पुरुषार्थ, कौशल और लोककल्याण का वैदिक संदेश ऋग्वेद के इस दिव्य मन्त्र का प्रेरणादायक उपदेश
ॐ
मन्त्र
तक्षन्नासत्याभ्यां परिज्मानं सुखं रथम्।
तक्षन्धेनुं सबर्दुघाम्॥
— ऋग्वेद
भूमिका
ऋग्वेद का यह मन्त्र मनुष्य को कौशल, परिश्रम और सृजनशीलता का अद्भुत संदेश देता है। वैदिक संस्कृति कर्मप्रधान संस्कृति है। वेद केवल प्रार्थना करना ही नहीं सिखाते, बल्कि जीवन के प्रत्येक क्षेत्र में उत्कृष्ट निर्माण, विज्ञान, तकनीक, कृषि, पशुपालन और लोककल्याण के लिए पुरुषार्थ करने की प्रेरणा देते हैं।
इस मन्त्र में ऐसे रथ के निर्माण का उल्लेख है जो सुरक्षित, सुगम और सुखद यात्रा के योग्य हो तथा ऐसी गौ का भी वर्णन है जो प्रचुर मात्रा में पोषण देने वाली हो। इसका तात्पर्य है कि मनुष्य अपने ज्ञान और कौशल से ऐसे साधनों का निर्माण करे जो सम्पूर्ण समाज के लिए हितकारी हों।
मन्त्र
तक्षन्नासत्याभ्यां परिज्मानं सुखं रथम्।
तक्षन्धेनुं सबर्दुघाम्॥
शब्दार्थ
- तक्षन् — निर्माण करे, कुशलता से बनाए।
- नासत्याभ्याम् — सत्यस्वरूप, उपकारी एवं कल्याणकारी शक्तियों के लिए; वैदिक सन्दर्भ में अश्विनौ।
- परिज्मानम् — सुगठित, चारों ओर से सुरक्षित, उत्तम रूप से निर्मित।
- सुखम् — आरामदायक, हितकारी, सुरक्षित।
- रथम् — वाहन; व्यापक अर्थ में जीवन और समाज की उन्नति के साधन।
- तक्षत् — बनाए, तैयार करे।
- धेनुम् — गौ; पोषण देने वाली व्यवस्था।
- सबर्दुघाम् — प्रचुर मात्रा में दूध अथवा पोषण प्रदान करने वाली।
भावार्थ
मनुष्य को चाहिए कि वह अपने ज्ञान, कौशल और परिश्रम से ऐसे साधनों का निर्माण करे जो सुरक्षित, उपयोगी और समाज के लिए सुखद हों। साथ ही वह ऐसी व्यवस्था विकसित करे जो सभी के पोषण, समृद्धि और कल्याण का आधार बने।
'तक्षन्' का वास्तविक अर्थ
मन्त्र का प्रथम शब्द 'तक्षन्' अत्यन्त महत्वपूर्ण है।
इसका अर्थ है—
- निर्माण करना।
- सृजन करना।
- कुशल कारीगर बनना।
- विज्ञान और तकनीक का सदुपयोग करना।
वेद आलस्य नहीं, बल्कि सृजनात्मक पुरुषार्थ का उपदेश देते हैं।
'सुखं रथम्' का व्यापक अर्थ
यहाँ रथ केवल एक वाहन नहीं है।
यह जीवन के उन सभी साधनों का प्रतीक है जो—
- सुरक्षित हों।
- उपयोगी हों।
- समाज के लिए लाभकारी हों।
- मानव जीवन को सरल और उन्नत बनाएँ।
आज के युग में इसका अर्थ हो सकता है—
- सुरक्षित परिवहन।
- उपयोगी तकनीक।
- वैज्ञानिक आविष्कार।
- जनहितकारी व्यवस्थाएँ।
धेनु का वैदिक महत्व
मन्त्र में धेनु का उल्लेख केवल एक पशु के रूप में नहीं है।
वेदों में धेनु—
- पोषण का प्रतीक है।
- समृद्धि का आधार है।
- कृषि और ग्रामीण अर्थव्यवस्था का महत्वपूर्ण अंग है।
- लोककल्याण की भावना का प्रतीक है।
'सबर्दुघाम्' का अर्थ है—जो सभी के लिए भरपूर पोषण प्रदान करे।
विज्ञान और धर्म का समन्वय
यह मन्त्र स्पष्ट करता है कि वैदिक धर्म विज्ञान-विरोधी नहीं है।
वेद चाहते हैं कि—
- मनुष्य नए निर्माण करे।
- तकनीक विकसित करे।
- कृषि को उन्नत बनाए।
- समाज के लिए उपयोगी साधन तैयार करे।
- अपनी बुद्धि का उपयोग मानवता के हित में करे।
यही वास्तविक वैदिक विज्ञान है।
आज के जीवन में इस मन्त्र की प्रासंगिकता
आज समाज को ऐसे वैज्ञानिकों, अभियन्ताओं, किसानों, शिक्षकों और उद्यमियों की आवश्यकता है जो—
- केवल लाभ के लिए नहीं,
- बल्कि समाज के कल्याण के लिए कार्य करें।
यदि प्रत्येक व्यक्ति अपने कौशल का उपयोग लोकहित में करे, तो सम्पूर्ण राष्ट्र समृद्ध और आत्मनिर्भर बन सकता है।
इस मन्त्र की मुख्य शिक्षाएँ
- परिश्रम और कौशल से श्रेष्ठ निर्माण करें।
- विज्ञान और तकनीक का उपयोग मानव कल्याण के लिए करें।
- समाज के लिए सुरक्षित और उपयोगी साधन विकसित करें।
- पोषण और समृद्धि के स्रोतों का संरक्षण करें।
- सृजनात्मक कार्य ही वास्तविक पुरुषार्थ है।
- व्यक्तिगत सफलता के साथ सामाजिक कल्याण का भी ध्यान रखें।
- ईश्वर प्रदत्त बुद्धि का उपयोग लोकमंगल के लिए करें।
उपसंहार
ऋग्वेद का यह प्रेरणादायक मन्त्र हमें सिखाता है कि मनुष्य केवल उपभोग करने के लिए नहीं, बल्कि निर्माण करने के लिए जन्मा है। अपने ज्ञान, कौशल और परिश्रम से वह ऐसा समाज बना सकता है जहाँ सुरक्षा, समृद्धि, पोषण और सुख का वातावरण हो।
आइए, हम भी इस वैदिक संदेश को अपने जीवन में अपनाएँ। अपने कार्य में उत्कृष्टता लाएँ, विज्ञान और ज्ञान का सदुपयोग करें, समाज के हित में सृजन करें और ऐसा जीवन जिएँ जिससे सम्पूर्ण मानवता का कल्याण हो। यही इस वैदिक मन्त्र का शाश्वत और सार्वभौमिक संदेश है।
॥ ॐ शान्तिः शान्तिः शान्तिः ॥
कुम्भ मेला : इतिहास, शास्त्रीय प्रमाण और वैज्ञानिक दृष्टिकोण
वेद, पुराण, भारतीय खगोल विज्ञान एवं आधुनिक विज्ञान के आलोक में एक शोधपरक अध्ययन
ॐ
संगच्छध्वं संवदध्वं सं वो मनांसि जानताम्।
देवा भागं यथा पूर्वे संजानाना उपासते॥
— ऋग्वेद 10.191.2
भावार्थ:
हे मनुष्यों! मिलकर चलो, मिलकर विचार करो और अपने मनों को एक बनाओ। जैसे प्राचीन विद्वान समाज के कल्याण के लिए एकत्र होकर कार्य करते थे, वैसे ही तुम भी एकता और सहयोग का जीवन अपनाओ।
भूमिका
कुम्भ मेला विश्व का सबसे बड़ा शांतिपूर्ण मानव समागम है। करोड़ों लोग भारत के चार पवित्र तीर्थों—प्रयागराज, हरिद्वार, उज्जैन और नासिक—में एकत्र होकर स्नान, दान, यज्ञ, सत्संग, योग और आध्यात्मिक साधना करते हैं।
किन्तु एक महत्वपूर्ण प्रश्न है—
क्या कुम्भ मेले का उल्लेख वेदों में मिलता है?
उत्तर है—वर्तमान स्वरूप का "कुम्भ मेला" वेदों में प्रत्यक्ष रूप से वर्णित नहीं है।
वेदों में तीर्थ, नदी, यज्ञ, सभा, धर्म, जल और एकता का महत्व अवश्य मिलता है, किन्तु आज जिस रूप में कुम्भ मेला मनाया जाता है, उसका विस्तार मुख्यतः पुराणों, ज्योतिषशास्त्र, धर्मशास्त्र तथा भारतीय परम्परा में मिलता है।
अतः कुम्भ का अध्ययन करते समय वेद, पुराण, इतिहास और विज्ञान—सभी का संतुलित अध्ययन आवश्यक है।
कुम्भ शब्द का अर्थ
संस्कृत में कुम्भ का अर्थ है—
- कलश
- घट
- जीवन का पात्र
- अमृत का पात्र
भारतीय संस्कृति में कलश समृद्धि, ज्ञान, जीवन और मंगल का प्रतीक माना गया है।
कुम्भ की उत्पत्ति : समुद्र-मंथन
कुम्भ पर्व की सबसे प्रसिद्ध परम्परा समुद्र-मंथन से जुड़ी है।
जब देवताओं और असुरों ने अमृत प्राप्त करने के लिए क्षीरसागर का मंथन किया, तब भगवान धन्वन्तरि अमृत से भरा कलश लेकर प्रकट हुए।
पुराणों में वर्णित है—
देवानां दानवानां च मन्थाने क्षीरसागरम्।
उत्पन्नः कुम्भोऽमृतस्य धन्वन्तरिणा स्वयम्॥
भावार्थ
समुद्र-मंथन के समय भगवान धन्वन्तरि अमृत से भरा हुआ कुम्भ लेकर प्रकट हुए।
इसके पश्चात् अमृत कलश की रक्षा के लिए देवताओं और असुरों के मध्य संघर्ष हुआ।
परम्परा के अनुसार अमृत की बूँदें चार स्थानों पर गिरीं—
- प्रयागराज
- हरिद्वार
- उज्जैन
- नासिक
इन्हीं स्थानों पर कुम्भ पर्व आयोजित किया जाता है।
पुराणों का प्रमाण
स्कन्दपुराण में कहा गया है—
यत्र यत्र पतद्बिन्दुरमृतस्य महीतले।
तत्र तत्र महापुण्यं कुम्भपर्व प्रकीर्तितम्॥
भावार्थ
जहाँ-जहाँ अमृत की बूँदें पृथ्वी पर गिरीं, वे स्थान महान पुण्यदायक कुम्भ पर्व के रूप में प्रसिद्ध हुए।
क्या यह ऐतिहासिक घटना है?
इतिहासकारों के अनुसार समुद्र-मंथन का वर्णन प्रतीकात्मक भी माना जाता है।
इसका दार्शनिक अर्थ है—
- समुद्र = संसार
- मंथन = पुरुषार्थ
- अमृत = ज्ञान
- विष = अज्ञान
- कुम्भ = जीवन का पात्र
अर्थात् निरन्तर पुरुषार्थ और ज्ञान से ही जीवन का अमृत प्राप्त होता है।
कुम्भ का खगोलीय विज्ञान
कुम्भ मेला किसी निश्चित तिथि पर नहीं होता।
यह भारतीय खगोल विज्ञान के अनुसार निर्धारित होता है।
मुख्य आधार हैं—
- सूर्य
- चन्द्रमा
- बृहस्पति (गुरु)
की विशेष राशियों में स्थिति।
उदाहरण के लिए—
- हरिद्वार कुम्भ
- प्रयागराज महाकुम्भ
- उज्जैन सिंहस्थ
- नासिक कुम्भ
इन सबकी गणना अलग-अलग ग्रह स्थितियों के अनुसार होती है।
यह भारतीय ज्योतिष और खगोल विज्ञान की उच्च परम्परा का प्रमाण है।
आदि शंकराचार्य की भूमिका
अनेक विद्वानों का मत है कि आदि शंकराचार्य ने भारत की आध्यात्मिक एकता को सुदृढ़ करने के लिए साधु-सन्तों के संगठित सम्मेलन की परम्परा को व्यापक रूप दिया।
उन्होंने—
- चार मठ स्थापित किए।
- सनातन ज्ञान परम्परा को संगठित किया।
- साधु समाज को एक सूत्र में बाँधा।
यद्यपि वर्तमान कुम्भ मेले की संपूर्ण संरचना का श्रेय केवल उन्हें देना ऐतिहासिक रूप से सिद्ध नहीं है, फिर भी इसके विकास में उनकी परम्परा का महत्वपूर्ण योगदान माना जाता है।
वैज्ञानिक दृष्टिकोण
कुम्भ केवल धार्मिक आयोजन नहीं है।
यह—
1. सामाजिक विज्ञान
करोड़ों लोगों का शांतिपूर्ण प्रबंधन।
2. स्वास्थ्य विज्ञान
विशाल चिकित्सा व्यवस्था।
स्वच्छता अभियान।
जनस्वास्थ्य प्रबंधन।
3. पर्यावरण विज्ञान
नदी संरक्षण।
स्वच्छ जल।
हरित व्यवस्था।
4. खगोल विज्ञान
ग्रहों की गणना।
पंचांग निर्माण।
सूर्य और बृहस्पति की स्थिति।
5. मनोविज्ञान
सामूहिक प्रार्थना।
ध्यान।
योग।
सकारात्मक मानसिक ऊर्जा।
क्या नदी स्नान से पाप धुल जाते हैं?
वेदों के अनुसार—
पाप कर्मों से होते हैं।
उनका नाश—
- ज्ञान
- प्रायश्चित्त
- सत्य
- यज्ञ
- सेवा
- सदाचार
से होता है।
जल शरीर को शुद्ध करता है।
मन को प्रेरणा देता है।
किन्तु केवल स्नान से कर्मफल समाप्त हो जाते हैं—ऐसा वेदों में नहीं कहा गया।
वेद क्या कहते हैं?
आपो हि ष्ठा मयोभुवः।
(यजुर्वेद 36.12)
जल सुख देने वाला है।
माता भूमिः पुत्रोऽहं पृथिव्याः।
(अथर्ववेद 12.1.12)
पृथ्वी हमारी माता है।
संगच्छध्वं संवदध्वम्।
(ऋग्वेद 10.191.2)
मिलकर चलो।
इन वैदिक सिद्धान्तों का वास्तविक रूप ही कुम्भ में दिखाई देता है—
- जल
- प्रकृति
- समाज
- एकता
- धर्म
यूनेस्को की मान्यता
वर्ष 2017 में यूनेस्को ने कुम्भ मेले को मानवता की अमूर्त सांस्कृतिक धरोहर (Intangible Cultural Heritage) के रूप में मान्यता प्रदान की।
यह सम्मान केवल धार्मिक कारणों से नहीं, बल्कि—
- सांस्कृतिक निरन्तरता,
- सामाजिक संगठन,
- लोकज्ञान,
- आध्यात्मिक परम्परा,
के कारण दिया गया।
आज कुम्भ का वास्तविक संदेश
यदि कुम्भ केवल स्नान बन जाए—
तो उसका उद्देश्य अधूरा रह जाएगा।
यदि कुम्भ बने—
- ज्ञान का महोत्सव
- योग का महोत्सव
- पर्यावरण संरक्षण
- वेद प्रचार
- संस्कृत प्रचार
- आयुर्वेद प्रचार
- सेवा
- रक्तदान
- वृक्षारोपण
- स्वच्छता अभियान
तभी उसका वास्तविक उद्देश्य पूर्ण होगा।
कुम्भ से मिलने वाली मुख्य शिक्षाएँ
- समाज की एकता ही राष्ट्र की शक्ति है।
- जल का सम्मान करो।
- प्रकृति की रक्षा करो।
- ज्ञान ही वास्तविक अमृत है।
- धर्म का अर्थ सत्य और सेवा है।
- करोड़ों लोगों का अनुशासन भारत की शक्ति है।
- विज्ञान और अध्यात्म विरोधी नहीं, पूरक हैं।
उपसंहार
कुम्भ मेला भारत की हजारों वर्षों पुरानी सांस्कृतिक चेतना का जीवंत प्रतीक है। इसका वर्तमान स्वरूप पुराणों, ज्योतिष, इतिहास और संत-परम्परा से विकसित हुआ है, जबकि इसकी मूल प्रेरणा वेदों के उन सिद्धान्तों में निहित है जो एकता, जल संरक्षण, प्रकृति, यज्ञ, ज्ञान और लोककल्याण का संदेश देते हैं।
कुम्भ का वास्तविक अमृत किसी कलश में नहीं, बल्कि ज्ञान, सदाचार, आत्मसंयम, सेवा और राष्ट्र की एकता में है। यदि प्रत्येक श्रद्धालु इन मूल्यों को अपने जीवन में उतार ले, तो कुम्भ केवल एक पर्व नहीं, बल्कि मानवता के उत्थान का महायज्ञ बन सकता है।
॥ ॐ शान्तिः शान्तिः शान्तिः ॥
कुम्भ मेला : आस्था, खगोल विज्ञान और जनस्वास्थ्य का अद्भुत संगम
वैदिक दृष्टि और वैज्ञानिक परिप्रेक्ष्य में कुम्भ का वास्तविक स्वरूप
ॐ
वैदिक प्रेरणा
संगच्छध्वं संवदध्वं सं वो मनांसि जानताम्।
देवा भागं यथा पूर्वे संजानाना उपासते॥
— ऋग्वेद 10.191.2
अर्थ:
हे मनुष्यों! साथ चलो, साथ विचार करो और अपने मनों को एक करो। जैसे प्राचीन विद्वान मिलकर समाज के कल्याण का कार्य करते थे, वैसे ही तुम भी एकता और सहयोग के साथ जीवन जीओ।
भूमिका
भारत का कुम्भ मेला केवल एक धार्मिक आयोजन नहीं है, बल्कि यह भारतीय सभ्यता के खगोल विज्ञान, पर्यावरण, स्वास्थ्य, सामाजिक संगठन, ज्ञान-परम्परा और सांस्कृतिक एकता का अद्भुत संगम है।
विश्व का सबसे बड़ा शांतिपूर्ण मानव समागम होने के कारण कुम्भ मेले को वर्ष 2017 में यूनेस्को (UNESCO) ने मानवता की अमूर्त सांस्कृतिक धरोहर (Intangible Cultural Heritage) के रूप में मान्यता दी।
कुम्भ का वैज्ञानिक आधार
कुम्भ मेले का समय मनमाने ढंग से निर्धारित नहीं किया जाता।
भारतीय ज्योतिष एवं खगोल विज्ञान के अनुसार—
- सूर्य
- चन्द्रमा
- बृहस्पति (गुरु)
की विशेष खगोलीय स्थितियों के आधार पर कुम्भ का आयोजन होता है।
प्राचीन भारतीय खगोलविदों ने ग्रहों की गति, ऋतु परिवर्तन तथा कालगणना का अत्यन्त सूक्ष्म अध्ययन किया था। कुम्भ उसी वैज्ञानिक काल-निर्धारण का उत्कृष्ट उदाहरण है। यूनेस्को भी कुम्भ को खगोलीय ज्ञान, आध्यात्मिक परम्परा और सांस्कृतिक व्यवहार का अद्वितीय समन्वय मानता है।
नदी स्नान का वैज्ञानिक पक्ष
वैदिक संस्कृति में जल को जीवन का आधार माना गया है।
"आपो हि ष्ठा मयोभुवः।"
— यजुर्वेद 36.12
अर्थ: जल सुख और जीवन प्रदान करने वाला है।
वैज्ञानिक दृष्टि से स्वच्छ नदी में स्नान—
- शरीर की स्वच्छता में सहायक होता है।
- मानसिक तनाव कम करने में सहायता कर सकता है।
- सामूहिक अनुशासन और सकारात्मक भावनाओं को बढ़ावा देता है।
- प्रकृति के निकट रहने का अवसर देता है।
हालाँकि यह कहना वैज्ञानिक रूप से उचित नहीं होगा कि केवल स्नान से सभी रोग या पाप स्वतः समाप्त हो जाते हैं। स्वास्थ्य लाभ स्वच्छ जल, स्वच्छता, जीवनशैली और व्यक्तिगत परिस्थितियों पर भी निर्भर करते हैं।
जनस्वास्थ्य और सामाजिक संगठन
कुम्भ मेला केवल धार्मिक आयोजन नहीं बल्कि विशाल जन-प्रबंधन का भी अद्भुत उदाहरण है।
इसमें—
- अस्थायी नगर बसाए जाते हैं।
- स्वच्छता व्यवस्था बनाई जाती है।
- पेयजल उपलब्ध कराया जाता है।
- चिकित्सा सेवाएँ संचालित होती हैं।
- यातायात और सुरक्षा का व्यापक प्रबन्ध किया जाता है।
आज विश्व के अनेक शोधकर्ता कुम्भ मेले को Mass Gathering Management अर्थात् विशाल जनसमूह प्रबंधन का उत्कृष्ट मॉडल मानकर अध्ययन करते हैं।
ज्ञान का महाकुम्भ
प्राचीन काल में कुम्भ केवल स्नान तक सीमित नहीं था।
यह था—
- ऋषियों का सम्मेलन।
- शास्त्रार्थ का मंच।
- वेद एवं दर्शन का प्रचार।
- आयुर्वेद, योग और संस्कृति का आदान-प्रदान।
- समाज सुधार और राष्ट्रीय एकता का केन्द्र।
यही कारण है कि कुम्भ भारतीय ज्ञान-परम्परा का भी महोत्सव रहा है।
सामाजिक समरसता का संदेश
कुम्भ में देश के विभिन्न प्रदेशों, भाषाओं, परम्पराओं और सामाजिक वर्गों के लोग एकत्रित होते हैं।
यह हमें सिखाता है कि—
- सम्पूर्ण भारत एक सांस्कृतिक परिवार है।
- विविधता में ही हमारी एकता निहित है।
- सहयोग और सेवा भारतीय संस्कृति की पहचान है।
पर्यावरण संरक्षण का संदेश
वेद प्रकृति की रक्षा को धर्म मानते हैं।
यदि कुम्भ में आने वाला प्रत्येक व्यक्ति—
- नदी को प्रदूषित न करे।
- प्लास्टिक का उपयोग कम करे।
- स्वच्छता बनाए रखे।
- वृक्षों और जल का संरक्षण करे।
तो कुम्भ वास्तव में प्रकृति-पूजन का श्रेष्ठ उदाहरण बन सकता है।
कुम्भ का वास्तविक आध्यात्मिक अर्थ
कुम्भ का वास्तविक उद्देश्य केवल नदी में स्नान करना नहीं है।
बल्कि—
- मन की शुद्धि।
- आत्मचिन्तन।
- सत्संग।
- दान।
- सेवा।
- संयम।
- योग और उपासना।
यदि बाहरी स्नान के साथ मन भी द्वेष, क्रोध, लोभ और अहंकार से शुद्ध हो जाए, तभी कुम्भ की यात्रा सार्थक होती है।
इस लेख की मुख्य शिक्षाएँ
- कुम्भ मेला आस्था और विज्ञान का अद्भुत समन्वय है।
- इसका समय खगोलीय गणनाओं के आधार पर निर्धारित किया जाता है।
- यह विश्व का सबसे बड़ा शांतिपूर्ण मानव समागम है।
- यूनेस्को ने इसे मानवता की अमूर्त सांस्कृतिक धरोहर के रूप में मान्यता दी है।
- कुम्भ ज्ञान, सेवा, सामाजिक एकता और सांस्कृतिक संरक्षण का महापर्व है।
- स्वच्छता और पर्यावरण संरक्षण कुम्भ की सफलता के आवश्यक अंग हैं।
- बाहरी स्नान के साथ आन्तरिक शुद्धि ही कुम्भ का वास्तविक उद्देश्य है।
उपसंहार
कुम्भ मेला भारतीय संस्कृति की उस महान परम्परा का प्रतीक है जहाँ आस्था, खगोल विज्ञान, सामाजिक संगठन, पर्यावरण चेतना, सेवा और आध्यात्मिक साधना एक साथ दिखाई देते हैं। यह केवल एक उत्सव नहीं, बल्कि भारत की वैज्ञानिक सोच, सांस्कृतिक निरन्तरता और सामूहिक जीवन की अद्भुत अभिव्यक्ति है।
आइए, हम कुम्भ के वास्तविक संदेश को समझें—ज्ञान को अपनाएँ, प्रकृति की रक्षा करें, समाज की सेवा करें, सत्य और धर्म के मार्ग पर चलें तथा बाहरी स्नान के साथ अपने मन को भी पवित्र बनाएँ। यही कुम्भ का शाश्वत और सार्वभौमिक संदेश है।
**॥ ॐ शान्तिः शान्तिः शान्तिः ॥**

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