‼️🚩ओ३म्‼️🚩
श्रेष्ठ गुणों का अनुसरण और कल्याणमय जीवन का वैदिक संदेश ऋग्वेद 7.35.15 का प्रेरणादायक उपदेश
ॐ
मन्त्र
— ऋग्वेद 7.35.15
भूमिका
ऋग्वेद का यह मंगलमय मन्त्र मनुष्य को श्रेष्ठ गुणों को अपनाने, सत्य का अनुसरण करने तथा ईश्वर की कल्याणकारी व्यवस्था में जीवन व्यतीत करने की प्रेरणा देता है। वेदों में 'देव' शब्द का अर्थ केवल किसी विशेष सत्ता से नहीं, बल्कि प्रकाश देने वाले, ज्ञानवान, उपकारी और श्रेष्ठ गुणों से युक्त व्यक्तियों अथवा दिव्य शक्तियों से भी है।
यह मन्त्र उन सभी महान गुणों, विद्वानों और सत्यनिष्ठ महापुरुषों का स्मरण करता है जो धर्म, यज्ञ, सत्य और लोककल्याण के मार्ग पर चलकर मानव समाज का मार्गदर्शन करते हैं। साथ ही परमात्मा से प्रार्थना की जाती है कि वे हमें भी ऐसे ही गुण प्रदान करें और सदैव कल्याण के मार्ग पर सुरक्षित रखें।
मन्त्र
— ऋग्वेद 7.35.15
शब्दार्थ
- ये — जो।
- देवानाम् — विद्वानों, उपकारी जनों अथवा दिव्य गुणों वाले।
- यज्ञियाः — यज्ञ के योग्य, सम्माननीय, पूजनीय।
- यज्ञियानाम् — श्रेष्ठ कर्म करने वालों में भी श्रेष्ठ।
- मनोः — मननशील, बुद्धिमान मनुष्यों के।
- यजत्राः — आदरणीय, उपासना एवं सम्मान के योग्य।
- अमृताः — अमर ज्ञान वाले, जिनकी शिक्षाएँ कालातीत हैं।
- ऋतज्ञाः — सत्य, न्याय और ईश्वर के नियमों को जानने वाले।
- ते — वे।
- नः — हमें।
- रासन्ताम् — प्रदान करें।
- उरूगायम् — महान यश, व्यापक कल्याण, उत्कृष्ट जीवन।
- अद्य — आज, अभी।
- यूयम् — आप सब।
- पात — रक्षा करें।
- स्वस्तिभिः — कल्याण, सुख, शान्ति और मंगल के साधनों से।
- सदा — सदैव।
- नः — हमारी।
भावार्थ
जो महान, उपकारी, सत्यनिष्ठ, यज्ञशील और ईश्वर के शाश्वत नियमों को जानने वाले विद्वान एवं दिव्य गुण हैं, वे हमें आज और सदैव श्रेष्ठ ज्ञान, व्यापक कल्याण तथा उत्तम जीवन प्रदान करें। परमात्मा हमें अपने कल्याणकारी साधनों से सदैव सुरक्षित रखें और सत्य, धर्म तथा मंगल के मार्ग पर चलने की शक्ति दें।
'देव' का वैदिक अर्थ
इस मन्त्र में 'देव' शब्द का अर्थ समझना अत्यन्त आवश्यक है।
वेदों में देव का अर्थ है—
- प्रकाश देने वाला।
- ज्ञानवान।
- उपकारी।
- सद्गुणों से सम्पन्न।
- समाज का हित करने वाला।
इस प्रकार जो व्यक्ति अपने ज्ञान, चरित्र और सेवा से समाज का कल्याण करता है, वह वैदिक दृष्टि में देवतुल्य है।
'यज्ञिय' कौन है?
मन्त्र में ऐसे लोगों को 'यज्ञिय' कहा गया है।
यज्ञिय वह है—
- जो सत्य का पालन करे।
- जो परोपकार करे।
- जो समाज के हित में कार्य करे।
- जो ईश्वर की उपासना और श्रेष्ठ कर्मों में लगा रहे।
- जिसका जीवन दूसरों के लिए प्रेरणा बने।
ऐसे व्यक्तियों का सम्मान करना ही वैदिक संस्कृति की पहचान है।
'ऋतज्ञ' का महत्व
मन्त्र में महापुरुषों को 'ऋतज्ञ' कहा गया है।
ऋत का अर्थ है—ईश्वर का शाश्वत नियम, सत्य और प्राकृतिक व्यवस्था।
ऋतज्ञ वह है—
- जो सत्य को जानता है।
- जो न्यायप्रिय है।
- जो प्रकृति और ईश्वर के नियमों का पालन करता है।
- जो अपने ज्ञान को समाज के हित में उपयोग करता है।
'अमृत' का वास्तविक अर्थ
यहाँ अमृत का अर्थ शरीर से अमर होना नहीं है।
वास्तविक अमरता है—
- सत्य का अमर होना।
- ज्ञान का अमर होना।
- श्रेष्ठ चरित्र का अमर होना।
- सत्कर्मों का युगों तक स्मरण किया जाना।
महापुरुष अपने शरीर से नहीं, बल्कि अपने आदर्शों से अमर होते हैं।
'स्वस्ति' का व्यापक अर्थ
मन्त्र के अन्त में कहा गया है—
"यूयं पात स्वस्तिभिः सदा नः।"
स्वस्ति का अर्थ केवल शुभकामना नहीं है।
इसका अर्थ है—
- शारीरिक स्वास्थ्य।
- मानसिक शान्ति।
- नैतिक जीवन।
- सामाजिक सद्भाव।
- आध्यात्मिक उन्नति।
- ईश्वर की कृपा।
अर्थात् हमारा सम्पूर्ण जीवन कल्याणमय बने।
आज के जीवन के लिए प्रेरणा
आज समाज को ऐसे व्यक्तियों की आवश्यकता है जो—
- सत्य बोलें।
- न्याय करें।
- समाज की सेवा करें।
- ज्ञान का प्रसार करें।
- पर्यावरण की रक्षा करें।
- मानवता को जोड़ने का कार्य करें।
ऐसे ही लोग वैदिक दृष्टि में यज्ञिय, ऋतज्ञ और देवतुल्य हैं।
इस मन्त्र की मुख्य शिक्षाएँ
- श्रेष्ठ और विद्वान व्यक्तियों का सम्मान करना चाहिए।
- सत्य और ईश्वर के नियमों को जानना ही वास्तविक ज्ञान है।
- यज्ञ का अर्थ लोककल्याण और श्रेष्ठ कर्म है।
- अमरता सत्कर्मों और आदर्शों से प्राप्त होती है।
- समाज का कल्याण ही मनुष्य का सर्वोच्च धर्म है।
- परमात्मा से सदैव कल्याण और सद्बुद्धि की प्रार्थना करनी चाहिए।
- स्वस्ति का अर्थ सम्पूर्ण जीवन का मंगल है।
उपसंहार
ऋग्वेद 7.35.15 का यह दिव्य मन्त्र हमें सिखाता है कि हम अपने जीवन में ज्ञान, सत्य, सेवा और सदाचार को स्थान दें। महान व्यक्तियों के आदर्शों का अनुसरण करें, ईश्वर के शाश्वत नियमों का पालन करें और समाज के कल्याण के लिए कार्य करें। यही जीवन को सार्थक और अमर बनाता है।
आइए, हम इस वैदिक संदेश को अपने जीवन का आदर्श बनाएँ। सत्य का अनुसरण करें, श्रेष्ठ गुणों को अपनाएँ, लोककल्याण के कार्यों में सहभागी बनें और परमात्मा से प्रार्थना करें कि वह हमें सदैव स्वस्ति, अर्थात् सम्पूर्ण कल्याण, शान्ति और धर्ममय जीवन प्रदान करे।
॥ ॐ शान्तिः शान्तिः शान्तिः ॥
🔥 मकर संक्रान्ति
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मकर संक्रान्ति हिन्दूओं का प्रमुख पर्व है। मकर संक्रान्ति पूरे भारत और नेपाल में किसी न किसी रूप में मनाया जाता है। पौष मास में जब सूर्य मकर राशि पर आता है तब इस पर्व को मनाया जाता है। वर्तमान शताब्दी में यह त्यौहार जनवरी माह के चौदहवे या पन्द्रहवें दिन ही पड़ता हैं। इस दिन सूर्य धनु राशि को छोड़ मकर राशि में प्रवेश करता है।
मकर संक्रान्ति उत्तरायण से भिन्न हैं मकर संक्रान्ति पर्व को कहीं कहीं उत्तरायणी भी कहते हैं, यह भ्रान्ति गलत है कि उत्तरायण भी मकर संक्रान्ति को ही होता है।उत्तरायण का प्रारंभ २१ दिसम्बर को ही हो जाता है।
उत्तरायण और दक्षिणायन
सूर्य की एक दशा है उत्तरायण ( उत्तर + अयन ) का शाब्दिक अर्थ है उत्तर में गमन। उत्तरायण में सूर्य उत्तर की ओर बढ़ता हैं उत्तरायण की दशा में पृथ्वी के उत्तरी गोलार्ध में दिन लम्बे ओर रातें छोटी होने लगती हैं।
उत्तरायण का आरम्भ २१ दिसम्बर को होता है। यह दशा २१ जून तक चलती है। २१ जून को दक्षिणायन होता है।
उत्तरायण और दक्षिणायन को समझने के लिए उत्तर और दक्षिण को समझना होगा। सूर्य से कुछ तय न करें क्योंकि वह हर रोज न तो पूर्व से उगता है और न पश्चिम में डूबता है।वह ऐसा केवल दो दिन में ही करता है - २१ मार्च और २१ सितम्बर । २१ मार्च और २१ सितम्बर को दिन और रात बराबर होते हैं।
२१ मार्च के बाद सूर्य रोज़ धीरे धीरे पूर्व से खिसक कर उत्तर की ओर बढ़ता जाता है, याने यह केवल पूर्व में न उग कर थोड़ा- थोड़ा उत्तर- पूर्व में उगता है। ऐसाकरते करते २१ जून आ जाता है, २१ जून को सूर्य सबसे अधिक पूर्वोत्तर में उगता है। फिर यह वापस पूर्व की ओर लौटना शुरू करता है। इसी को दक्षिणायन कहते है। दक्षिणायन यानि जब सूर्योदय दक्षिण की ओर बढने लगे।
२१ सितम्बर को सूर्य वापस ठोक पूर्व में उगता है और उसके बाद दक्षिण की ओर उगना शुरू कर देता है। हर दिन वह थोड़ा दक्षिण पूर्व में उगता हुआ दिखाई देता है। ऐसा करते करते २१ दिसम्बर आ जाता है उस दिन सूर्य सर्वाधिक दक्षिण- पूर्व में उगा होता है। फिर अगले दिन से वह वापस पूर्व की ओर लौटने लगता है इसी को उत्तरायण कहते है।
🌷 ओ३म् ये देवानां यज्ञिया यज्ञियानां मनोर्यजत्रा अमृता ऋतज्ञा:। ते नो रासन्तामुरूगायमद्य यूयं पात स्वस्तिभि: सदा न:।(ऋग्वेद ७|३५|१५)
💐अर्थ :- पूजनीय विद्वान्, यज्ञमय जीवन वाले ज्ञानी, यशस्वी देव जन, धर्म के जानने हारे हमको उत्तम ज्ञान का उपदेश करें। हे देवों ! आप अनेक सुखों द्वारा सदा हमारी रक्षा करें।

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