ईश्वर दयालु और न्यायप्रिय है

 

पृथ्वी माता का सम्मान और धर्ममय जीवन का वैदिक संदेश यजुर्वेद 18.30 का प्रेरणादायक वैदिक उपदेश

पृथ्वी माता का सम्मान और धर्ममय जीवन का वैदिक संदेश यजुर्वेद 18.30 का प्रेरणादायक वैदिक उपदेश

मन्त्र

ओ३म् वाजस्य नु प्रसवे मातरं महीम् अदितिं नाम वचसा करामहे।
यस्यामिदं विश्वं भुवनमाविवेश तस्यां नो देवः सविता धर्म साविषत्॥

— यजुर्वेद 18.30


भूमिका

यजुर्वेद का यह दिव्य मन्त्र पृथ्वी के प्रति कृतज्ञता, प्रकृति के सम्मान और धर्ममय जीवन का अनुपम संदेश देता है। वेदों में पृथ्वी को केवल मिट्टी का एक गोला नहीं माना गया, बल्कि समस्त प्राणियों का पालन-पोषण करने वाली माता कहा गया है। वह हमें अन्न, जल, औषधियाँ, वन, खनिज और जीवन के लिए आवश्यक सभी साधन प्रदान करती है।

यह मन्त्र हमें सिखाता है कि जिस पृथ्वी पर समस्त प्राणी निवास करते हैं, उसके प्रति सम्मान, संरक्षण और कृतज्ञता का भाव रखना प्रत्येक मनुष्य का कर्तव्य है। साथ ही हम प्रार्थना करते हैं कि परमात्मा हमें इसी पृथ्वी पर धर्म, न्याय और सत्कर्म के मार्ग पर चलाए।


मन्त्र

ओ३म् वाजस्य नु प्रसवे मातरं महीम् अदितिं नाम वचसा करामहे।
यस्यामिदं विश्वं भुवनमाविवेश तस्यां नो देवः सविता धर्म साविषत्॥

— यजुर्वेद 18.30


शब्दार्थ

  • वाजस्य — अन्न, बल, समृद्धि एवं जीवनोपयोगी साधनों का।
  • नु — निश्चय ही।
  • प्रसवे — उत्पत्ति, पोषण और विकास के लिए।
  • मातरम् — माता।
  • महीम् — महान पृथ्वी।
  • अदितिम् — अखण्ड, सबका पालन करने वाली, उदार।
  • नाम — नाम से, रूप में।
  • वचसा — वाणी से, श्रद्धापूर्वक।
  • करामहे — हम स्तुति करते हैं, सम्मान करते हैं।
  • यस्याम् — जिसमें।
  • इदम् विश्वम् भुवनम् — यह सम्पूर्ण संसार और सभी प्राणी।
  • आविवेश — निवास करते हैं।
  • तस्याम् — उसी पृथ्वी पर।
  • देवः सविता — प्रेरणा देने वाला परमात्मा।
  • धर्म — सत्य, न्याय, कर्तव्य और सदाचार।
  • साविषत् — स्थापित करे, प्रेरित करे।

भावार्थ

हम उस महान पृथ्वी माता का श्रद्धापूर्वक सम्मान करते हैं, जो समस्त प्राणियों का पालन-पोषण करती है और हमें अन्न, बल तथा जीवन के आवश्यक साधन प्रदान करती है। इसी पृथ्वी पर सम्पूर्ण संसार निवास करता है। उस परम प्रेरक परमात्मा से हमारी प्रार्थना है कि वह हमें इसी पृथ्वी पर धर्म, सत्य, न्याय और सदाचार के मार्ग पर चलाए।


पृथ्वी माता क्यों?

वेदों में पृथ्वी को माता इसलिए कहा गया है क्योंकि—

  • वह सभी प्राणियों का समान रूप से पालन करती है।
  • बिना किसी भेदभाव के अन्न और जल प्रदान करती है।
  • औषधियाँ, वन और खनिज उपलब्ध कराती है।
  • समस्त जीवन को आश्रय देती है।

जिस प्रकार माता अपने बच्चों का पालन करती है, उसी प्रकार पृथ्वी सम्पूर्ण जीव-जगत का पालन करती है।


'अदिति' का वास्तविक अर्थ

मन्त्र में पृथ्वी को अदिति कहा गया है।

अदिति का अर्थ है—

  • जो खण्डित न हो।
  • जो सबको अपने भीतर स्थान दे।
  • जो उदार और पालन करने वाली हो।

यह हमें सिखाता है कि पृथ्वी किसी एक व्यक्ति, जाति या राष्ट्र की नहीं, बल्कि सम्पूर्ण मानवता और समस्त प्राणियों की साझा धरोहर है।


'वाज' का व्यापक अर्थ

मन्त्र में वाज शब्द का अर्थ केवल अन्न नहीं है।

इसका व्यापक अर्थ है—

  • अन्न।
  • बल।
  • ऊर्जा।
  • समृद्धि।
  • स्वास्थ्य।
  • जीवन के सभी आवश्यक साधन।

पृथ्वी इन सभी का स्रोत है। इसलिए उसका संरक्षण मानव जीवन के लिए अनिवार्य है।


धर्म का वैदिक स्वरूप

मन्त्र के अन्त में प्रार्थना की गई है—

"देवः सविता धर्म साविषत्।"

अर्थात् परमात्मा हमें धर्म में प्रेरित करे।

यहाँ धर्म का अर्थ किसी सम्प्रदाय या पूजा-पद्धति से नहीं है, बल्कि—

  • सत्य बोलना।
  • न्याय करना।
  • कर्तव्य का पालन करना।
  • प्रकृति की रक्षा करना।
  • ईमानदारी और सदाचार से जीवन जीना।
  • सभी प्राणियों के प्रति करुणा रखना।

यही वैदिक धर्म है।


पर्यावरण संरक्षण का वैदिक संदेश

यह मन्त्र स्पष्ट करता है कि पृथ्वी का सम्मान केवल शब्दों से नहीं, बल्कि कर्मों से होना चाहिए।

आज—

  • वनों की कटाई,
  • जल प्रदूषण,
  • वायु प्रदूषण,
  • भूमि का अंधाधुंध दोहन,
  • और जलवायु परिवर्तन

मानव जीवन के लिए गंभीर चुनौती बन चुके हैं।

इस मन्त्र का संदेश है कि पृथ्वी से केवल लेना ही नहीं, बल्कि उसकी रक्षा करना भी हमारा कर्तव्य है।


आज के जीवन में इस मन्त्र की प्रासंगिकता

यदि प्रत्येक व्यक्ति—

  • जल का संरक्षण करे।
  • अधिक से अधिक वृक्ष लगाए।
  • भूमि को प्रदूषित न करे।
  • प्राकृतिक संसाधनों का संयमित उपयोग करे।
  • धर्म, सत्य और न्याय का पालन करे।

तो पृथ्वी आने वाली पीढ़ियों के लिए भी समृद्ध और जीवनदायिनी बनी रहेगी।


इस मन्त्र की मुख्य शिक्षाएँ

  • पृथ्वी सम्पूर्ण मानवता की माता है।
  • प्रकृति का सम्मान और संरक्षण हमारा कर्तव्य है।
  • अन्न, जल और जीवन के सभी साधनों का मूल स्रोत पृथ्वी है।
  • धर्म का अर्थ सत्य, न्याय और सदाचार है।
  • परमात्मा हमें धर्ममय जीवन जीने की प्रेरणा देता है।
  • पर्यावरण की रक्षा ही भविष्य की रक्षा है।
  • कृतज्ञता और संयम वैदिक जीवन के मूल आधार हैं।

उपसंहार

यजुर्वेद 18.30 का यह मन्त्र हमें स्मरण कराता है कि हम पृथ्वी के स्वामी नहीं, बल्कि उसके उत्तरदायी संरक्षक हैं। यह महान धरा हमें जीवन देती है, हमारा पालन करती है और हमारी प्रत्येक आवश्यकता की पूर्ति करती है। इसलिए हमारा धर्म है कि हम उसका सम्मान करें, उसका संरक्षण करें और परमात्मा की प्रेरणा से सत्य, न्याय और सदाचार का जीवन जिएँ।

आइए, हम संकल्प लें कि पृथ्वी माता की रक्षा करेंगे, प्राकृतिक संसाधनों का विवेकपूर्ण उपयोग करेंगे, पर्यावरण को स्वच्छ रखेंगे और अपने जीवन को धर्ममय बनाएँगे। यही यजुर्वेद के इस दिव्य मन्त्र का शाश्वत और सार्वभौमिक संदेश है।

॥ ॐ शान्तिः शान्तिः शान्तिः ॥

  ईश्वर को दयालु और न्यायप्रिय कहा गया है। ईश्वर निष्काम भाव से जीवात्माओं के कर्म और भोग के निमित सृष्टि का निर्माण करते है।  ताकि मनुष्य रूपी आत्मा उत्तम कर्म कर मुक्ति को प्राप्त कर सके। ईश्वर जीवात्माओं के शुभ-अशुभ कर्मों के अनुसार बिना पक्षपात के सुख-दुःख रूपी फल देते है।  यही उनकी न्याय प्रियता है।  

   कुछ लोग यह शंका करते है कि यदि ईश्वर पुण्य के समान पापों का भी फल उसी अनुपात में देता हैं।  तो फिर वह दयालु कैसे? क्योंकि अपराधी को क्षमा करना दया है। जब ईश्वर पापों को क्षमा ही नहीं करता तो फिर दयालु कैसे सिद्ध हुआ? अगर ईश्वर न्यायकारी है? उसी अनुपात में दंड देता है। तो फिर वह दयालु हो ही नहीं सकता। दयालु और न्याय प्रियता दोनों विपरीत गुण हैं। दोनों ही गुण ईश्वर के कैसे हो सकते है?

   इस शंका का मूल कारण दयालु का यथार्थ अर्थ को नहीं समझना है। एक अपराधी को क्षमा करके छोड़ देना , दया नहीं। उसके और सब जगत के साथ अन्याय करना है। पापी को पाप का दण्ड अवश्य मिलना चाहिए। दण्ड का उद्देश्य अपराधी सुधार, दूसरों को उससे और उस जैसे लोगों से बचाना और धर्म नीति तथा राज नियम के महत्व को समाज में स्थापित रखना है।  दण्ड मिलने में ही पापी का भला है। उसे दण्ड न देना उसके दोषों को बढ़ाना है। और वह उस पर अत्याचार करना है।

  सत्य तो यह है कि परिणाम की दृष्टि से न्याय और दया का नाम मात्र भेद है। क्योंकि जो न्याय से प्रयोजन सिद्ध होता है, वही दया से। दण्ड देने का प्रयोजन है कि मनुष्य अपराध करने से बंद होकर दुखों को प्राप्त न हो। वही दया कहलाती है, जो पराये दुःखों का छुड़ाना है।  इन दोनों का इतना ही भेद है कि जो मन में सब की सुख देने और दुःख छुड़ाने की इच्छा एवं कृपा करना है। वह दया और उपकार की दृष्टि से न्याय कहलाता है। दोनों का प्रयोजन जीवात्माओं को  पाप और दुःखों से दूर करना हैं। 

  इसलिए तीर्थ यात्रा या गंगा स्नान से मुक्ति, पीर या कब्र पूजा से बरकत, गिरिजा घर में जाकर प्रार्थना से पाप क्षमा होना,  केवल इस्लाम और रसूल पर विश्वास से जन्नत का नसीब होना सब भ्रम हैं। मनुष्य जैसे कर्म करेगा उसे वैसा ही फल निश्चित रूप से मिलेगा।    

  दण्ड को न्याय और उसके प्रयोजन को दया कहते है।

🌷ओ३म् वाजस्य नु प्रसवे मातरं महीमदितिं नाम वचसा करामहे।यस्यामिदं विश्वं भुवनमाविवेश तस्यां नो देव: सविता धर्म साविषत्॥ यजुर्वेद १८-३०॥

💐 अर्थ :- उस ईश्वर ने इस धरती मां की रचना की है। यह धरती ममां हम सबको धारण किए हुए है। हमें अपनी इस धरती मां  से प्यार करना चाहिए और इसकी उपासना करनी चाहिए । उस ईश्वर के आशीर्वाद के साथ इसकी राजनीतिक और आर्थिक स्वतंत्रता के लिए पवित्र कर्म करने चाहिए।



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