सत्य, असत्य और ईश्वर की न्याय व्यवस्था का वैदिक संदेश ऋग्वेद का प्रेरणादायक मन्त्र

सत्य, असत्य और ईश्वर की न्याय व्यवस्था का वैदिक संदेश ऋग्वेद का प्रेरणादायक मन्त्र

मन्त्र

ओ३म् अमी ये देवाः स्थन त्रिष्वा रोचने दिवः।
कद् व ऋतं कदनृतं क्व प्रजा व आहुतिः।
वित्तं मे अस्य रोदसी॥

— ऋग्वेद


भूमिका

ऋग्वेद का यह गूढ़ मन्त्र मनुष्य को सत्य और असत्य के विवेक की ओर प्रेरित करता है। इसमें ऋषि परमात्मा की उस दिव्य व्यवस्था का स्मरण करते हुए प्रश्न करते हैं कि सत्य कहाँ है, असत्य कहाँ है, मनुष्य के कर्मों का वास्तविक फल क्या है और ईश्वर की न्याय व्यवस्था किस प्रकार कार्य करती है।

वेदों की विशेषता यह है कि वे मनुष्य को अंधविश्वास नहीं सिखाते, बल्कि प्रश्न पूछने, सत्य की खोज करने और तर्क एवं ज्ञान के आधार पर जीवन जीने की प्रेरणा देते हैं। यही कारण है कि वैदिक ऋषि स्वयं भी सत्य के प्रति जिज्ञासा व्यक्त करते हैं और परमात्मा की व्यवस्था को समझने का प्रयास करते हैं।

यह मन्त्र हमें स्मरण कराता है कि इस विशाल ब्रह्माण्ड में कुछ भी ईश्वर के ज्ञान और न्याय से छिपा हुआ नहीं है।


मन्त्र

ओ३म् अमी ये देवाः स्थन त्रिष्वा रोचने दिवः।
कद् व ऋतं कदनृतं क्व प्रजा व आहुतिः।
वित्तं मे अस्य रोदसी॥


शब्दार्थ

  • अमी — वे।
  • देवाः — प्रकाशमान, ज्ञानवान, दिव्य शक्तियाँ अथवा ईश्वर की व्यवस्था।
  • स्थन — स्थित हैं।
  • त्रिषु — तीनों में।
  • रोचने — प्रकाशमय लोकों में, प्रकाशित क्षेत्रों में।
  • दिवः — आकाश, द्युलोक।
  • कद् — कहाँ।
  • ऋतम् — सत्य, ईश्वर का शाश्वत नियम।
  • अनृतम् — असत्य, मिथ्या, अधर्म।
  • क्व — कहाँ।
  • प्रजाः — प्राणी, मनुष्य।
  • आहुतिः — समर्पित कर्म, यज्ञ, सत्कर्म।
  • वित्तम् — जानने योग्य ज्ञान, समझ।
  • मे — मुझे।
  • रोदसी — द्युलोक और पृथ्वी, सम्पूर्ण सृष्टि।

भावार्थ

हे परमात्मन्! यह समस्त प्रकाशित जगत आपकी व्यवस्था के अधीन है। हमें यह ज्ञान प्रदान करें कि सत्य क्या है और असत्य क्या है। मनुष्य के कर्मों का वास्तविक स्वरूप क्या है और उनका फल किस प्रकार प्राप्त होता है। हे द्युलोक और पृथ्वी के स्वामी! हमें ऐसा विवेक प्रदान करें जिससे हम आपकी न्यायपूर्ण व्यवस्था को समझकर सत्य के मार्ग पर चल सकें।


'ऋत' का वास्तविक अर्थ

मन्त्र में 'ऋत' शब्द अत्यन्त महत्वपूर्ण है।

वेदों में ऋत का अर्थ है—

  • शाश्वत सत्य।
  • ईश्वर द्वारा स्थापित प्राकृतिक नियम।
  • नैतिक व्यवस्था।
  • न्याय और धर्म।

जो व्यक्ति ऋत के अनुसार जीवन जीता है, वही वास्तविक अर्थ में धर्माचरण करता है।


'अनृत' क्या है?

अनृत का अर्थ है—

  • असत्य।
  • छल-कपट।
  • अन्याय।
  • ईश्वर के नियमों के विपरीत आचरण।
  • नैतिक पतन।

वेद स्पष्ट करते हैं कि अनृत का मार्ग प्रारम्भ में आकर्षक प्रतीत हो सकता है, किन्तु उसका परिणाम दुःख और पतन ही होता है।


ईश्वर सब कुछ जानता है

मन्त्र में द्युलोक और पृथ्वी का उल्लेख यह बताने के लिए किया गया है कि सम्पूर्ण सृष्टि ईश्वर के ज्ञान में है।

मनुष्य अपने कर्मों को समाज से छिपा सकता है, किन्तु—

  • परमात्मा से कुछ भी छिपा नहीं है।
  • प्रत्येक विचार, वचन और कर्म उसके न्याय के अधीन है।
  • इसलिए मनुष्य को सदैव सत्य और धर्म का पालन करना चाहिए।

प्रश्न पूछना ही ज्ञान का आरम्भ है

इस मन्त्र की एक विशेषता यह है कि इसमें प्रश्न किए गए हैं।

वेद हमें सिखाते हैं—

  • प्रश्न करो।
  • सत्य की खोज करो।
  • प्रमाण के आधार पर निर्णय लो।
  • विवेक से जीवन जियो।

यही वैज्ञानिक दृष्टिकोण का आधार है।


कर्म और उत्तरदायित्व

मन्त्र में आहुति का संकेत केवल अग्नि में दी जाने वाली सामग्री तक सीमित नहीं है।

वास्तविक आहुति है—

  • सत्य का पालन।
  • परोपकार।
  • ज्ञान का प्रचार।
  • सेवा।
  • ईश्वर के प्रति समर्पित कर्म।

मनुष्य का प्रत्येक श्रेष्ठ कर्म समाज और ईश्वर के प्रति एक पवित्र आहुति है।


आज के जीवन में इस मन्त्र की प्रासंगिकता

आज सूचना के युग में सत्य और असत्य के बीच भेद करना कठिन होता जा रहा है।

ऐसे समय में यह मन्त्र हमें प्रेरित करता है कि—

  • किसी भी बात को बिना प्रमाण स्वीकार न करें।
  • सत्य की खोज करें।
  • ईमानदारी से जीवन जिएँ।
  • अपने प्रत्येक कर्म के प्रति उत्तरदायी बनें।
  • ईश्वर की न्याय व्यवस्था पर विश्वास रखें।

इस मन्त्र की मुख्य शिक्षाएँ

  • सत्य और असत्य का विवेक जीवन का आधार है।
  • ईश्वर का न्याय सर्वव्यापी और निष्पक्ष है।
  • मनुष्य को प्रमाण, तर्क और ज्ञान के आधार पर जीवन जीना चाहिए।
  • प्रत्येक कर्म का परिणाम अवश्य मिलता है।
  • प्रश्न करना और सत्य की खोज करना वैदिक परम्परा का अंग है।
  • धर्म का आधार सत्य और ईश्वर के नियम हैं।
  • सदैव सत्य, न्याय और सदाचार का मार्ग अपनाना चाहिए।

उपसंहार

ऋग्वेद का यह मन्त्र हमें आत्मचिन्तन और सत्य की खोज के लिए प्रेरित करता है। यह बताता है कि ईश्वर की व्यवस्था पूर्णतः न्यायपूर्ण है और सत्य ही अन्ततः विजयी होता है। इसलिए मनुष्य को भ्रम, अज्ञान और असत्य का त्याग कर विवेक, ज्ञान और धर्म के मार्ग पर चलना चाहिए।

आइए, हम संकल्प लें कि अपने जीवन में सत्य को अपनाएँगे, प्रमाण और विवेक के आधार पर निर्णय लेंगे, अपने कर्मों को ईश्वर के प्रति समर्पित करेंगे और ऐसा जीवन जिएँगे जो स्वयं के साथ-साथ सम्पूर्ण समाज के लिए भी कल्याणकारी हो।

॥ ॐ शान्तिः शान्तिः शान्तिः ॥

 🔥 प्रश्न  :- प्रलयावस्था में सब जीव कहाँ रहते हैं  ?

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    उत्तर  :- ऋग्वेद के इस मंत्र में आपका ही प्रश्न है और इसका उत्तर भी।

   ओ३म् अमी ये देवा: स्थन त्रिष्वा रोचने दिव:।

कद् व ऋतं कदनृतं क्व प्रजा व आहुतिर्वित्तं मे अस्य रोदसी।।

   भावार्थ  :- प्रश्न  - जब सब लोकों की आहुति अर्थात् प्रलय होती है तब कार्य- कारण और जीव कहाँ रहते है? उत्तर  - सर्वव्यापी ईश्वर और आकाश में कारणरूप रूप से सब जगत् और अच्छी गाढ़ी निद्रा में सोते हुए के समान जीव रहते है। एक-एक सूर्य के प्रकाश और आकर्षण के विषय में जितने लोक है , उन सबको ईश्वर ने बनाया और धारण कर रहा है यह जानना चाहिए।

      प्रलय का लम्बा काल ( ४अरब ३२ करोड़ वर्ष  )सब जीवों के लिए समान नहीं है।जैसे गाढ़ निद्रा में सोए हुए व्यक्ति को समय के परिमाण का भान नही रहता, उसी तरह बद्ध जीवों को भी सुषुप्ति - अवस्था में रहने से प्रलय का भान नही होता। प्रन्तु मुक्त जीवात्माएं ज्ञान सहित मोक्ष के आनन्द को भोगती है , और बद्ध जीव ज्ञान रहित गाढ़ निद्रा के आनन्द को भोगा करती है । जिस प्रकार क्रमश: जगत् उत्पन्न होता है उसी प्रकार क्रमश: प्रलय को प्राप्त होता है; ईश्वर सदा एकरस रहता है। 

*🌷 ओ३म् ये त्रिषप्ता: परियन्ति विश्वा रूपाणि बिभ्रत:।*

*वाचस्पतिर्बला तेषां तन्वोऽअद्य दधातु मे । ( अथर्ववेद)*

💐जो इकीस तत्व ( ३×७=२१) सम्पूर्ण सृष्टि के विविध रूपों वाले पदार्थों को धारण करते हैं, चराचर आदि सबका धारक, सर्वव्यापक, प्रजापति परमेश्वर उनके बलों को आज मेरे लिए प्रदान करे, मेरे भीतर धारण करे ।



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