पयस्वतीरोषधयः पयस्वन् मामकं वचः ।
अथो पयस्वतीनामा भरेऽहं सहस्रशः ॥१॥
०३।०२४।०१
✍क्षेमकरण दास त्रिवेदी 👉
भाषार्थ: (ओषधयः) ओषधियाँ, चावल जौ आदि वस्तुएँ (पयस्वतीः=०-त्यः) सारवाली होवें, और (मामकम्) मेरा (वचः) वचन (पयस्वत्) सारवाला होवे। (अथो) और भी (अहम्) मैं (पयस्वतीनाम्) सारवाली [ओषधियों] का (सहस्रशः) सहस्रों प्रकार से (आ) यथाविधि (भरे) धारण करूँ ॥१॥
भावार्थः मनुष्य विद्यापूर्वक अन्न आदि पदार्थों को उत्तम बनावें और दृढ़ सत्य वचन बोलें। ऐसा करने से शारीरिक और आत्मिक उन्नति होती है ॥१॥
मनु महाराज का वचन है−
उद्भिजाः स्थावराः सर्वे बीजकाण्डप्ररोहिणः। ओषध्यः फलपाकान्ता बहुपुष्पफलोपगाः ॥ मनु० १।४६ ॥ भूमि को फाड़कर उपजनेवाले, और बीज वा शाखा से उगनेवाले सब वृक्ष हैं, फल पाक के साथ नष्ट होनेवाली और बहुत फूल फलवाली ओषधियाँ [चावल, जौ आदि] हैं ॥१॥
✍विश्वनाथ विद्यालंकार👉
भाषार्थ: (पयस्वतीः) सारवाली हैं (ओषधयः) ओषधियाँ, (पयस्वत्) सारवाला है (मामकम् वचः) मेरा वचन। (अथो) तथा (पयस्वतीनाम्) सारवाली (सहस्रशः) हजारों ओषधियों को (अहम्) मैं (आ भरे) प्राप्त करूं।
वेदाहं पयस्वन्तं चकार धान्यं बहु ।
संभृत्वा नाम यो देवस्तं वयं हवामहे योयो अयज्वनो गृहे ॥२॥
०३।०२४।०२
संभृत्वा नाम यो देवस्तं वयं हवामहे योयो अयज्वनो गृहे ॥२॥
०३।०२४।०२
✍क्षेमकरण दास त्रिवेदी 👉
भाषार्थ: (अहम्) मैं (पयस्वन्तम्) सारवाले परमेश्वर को (वेद) जानता हूँ। (बहु) बहुत सा (धान्यम्) धान्य (चकार) उसने उत्पन्न किया है। (यः) जो (देवः) दानशील ईश्वर (संभूत्वा) यथावत् पोषक (नाम) नाम (अयज्वनः) यज्ञ न करनेवाले के (गृहे) घर में (योयः=यस्-यः) गतिवाला है, (तम्) उस [परमात्मा] का (वयम्) हम (हवामहे) आवाहन करते हैं ॥२॥
भावार्थः प्रत्येक प्राणी उस उत्तम पदार्थों के भण्डार परमात्मा को जानता है, जो अनेक अन्न उपजाकर [धर्मात्माओं का तो क्या कहना है] पापियों तक के घर भोजन पहुँचाता है। हम उसकी उपासना नित्य किया करें ॥२॥ शेखसादी शीराजी ने अपनी पुस्तक पुष्पवाटिका [गुलिस्ता] में इस मन्त्र का आशय इस प्रकार दिखलाया है−“ऐ करीमे कि अज खजानै गैब। गब्रो तर्सा वजीफा खुरदारी ॥१॥ दोस्तां रा कुजा कुनी महरूम्। तो कि वा दुश्मनां नजरदारी ॥२॥” हे ऐसे उदार कि तू गुप्त कोष के विरोधी और नास्तिक को पेटियाँ खिलाता है। मित्रों को तू कब निराश करे, जब कि तू द्वेषियों पर आँख रखता है ॥
✍विश्वनाथ विद्यालंकार👉
भाषार्थ: (अहम्) मैं (वेद) जानता हूँ (पयस्वन्तम्) जलवाले को, जिसने कि (बहु धान्यम्) बहुत धान्य (चकार) पैदा किया है। (संभृत्वा नाम य: देव:) संभरण-पोषण करने में जो प्रसिद्ध व्यवहारकुशल दिव्य व्यक्ति है, (तं वयम् हवामहे) उसका हम आह्वान करते हैं, (य: यः) और जो-जो [संभरण-पोषण करनेवाला व्यवहार कुशल] (अयज्वन:) राष्ट्र-यज्ञ न करने वाले के (गृहे) पर में नियत है उस-उसका भी आह्वान करते हैं।
टिप्पणी: [पयस्वान् है मेघ। मेघ है जलवाला। इस द्वारा वर्षा से धान्य बहुत पैदा होता है। संभृत्वा=संपूर्वात् भृञ:१ क्वनिप् (अष्टा० ३।२।७५), तुक् (अष्टा० ६।१।७१), (सायण), (य: य:) जो जो "संभृत्वा"। देवः= दिवु क्रीडा विजिगीषाव्यवहार आदि (दिवादिः) अर्थात् व्यवहारकुशल "राज्यकर" का अधिकारी (य: यः) जो-जो भी "राज्यकर" के संग्रह करने में, राष्ट्रयज्ञ के न करनेवालों के घर घर में नियुक्त हैं, उनका आह्वान है, उन द्वारा संगृहीत "राज्यकर" की राशि के परिज्ञानार्थ। "अयज्यनः गृहे" जात्येकवचन है, अभिप्राय है "अयज्वनां गृहेषु"। "राज्यकर" स्वेच्छापूर्वक देना, यह प्रत्येक भूमिपति का कर्तव्य है, तो भी उनकी सुविधा के लिए संग्रह करनेवाले नियुक्त किये गये हैं।] [१. भृञ् धारणपोषणयोः, तथा भृञ् भरणे।]
इमा याः पञ्च प्रदिशो मानवीः पञ्च कृष्टयः ।
वृष्टे शापं नदीरिवेह स्फातिं समावहान् ॥३॥
वृष्टे शापं नदीरिवेह स्फातिं समावहान् ॥३॥
०३।०२४।०३
✍क्षेमकरण दास त्रिवेदी 👉
भाषार्थ: (इमाः) यह (याः) जो (मानवीः=०-व्यः) मानुषी (पञ्च) पाँच भूत [पृथिवी आदि] से सम्बन्धवाली (कृष्टयः) प्रजायें (पञ्च प्रदिशः) पाँच फैली हुई दिशाओं में हैं, वे प्रजायें (शापम्) अनिष्ट वा मलिनता हटाकर (इह) यहाँ पर (स्फातिम्) बढ़ती को (समावहान्) यथावत् लावें, और (नदीः इव नद्यः इव) जैसे नदियाँ (वृष्टे) बरसने पर [अनिष्ट वा मलिनता हटाकर] (शतधारम्) सैकड़ों धाराओंवाले और (सहस्रधारम्) सहस्रों विधि से धारण करनेवाले, (अक्षितम्) अक्षय (उत्सम्) सींचने के साधन [झरना, कूप आदि] को (उत्=उदावहन्ति) निकालती हैं (एव=एवम्) ऐसे ही (अस्माक=अस्माकम्) हमारा (इदम्) यह (धान्यम्) धान्य (सहस्रधारम्) सहस्रों प्रकार से धारण करनेवाला और (अक्षितम्) अक्षय [होवे] ॥३, ४॥
भावार्थः मनुष्य खेती व्यापार आदि द्वारा पूर्वादि चार दिशाओं और ऊपर नीचे की दिशा [वायु मण्डल वा पाताल] से बहुत धन प्राप्त करें और अनेक प्रयोगों से उसकी यथावत् वृद्धि करें, जैसे बरसा का जल नदियों में एकत्र होकर और झरनों, कूपों, नालियों से खेती आदि में पहुँचकर दरिद्रता आदि मिटाकर संसार को लाभ पहुँचाता है ॥३, ४॥ मन्त्र ३ व ४ युग्मक छन्द हैं ॥
✍विश्वनाथ विद्यालंकार👉
भाषार्थ: (इमाः याः) ये जो (पञ्च) विस्तृत (प्रदिशः) प्रकृष्ट दिशाएँ हैं, और (पञ्च) विस्तृत (मानवी) मानुष (कृष्टयः) कृषि करनेवाली प्रजाएँ हैं, ये (इह) इस राज्य में (स्फातिम्) समृद्धि को (समावहान्) हम परस्पर मिलकर प्राप्त करें, प्रवाहित करें, (इव) जैसेकि (नदी:) नदियाँ (वृष्टे) वर्षा में (शापम्) शापरूप मल को प्रवाहित कर देती हैं।
टिप्पणी: [पञ्च=पचि विस्तारवचने (चुरादिः)। कृष्टयः मनुष्यानाम (निघं० २।३), संभवतः कृषि करनेवाले मनुष्य।]
उदुत्सं शतधारं सहस्रधारमक्षितम् ।
एवास्माकेदं धान्यं सहस्रधारमक्षितम् ॥४॥
एवास्माकेदं धान्यं सहस्रधारमक्षितम् ॥४॥
०३।०२४।०४
✍क्षेमकरण दास त्रिवेदी 👉
भाषार्थ: (इमाः) यह (याः) जो (मानवीः=०-व्यः) मानुषी (पञ्च) पाँच भूत [पृथिवी आदि] से सम्बन्धवाली (कृष्टयः) प्रजायें (पञ्च प्रदिशः) पाँच फैली हुई दिशाओं में हैं, वे प्रजायें (शापम्) अनिष्ट वा मलिनता हटाकर (इह) यहाँ पर (स्फातिम्) बढ़ती को (समावहान्) यथावत् लावें, और (नदीः इव नद्यः इव) जैसे नदियाँ (वृष्टे) बरसने पर [अनिष्ट वा मलिनता हटाकर] (शतधारम्) सैकड़ों धाराओंवाले और (सहस्रधारम्) सहस्रों विधि से धारण करनेवाले, (अक्षितम्) अक्षय (उत्सम्) सींचने के साधन [झरना, कूप आदि] को (उत्=उदावहन्ति) निकालती हैं (एव=एवम्) ऐसे ही (अस्माक=अस्माकम्) हमारा (इदम्) यह (धान्यम्) धान्य (सहस्रधारम्) सहस्रों प्रकार से धारण करनेवाला और (अक्षितम्) अक्षय [होवे] ॥३, ४॥
भावार्थः मनुष्य खेती व्यापार आदि द्वारा पूर्वादि चार दिशाओं और ऊपर नीचे की दिशा [वायु मण्डल वा पाताल] से बहुत धन प्राप्त करें और अनेक प्रयोगों से उसकी यथावत् वृद्धि करें, जैसे बरसा का जल नदियों में एकत्र होकर और झरनों, कूपों, नालियों से खेती आदि में पहुँचकर दरिद्रता आदि मिटाकर संसार को लाभ पहुँचाता है ॥३, ४॥ मन्त्र ३ व ४ युग्मक छन्द हैं ॥
✍विश्वनाथ विद्यालंकार👉
भाषार्थ: (उत्सम्) जैसेकि चश्मा, (शतधारम् सहस्रधारम्) सौ धाराओं वाला तथा हजार धाराओंवाला (उत्) उद्धृत हुआ (अक्षितम्) क्षीण नहीं होता, (एव) इसी प्रकार (अस्माक=अस्माकम्) हमारा (इदम् धान्यम्) यह धान्य (अक्षितम्) क्षीण नहीं होता, (सहस्रधारम्) और हजारों का धारण-पोषण करता है। उत्=उद्भूतम् (सायण)।
टिप्पणी: [मन्त्र २ में बहुधान्यम्, तथा मन्त्र ३ में स्फातिम् के कारण हमारा धान्य अक्षित है।]
शतहस्त समाहर सहस्रहस्त सं किर ।
कृतस्य कार्यस्य चेह स्फातिं समावह ॥५॥
कृतस्य कार्यस्य चेह स्फातिं समावह ॥५॥
०३।०२४।०५
✍क्षेमकरण दास त्रिवेदी 👉
भाषार्थ: (शतहस्त) हे सैकड़ों हाथोंवाले ! [मनुष्य !] [धान्य को-म० ४] (समाहर) बटोर कर ला, और (सहस्रहस्त) हे सहस्रों हाथोंवाले (सम्) अच्छे प्रकार से (किर) फैला। (च) और (कृतस्य) किये हुए और (कार्यस्य) कर्तव्य कर्म की (स्फातिम्) बढ़ती को (इह) यहाँ पर (समावह) मिलकर ला ॥५॥
भावार्थः मनुष्य सैकड़ों तथा सहस्रों प्रकार से कर्मकुशल होकर, और सहस्रों कर्मकुशलों से मिलकर धन धान्य एकत्र करे और उत्तम कर्मों में व्यय करके आगा पीछा सोचकर सदैव उन्नति करता रहे ॥५॥
✍विश्वनाथ विद्यालंकार👉
भाषार्थ: [हे कृषि करने वाले ! मन्त्र ३] (शतहस्त) सौ हाथोंवाला होकर (समाहर) धान्य आदि का संग्रह कर, और (सहस्रहस्त) हजार हाथोंवाला होकर (संकिर) सम्यक् दान कर। (इह) इस राज्य में (कृतस्य) किये दान की, (च) और (कार्यस्य) भावी काल में किये जाने वाले योग्य दान की (स्फातिम्) वृद्धि को (सम् आवह) संप्राप्त कर।
टिप्पणी: [कृषक के लिए कहा है कि तू जितना धान्य प्राप्त करता है, उससे अधिक दान देने के लिए प्रयल कर। संकिर=सम् कृ विक्षेपे (तुदादि:)। विक्षेप है फेंकना। इस द्वारा सम्पत्ति में मोह त्याग सूचित किया है।]
तिस्रो मात्रा गन्धर्वाणां चतस्रो गृहपत्न्याः ।
तासां या स्फातिमत्तमा तया त्वाभि मृशामसि ॥६॥
तासां या स्फातिमत्तमा तया त्वाभि मृशामसि ॥६॥
०३।०२४।०६
✍क्षेमकरण दास त्रिवेदी 👉
भाषार्थ: (तिस्रः) तीन (मात्राः) मात्रायें [भाग] (गन्धर्वाणाम्) विद्या वा पृथिवी धारण करनेवालों की, और (चतस्रः) चार (गृहपत्न्याः) गृहपत्नी [घर की पालन शक्ति] की [होवें], (तासाम्) उन सब [मात्राओं] में से (या) जो (स्फातिमत्तमा) अत्यन्त समृद्धिवाली है, (तया) उस [मात्रा] से (त्वा) तुझको (अभि) सब ओर से (मृशामसि=०-मः) हम छूते [संयुक्त करते] हैं ॥६॥
भावार्थः सब कुटुम्बी लोग जो धन धान्य कमावें, उसमें से उत्तम अधिकांश अनदेखे विपत्ति समय के लिए प्रधान पुरुष को सौपें, और शेष के सात भाग करके तीन भाग विद्यावृद्धि और राजप्रबन्ध आदि और चार भाग सामान्य निर्वाह खान पान वस्त्र आदि में व्यय करें। यह वैदिक शिक्षा सब मनुष्यों के सुख का मूल है ॥६॥
✍विश्वनाथ विद्यालंकार👉
भाषार्थ: (गन्धर्वाणाम्) पृथिवी के धारण करनेवाले पतियों का (मात्रा) हिस्सा है (तिस्रः) तीन और (गृहपत्याः) गृहपत्नी की मात्राएँ हैं, हिस्से में चार (तासाम्) उन मात्राओं में (या) जो (स्फातिमत्तमा) अतिसमृद्धियुक्त मात्रा है, (तया) उस मात्रा के साथ (त्वा) हे गृहपत्नी ! (अभिमृशामसि) हम तेरा स्पर्श करते हैं।
टिप्पणी: [अभिमृशामसि द्वारा राज्याधिकारी गृहपति को आश्वासन देते हैं। गृहपत्नी जब प्राप्त सम्पत्ति की अधिकारिणी हो, तो वह गृहजीवन में स्वतन्त्रता अनुभव कर सकती है। और पति-पत्नी परस्पर के सहयोगपूर्वक अधिक सुखी रह सकते हैं ।]
उपोहश्च समूहश्च क्षत्तारौ ते प्रजापते ।
ताविहा वहतां स्फातिं बहुं भूमानमक्षितम् ॥७॥
ताविहा वहतां स्फातिं बहुं भूमानमक्षितम् ॥७॥
०३।०२४।०७
✍क्षेमकरण दास त्रिवेदी 👉
भाषार्थ: (प्रजापते) हे प्रजापालक गृहस्थ ! (उपोहः) योग [प्राप्ति] (च) और (समूहः) संग्रह [क्षेम वा रक्षा] दोनों (च) निश्चय करके (ते) तेरे (क्षत्तारौ) क्षत्रिय [क्षति वा हानि से बचानेवाले] हैं। (तौ) वे दोनों (इह) यहाँ पर (स्फातिम्) बढ़ती और (बहुम्) बहुत (अक्षितम्) अचूक (भूमानम्) अधिकाई (आ वहताम्) लावें ॥७॥
भावार्थः गृहस्थ लोग पुरुषार्थ करके विद्या, धन, धान्य आदि जीवन सामग्री की १-प्राप्ति, २-रक्षा और ३-वृद्धि वा ऋद्धि सिद्धि करके आनन्द भोगें ॥७॥ यजुर्वेद में आया हैः−योगक्षे॒मो नः॑ कल्पताम् ॥ य० २२।२२ ॥ (नः) हमारा (योगक्षेमः) योग-अप्राप्त वस्तु का लाभ, और क्षेम-प्राप्त पदार्थ की रक्षा (कल्पताम्) समर्थ अर्थात् पर्याप्त होवे ॥
✍विश्वनाथ विद्यालंकार👉
भाषार्थ: (प्रजापते) उत्पन्न सन्तानों के रक्षक! [हे सद्गृहस्थ] (उपोह:) धन की प्राप्ति (च) और (समूहः) उसका समूहीकरण अर्थात् बढ़ाना, (ते) तेरे लिए, (क्षत्तारौ) क्षतिनद से तैरानेवाले हैं; (तौ) वे दोनों (इह) इस गृहस्थ में (स्फातिम्) समृद्धि को, (अक्षितम्) तथा न क्षीण होनेवाले (बहुम्) बहुत प्रकार की (भूमानम्) बहुतायत को (आ वहताम्) प्राप्त कराएँ,
टिप्पणी: [वह प्रापणे]। [उपोह:=उप+ वह प्राप्तौ (भ्वादिः)। समूहः=सम्+ वह प्राप्तौ। क्षत्तारौ=क्षत् तृ संतरणे (भ्वादिः)।]

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