त्रिफला : आयुर्वेद का अमृतयोग

 


त्रिफला : आयुर्वेद का अमृतयोग

चरक संहिता एवं सुश्रुत संहिता के प्रमाणों पर आधारित त्रिफला का आयुर्वेदिक महत्व


भूमिका

आयुर्वेद में कुछ ऐसे योग हैं जिन्हें दैनिक स्वास्थ्य संरक्षण के लिए अत्यन्त उपयोगी माना गया है। उनमें त्रिफला का स्थान सर्वोपरि है। "त्रिफला" का अर्थ है—तीन फलों का योग। यह तीन औषधियों से मिलकर बनता है—

  • हरितकी (हरड़)
  • विभीतकी (बहेड़ा)
  • आमलकी (आँवला)

महर्षि चरक और सुश्रुत दोनों ने त्रिफला तथा इसके प्रत्येक घटक के गुणों का विस्तार से वर्णन किया है। आयुर्वेद में इसे पाचन, रसायन (पुनर्योजक), नेत्रहित, रक्तशोधक तथा दोष-संतुलक योग माना गया है।


त्रिफला का आयुर्वेदिक स्वरूप

आयुर्वेद में त्रिफला तीन महान औषधियों का संतुलित संयोजन है—

  • हरितकी – मुख्यतः वात का शमन।
  • विभीतकी – मुख्यतः कफ का शमन।
  • आमलकी – मुख्यतः पित्त का शमन।

इसी कारण त्रिफला को त्रिदोषहर (वात, पित्त और कफ के संतुलन में सहायक) माना गया है।


चरक संहिता का प्रमाण

महर्षि चरक ने हरितकी, विभीतकी और आमलकी को श्रेष्ठ रसायन द्रव्यों में स्थान दिया है।

"हरीतकी आमलकी विभीतकी च रसायनानि।"

— चरक संहिता, चिकित्सास्थान (रसायन अध्याय)

भावार्थ

हरितकी, आमलकी और विभीतकी शरीर को पुष्ट करने वाले, दीर्घायु प्रदान करने वाले तथा स्वास्थ्य की रक्षा करने वाले रसायन द्रव्य हैं।


सुश्रुत संहिता का प्रमाण

महर्षि सुश्रुत त्रिफला के गुणों का वर्णन करते हुए कहते हैं—

"त्रिफला मधुरा रुक्षा कषाया दोषत्रयापहा।
चक्षुष्या दीपनी मेध्या रसायनवरा मता॥"

— सुश्रुत संहिता (द्रव्यगुण वर्णन)

भावार्थ

त्रिफला—

  • त्रिदोष का संतुलन करने में सहायक है।
  • नेत्रों के लिए हितकारी है।
  • पाचनशक्ति को सुधारती है।
  • बुद्धि और स्मरणशक्ति के लिए लाभकारी मानी गई है।
  • श्रेष्ठ रसायन (पुनर्योजक) औषधि है।

टिप्पणी: उपर्युक्त श्लोक पारम्परिक आयुर्वेदिक ग्रन्थों में प्रचलित है। विभिन्न संस्करणों में पाठभेद मिल सकते हैं।


त्रिफला के तीनों घटकों का महत्व

१. हरितकी (हरड़)

आयुर्वेद में हरितकी को "अभया" भी कहा गया है।

इसके प्रमुख गुण—

  • पाचन में सहायक।
  • मल त्याग को नियमित रखने में सहायक।
  • वात दोष के संतुलन में उपयोगी।
  • रसायन गुणयुक्त।

२. विभीतकी (बहेड़ा)

विभीतकी मुख्यतः कफ दोष के संतुलन के लिए प्रसिद्ध है।

इसके गुण—

  • कफ का शमन।
  • गले और श्वसन तंत्र के लिए हितकारी।
  • पाचन में सहायक।
  • शरीर की शुद्धि में उपयोगी।

३. आमलकी (आँवला)

आमलकी को आयुर्वेद में श्रेष्ठ रसायन माना गया है।

इसके गुण—

  • पित्त का संतुलन।
  • पाचन में सहायता।
  • नेत्रों के लिए हितकारी।
  • शरीर के पोषण में सहायक।

त्रिफला के आयुर्वेदिक लाभ

आयुर्वेद के अनुसार त्रिफला—

  • पाचनशक्ति को संतुलित रखने में सहायक है।
  • मलोत्सर्ग को नियमित रखने में सहायता करती है।
  • शरीर की प्राकृतिक शुद्धि में सहयोग करती है।
  • नेत्र स्वास्थ्य के लिए हितकारी मानी गई है।
  • रसायन होने के कारण दीर्घकालीन स्वास्थ्य संरक्षण में उपयोगी मानी जाती है।
  • त्रिदोष के संतुलन में सहायक है।

रसायन का वास्तविक अर्थ

आयुर्वेद में रसायन का अर्थ केवल आयु बढ़ाने वाली औषधि नहीं है।

रसायन वह है जो—

  • शरीर का पोषण करे।
  • रोग-प्रतिरोधक क्षमता का समर्थन करे।
  • धातुओं के संतुलन में सहायता करे।
  • स्वस्थ वृद्धावस्था की दिशा में योगदान दे।
  • स्वास्थ्य की रक्षा में सहायक हो।

इसी कारण त्रिफला को प्रमुख रसायन योगों में गिना जाता है।


त्रिफला का विवेकपूर्ण प्रयोग

आयुर्वेद में त्रिफला का उपयोग व्यक्ति की प्रकृति, आयु, ऋतु और स्वास्थ्य की स्थिति को ध्यान में रखकर किया जाता है।

इसलिए—

  • सभी व्यक्तियों के लिए एक जैसी मात्रा उपयुक्त नहीं होती।
  • किसी रोग के उपचार हेतु इसका उपयोग योग्य आयुर्वेदाचार्य की सलाह से करना चाहिए।
  • गर्भवती महिलाओं, बच्चों, बुज़ुर्गों या गंभीर रोगियों को बिना चिकित्सकीय परामर्श औषधीय मात्रा में सेवन नहीं करना चाहिए।

आयुर्वेद की मूल शिक्षा

महर्षि चरक कहते हैं—

"स्वस्थस्य स्वास्थ्यरक्षणं आतुरस्य विकारप्रशमनं च।"

— चरक संहिता, सूत्रस्थान 30/26

भावार्थ

आयुर्वेद का प्रथम उद्देश्य स्वस्थ व्यक्ति के स्वास्थ्य की रक्षा करना और रोगी के रोगों का उचित उपचार करना है।

त्रिफला का महत्व भी इसी सिद्धान्त में निहित है—स्वास्थ्य की रक्षा और शरीर के संतुलन का समर्थन।


आज के जीवन में त्रिफला की प्रासंगिकता

आज अनियमित दिनचर्या, असंतुलित भोजन, तनाव और शारीरिक निष्क्रियता के कारण पाचन एवं जीवनशैली से जुड़ी समस्याएँ बढ़ रही हैं।

आयुर्वेद हमें स्मरण कराता है कि केवल औषधियों पर निर्भर रहने के बजाय—

  • संतुलित आहार,
  • नियमित व्यायाम,
  • योग और प्राणायाम,
  • पर्याप्त निद्रा,
  • और उचित आयुर्वेदिक मार्गदर्शन

के साथ स्वास्थ्य की रक्षा करनी चाहिए। त्रिफला इस समग्र दृष्टिकोण का एक महत्वपूर्ण अंग माना गया है।


इस लेख की मुख्य शिक्षाएँ

  • त्रिफला तीन श्रेष्ठ फलों का संतुलित आयुर्वेदिक योग है।
  • इसे आयुर्वेद में रसायन और स्वास्थ्य-संरक्षक माना गया है।
  • यह त्रिदोष संतुलन में सहायक मानी गई है।
  • पाचन और नेत्रहित के संदर्भ में इसका विशेष महत्व वर्णित है।
  • औषधि का उपयोग व्यक्ति की प्रकृति के अनुसार होना चाहिए।
  • स्वास्थ्य की रक्षा ही आयुर्वेद का प्रथम उद्देश्य है।

उपसंहार

त्रिफला भारतीय आयुर्वेद की एक अत्यन्त प्रसिद्ध और प्राचीन औषधीय परंपरा है। महर्षि चरक और महर्षि सुश्रुत ने इसके गुणों का वर्णन करते हुए इसे स्वास्थ्य संरक्षण, पाचन, रसायन और संतुलित जीवन के लिए महत्वपूर्ण माना है।

किन्तु आयुर्वेद यह भी सिखाता है कि कोई भी औषधि तभी अधिक लाभकारी होती है जब उसके साथ सात्त्विक आहार, संयमित दिनचर्या, योग, प्राणायाम और सदाचार भी जुड़े हों। इसलिए त्रिफला को चमत्कारिक उपाय के रूप में नहीं, बल्कि आयुर्वेद की समग्र जीवनशैली का एक अंग समझना चाहिए।

॥ ॐ सर्वे सन्तु निरामयाः ॥

 प्रचलित , उदर रोग --*    घटक - अजवाइन, मेथी , हालो , काला जीरा , छोटी हरड, काला नमक , सभी संमभाग लेकर - इसे सुष्म पीस ले ।   *मात्रा-*   एक-एक चम्मच, भोजन के बाद- गर्म पानी से, दोनों समय।  *उपयोग --*  यह योग, पाचन को - सुधार कर, वात रोग बढ़ने से-  रोकता है,  मेद को- जलाता है - इसलिए - मोटापा कम करने में भी, सहायक है। शिवा आयुर्वेद

त्रिफला सेवन के लाभ

⭐🔹⭐🔹⭐🔹⭐

1⭐ शिशिर ऋतू में ( 14 जनवरी से 13 मार्च) 5 ग्राम त्रिफला को आठवां भाग छोटी पीपल का चूर्ण मिलाकर सेवन करें।

2⭐ बसंत ऋतू में (14 मार्च से 13 मई) 5 ग्राम त्रिफला को बराबर का शहद मिलाकर सेवन करें।

3⭐ ग्रीष्म ऋतू में (14 मई से 13 जुलाई ) 5 ग्राम त्रिफला को चोथा भाग गुड़ मिलाकर सेवन करें।

4⭐ वर्षा ऋतू में (14 जुलाई से 13 सितम्बर) 5 ग्राम त्रिफला को छठा भाग सैंधा नमक मिलाकर सेवन करें।

5⭐ शरद ऋतू में(14 सितम्बर से 13 नवम्बर) 5 ग्राम त्रिफला को चोथा भाग देशी खांड/शक्कर मिलाकर सेवन करें।

6⭐ हेमंत ऋतू में (14 नवम्बर से 13 जनवरी) 5 ग्राम त्रिफला को छठा भाग सौंठ का चूर्ण मिलाकर सेवन करें।

          ओषधि के रूप में त्रिफला 

⭐ रात को सोते वक्त 5 ग्राम (एक चम्मच भर) त्रिफला चुर्ण हल्के गर्म दूध अथवा गर्म पानी के साथ लेने से कब्ज दूर होता है।

अथवा त्रिफला व ईसबगोल की भूसी दो चम्मच मिलाकर शाम को गुनगुने पानी से लें इससे कब्ज दूर होता है।

इसके सेवन से नेत्रज्योति में आश्चर्यजनक वृद्धि होती है।

⭐ सुबह पानी में 5 ग्राम त्रिफला चूर्ण साफ़ मिट्टी के बर्तन में भिगो कर रख दें, शाम को छानकर पी ले। शाम को उसी त्रिफला चूर्ण में पानी मिलाकर रखें, इसे सुबह पी लें। इस पानी से आँखें भी धो ले। मुँह के छाले व आँखों की जलन कुछ ही समय में ठीक हो जायेंग।

⭐ शाम को एक गिलास पानी में एक चम्मच त्रिफला भिगो दे सुबह मसल कर नितार कर इस जल से आँखों को धोने से नेत्रों की ज्योति बढती है।

⭐ एक चम्मच बारीख त्रिफला चूर्ण, गाय का घी10 ग्राम व शहद 5 ग्राम एक साथ मिलाकर नियमित सेवन करने से आँखों का मोतियाबिंद, काँचबिंदु, द्रष्टि दोष आदि नेत्ररोग दूर होते है। और बुढ़ापे तक आँखों की रोशनी अचल रहती है।

⭐ त्रिफला के चूर्ण को गौमूत्र के साथ लेने से अफारा, उदर शूल, प्लीहा वृद्धि आदि अनेकों तरह के पेट के रोग दूर हो जाते है।

⭐ त्रिफला शरीर के आंतरिक अंगों की देखभाल कर सकता है, त्रिफला की तीनों जड़ीबूटियां आंतरिक सफाई को बढ़ावा देती हैं।

⭐ चर्मरोगों में (दाद, खाज, खुजली, फोड़े-फुंसी आदि) सुबह-शाम 6 से 8 ग्राम त्रिफला चूर्ण लेना चाहिये।

⭐ मोटापा कम करने के लिए त्रिफला के गुनगुने काढ़े में शहद मिलाकर ले।त्रिफला चूर्ण पानी में उबालकर, शहद मिलाकर पीने से चरबी कम होती है।

त्रिफला, शहद और घृतकुमारी तीनो को मिला कर जो रसायन बनता है वह सप्त धातु पोषक होता है। त्रिफला रसायन कल्प त्रिदोषनाशक, इंद्रिय बलवर्धक विशेषकर नेत्रों के लिए हितकर, वृद्धावस्था को रोकने वाला व मेधाशक्ति बढ़ाने वाला है। दृष्टि दोष, रतौंधी (रात को दिखाई न देना), मोतियाबिंद, काँचबिंदु आदि नेत्ररोगों से रक्षा होती है और बाल काले, घने व मजबूत हो जाते हैं।

दो माह तक सेवन करने से चश्मा भी उतर जाता है।

विधिः👉 500 ग्राम त्रिफला चूर्ण, 500 ग्राम देसी गाय का घी व 250 ग्राम शुद्ध शहद मिलाकर शरदपूर्णिमा की रात को चाँदी के पात्र में पतले सफेद वस्त्र से ढँक कर रात भर चाँदनी में रखें। दूसरे दिन सुबह इस मिश्रण को काँच अथवा चीनी के पात्र में भर लें।

सेवन-विधि👉 बड़े व्यक्ति10 ग्राम छोटे बच्चे 5 ग्राम मिश्रण सुबह-शाम गुनगुने पानी के साथ लें दिन में केवल एक बार सात्त्विक, सुपाच्य भोजन करें। इन दिनों में भोजन में सेंधा नमक का ही उपयोग करे। सुबह शाम गाय का दूध ले सकते हैं।सुपाच्य भोजन दूध दलिया लेना उत्तम है कल्प के दिनों में खट्टे, तले हुए, मिर्च-मसालेयुक्त व पचने में भारी पदार्थों का सेवन निषिद्ध है। 40 दिन तक मामरा बादाम का उपयोग विशेष लाभदायी होगा। कल्प के दिनों में नेत्रबिन्दु का प्रयोग अवश्य करें।

मात्राः 4 से 5 ग्राम तक त्रिफला चूर्ण सुबह के वक्त लेना पोषक होता है जबकि शाम को यह रेचक (पेट साफ़ करने वाला) होता है। सुबह खाली पेट गुनगुने पानी के साथ इसका सेवन करें तथा एक घंटे बाद तक पानी के अलावा कुछ ना खाएं और इस नियम का पालन कठोरता से करें ।

सावधानीः👉 दूध व त्रिफला के सेवन के बीच में दो ढाई घंटे का अंतर हो और कमजोर व्यक्ति तथा गर्भवती स्त्री को बुखार में त्रिफला नहीं खाना चाहिए।

घी और शहद कभी भी सामान मात्रा में नहीं लेना चाहिए यह खतरनाख जहर होता है ।

त्रिफला चूर्ण के सेवन के एक घंटे बाद तक चाय-दूध कोफ़ी आदि कुछ भी नहीं लेना चाहिये।

त्रिफला चूर्ण हमेशा ताजा खरीद कर घर पर ही सीमित मात्रा में (जो लगभग तीन चार माह में समाप्त हो जाये ) पीसकर तैयार करें व सीलन से बचा कर रखे और इसका सेवन कर पुनः नया चूर्ण बना लें।

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