प्रकृति, पर्यावरण और मानव कल्याण का वैदिक संदेश ऋग्वेद 7.35.5 का सार्वभौमिक शान्ति मन्त्र

प्रकृति, पर्यावरण और मानव कल्याण का वैदिक संदेश ऋग्वेद 7.35.5 का सार्वभौमिक शान्ति मन्त्र


प्रकृति, पर्यावरण और मानव कल्याण का वैदिक संदेश ऋग्वेद 7.35.5 का सार्वभौमिक शान्ति मन्त्र

मन्त्र

ओ३म् शं नो द्यावापृथिवी पूर्वहूतौ।
शमन्तरिक्षं दृशये नो अस्तु।
शं न ओषधीर्वनिनो भवन्तु।
शं नो रजसस्पतिरस्तु जिष्णुः॥

— ऋग्वेद 7.35.5


भूमिका

ऋग्वेद का यह दिव्य मन्त्र सम्पूर्ण प्रकृति के साथ मानव के सामंजस्यपूर्ण सम्बन्ध का अद्भुत चित्र प्रस्तुत करता है। वेदों की दृष्टि में मनुष्य प्रकृति का स्वामी नहीं, बल्कि उसका उत्तरदायी संरक्षक है। इसलिए वेद बार-बार आकाश, पृथ्वी, अन्तरिक्ष, वनस्पतियों, औषधियों और सम्पूर्ण पर्यावरण के कल्याण की कामना करते हैं।

आज विश्व जलवायु परिवर्तन, वनों की कटाई, प्रदूषण, जल संकट और पर्यावरणीय असंतुलन जैसी गंभीर समस्याओं का सामना कर रहा है। ऐसे समय में यह वैदिक मन्त्र अत्यन्त प्रासंगिक हो जाता है। यह हमें सिखाता है कि मानव का सुख प्रकृति के सुख से जुड़ा हुआ है। यदि पृथ्वी सुरक्षित होगी, वन समृद्ध होंगे, औषधियाँ फलेंगी और वायु शुद्ध होगी, तभी मानव जीवन भी स्वस्थ, सुखी और समृद्ध होगा।


मन्त्र

ओ३म् शं नो द्यावापृथिवी पूर्वहूतौ।
शमन्तरिक्षं दृशये नो अस्तु।
शं न ओषधीर्वनिनो भवन्तु।
शं नो रजसस्पतिरस्तु जिष्णुः॥

— ऋग्वेद 7.35.5


शब्दार्थ

  • शम् — कल्याण, सुख, शान्ति और मंगल।
  • नः — हमारा, हम सबका।
  • द्यावा — आकाश, द्युलोक।
  • पृथिवी — पृथ्वी, धारण करने वाली माता।
  • पूर्वहूतौ — आदि काल से पूजनीय, सर्वप्रथम स्मरणीय।
  • अन्तरिक्षम् — आकाश और पृथ्वी के मध्य का क्षेत्र, वायुमण्डल।
  • दृशये — देखने, अनुभव करने और जीवन के लिए।
  • ओषधयः — औषधियाँ, जीवनदायिनी वनस्पतियाँ।
  • वनिनः — वन, वृक्ष और समस्त हरित सम्पदा।
  • रजसस्पतिः — अन्तरिक्ष का स्वामी, समस्त ब्रह्माण्ड का नियन्ता परमात्मा।
  • जिष्णुः — विजयी, सर्वशक्तिमान, सब पर विजय पाने वाला।

भावार्थ

हे परमात्मन्! आकाश और पृथ्वी हमारे लिए कल्याणकारी हों। अन्तरिक्ष शुद्ध और जीवन के लिए हितकारी हो। समस्त औषधियाँ, वृक्ष और वन हमारे लिए सुख एवं स्वास्थ्य के साधन बनें। सम्पूर्ण जगत के स्वामी, सर्वशक्तिमान और विजयी परमात्मा हमें सदैव कल्याण, सुरक्षा और उन्नति प्रदान करें।


आकाश और पृथ्वी का महत्व

मन्त्र का आरम्भ द्यावा-पृथिवी से होता है।

आकाश हमें प्रकाश, ऊर्जा और वर्षा का आधार प्रदान करता है, जबकि पृथ्वी हमें अन्न, जल, खनिज, वनस्पति और जीवन का आश्रय देती है।

वेद इन दोनों को पूजनीय इसलिए मानते हैं क्योंकि सम्पूर्ण जीवन इन पर आधारित है। इसका अर्थ इनकी पूजा करना नहीं, बल्कि इनके प्रति कृतज्ञता, सम्मान और संरक्षण का भाव रखना है।


शुद्ध अन्तरिक्ष की आवश्यकता

मन्त्र में कहा गया है—

"शमन्तरिक्षं दृशये नो अस्तु।"

अर्थात् हमारा अन्तरिक्ष शुद्ध, स्वच्छ और कल्याणकारी हो।

आज वायु प्रदूषण, धूल, धुआँ और विषैली गैसें मानव स्वास्थ्य के लिए गंभीर खतरा बन चुकी हैं। ऋग्वेद हजारों वर्ष पहले ही शुद्ध वायुमण्डल की आवश्यकता पर बल देता है। स्वच्छ वायु केवल स्वास्थ्य ही नहीं, बल्कि सम्पूर्ण जीवन का आधार है।


औषधियाँ और वन मानव जीवन की अमूल्य सम्पत्ति हैं

मन्त्र में औषधियों और वनों के कल्याण की कामना की गई है।

वेदों के अनुसार—

  • औषधियाँ रोगों को दूर करती हैं।
  • वृक्ष प्राणवायु प्रदान करते हैं।
  • वन वर्षा और जलचक्र को संतुलित रखते हैं।
  • जैव विविधता सम्पूर्ण प्रकृति का संतुलन बनाए रखती है।

इसलिए वृक्षारोपण, वन संरक्षण और औषधीय पौधों का संवर्धन केवल पर्यावरण का कार्य नहीं, बल्कि वैदिक धर्म का भी एक महत्वपूर्ण अंग है।


'रजसस्पति' का वास्तविक अर्थ

मन्त्र में परमात्मा को 'रजसस्पति' कहा गया है।

अर्थात्—

  • सम्पूर्ण अन्तरिक्ष का स्वामी।
  • समस्त ब्रह्माण्ड का नियन्ता।
  • प्राकृतिक नियमों का निर्माता।
  • सृष्टि का संचालक।

यह मन्त्र स्पष्ट करता है कि सम्पूर्ण प्रकृति एक निश्चित व्यवस्था के अनुसार संचालित होती है और उस व्यवस्था का मूल आधार परमात्मा है।


'जिष्णु' का संदेश

परमात्मा को 'जिष्णु' अर्थात् सदैव विजयी कहा गया है।

इसका अर्थ है कि—

  • सत्य अन्ततः विजयी होता है।
  • प्रकृति के नियम अटल हैं।
  • ईश्वर का न्याय सर्वोपरि है।
  • अधर्म और अन्याय स्थायी नहीं हो सकते।

मनुष्य को भी सत्य, धर्म और न्याय के मार्ग पर चलकर जीवन में विजय प्राप्त करनी चाहिए।


वैदिक पर्यावरण दर्शन

यह मन्त्र स्पष्ट करता है कि पर्यावरण संरक्षण कोई आधुनिक विचार नहीं है, बल्कि वैदिक संस्कृति का मूल सिद्धान्त है।

वेद चाहते हैं कि—

  • जल शुद्ध रहे।
  • वायु स्वच्छ रहे।
  • पृथ्वी उर्वर बनी रहे।
  • वन सुरक्षित रहें।
  • औषधियाँ समृद्ध हों।
  • मनुष्य प्रकृति के साथ संतुलन बनाकर जीवन जीए।

यही स्थायी विकास (Sustainable Development) का वास्तविक वैदिक स्वरूप है।


आज के समय में इस मन्त्र की प्रासंगिकता

आज पृथ्वी अनेक पर्यावरणीय संकटों से जूझ रही है। यदि मनुष्य प्रकृति का अंधाधुंध दोहन करता रहेगा, तो उसका दुष्परिणाम सम्पूर्ण मानवता को भुगतना पड़ेगा।

यह मन्त्र हमें प्रेरणा देता है कि—

  • अधिक से अधिक वृक्ष लगाएँ।
  • जल और वायु को प्रदूषित न करें।
  • औषधीय पौधों का संरक्षण करें।
  • प्राकृतिक संसाधनों का विवेकपूर्ण उपयोग करें।
  • पर्यावरण को आने वाली पीढ़ियों के लिए सुरक्षित रखें।

इस मन्त्र की मुख्य शिक्षाएँ

  • प्रकृति और मानव एक-दूसरे के पूरक हैं।
  • आकाश, पृथ्वी और अन्तरिक्ष का संरक्षण आवश्यक है।
  • वन और औषधियाँ मानव जीवन की अमूल्य सम्पत्ति हैं।
  • पर्यावरण की रक्षा करना प्रत्येक मनुष्य का कर्तव्य है।
  • परमात्मा सम्पूर्ण ब्रह्माण्ड का नियन्ता है।
  • सत्य और प्रकृति के नियमों का पालन ही वास्तविक कल्याण का मार्ग है।

उपसंहार

ऋग्वेद 7.35.5 का यह मन्त्र सम्पूर्ण सृष्टि के प्रति कृतज्ञता, संरक्षण और सामंजस्य का संदेश देता है। यह हमें सिखाता है कि मनुष्य का सुख प्रकृति के सुख से जुड़ा हुआ है। यदि पृथ्वी, आकाश, वायु, वन और औषधियाँ सुरक्षित रहेंगी, तभी मानव जीवन भी सुरक्षित और समृद्ध रहेगा।

आइए, हम इस वैदिक संदेश को अपने जीवन का संकल्प बनाएँ। प्रकृति को ईश्वर की अनुपम देन मानकर उसका संरक्षण करें, पर्यावरण को स्वच्छ रखें, वृक्षों की रक्षा करें और समस्त सृष्टि के कल्याण के लिए कार्य करें। यही ऋग्वेद के इस मंगलमय मन्त्र का शाश्वत और सार्वभौमिक संदेश है।

॥ ॐ शान्तिः शान्तिः शान्तिः ॥

  🔥प्रश्न  :- धर्म क्या है ? किसे कहते हैं  ? मनुष्य का क्या धर्म है  ?

    उत्तर  :-   ' धर्म ' धृ  धारणे धातु से बना है जिसका अर्थ है ' ' 'धारण  करना ' अर्थात् वे सत्य और अटल सिद्धांत या ईश्वरीय नियम जिनके धारण करने से यह समस्त संसार थमा हुआ है। ईश्वर की रची सृष्टि के हर कार्य में जो सत्यरूपी नियम पूर्ण रूप से प्रत्येक वस्तु में रमा हुआ है वही धर्म है। 

      मनुस्मृति में धर्म शब्द की परिभाषा इस प्रकार की गयी है कि  - ' धारणाद्धर्ममित्याहु:' अर्थात् जिसके धारण करने से किसी वस्तु की स्थिति रहती हैं वह धर्म है। 

       मनुष्य का धर्म मानवता है इतना तो सभी जानते हैं , वैशेषिक दर्शनकार कहते है -

    यतोऽभयुदयनि:श्रेयससिद्धि स धर्म: ( वैशेषिक १\२ )

    अर्थात् जिसे भोग और मोक्ष  की सिद्धि हो वह धर्म है। 

    मनु महाराज ने धर्म के दस लक्षण बताए है ।जिस मनुष्य में ये दस गुण विधमान है और उन्हीं के अनुसार जीवन व्यतीत करता है वही धार्मिक प्रवृत्ति वाला है। मनु महाराज ने इस श्लोक में धर्म के दस लक्षण बताए है। 

धृति: क्षमा दमोऽस्तेयं शौचमिन्द्रियनिग्रह:। धीर्विद्या सत्यमक्रोधो दशकं धर्म लक्षणमं।। ( मनुस्मृति ६\९२)

     धृति ( धैर्य), क्षमा,दम (आत्म-संयम  ), अस्तेय ( चोरी न करना), शौच ( स्वच्छता), इन्द्रिनिग्रह ( इन्द्रियों पर नियंत्रण), धी: ( विवेकशीलता ), विद्या ( ज्ञान), सत्य बोलना, अक्रोध ( क्रोध न करना) - ये वैदिक धर्म के दस लक्षण है। 

    महर्षि दयानंद सरस्वती जी ने 'धर्म किसको कहते है ' बड़े ही आसान तरीके से सत्यार्थ प्रकाश में बताया है। 

   " धर्म वह है जिसमें परस्पर किसी का विरोध न हो अर्थात् धर्म  एक सार्वभौम वस्तु है जिसका किसी विशेष देश , जाति तथा काल से खास सम्बन्ध नही होता।

 "" जो ईश्वर की आज्ञा का यथावत् पालन और पक्षपात रहित सर्वहित न्याय करना है।, जो कि वेदोक्त होने से सब मनुष्यों  के लिए एक ही मानने योग्य हैं, वह धर्म कहाता है। (महर्षि दयानंद सरस्वती)

      ईश्वर एक है अत: उसके द्वारा  प्रदत्त धर्म भी एक ही होता है, अनेक नही। जो अनेक है वे मत, मज़हब, पंथ हो सकते हैं जो मनुष्य कृत अपने-अपने विचार है, मान्यताएँ हैं, देश- काल परिस्थितियों के अनुसार बनाए नियम है । परंतु जहां धर्म की बात आती है वहाँ धर्म सबके लिए एक है।धर्म ही मनुष्य को मनुष्य बनाता है, जीने का तरीका बताता है, सत्यासत्य का बोध कराता है, कर्तव्यों की जानकारी देता है, वरना धर्महीन मनुष्य दिखने में तो  मनुष्य-जैसा लगता है, परंतु वह मनुष्य कहलाने के काबिल नहीं होता। 

ओ३म् शं नो द्यावापृथिवी पूर्वहूतौ शमन्तरिक्षं दृशये नो अस्तु। शं न ओषधीर्वनिनो भवन्तु शं नो रजसस्पतिरस्तु जिष्णु: ( ऋग्वेद ७\३५\५)

  🌷अर्थ  :' पहले स्तुति किये हुए द्युलोक और पृथ्वी लोक हमारे लिए शान्तिदायक हो, सूर्य-चन्द्रमा वाला अन्तरिक्ष हमारी नेत्र ज्योति के लिये शान्ति देने वाला हो, औषधियाँ-अन्नादि और वन पदार्थ  हमें शान्तिकारक हो , जगत् का स्वामी जयशील परमेश्वर हमें सदा  शान्तिदायक हो। 



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