ज्ञान, यज्ञ और समस्त जीवन में कल्याण का वैदिक संदेश ऋग्वेद 7.35.7 का सार्वभौमिक मंगल मन्त्र

ज्ञान, यज्ञ और समस्त जीवन में कल्याण का वैदिक संदेश ऋग्वेद 7.35.7 का सार्वभौमिक मंगल मन्त्र


ज्ञान, यज्ञ और समस्त जीवन में कल्याण का वैदिक संदेश ऋग्वेद 7.35.7 का सार्वभौमिक मंगल मन्त्र

मन्त्र

ओ३म् शं नः सोमो भवतु ब्रह्म शं नः।
शं नो ग्रावाणः शमु सन्तु यज्ञाः।
शं नो स्वरूणां मितयो भवन्तु।
शं नः प्रसवः शम्वस्तु वेदिः॥

— ऋग्वेद 7.35.7


भूमिका

ऋग्वेद का यह मंगलमय मन्त्र सम्पूर्ण जीवन में शान्ति, समृद्धि, ज्ञान और कल्याण की कामना करता है। वेद केवल मनुष्य के व्यक्तिगत सुख की प्रार्थना नहीं करते, बल्कि वे चाहते हैं कि मनुष्य के विचार, ज्ञान, कर्म, यज्ञ, समाज और सम्पूर्ण वातावरण में मंगल और सामंजस्य स्थापित हो।

इस मन्त्र में बार-बार "शम्" शब्द आया है। 'शम्' का अर्थ केवल शान्ति नहीं, बल्कि सुख, कल्याण, मंगल, समृद्धि, स्वास्थ्य, सुरक्षा और आध्यात्मिक उन्नति भी है। अर्थात् मनुष्य के जीवन का प्रत्येक क्षेत्र कल्याणकारी बने।

यह मन्त्र हमें सिखाता है कि वास्तविक सुख केवल धन या भौतिक साधनों से नहीं मिलता, बल्कि ज्ञान, ईश्वर-उपासना, यज्ञ, सत्कर्म और प्रकृति के साथ सामंजस्यपूर्ण जीवन से प्राप्त होता है।


मन्त्र

ओ३म् शं नः सोमो भवतु ब्रह्म शं नः।
शं नो ग्रावाणः शमु सन्तु यज्ञाः।
शं नो स्वरूणां मितयो भवन्तु।
शं नः प्रसवः शम्वस्तु वेदिः॥


शब्दार्थ

  • शम् — कल्याण, सुख, शान्ति, मंगल।
  • नः — हमारा, हम सबका।
  • सोमः — आनन्ददायक ज्ञान, ईश्वर-उपासना से प्राप्त शान्ति एवं उत्साह।
  • भवतु — हो।
  • ब्रह्म — वेदज्ञान, दिव्य ज्ञान, ईश्वर की महिमा।
  • ग्रावाणः — यज्ञ के साधन; व्यापक अर्थ में श्रेष्ठ कर्मों के उपकरण।
  • यज्ञाः — यज्ञ, उपासना, परोपकार और लोकहितकारी कर्म।
  • स्वरूणाम् — श्रेष्ठ ध्वनियाँ, वेदमन्त्र, मधुर वाणी अथवा उत्तम शिक्षाएँ।
  • मितयः — मर्यादाएँ, उचित नियम, संतुलित आचरण।
  • प्रसवः — सृजन, उन्नति, विकास।
  • वेदिः — यज्ञ का पवित्र स्थान; व्यापक अर्थ में पवित्र जीवन और धर्ममय वातावरण।

भावार्थ

हे परमात्मन्! हमारे लिए ज्ञानरूपी सोम कल्याणकारी हो। वेदज्ञान और आपकी दिव्य वाणी हमारा मंगल करें। यज्ञ और हमारे सभी श्रेष्ठ कर्म कल्याणकारी हों। हमारी वाणी, हमारे नियम और हमारा आचरण शुभ हो। हमारे सभी सृजनात्मक कार्य सफल हों तथा हमारा जीवन, हमारा परिवार और हमारा वातावरण यज्ञवेदी के समान पवित्र एवं मंगलमय बने।


'शम्' का व्यापक अर्थ

इस मन्त्र में 'शम्' शब्द बार-बार आया है।

वैदिक भाषा में 'शम्' का अर्थ केवल युद्ध का अभाव नहीं है।

इसका अर्थ है—

  • शारीरिक स्वास्थ्य।
  • मानसिक शान्ति।
  • नैतिक जीवन।
  • आध्यात्मिक उन्नति।
  • सामाजिक सद्भाव।
  • आर्थिक संतुलन।
  • पर्यावरण का संरक्षण।
  • ईश्वर की कृपा।

अर्थात् जीवन के प्रत्येक क्षेत्र में कल्याण स्थापित हो।


'सोम' का वास्तविक अर्थ

इस मन्त्र में सोम का अर्थ किसी पेय पदार्थ से नहीं है।

यहाँ सोम का अर्थ है—

  • ईश्वर-उपासना से प्राप्त आनन्द।
  • सत्यज्ञान।
  • आत्मिक शान्ति।
  • जीवन में उत्साह और प्रेरणा।

जब मनुष्य सत्य, संयम और धर्म का पालन करता है, तब उसके भीतर जो आनन्द उत्पन्न होता है, वही वास्तविक सोम है।


ज्ञान ही वास्तविक कल्याण का आधार है

मन्त्र में 'ब्रह्म' अर्थात् वेदज्ञान को भी कल्याणकारी कहा गया है।

ज्ञान के बिना मनुष्य अज्ञान, अन्धविश्वास और भ्रम में भटकता रहता है। सच्चा ज्ञान मनुष्य को विवेक, नैतिकता, विज्ञान और आत्मविश्वास प्रदान करता है।

इसीलिए वेद ज्ञान को मानव जीवन का सर्वोच्च प्रकाश मानते हैं।


यज्ञ का वास्तविक स्वरूप

मन्त्र में कहा गया है—

"शमु सन्तु यज्ञाः"

अर्थात् हमारे यज्ञ कल्याणकारी हों।

वेदों में यज्ञ का अर्थ है—

  • ईश्वर की उपासना।
  • विद्या का प्रचार।
  • पर्यावरण की शुद्धि।
  • समाज की सेवा।
  • आत्मसंयम।
  • परोपकार।

यदि हमारे सभी कर्म लोकमंगल के लिए हों, तो सम्पूर्ण जीवन ही यज्ञ बन जाता है।


मर्यादा और मधुर वाणी का महत्व

मन्त्र में 'मितयः' अर्थात् मर्यादाओं की भी मंगलकामना की गई है।

मनुष्य का जीवन तभी सुखी बनता है जब वह—

  • सत्य बोले।
  • मधुर वाणी का प्रयोग करे।
  • अनुशासन का पालन करे।
  • अपने अधिकारों के साथ अपने कर्तव्यों को भी समझे।

वेद बताते हैं कि मर्यादाहीन जीवन कभी सुखद नहीं हो सकता।


पवित्र जीवन ही वास्तविक वेदी है

मन्त्र का अन्तिम शब्द 'वेदिः' अत्यन्त प्रेरणादायक है।

यज्ञ की वेदी केवल ईंटों या मिट्टी से बनी हुई जगह नहीं है।

वास्तविक वेदी है—

  • पवित्र हृदय।
  • शुद्ध विचार।
  • सत्यनिष्ठ जीवन।
  • धर्ममय परिवार।
  • सेवा और सदाचार से युक्त समाज।

जहाँ ऐसे गुण होते हैं, वहीं वास्तविक यज्ञ सम्पन्न होता है।


आज के जीवन में इस मन्त्र की प्रासंगिकता

आज मनुष्य विज्ञान और तकनीक में बहुत आगे बढ़ गया है, किन्तु मानसिक शान्ति, नैतिकता और पारिवारिक सौहार्द की कमी बढ़ती जा रही है।

यह मन्त्र हमें याद दिलाता है कि यदि ज्ञान, मर्यादा, सेवा, उपासना और मधुर व्यवहार हमारे जीवन का भाग बन जाएँ, तो व्यक्तिगत, पारिवारिक और सामाजिक सभी समस्याओं का समाधान सम्भव है।


इस मन्त्र की मुख्य शिक्षाएँ

  • जीवन का प्रत्येक क्षेत्र कल्याणकारी होना चाहिए।
  • वास्तविक सोम आध्यात्मिक आनन्द और सत्यज्ञान है।
  • वेदज्ञान मानव जीवन का सर्वोच्च प्रकाश है।
  • यज्ञ का अर्थ लोककल्याण और श्रेष्ठ कर्म है।
  • मधुर वाणी और मर्यादित आचरण सुख का आधार हैं।
  • पवित्र जीवन ही वास्तविक यज्ञवेदी है।
  • ज्ञान, सेवा और ईश्वर-उपासना से ही स्थायी शान्ति प्राप्त होती है।

उपसंहार

ऋग्वेद 7.35.7 का यह मन्त्र सम्पूर्ण मानव जीवन के लिए एक सार्वभौमिक मंगलकामना है। यह हमें सिखाता है कि हमारा ज्ञान, हमारी वाणी, हमारे कर्म, हमारी उपासना, हमारा परिवार और हमारा समाज—सब कुछ कल्याणकारी बने। यही वास्तविक शान्ति है और यही वैदिक जीवन का उद्देश्य है।

आइए, हम भी इस दिव्य मन्त्र को अपने जीवन का आदर्श बनाएँ। ज्ञान को अपनाएँ, सत्य का पालन करें, यज्ञमय जीवन जिएँ, मधुर व्यवहार रखें और परमात्मा की उपासना करते हुए समस्त प्राणियों के कल्याण का संकल्प लें। यही इस वैदिक मन्त्र का शाश्वत और विश्वव्यापी संदेश है।

॥ ॐ शान्तिः शान्तिः शान्तिः ॥

प्रश्न  :- क्या वेदों में यज्ञ का वर्णन है ?

   उत्तर  :- यजुर्वेद में यज्ञकर्म के ही बारे में बताया गया है। यजुर्वेद का मुख्य विषय कर्मकांड है। मनुष्य को क्या करना चाहिए, क्या नहीं करना चाहिए, इन बातों को बताया गया है। जितने पुराने वेद है उतने ही पुराने ' यज्ञ ' है। ऋग्वेद वेद का सर्वप्रथम मंत्र है -

ओ३म् अग्निमीडे पुरोहितं यज्ञस्य देवमृत्विजम्। होतारं रत्नधातम्। ( ऋग्वेद १\१\१ )

यज्ञ - पुरोहित- ऋत्विज् और होता सबका स्पष्ट वर्णन है, अत: यज्ञ उतने ही पुराने है , जितना पुराना ऋग्वेद का पहला मंत्र। 

अरं कृण्वन्तु वेदिं समग्निमिन्धतां पुर: ( ऋग्वेद  १\१७०\४ )

अर्थात् ईश्वर की आज्ञा है कि " तुम यज्ञवेदी को अलंकृत करो और उसमें अग्नि को प्रज्वलित करो " ।

आ वक्षि देवाँ इहाँ विप्र यक्षि च ( ऋग्वेद २\३६\४ )

अर्थात् हे विद्वान  ! तुम देवों को लाओं और यज्ञ करो। 

जुहोत प्र च तिष्ठत ( ऋग्वेद  १\१५\९ )

ईश्वर आज्ञा है कि  " तुम यज्ञ करो और प्रगति करो।"

   चारों वेदों में यज्ञकर्म को सर्वश्रेष्ठ कहा है और यज्ञ करने की प्ररेणा दी गई है , क्योंकि यज्ञ से सब कार्य सिद्ध होते है। 

प्र यज्ञमन्सा वृजनं तिराते ( ऋग्वेद   ७\६१\४)

अर्थात् यज्ञ की ओर प्रवृत्ति परिवार को दु :खों से पार लगाती है। 

यज्ञो हि त इन्द्र वर्धन: ( ऋग्वेद ३\३२\१२ )

अर्थात् यज्ञ ही वृद्धि और सम्पन्नता का सूचक हैं।

    " यज्ञो वै श्रेष्ठतमं कर्म "

   यज्ञ की महिमा का वर्णन करते हुए शतपथ ब्राह्मण में लिखा है कि संसार में सबसे श्रेष्ठ कार्य यज्ञ है।

योगेश्वर कृष्ण ने तो गीता में यहाँ तक कह दिया है कि जो व्यक्ति बिना यज्ञ किये भोजन करता है  वह अन्न नही पाप खाता है। भुज्जते ते त्वघं पापा ये पचन्त्यात्म कारणात्  " गीता "

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💐🙏आज का वेद मंत्र 💐🙏

🌷ओ३म्  शं न: सोमो भवतु ब्रह्म शं न: शं नो ग्रावाण: शमु सन्तु यज्ञा:। शं नो स्वरूणां मितयो भवन्तु शं : प्रशव: शम्वस्तु वेदि: ( ७\३५\७ )

🌷अर्थ  :- परमैश्वर्यवान ईश्वर हमे सुखदायक हो, वेद-ज्ञान हमें सुखकारी हो, यज्ञकुण्ड तथा भवनादि हमे सुखदायी हो, यज्ञ-स्तम्भ परिमाण हमारे लिए सुख देने वाले हो, औषधियाँ हमें कल्याण देने वाली हों तथा यज्ञ व यज्ञवेदी हमें शान्तिदायक हो।

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