सूक्त ३
०३।००३।०१
अचिक्रदत् स्वपा इह भुवदग्ने व्य चस्व रोदसी उरूची।
युञ्जन्तु त्वा मुरुतों विश्ववेदस आमुं नय नमसा रातइंव्यम्।। १।।
✍क्षेमकरण दास त्रिवेदी 👉
भाषार्थः (अचिक्रदत्) उस [परमेश्वर] ने पुकारकर कहा है, “(इह) यहाँ पर (स्वपाः) अपनेजनों का पालनेवाला अथवा उत्तम कर्मोंवाला प्राणी (भुवत्) होवे।” (अग्ने) हे अग्नि [समान तेजस्वी राजन् !] (उरूची) बहुत पदार्थों को प्राप्त करानेवाले (रोदसी) सूर्य और पृथिवी में (वि) विविध प्रकार से (अचस्व) गति कर। (विश्ववेदसः) सब प्रकार के ज्ञान वा ध्यानवाले (मरुतः) शूर और विद्वान् पुरुष (त्वा) तुझसे (युञ्जन्तु) मिलें। [हे राजन्] (रातहव्यम्) भेंट वा भक्ति का दान करनेवाले (अमुम्) उस [प्रजागण] को (नमसा) अन्न वा सत्कार के साथ (आ, नय) अपने समीप आ ॥१॥
भावार्थः परमेश्वर ने यजुर्वेद में भी कहा है−
कु॒र्वन्ने॒वेह कर्माणि जिजीवि॒षेच्छ॒त समाः॑ ॥ यजु० ४०।२ ॥
मनुष्य (इह) यहाँ पर (कर्माणि कुर्वन् एव) कर्मों को करता हुआ ही (शतंसमाः) सौ वर्षो तक (जिजीविषेत्) जीना चाहे ॥
इस प्रकार राजा परमेश्वर की आज्ञापालन और स्वप्रजापालन में कुशल होकर सूर्यविद्या और पृथिवी आदि विद्या में निपुण बनकर विज्ञानी होवे, शूरवीर विद्वान् लोग उससे मिलें और राजा उन भक्त प्रजागणों का सत्कार करे ॥
✍विश्वनाथ विद्यालंकार👉
भाषार्थः (अग्नि) हे अग्रणी प्रधानमंत्री ! (अचिक्रदत्त) [इन्द्र] ने बार-बार तुझे पुकारा है, (स्वपा:) ताकि उत्तमकर्मी वह इन्द्र (इह) इस अपने राष्ट्र में (भुवत्) पुनः सूचित हो जाय, एतदर्थ (उरूची) व्यापनशील, (रोदसी) द्युलोक और पृथिवी में (व्यचस्व) विविध प्रकार की गतियाँ कर [इन्द्र के अन्वेषण के लिए]। (विश्ववेदसः) विश्व के नेता प्रज्ञाशील (मरुतः) मनुष्य (त्वा) तुझे (युञ्जन्तु) इस कार्य में नियुक्त करें, (रात-हव्यम) सव प्रजा को अदनीय-अन्न देनेवाले ! (अमुम्) उस इन्द्र को (नमसा) नमस्कार के साथ नमस्कारपूर्वक (आ नय) इस साम्राज्य में वापिस ले आ।
टिप्पणी: [प्रजाजनों ने किसी कारण निज इंद्र अर्थात् सम्राट् को साम्राज्य से पदच्युत कर दिया है। वह रुष्ट होकर कहीं चला गया है। प्रज्ञानी पुरुष, अग्रणी अर्थात् प्रधानमन्त्री को इन्द्र को वापिस लाने के लिए नियुक्त करते हैं। अचिक्रदत्=क्रदि आह्वाने (भ्वादिः), चङ् आगम, लुङ् लकार। उरूची=उर्वञ्चने व्यापनशीले (सायण) उरु=अच् (अञ्चु, अच्, अचि, गतौ भ्वादिः)।]
०३।००३।०२
दूरे चित् सन्तमरूषास इन्द्रमा च्यावयन्तु सख्याय विप्रम्। यद् गायत्रीं बृहतीमर्कमस्मै सौत्रामण्या दधृषन्त देवा: ॥२॥
✍क्षेमकरण दास त्रिवेदी 👉
भाषार्थः (अरुषासः=०−षाः) गतिशील [उद्यमी] पुरुष (दूरे) दुर्गम वा दूर देश में (चित्) भी (सन्तम्) विद्यमान (विप्रम्) बुद्धिमान् (इन्द्रम्) बड़े प्रतापी राजा को (सख्याय) अपना सखा बनाने केलिये (आ, च्यावयन्तु) ले आवें। (यत्) क्योंकि (देवाः) व्यवहारकुशल महात्माओं ने (गायत्रीम्) गान क्रिया, (बृहतीम्) स्तुति क्रिया और (अर्कम्) अन्न वा सत्कार क्रिया को (अस्मै) इस [इन्द्र] के लिये (सौत्रामण्या) सुत्रामा [उत्तमरक्षक] के योग्य भक्ति के साथ (दधृषन्त) एकत्र किया है ॥२॥
भावार्थः उद्योगी प्रजागण प्रजापालक नीतिकुशल राजा को दूर देश से भी अपनी सहायता के लिये बुलावें और अनेक प्रकार से उनका उत्साह और अपना आनन्द बढ़ाने के लिये उसका योग्य अभिनन्दन करें और गायत्री, बृहती आदि छन्दों से भी उसका यश गावें ॥२॥
✍विश्वनाथ विद्यालंकार👉
भाषार्थः (अरुषासः) न-रुष्ट प्रजाएं, (दुरे चित् सन्तम्) दूर में भी विद्यमान (विप्रम्) मेधावी (इन्द्रम्) सम्राट को, (सख्याय) पुनः मैत्री के लिए, (आ च्यावयन्तु) रोषभावना से पूर्णतया च्युत करें, विमुक्त करें। (यद्) यतः (देवा:) साम्राज्य के दिव्य अधिकारियों ने, (अस्मै) इस सम्राट के लिए, (सौत्रामण्या) सौत्रामणी क्रिया द्वारा, (बृहतीम्, गायत्रीम्) महती गायत्री रूप (अर्कम्) स्तुति साधना को, (दधृषन्त१) निर्धारित किया है; निश्चित किया है।
टिप्पणी: [सौत्रामण्या=सुत्रामा है इन्द्र अर्थात् सम्राट्, सौत्रामणी क्रिया है सम्राट् को प्रसन्न करने की क्रिया अर्थात विधि। वह है अर्चना का साधनभूत "महती गायत्री"। गायत्री का अभिप्राय है गुणगान, प्रकरणानुसार सम्राट् का गुणगान, उनकी प्रशंसा करना। इस विधि द्वारा सम्राट प्रसन्न होकर साम्राज्य में वापस आ जाता है। अर्कम्=अर्कः मन्त्रो भवति, यदनेनार्चन्ति (निरुक्त ५।१।४; पद संख्या २४)। प्रकरणानुसार मंत्र है गायत्री। गायत्री मन्त्र में सद्बुद्धि के लिए प्रार्थना है, सद्बुद्धि से प्रेरित हुआ सम्राट् प्रजा की प्रार्थना को स्वीकार कर लेता है। विप्रः मेधाविनाम (निघं० ३।१५)।]
[१. अघारयन् (सायण); अथवा धृ (यङलुक्)+सिप्+अट्। या धृष, धृषा[यङलुकि] प्रसहने प्रागल्भ्ये (चुरादिः, स्वादिः)।]
०३।००३।०३
अ्रद्भ्यस्त्वा राजा वरुणो ह्वयतु सोमस्त्वा ह्वयतु पर्वतेभ्यः। इन्द्रस्त्वा ह्वयतु विड्भ्य आभ्यः श्येनो भूत्वा विशु आ पतेमाः॥३ ॥
✍क्षेमकरण दास त्रिवेदी 👉
भाषार्थः [हे राजराजेश्वर !] (वरुणः) अति श्रेष्ठ (राजा) शासनकर्त्ता पुरुष (त्वा) तुझको (अद्भ्यः) प्राणों के लिये (ह्वयतु) बुलावे, (सोमः) औषधों का रस निकालनेवाला [वैद्यराज] (त्वा) तुझको (पर्वतेभ्यः) [शरीर की] पुष्टियों के लिये (ह्वयतु) बुलावे। (इन्द्रः) बड़ा प्रतापी सेनापति वा निधिपति (त्वा) तुझको (आभ्यः विड्भ्यः) इन प्रजाओं के लिये (ह्वयतु) बुलावे [हे महाराजाधिराज !] (श्यैनः) शीघ्र गतिवाला [वा वाज पक्षी के समान शीघ्र गतिवाला] (भूत्वा) होकर (इमाः) इन (विशः) प्रजाओं में (आ, वत) उड़कर आ ॥३॥
भावार्थः राजा वरुण, सोम, इन्द्रादि पदवीवाले बड़े-२ अधिकारी अपने अधिकार की उन्नति के लिये राजाज्ञा का पालन करें और प्रधान राजा अपनी प्रजा के हित का उद्योग सदा करता रहे ॥३॥
✍विश्वनाथ विद्यालंकार👉
भाषार्थः [हे सम्राट् !] (वरुणः राजा) वरुण राजा (त्वा) तुझे (अद्म्यः) सामुद्रिक जलों से (ह्वयतु) आह्वान करे, (सोमः) सोम (त्वा) तुझे (पर्वतेभ्यः) पर्वतों से (ह्वयतु) आह्वान करे। (इन्द्रः) सम्राट (त्वा) तुझे (आभ्यः विड्भ्यः) इन प्रजाओं से (ह्वयतु) आह्वान करे, (श्येनो१ भूत्वा) वाजपक्षी होकर तू (इमा: विशः) इन प्रजाओं में (पत आ) उड़कर आ जा।
टिप्पणी: [वरुण है राष्ट्राधिपति राजा, यथा "इन्द्रश्च सम्राड् वरुणश्च राजा" (यजु:० ८।३७)। वरुण राजा अधिपति है जलों का। वह सामुद्रिक जलों का अधिपति है, यथा "वरुणोऽपामधिपति:" (अथर्व० ५।४)। सोम है सेनाध्यक्षः, सेना-प्रेरक [षू प्रेरणे, तुदादिः), यह पर्वतीय युद्धों का भी अध्यक्ष है। इन्द्र है सम्राट्, जोकि सामयिक सम्राट है, जब तक कि पदच्युत सम्राट् बापस नहीं आ जाता। सोमः=सेनाध्यक्ष (यजु० १७।४९)।]
[१. वायुयान द्वारा। सम्भवतः उड़कर (श्येनः भूत्वा)। अश्वारोही तथा श्येनो भुत्वा दो विकल्प हैं 'आपत' में।]
०३।००३।०४
श्येनो हव्यं नयत्वा परस्मादन्यक्षेत्रे अपरुद्धं चरन्तम्।
अश्विना पन्थां कृणुतां सुगं त इमं संजाता अभि संविशध्वम् ॥४॥
✍क्षेमकरण दास त्रिवेदी 👉
भाषार्थः (श्येनः) शीघ्रगतिवाले आप (अन्यक्षेत्रे) परदेश में (अपरुद्धम्) रोक दिये गये (चरन्तम्) उत्तम आचरण करते हुए (हव्यम्) बुलाने योग्य पुरुष को (परस्मात्) दूर देश से (आ नयतु) समीप लावें। (अश्विना=०−नौ) सूर्य और चन्द्रमा (ते) तेरे (पन्थाम्=पन्थानम्) मार्ग को (सुगम्) सुगम (कृणुताम) करें। (सजाताः) हे सजातीय लोगो ! (इमम्) इस [वीर पुरुष] से (अभि−सं−विशध्वम्) चारों ओर से मिलो ॥४
भावार्थः यदि कोई सत्पुरुष प्रजागण परदेश में रोक दिया गया हो, राजा उसे प्रयत्नपूर्वक बुला लेवे। और सूर्य-चन्द्रमा के समान नियम से प्रजापालन करे जिससे सब प्रजागण उससे मिले रहें ॥४॥
✍विश्वनाथ विद्यालंकार👉
भाषार्थः [हे पदच्युत सम्राट् !] (श्येन:) बाजपक्षी के सदृश उड़नेवाला सामयिक सम्राट्, (हव्यम्) आह्वातव्य (त्वा) तुझे, (परस्मात्) परराष्ट्र से (आ नयतु) ले आए, जो तू कि (अन्यक्षेत्रे२) परराष्ट्र में (अपरुद्धम) स्वेच्छापूर्वक रुका हुआ है, और (चरन्तम्) स्वेच्छया परराष्ट्र में विचर रहा है। (अश्विना) अश्वों तथा अश्वरथों के अध्यक्ष अर्थात् अश्वारोही तथा अश्वरथारोही द्विविध अध्यक्ष (ते पन्थाम्) तेरे वापस आने के मार्ग को (सुगम्) सुगम (कुरुताम्) कर दें। (सजाताः) समान जातिवाले है प्रजाजनो ! (इमम् अभि) इस आनेवाले सम्राट् के अभिमुख (संविशध्वम्) तुम परस्पर मिलकर बैठो, [सामाजिक तथा साम्राज्य के कार्यों के लिए] "सजाता:" द्वारा यह दर्शाया है कि तुम और आगन्तुक सम्राट् एक ही जाति के हों, अतः भेदभाव त्याग दो। हव्यम्=ह्वातव्यम् (सायण)।]
टिप्पणी: [२. क्षेत्रसम्भवना कृषि के लिये, उसके जीवनार्थ परराष्ट्र में दिया गया खेत।]
०३।००३।०५
ह्वयन्तु त्वा प्रतिजना: प्रति मित्रा अवृषत।
इन्द्राग्नी विश्वे देवास्ते विशि क्षेममदीधरन्॥५॥
✍क्षेमकरण दास त्रिवेदी 👉
भाषार्थः (प्रतिजनाः) प्रतिकूलजन (त्वा) तुझे (ह्वयन्तु) बुलावें। (मित्राः) स्नेही पुरुषों ने (प्रति) प्रत्यक्ष (अवृषत) सेवा की है। (इन्द्राग्नी) वायु और अग्नि [के समायन गुणवाले] (ते) उन (विश्वे देवाः) सब तेजस्वी पुरुषों ने (विशि) प्रजा में (क्षेमम्) कुशल (अदीधरन्) स्थापित की है ॥५॥
भावार्थः जिस राजा को प्रजागण चुनते हैं, बैरी लोग उस राजा के आधीन रहते हैं। और विद्वान् शूरवीर पुरुष प्रजा में उन्नति करते हैं ॥५॥
✍विश्वनाथ विद्यालंकार👉
भाषार्थः [है सम्राट्] (प्रतिजना:) साम्राज्य के सब जन अर्थात् प्रत्येक जन (त्वा) तेरा (ह्वयन्तु) आह्वान करें, (प्रति) प्रतिकूल हुए (मित्रः) मित्र [राजाओं] ने तेरा (अवृषत) वरण कर लिया है, तुझे स्वीकृत कर लिया है। (इन्द्राग्नी) सामयिक सम्राट् और अग्रणी प्रधानमंत्री ने (विश्वदेवाः) तथा साम्राज्य के सब दिव्य व्यक्तियों ने (विशि) प्रजाजनों में (ते) तेरे लिए (क्षेमम्) सुरक्षा के निश्चय की (अदीधरन्) धारण कर ली है।
टिप्पणी: [पदपाठ में "प्रतिजनाः" समस्त पद है, और "प्रति, मित्रा;" असमस्त हैं। यह दर्शाने के लिए कि साम्राज्य का प्रति व्यक्ति तो तुझे चाहता ही है, परन्तु साम्राज्य के मित्र-राजा जो तेरा विरोध करते थे, परन्तु उन्होंने भी तेरा वरण कर लिया है, तथा साम्राज्य के सामयिक इन्द्र और अग्नि ने, तथा सब देवों ने तेरी सुरक्षा की धारणा अपनाली है। अवृषत=अट्+ वृञ् (वरणे, क्र्यादि:)। छान्दस लुङ्। ये मित्र राजा साम्राज्य के राष्ट्रों के अधिपति हैं, जिन्हें कि "वरुण" कहा है, यथा “इन्द्रश्च सम्राट वरुणश्च राजा” (यजु० ८।१७)।]
०३।००३।०६
यस्ते हवं विवदत सजातो यश्च निष्ट्यः।
अपाञ्चमिन्द्र तं कृत्वाथेममिहाव गमय ॥६॥
✍क्षेमकरण दास त्रिवेदी 👉
भाषार्थः (अथ) और (इन्द्र) हे महाप्रतापी राजन् ! (यः) जो (सजातः) सजातीय (च) और (यः) जो (निष्ट्यः) विजातीय पुरुष (ते) तेरे (हवम्) विज्ञापन में (विवदत्) विवाद करे, (तम्) उसको (अपाञ्चम्) बहिष्कृत [देश बाहिर] (कृत्वा) करके (इमम्) इस [विज्ञापन] को (इह) यहाँ पर (अव, गमय) जता दे ॥६॥
भावार्थः राजा अपने और पराये का विचार छोड़ पक्षपात रहित होकर शान्तिनाशक विवादी पुरुष को देश बाहिर कर दे और यह विज्ञापन राज्यभर में प्रसिद्ध कर दे, जिससे फिर कोई धर्मविरुद्ध चेष्टा न करे ॥६॥
✍विश्वनाथ विद्यालंकार👉
भाषार्थः (यः) जो कोई (सजातः) समान जाति का, (च) और (निष्ट्यः) पर जाति का अर्थात् विदेशी, (ते) तेरे (हवम्) आह्वान को (विवदत्) विवादग्रस्त करता है। (इन्द्र) हे सामयिक सम्राट् ! (तम्) उसे (अपाञ्चम्, कृत्वा) साम्राज्य से अपगत कर, निकालकर (अथ) तदनन्तर (इमम्) इस निश्चित सम्राट् को (इह) इस साम्राज्य में, (अब गमय) सम्राट् रूप में अवगत कर, विज्ञापित कर।
टिप्पणी: [सूक्त का वर्णन गाथारूप है। ऐसी परिस्थिति के उपस्थित हो जाने पर किस साधन का अवलंबन करना चाहिए, केवल इसका सुझाव ही सूक्त में दिया है। वेदों में गाथारूप में प्रायः वर्णन होता है— एतदर्थ देखो (अथर्व० १५।१५।११, १२) का अथर्ववेद-भाष्य। गाथारूप में वर्णन प्ररोचनार्थ होता है, रुचि बढ़ाने के लिए होता है। (अपाञ्चम् कृत्वा=अपगतं बहिष्कृतं कृत्वा (सायण)।]

0 टिप्पणियाँ
If you have any Misunderstanding Please let me know