आध्यात्मिक जागरण
जीवन के सात दिव्य स्तम्भ
यजुर्वेद के इस रहस्यमय मंत्र में छिपा सम्पूर्ण जीवन-विज्ञान
वैदिक मंत्र
ओ३म् सप्त तेऽअग्ने समिधः सप्त जिह्वाः सप्त ऋषयः सप्त धाम प्रियाणि।
सप्त होत्राः सप्तधा त्वा यजन्ति सप्त योनीरापृणस्व घृतेन स्वाहा॥
यजुर्वेद 17.79
मंत्र का सरल भावार्थ
हे अग्ने! तेरी सात समिधाएँ हैं, सात जिह्वाएँ हैं, सात ऋषि हैं, सात प्रिय धाम हैं। सात प्रकार के यजमान तुझे सात प्रकार से पूजते हैं। तू सातों आधारों को ज्ञान और पवित्रता रूपी घृत से पूर्ण कर।
सात संख्या का वैदिक रहस्य
वेदों में "सप्त" अर्थात सात संख्या का विशेष महत्व है।
सृष्टि के अनेक रहस्य सात संख्या से जुड़े हुए हैं—
- सात लोक
- सात समुद्र
- सात स्वर
- सात रंग
- सात ऋषि
- सात दिन
- सात धातुएँ
- सात चक्र
यह संख्या पूर्णता और संतुलन का प्रतीक मानी गई है।
इस मंत्र में भी सात बार "सप्त" शब्द का प्रयोग करके वेद हमें जीवन के बहुआयामी विकास का संदेश देता है।
अग्नि क्या है?
सामान्यतः अग्नि का अर्थ आग समझा जाता है।
किन्तु वैदिक दर्शन में अग्नि केवल भौतिक ज्वाला नहीं है।
अग्नि का अर्थ है—
- चेतना
- ज्ञान
- ऊर्जा
- प्रेरणा
- आत्मबल
- प्रगति की शक्ति
जिस दिन मनुष्य के भीतर की अग्नि बुझ जाती है, उसी दिन उसका विकास रुक जाता है।
सप्त समिधः — जीवन की सात ईंधन शक्तियाँ
यज्ञ में समिधा अग्नि को प्रज्वलित रखती है।
उसी प्रकार जीवन की अग्नि को प्रज्वलित रखने वाली सात समिधाएँ हैं—
- श्रद्धा
- सत्य
- परिश्रम
- संयम
- सेवा
- ज्ञान
- धैर्य
इनके बिना आत्मविकास की अग्नि धीरे-धीरे मंद पड़ जाती है।
सप्त जिह्वाः — ऊर्जा के सात रूप
अग्नि की जिह्वाएँ उसके कार्य करने की शक्तियाँ हैं।
मानव जीवन में ये सात जिह्वाएँ प्रतीक हैं—
- विचार
- वाणी
- दृष्टि
- श्रवण
- कर्म
- भावना
- संकल्प
यदि ये सातों शुद्ध हों तो जीवन यज्ञ सफल हो जाता है।
सप्त ऋषयः — ज्ञान के सात स्रोत
ऋषि का अर्थ है सत्य को देखने वाला।
आज के जीवन में सात ऋषि समझे जा सकते हैं—
- अनुभव
- अध्ययन
- चिंतन
- ध्यान
- प्रकृति
- गुरु
- आत्मनिरीक्षण
इन सात स्रोतों से प्राप्त ज्ञान मनुष्य को पूर्णता की ओर ले जाता है।
सप्त धाम प्रियाणि — जीवन के सात प्रिय क्षेत्र
मनुष्य का विकास केवल धन कमाने से नहीं होता।
जीवन के सात प्रमुख धाम हैं—
- शरीर
- मन
- बुद्धि
- परिवार
- समाज
- प्रकृति
- आत्मा
यदि इनमें संतुलन न हो तो जीवन अधूरा रह जाता है।
सप्त होत्राः — सात प्रकार के यज्ञ
वेद का यज्ञ केवल अग्निकुण्ड तक सीमित नहीं है।
वास्तविक यज्ञ हैं—
- ज्ञान यज्ञ
- सेवा यज्ञ
- दान यज्ञ
- तप यज्ञ
- स्वाध्याय यज्ञ
- ध्यान यज्ञ
- चरित्र निर्माण यज्ञ
जो व्यक्ति इन यज्ञों को जीवन में उतारता है, वही सच्चा यजमान है।
घृत का वास्तविक अर्थ
मंत्र कहता है—
"सप्त योनीरापृणस्व घृतेन"
घृत केवल गाय का घी नहीं है।
वैदिक भाषा में घृत का अर्थ है—
- प्रकाशमान ज्ञान
- निर्मल बुद्धि
- पवित्र विचार
जिस प्रकार घी अग्नि को प्रज्वलित करता है, उसी प्रकार ज्ञान जीवन की चेतना को प्रकाशित करता है।
आधुनिक विज्ञान और यह मंत्र
आज विज्ञान भी स्वीकार करता है कि ब्रह्माण्ड ऊर्जा, कंपन और संतुलन पर आधारित है।
मनुष्य का मस्तिष्क, तंत्रिका तंत्र, भावनाएँ और शरीर सभी विभिन्न स्तरों पर कार्य करते हैं।
यह वैदिक मंत्र हजारों वर्ष पहले ही संकेत देता है कि जीवन अनेक स्तरों का समन्वित यज्ञ है।
जब शरीर, मन, बुद्धि और आत्मा एक दिशा में कार्य करते हैं, तब असाधारण उपलब्धियाँ संभव होती हैं।
इस मंत्र का व्यावहारिक संदेश
प्रतिदिन स्वयं से पूछें—
✅ क्या मेरी श्रद्धा जीवित है?
✅ क्या मैं सत्य का पालन कर रहा हूँ?
✅ क्या मैं ज्ञान अर्जित कर रहा हूँ?
✅ क्या मेरे विचार पवित्र हैं?
✅ क्या मैं समाज के लिए उपयोगी हूँ?
✅ क्या मैं आत्मिक विकास कर रहा हूँ?
✅ क्या मेरी जीवन-अग्नि प्रज्वलित है?
निष्कर्ष
यजुर्वेद का यह महान मंत्र हमें बताता है कि मनुष्य स्वयं एक चलता-फिरता यज्ञ है।
उसके भीतर सात प्रकार की शक्तियाँ, सात प्रकार के विकास मार्ग और सात प्रकार की चेतनाएँ कार्य कर रही हैं।
जब वह इन सभी को ज्ञानरूपी घृत से पोषित करता है, तब उसका जीवन प्रकाश, सफलता, संतुलन और आत्मज्ञान से भर जाता है।
"जिसके भीतर ज्ञान की अग्नि जलती है, उसके जीवन का प्रत्येक कर्म यज्ञ बन जाता है।"
॥ ॐ स्वाहा ॥
भूत्यै जागरणमभूत्यै स्वप्नम् ।―(यजु० ३०/१७)
जागना कल्याण के लिए है और सोना नाश के लिए है।
मनुष्य जन्मकाल से शरीर की साधना, निद्रा, नित्य आवश्यकताओं की निवृत्ति, खान-पान, व्यायाम, विश्राम आदि में अपना समय व्यतीत करता है। उसके पश्चात् पेट के धन्धे के लिए अपना समय निकालता है। फिर घर-गृहस्थी के कामों के लिए समय व्यतीत करता है। उसके पश्चात् रिश्तेदारों, मित्रों, पड़ोसियों, मुहल्लेदारों और सहव्यवसायियों के लिए सुख-दु:ख में सम्मिलित होता है। उसके अनन्तर वह आलस्य, प्रमाद, मनोरंजन और समाचार-पत्र का शिकार हो जाता है। ये पाँच काम तो संसार का प्राय: प्रत्येक व्यक्ति करता ही है। छठा काम, ईश्वर-भक्ति, धर्मग्रन्थों का अध्ययन और सत्संग करने वाले संसार में थोड़े व्यक्ति हैं। यही अध्यात्म-जागरण का मार्ग है।
प्रत्येक मनुष्य जीवन-भर उपरोक्त पाँचों कामों में अपना समय व्यतीत कर देता है। जितनी आयु तक वह ये काम करता है वह आयु सांसारिक आयु होती है। पारमार्थिक आयु तभी से समझनी चाहिए जब से व्यक्ति में आध्यात्मिक जागरण आ जाए। यही वास्तविक आयु है क्योंकि जीवन का लक्ष्य आत्म-साक्षात्कार और परमात्म-साक्षात्कार करना है।
महाराज विक्रमादित्य कहीं जा रहे थे। एक अत्यन्त वृद्ध पुरुष को देखकर उन्होंने पूछा, 'महाशय ! आपकी आयु कितनी है?'
वृद्ध ने अपनी श्वेत दाढ़ी हिलाते हुए कहा, 'श्रीमान जी ! केवल चार वर्ष' ।
यह सुनकर राजा को बड़ा क्रोध आया। वह बोला, 'तुम्हें शर्म आनी चाहिए। इतने वृद्ध होकर भी झूठ बोलते हो। तुम्हें अस्सी वर्ष से कम कौन कहेगा?'
वृद्ध बोला, 'श्रीमान्, आप ठीक कहते हैं। किंतु इन अस्सी वर्षों में से 76 वर्ष तक तो मैं पशु की तरह अपने कुटुम्ब का भार वहन करता रहा। अपने कल्याण की तरफ ध्यान ही नहीं दिया। अत: वह तो पशु-जीवन था। अभी चार वर्ष से ही मैंने आत्म-कल्याण की ओर ध्यान दिया है। इससे मेरे मनुष्य जीवन की आयु चार वर्ष की है। और वही मैंने आपको बताई है।
🍀🍁🍀🍁🍀🍁🍀🍁
🕉️🚩आज का वेद मन्त्र,🚩🕉️
🔥 ओ३म् सप्त तेऽअग्ने समिध: सप्त जिह्वा: सप्तऽऋषय: सप्त धाम प्रियाणि। सप्त होत्रा: सप्तधा त्वा यजन्ति सप्त योनीरापृणस्व घृतेन स्वाहा॥ यजुर्वेद १७-७९॥
🌷हे तेजस्वी मनुष्य, सात प्राण (प्राण, अपान, समान, उदान व्यान, देवदत्त और धनंजय) तुम्हारी समिधायें हैं। सात जिव्हा ( काली, कराली आदि) तुम्हारी ज्ञान अग्नि की ज्वालाएं हैं। सात ऋषि (पांच ज्ञानेंद्रियां, मन और बुद्धि) तुम्हारे ज्ञान के स्रोत हैं। सात (जन्म, नाम, स्थान, धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष) तुम्हारे प्रिय धाम हैं। सात (होत,प्रशस्त, आदि) तुम्हारे यजन्ति हैं, जो सात प्रकार (अग्निस्तोम,सस अतिअग्निस्तोम आदि) द्वारा होम करते हैं। तुम इन स्थानों को अपने ज्ञान ओर त्याग द्वारा भरो।

0 टिप्पणियाँ
If you have any Misunderstanding Please let me know