महाभारत, आदिपर्व, समुद्रमन्थन प्रसंग

श्लोक – १ : देवताओं की दुर्बलता और भगवान विष्णु की शरण

तेजोबलविहीनास्ते देवा इन्द्रपुरोगमाः।
विष्णुं शरणमापन्नाः सर्वलोकनमस्कृतम्॥

(महाभारत, आदिपर्व, समुद्रमन्थन प्रसंग)


शब्दार्थ

  • तेजः — तेज, प्रभाव।
  • बल — शक्ति।
  • विहीनाः — रहित हो गए।
  • देवाः — देवगण।
  • इन्द्रपुरोगमाः — इन्द्र के नेतृत्व में।
  • विष्णुम् — सर्वव्यापक परमेश्वर (महाभारत के सन्दर्भ में विष्णु)।
  • शरणम् आपन्नाः — शरण में गए।
  • सर्वलोकनमस्कृतम् — जिन्हें सभी लोक नमस्कार करते हैं।

भावार्थ

जब देवताओं का तेज और बल क्षीण हो गया तथा वे असुरों से पराजित होने लगे, तब इन्द्र सहित सभी देवगण भगवान विष्णु की शरण में गए और उनसे अपनी रक्षा तथा पुनः शक्ति प्राप्त करने का उपाय पूछा।


विस्तृत व्याख्या

समुद्र-मंथन की कथा का आरम्भ यहीं से होता है। महाभारत के अनुसार एक समय ऐसा आया जब देवताओं का तेज और सामर्थ्य कम हो गया। इसका परिणाम यह हुआ कि असुरों का प्रभाव बढ़ने लगा और देवता स्वयं को असहाय अनुभव करने लगे।

इस संकट की घड़ी में उन्होंने अपने अहंकार का त्याग किया और भगवान विष्णु की शरण ग्रहण की। यह प्रसंग हमें सिखाता है कि जब मनुष्य अपने सामर्थ्य से समस्या का समाधान नहीं कर पाता, तब उसे ज्ञान, विवेक और ईश्वरीय मार्गदर्शन का आश्रय लेना चाहिए।

यहाँ "विष्णु" का अर्थ केवल एक देवता नहीं, बल्कि पालन, व्यवस्था, संतुलन और लोककल्याण की उस दिव्य शक्ति से भी है जो संकट के समय उचित मार्ग दिखाती है।


इस श्लोक से मिलने वाली शिक्षा

  • संकट आने पर धैर्य नहीं खोना चाहिए।
  • अहंकार छोड़कर योग्य मार्गदर्शन ग्रहण करना चाहिए।
  • सामूहिक प्रयास से बड़े संकटों का समाधान सम्भव है।
  • प्रत्येक कठिनाई किसी नए समाधान की शुरुआत बन सकती है।

महाभारत के आदिपर्व (आस्तीकपर्व), अध्याय 34 में गरुड़ द्वारा अमृत लाने की घटना का सार इस प्रकार मिलता है। मूल संस्कृत पाठ विभिन्न संस्करणों में थोड़ा-बहुत भिन्न हो सकता है, लेकिन घटना यह है:

गरुड उवाच—
आनीतममृतं नागाः स्थापयामि कुशेष्वहम्।
स्नात्वा कृतशुचिर्भूत्वा ततः पिबत वः सुधाम्॥

भावार्थ:
गरुड़ ने नागों से कहा—"मैं अमृत ले आया हूँ। इसे मैं इन कुशों पर रखता हूँ। तुम पहले स्नान करके शुद्ध हो जाओ, फिर आकर अमृत का पान करना।"

इसके बाद महाभारत में वर्णन है कि—

ततः शक्रोऽमृतं गृह्य पुनरेव दिवं ययौ।

भावार्थ:
तब इन्द्र (शक्र) वहाँ से अमृत उठाकर पुनः स्वर्ग चले गए।

फिर आगे आता है—

ते कुशान् लेलिहुर्नागा अमृतस्योपलिप्सया।
द्विजिह्वास्तेन ते जाता दर्भाश्चामृतसंस्पृशाः॥

भावार्थ:
नागों ने यह समझकर कि अमृत कुशों पर लगा होगा, उन कुशों को चाटना आरम्भ किया। उसी कारण उनकी जीभ दो भागों में विभक्त हो गई और अमृत के स्पर्श से कुश (दर्भ) पवित्र माने गए।


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