परमात्मा की कृपा, संरक्षण और सत्यमार्ग का वैदिक संदेश ऋग्वेद का प्रेरणादायक दिव्य उपदेश
ॐ
मन्त्र
— ऋग्वेद
भूमिका
ऋग्वेद के मन्त्र मनुष्य को ईश्वर के प्रति श्रद्धा, सत्य के प्रति निष्ठा और सत्कर्म के प्रति प्रेरणा प्रदान करते हैं। प्रस्तुत मन्त्र में ऋषि परमात्मा से प्रार्थना करते हैं कि जिस प्रकार उन्होंने पूर्वकाल में सत्यनिष्ठ, विद्वान और धर्मपरायण लोगों की रक्षा की, उसी प्रकार आज भी हमारी रक्षा करें, हमें शुभ मार्ग पर चलाएँ और सत्य, ज्ञान तथा धर्म से युक्त जीवन जीने की शक्ति प्रदान करें।
यह मन्त्र हमें विश्वास दिलाता है कि परमात्मा किसी व्यक्ति विशेष का नहीं, बल्कि प्रत्येक सत्यनिष्ठ, पुरुषार्थी और धर्माचारी मनुष्य का रक्षक है। जो व्यक्ति ईश्वर के नियमों का पालन करता है, उसके जीवन में परमात्मा का संरक्षण और मार्गदर्शन सदैव बना रहता है।
मन्त्र
शब्दार्थ
- याभिः — जिनके द्वारा।
- कण्वम् — कण्व ऋषि; यहाँ अर्थ है विद्वान, सत्यनिष्ठ उपासक।
- अभिष्टिभिः — सहायता, संरक्षण, इच्छित कल्याण के साधनों द्वारा।
- प्रावतम् — रक्षा की, सहायता की।
- युवम् — आप दोनों (कल्याणकारी दिव्य शक्तियाँ/परमात्मा के उपकारी गुण)।
- अश्विना — शीघ्र सहायता करने वाले, कल्याणकारी।
- ताभिः — उन्हीं साधनों से।
- षु — निश्चय ही।
- अस्मान् — हमारी।
- अवतम् — रक्षा कीजिए।
- शुभस्पती — शुभ के स्वामी, मंगल प्रदान करने वाले।
- पातम् — स्वीकार करें, ग्रहण करें।
- सोमम् — आनन्ददायक ज्ञान, उपासना का अमृत।
- ऋतावृधा — सत्य और धर्म की वृद्धि करने वाले।
भावार्थ
हे सर्वकल्याणकारी परमात्मन्! जिस प्रकार आपने सत्यनिष्ठ विद्वानों और धर्मपरायण उपासकों की अपने दिव्य संरक्षण और कृपा से रक्षा की, उसी प्रकार आज हमारी भी रक्षा कीजिए। हमें शुभ मार्ग पर चलाइए, सत्य और धर्म में दृढ़ बनाइए तथा हमारी उपासना और सत्यज्ञानरूपी सोम को स्वीकार करके हमारे जीवन को ज्ञान, शान्ति और कल्याण से परिपूर्ण कीजिए।
'कण्व' का वास्तविक अर्थ
इस मन्त्र में कण्व केवल एक ऋषि का नाम नहीं, बल्कि सत्य के साधक, विद्वान और ईश्वर-उपासक का भी प्रतीक है।
वेदों का संदेश है कि जो व्यक्ति ज्ञान प्राप्त करता है, सत्य का पालन करता है और समाज के हित में कार्य करता है, वह परमात्मा की विशेष कृपा का अधिकारी बनता है।
यह कृपा किसी चमत्कार के रूप में नहीं, बल्कि विवेक, साहस, आत्मबल और उचित मार्गदर्शन के रूप में प्राप्त होती है।
ईश्वर का संरक्षण कैसा होता है?
मन्त्र में कहा गया है कि परमात्मा ने अपने भक्तों की रक्षा की और वही रक्षा आज भी हमारी करे।
इसका अर्थ यह नहीं कि परमात्मा प्रकृति के नियमों को बदल देता है, बल्कि वह—
- सत्य का अनुसरण करने की शक्ति देता है।
- कठिनाइयों का सामना करने का साहस देता है।
- विवेकपूर्ण निर्णय लेने की बुद्धि देता है।
- धर्म के मार्ग पर अडिग रहने की प्रेरणा देता है।
- पुरुषार्थ को सफल बनाने के अवसर प्रदान करता है।
यही परमात्मा का वास्तविक संरक्षण है।
'शुभस्पती' का संदेश
मन्त्र में परमात्मा को 'शुभस्पती' कहा गया है, अर्थात् शुभ, मंगल और कल्याण का स्वामी।
परमात्मा का प्रत्येक नियम मनुष्य के हित के लिए है। जब मनुष्य सत्य, संयम, परिश्रम और सदाचार का पालन करता है, तब उसका जीवन भी शुभ और मंगलमय बन जाता है।
'सोम' का आध्यात्मिक अर्थ
इस मन्त्र में सोम का अर्थ किसी पेय पदार्थ से नहीं है।
यहाँ सोम का अर्थ है—
- ईश्वर-उपासना से प्राप्त आनन्द।
- सत्यज्ञान।
- आत्मिक शान्ति।
- धर्ममय जीवन का अमृत।
जब मनुष्य परमात्मा के निकट आता है, तब उसके जीवन में जो पवित्र आनन्द उत्पन्न होता है, वही वास्तविक सोम है।
'ऋतावृधा' का गूढ़ अर्थ
ऋत का अर्थ है—सत्य, ईश्वर का शाश्वत नियम और प्राकृतिक व्यवस्था।
ऋतावृधा अर्थात् जो सत्य और धर्म की वृद्धि करता है।
परमात्मा चाहता है कि मनुष्य ऐसा जीवन जिए जिससे सत्य, न्याय, करुणा और सदाचार का विस्तार हो।
प्रार्थना और पुरुषार्थ का सम्बन्ध
यह मन्त्र केवल रक्षा की प्रार्थना नहीं है, बल्कि यह भी सिखाता है कि परमात्मा उसी की सहायता करता है जो स्वयं भी पुरुषार्थ करता है।
यदि मनुष्य आलस्य, अन्याय और असत्य में लिप्त रहे, तो केवल प्रार्थना करने से कल्याण नहीं होगा। ईश्वर की कृपा का अधिकारी वही बनता है जो कर्म, उपासना और सत्य—तीनों का पालन करता है।
आज के जीवन के लिए प्रेरणा
आज मनुष्य अनेक प्रकार की चुनौतियों का सामना कर रहा है—भय, तनाव, असुरक्षा, नैतिक पतन और मानसिक अशान्ति।
ऐसे समय में यह मन्त्र हमें आश्वस्त करता है कि यदि हम सत्य, धर्म और ईश्वर-विश्वास को अपना आधार बनाएँ, तो कठिन से कठिन परिस्थितियों में भी सही मार्ग प्राप्त कर सकते हैं।
परमात्मा का संरक्षण बाहरी चमत्कार से अधिक हमारे भीतर आत्मबल, विवेक और धैर्य के रूप में प्रकट होता है।
इस मन्त्र की मुख्य शिक्षाएँ
- परमात्मा सत्यनिष्ठ और धर्माचारी लोगों का संरक्षण करता है।
- ईश्वर का संरक्षण विवेक, साहस और आत्मबल के रूप में मिलता है।
- उपासना के साथ पुरुषार्थ भी आवश्यक है।
- सत्य और धर्म जीवन की सबसे बड़ी सुरक्षा हैं।
- शुभ कर्म करने वाला व्यक्ति परमात्मा की कृपा का अधिकारी बनता है।
- वास्तविक सोम आध्यात्मिक आनन्द और सत्यज्ञान है।
उपसंहार
ऋग्वेद का यह मन्त्र हमें विश्वास, साहस और धर्म का संदेश देता है। जिस प्रकार परमात्मा ने पूर्वकाल के सत्यनिष्ठ ऋषियों और उपासकों का मार्गदर्शन किया, उसी प्रकार आज भी वह प्रत्येक धर्मपरायण, कर्मशील और सत्यवादी मनुष्य का मार्गदर्शक है।
आइए, हम भी इस वैदिक शिक्षा को अपने जीवन में अपनाएँ। सत्य को अपना आधार बनाएँ, पुरुषार्थ को अपना धर्म बनाएँ, ईश्वर-उपासना को अपनी शक्ति बनाएँ और समाज के कल्याण को अपना लक्ष्य बनाएँ। तब परमात्मा की कृपा से हमारा जीवन भी ज्ञान, शान्ति, साहस और वास्तविक आनन्द से परिपूर्ण होगा।
॥ ॐ शान्तिः शान्तिः शान्तिः ॥
हिंदुओं ने सोचा* विदेश में जायेंगे *तो खुश रहेंगे―
सच्चाई ये है *कि वहां भी पीट रहे हैं* क्योंकि हिंदुओं ने प्रकृति का नियम नहीं समझा *...*…
यह प्रकृति कोई बगीचा नहीं है कि पैसा कमाओगे, आलीशान घर बनाओगे और चैन की नींद सो लोगे।
*यह प्रकृति एक जंगल है* जिसमें जंगली लुटेरे, चोर, डाकू चौबीसों घंटे, 365 दिन सभ्य लोगों को लूटने की फिराक में रहते है।
*हिंदुओं ने सब कुछ बनाया* लेकिन अपनी सुरक्षा के लिए कभी हथियार नहीं खरीदे *अगर हथियार खरीद लिए होते* तो न पाकिस्तान से पलायन करना पड़ता, न कश्मीर से और अब ना UK से।
*सोचिए* जहां आप जाने का सपना रखते हैं *UK* उस देश में भी आप सुरक्षित नहीं हैं *क्या करेंगे ऐसे बंगले का* जिसे एक दिन जेहादी लूट ही लेंगे *अपनी सुरक्षा के लिए पहले हथियार खरीदो*।
शांतिदूत ने 57 देशों पर यूं ही राज कायम नहीं किया *उनके कांसेप्ट बिलकुल क्लियर है* वे इस दुनिया को जंगल समझते है *और इस जंगल में वही राजा होगा* जो दूसरों का शिकार करना जानता है *जब तक तुम शिकार करना नहीं सीखोगे* तब तक कोई और तुम्हारा शिकार करता रहेगा।00
इसीलिए पूरे विश्व के हिंदुओं से *यह आग्रह है कि सबसे पहले हथियार खरीदिए* उसके बाद गाड़ी, बंगला, बैंक बैलेंस सब कुछ *वरना जेहादी* जो आज झोंपड़ी में रह रहा है *वो उसके हथियार का प्रयोग करके आपसे वो सब कुछ छीन लेगा* जिसके लिए आपने जीवन भर तपस्या की है।
*पहली फुरसत में हथियार खरीदो* सिर्फ हथियार खरीदो, और कुछ नहीं *कोई इन्वेस्टमेंट नहीं* कोई दूसरी खरीददारी नहीं *सिर्फ हथियार* आपके लिए एक टास्क है।
*कल से जिन 5 मंदिरों में जाओगे* वहां पर देवी देवताओं की मूर्ति का अच्छे से अवलोकन करोगे *उनके हाथ में क्या है?* ये गौर करोगे *आपको हथियार दिखेगा* ये मेरा दावा है।
*आप 5 मंदिर जाओ* कम से कम 4 मंदिरों में आपको देवताओं के हाथ में हथियार जरूर मिलेगा *ये सिग्नल है* ये संदेश है।
जब कोई जेहादी आपको मार देगा और आप भगवान के पास जाकर बोलोगे *कि भगवान* आपने हमारी रक्षा क्यों नहीं की।
*तब भगवान बोलेंगे* जिस मंदिर को तू जाता था *वहां पर मेरे हाथ में तलवार थी* तूने उसको देखा ही नहीं *मैं तो संदेश दे रहा था* तलवार खरीद *लेकिन तूने उस संदेश को समझा ही नहीं* ये तेरी गलती है।
भगवान भी तुम्हें सिग्नल दे रहे हैं *हथियार खरीदो* यह दुनिया एक जंगल है *इसीलिए जंगली बनो*।
क्या तुमने कभी सोचा है कि अमेरिका दुनिया का सबसे शक्तिशाली देश क्यों है? *क्यों दुनिया के सारे देश मिलकर भी अमेरिका पर कब्जा नहीं कर सकते??*
*वह इसीलिए* क्योंकि वहां प्रत्येक नागरिक के पास बंदूक है *हिटलर ने कहा था* अगर आप किसी देश पर कब्जा करना चाहते हो *तो सबसे पहले उसके नागरिकों से हथियार छीन लो*।
*शरिया भी यही कहता है* शरिया के अनुसार किसी भी गैर मुस्लिम को अपनी सुरक्षा के लिए हथियार रखने की इजाजत नहीं है।
*ये सब संदेश हैं* ये सब सिग्नल हैं *सभी तुम्हें कोई इशारा कर रहे हैं* इस संदेश को समझो।
*हथियार खरीदो*… भाईचारे और आदर्शवाद के संदेश बातों में ही अच्छे लगते हैं *वास्तविकता में नहीं* आज जो आपसे हंस के बात कर रहा है *हो सकता है वही कल आपका काम लगा दे* इसीलिए हथियार खरीदो।
*जेहादियों का पहला ध्यान हथियार खरीदने में ही रहता है* उसका पहला इन्वेस्टमेंट हथियार होता है *वो गाड़ी*, *बंगले में ध्यान देता ही नहीं* वो जानता है कि जिस दिन वो सामने वाले की कनपटी पर बंदूक रखेगा, सामने वाला हंसते हंसते जर, जोरू, जमीन, जान उसकी झोली में डालेगा *यही प्रकृति का नियम है* ताकतवर बनो, *और जरूरत पड़ने पर राक्षसों का वध करो*।

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