष्य को एक अलौकिक आनन्द और अद्भुत शक्ति प्राप्त होती है,उसका शरीर के ऊपर भी बहुत गहरा प्रभाव पड़ता है। शरीर की सब धातुओं-उपधातुओं की विषमता दूर होकर उसमें समता व शक्ति का संचार होता है।संत-महात्मा तथा योगीजनों के स्वस्थ,बलवान् और दीर्घजीवी होने का

ईश्वर-भक्ति ही एक मुख्य कारण है।

   महाभारत में लिखा है-'ऋषयो दीर्घसन्ध्यत्वाद्दीर्घमायुरवाप्नुयुः।

   अर्थात् ऋषियों ने दीर्घकाल तक संन्ध्या अर्थात् ईश्वर-भक्ति करने से ही दीर्घ आयु को प्राप्त किया है।

संत कबीर ने भी 'मैं तो प्रभु को रिझाऊँ' अपने इस दोहे में कहा है।

औषध खाऊँ न बूटी खाऊँ,न ही कोई वैद्य बुलाऊँ।एक ही वैद्य मिलो अविनाशी,वाही को नबज दिखाऊँ।।

   ईश्वर-भक्ति जहाँ शारीरिक उन्नति के लिए आवश्यक है,वहाँ आत्म-कल्याण के लिए भी परम आवश्यक है।जिस प्रकार भोजन के बिना शरीर का काम नहीं चल सकता,इसी प्रकार बिना ईश्वर-भक्ति के आत्मा का काम भी नहीं चलता।सच पूछा जाय तो शरीर के लिए भोजन इतना आवश्यक नहीं,जितना आत्मा के लिए ईश्वर-भक्ति।इसीलिए ईश्वर-भक्ति को आत्मिक खुराक कहा गया है।ईश्वर-भक्ति से ही अज्ञान-तिमिर का नाश होकर आत्मा में ज्ञान का प्रकाश होता है।ईश्वर-भक्ति के बल से ही मनुष्य संसार में अपनी सब शुभकामनाएँ पूर्ण कर सकता है।प्रभु-भक्ति से

रोग,शोक,संताप,दरिद्रता,चिन्ता,निर्बलता आदि जितने भी क्लेश हैं,वे सब दूर हो जाते हैं।

  प्रभु-भक्तिहीन होकर मनुष्य न तो सच्ची शान्ति और न आनन्द का अनुभव कर सकता है,और न ही प्रभु के इस परम सुन्दर और सुखमय संसार का सच्चा रसास्वादन कर पाता है।अतः आत्मकल्याण के लिए प्रतिदिन प्रभु का चिंतन अवश्य करना चाहिए।

_यदि हम प्रातः एक घंटे तक एकाग्रचित्त होकर प्रभु की उपासना करें,एकमात्र प्रभु को छोड़कर दूसरा कोई भी विचार मन में न आने दें,तो सब प्रकार की शारीरिक तथा मानसिक पीड़ाएँ केवल प्रभु-भक्ति से ही दूर हो जाएँगी।_

ओ३म् यस्मिन्नृच: साम यजु षि यस्मिन प्रतिष्ठिता रथनाभाविवारा:।यस्मिंश्चित सर्वमोतं प्रजानां तन्मे मन: शिवसंलपमस्तु ( यजुर्वेद ३४|५ )

 अर्थ :- हे परमदेव परमात्मन्  ! आप की कृपा से जिस मेरे मन में जैसे रथ के मध्य धुरे में अरे लगे होते है,  वैसे ऋग्वेद,  यजुर्वेद,  सामवेद और इनके अन्तर्गत होने से अथर्ववेद भी प्रतिष्ठित होते हैं जिसमें सर्वज्ञ,  सर्वव्यापक,  प्रजा का साक्षी चेतन परमात्मा विदित होता है,  वह मेरा मन अविद्या का त्याग कर सदा विद्या प्रिय बना रहे ।


🔥अमूल्य―उपदेश!!!
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  (१) आश्चर्य की बात―आश्चर्य है उस मानव पर जिसे मृत्यु का निश्चय है और फिर भी पापासक्त है। आश्चर्य है उस इन्सान पर जो संसार को नाशवान जानता है फिर भी उसमें फंसा है, आश्चर्य है उस मनुष्य पर जो ईश्वर विश्वासी हो और फिर भी चिन्तातुर रहे। आश्चर्य है उस बुद्धिमान पर जो दुर्गति से बचना चाहता है और फिर भी दुष्कर्म करता है। आश्चर्य है उस व्यक्ति पर जो ईश्वर भक्त होकर भी उसके स्थान पर दूसरी वस्तु का पूजन करे, आश्चर्य है ऐसे योगी पर जो मुक्ति का इच्छुक है और विषयों में लीन है।

   (२) पाप― जो मनुष्य पाप करते समय किवाड़ों को बन्द कर लेता है, लोगों से छिप जाता है और एकान्त में उसकी आज्ञा को भंग करता है तो प्रभु कहता है, ओ मूर्ख, तूने अपनी ओर देखने वालों में मुझे ही सबसे कम समझा है कि सबसे परदा करना आवश्यक समझता है और मुझ से लोगों के बराबर भी लज्जा नहीं करता।

   (३) अनिष्ट वस्तुएं― विद्वानों में कुकर्म, हाकिमों में लोभ, धनवानों में कृपणता, स्त्रियों में निर्लज्जता, वृद्धों में व्यभिचार। पांचों पर प्रभु की मार।

  (४) क्रोध और अभिमान― जब तक तेरे अन्दर क्रोध और अभिमान है तब तक अपने को ज्ञानियों में मत समझ―क्योंकि तू मूर्ख ही है।

  (५) प्रभु से दूर― तुम ऐसी वस्तुएं एकत्रित करने में प्रयत्नशील हो जिन्हें तुम खा न सकोगे। ऐसी वस्तुओं की इच्छा करते हो जिन्हें तुम पा न सकोगे। ऐसे मकान बनाते हो जिनमें तुम बस न सकोगे। ये सब वस्तुएं तुम्हें उस दाता से दूर ले जाने वाली हैं।

(६) ईश्वर से डरो― जो ईश्वर से डरता है, उसे किसी से डरने की आवश्यकता नहीं।

   (७) भाग्यशाली― भाग्यशाली वह है जो नेकी करे और डरे। भाग्यहीन वह है जो बदी करे और सर्वप्रिय होने की आशा करे।

   (८) दिल दुखाना―नास्तिकता के पश्चात् सबसे बड़ा पाप किसी का दिल दुखाना है।

  (९) सुकर्म― सुकर्मियों को ईश्वरीय ज्ञान की प्राप्ति होती है और कुकर्मी उससे वंचित रहते हैं।

  (१०) मन की मलीनता― तीन वस्तुएं मन की मलीनता को प्रकट करती हैं―(१) ईर्ष्या करना, (२) दिखावा करना, (३) अपने को बड़ा तथा दूसरे को छोटा समझना।

  (११) वास्तविक ज्ञान― वास्तविक ज्ञान वह है जो पाप से बचाये, निजी न्यूनता को बताये, ईश्वर-भक्ति में लगाये, विषयों से हटाये तथा धर्म कार्यों में जुटाये।

  (१२) स्त्री से व्यवहार― स्त्री के साथ सद्व्यवहार कर। स्वयं कष्ट सह परन्तु उसे कष्ट न दे।

   (१३) दुश्चिन्तन― किसी के प्रति बुरा विचार भी मन में मत लाओ। स्मरण रखो का उसका प्रतिबिम्ब उसके दिल पर भी अवश्य पड़ता है।

  (१४) अधोगति― (१) परलोक पर विश्वास न होना (२) एकान्त में दुश्चिन्तन करना (३) मृत्यु को भूल जाना (४) प्रभु की प्रसन्नता से संसार की प्रसन्नता को उत्तम समझना (५) विषयों में आसक्त रहना (६) आस्तिक जनों की वाणी पर विश्वास न करना। ये छ: बातें अधोगति की ओर ले जाने वाली होती हैं।

  ( १५) सच्चा ज्ञानी― जो धनवानों को शिक्षा लेने की दृष्टि से देखता है, ईर्ष्या से नहीं। स्त्रियों को मातृदृष्टि से देखता है काम वासना से नहीं। सन्तों को सेवा की दृष्टि से देखता है अभिमान भरी दृष्टि से नहीं, वह ही वास्तविक ज्ञानी है।

  (१६) विनम्रता― यदि बड़ा बनना चाहते हो तो प्रथम छोटे बनने का प्रयत्न करो।

यथा यथा हि पुरुषः कल्याणे कुरुते मनः ।
तथा तथास्य सर्वार्थाः सिध्यन्ते नात्र संशयः ।।-(३/४१)

  भावार्थ:- जैसे-जैसे मनुष्य शुभ कार्यों में मन लगाता है,वैसे-वैसे उसकी सभी इच्छाएँ पूर्ण हो जाती हैं,इसमें कोई सन्देह नहीं है।

इज्याध्ययनदानादि तपः सत्यं क्षमा घृणा ।
अलोभ इति मार्गोऽयं धर्मस्याष्टविधः स्मृतः ।।-(३/५५)
तत्र पूर्वचतुर्वर्गो दम्भार्थमपि सेव्यते ।
उत्तरश्च चतुर्वर्गो नामहात्मसु तिष्ठति ।।-(३/५६)

भावार्थ:-यज्ञ,अध्ययन,दान,तप,सत्यभाषण,क्षमा,दया और लोभ-त्याग-यह धर्म का आठ प्रकार का मार्ग कहा गया है।

इनमें से प्रथम चार (यज्ञ,अध्ययन,दान और तप) को दुर्जन लोग दम्भ=दिखावे के लिए भी सेवन कर सकते हैं,परन्तु अगले चार गुण (सत्य,क्षमा,दया और लोभ-त्याग) ये दुर्जनों में कभी नहीं रह सकते।

 न सा सभा यत्र न सन्ति वृद्धा
वृद्धा न ते ये न वदन्ति धर्मम् ।
नासौ धर्मो यत्र न सत्यमस्ति
न तत्सत्यं यच्छलेनाभ्युपेतम् ।।-(३/५७)

   भावार्थ:- वह सभा ही नहीं है जिसमें वृद्ध न हों,वे वृद्ध ही नहीं हैं जो धर्म का कथन नहीं करते,वह धर्म नहीं है 
जिसमें सत्य न हो और वह सत्य नहीं है जो छल से युक्त हो।

सच्चा सुख और आनंद

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   पुराने समय में संत गाँव के लोगों को प्रवचन देते थे, भिक्षा मांगकर अपना जीवन यापन करते थे। एक दिन गाँव की महिला ने एक संत के लिए खाना बनाया। जब संत उस महिला के घर खाना खाने गए, तो उस महिला ने पूछा की महाराज हमें जीवन में सच्चा सुख और आनंद कैसे मिल सकता है? इस पर संत ने कहा की इसका जवाब हम आपको कल देंगे। 

     अगले दिन उस महिला ने संत के लिए खीर बनाई, क्योकि वह महिला उन संत से सुख और आनंद के बारे में प्रवचन सुनना चाहती थी। 

     उसके बाद संत आये और उन्होंने भिक्षा के लिए उस महिला को आवाज दी। महिला संत के लिए खीर लेकर बाहर आई। संत ने खीर लेने के लिए अपना कमंडल आगे किया। महिला खीर डालने ही वाली थी की उसकी नजर कमंडल के अन्दर पड़ी। तो उसने संत से कहा की महाराज आपका कमंडल तो गंदा है, इसमें कचरा पड़ा है। इस पर संत ने कहा- हां कमंडल गंदा है, लेकिन आप खीर इसमें ही डाल दो। महिला ने कहा- नहीं महाराज, ऐसे तो खीर ख़राब हो जाएगी।

    आप ऐसा कीजिये ये कमंडल मुझे दीजिये, मैं इसे धोकर साफ कर देती हूं। इस पर संत ने पूछा की मतलब जब तक कमंडल साफ नहीं होगा तो आप इसमें खीर नहीं देगी। उसके बाद महिला ने कहा- जी महाराज, मैं इसे साफ़ करने के बाद इसमें खीर दे दूंगी। तब संत ने कहा की ठीक इसी तरह जब तक हमारे मन में लोभ, क्रोध, मोह, और काम जैसे बुरे विचारो की गंदगी है, तो हम उसमें अच्छे उपदेश कैसे डाल सकते हैं? अगर ऐसे मन में उपदेश डालेंगे तो अपना असर नहीं दिखा पाएंगे। 

    इसलिए अच्छे उपदेश सुनने के लिए मन को शांत और पवित्र करना चाहिए। तभी हम ज्ञान की बातें सीख सकते है। शांत और पवित्र मन वाले ही सच्चे सुख और आनंद की प्राप्ति कर पाते हैं।

   शिक्षा:-

जब हम अपने मन को शांत और पवित्र बना लेंगे तब हमें जीवन का सच्चा सुख और आनंद की प्राप्ति होगी।

ओ३म्  माहिर्भूर्मा पृदाकुर्नमस्तऽआतानानर्वा प्रेहि।

घृतस्य कुल्याऽउपऽऋतस्य पथ्याऽअनु॥ यजुर्वेद ६-१२॥

हे विद्वान मनुष्य, तुम सर्प की तरह कुटिल मार्ग गामी ना बनो, ना ही बाघ की तरह हिंसक बनो और ना ही मूर्ख की तरह घमंडी बनो। तुम बिना हिंसा और घमंड के सीधे और सरल बनो। सत्य के मार्ग पर चलो तुम्हें सभी सुख साधन मिलते चले जाएंगे।

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