तपस्या हीन ,कामचोर ,निट्ठल्ले ,ये तीनों ही पापी है ।
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🔥वेदा वदन्ति ।
अतप्ततनूर्न तदामो अश्नुते ।ऋ०-९-८३-१
उस सुख को अतपस्वी नहीं प्राप्त कर सकता ।
अर्थात् जो तपस्याहीन है ,कामचोर है ,हाथ नहीं हिलाना चाहता ,बैठे बैठे ही दूसरों द्वारा प्रदत्त ,संचित कमाई को खाना चाहता है वह न लौकिक सुख को भोग सकता है और न पारलौकिक ।
वेद कहता है - नाहमन्यकृतेन भोजम् - मैं दूसरों के द्वारा अर्जित किये हुये को भोग नहीं करूं तथाअनधिकार चेष्टा नहीं करूं ।उसमें आता है - स्वयं यजस्व स्वयं जुषस्व - स्वयं यज्ञ करो स्वयं सेवन करो ,स्वावलम्बी बनो । अपने कर्तव्यों का निर्वहण न करना ,आलसी होकर दूसरों के सहारे पड़े रहना निट्ठल्लापन है । ऐसे व्यक्ति अशान्त रहते हुये वास्तविक सुख को न यहाँ प्राप्त कर सकते हैं न वहाँ ,भोग्यपदार्थ तो दूसरों द्वारा मिल भी जांयें तोभी मानसिक क्लेश बना रहता है । जब यहाँ शान्ति नहीं तो परलोक में भी कैसे मिलेगी ।
इसीलिये वेद ने कहा - कुर्वन्नेवेह कर्माणि जिजीविषेच्छतं समा: ।-
हर क्षेत्र में मनुष्य को तप , कठोर परिश्रम करना पडता है । चाहे वह विद्या का हो ,अध्ययन का हो ,अध्यापन का हो ,चिकित्सा का हो , धनोपार्जन का हो ,परिवार का हो ,समाज का हो ,इहलोक हो या परलोक , सर्वत्र तपस्या की ,साधना की ,कर्मठता की आवश्यकता होती है ।
उद्यमेन हि सिध्यन्ति कार्याणि न मनोरथै:।
नहि सुप्तस्य सिंहस्य प्रविशन्ति मुखे मृगा: ।।
सोये हुये शेर के मुख में आहार अपने अाप प्रवेश नहीं करता ।
उद्योगिनं पुरुषसिंहमुपैति लक्ष्मी: ।
दैवेन देयमिति कापुरुषा: वदन्ति ।
भोजन सामने होने पर भी हाथ को मुँह तक ले ही जाना पडता है । आलसी ,निष्क्रिय ,परन्तु समर्थ कटोरा लेकर घूमने वाले को भिक्षा देना भी पाप है ,यदि कर सकते हैं तो उनमें क्रियाशीलता पैदा करें । क्यों कि वेद की दृष्टि में अकर्मा दस्यु होता है नीच होता है ,लुटेरा होता है ,कामचोर होता है । ऐसे लोगों पर तो परमेश्वर भी दया नहीं करता क्योंकि उसने कहा है -
कुर्वन्नेवेह कर्माणि सुकर्मों को ,शुभ कर्मों को करता हुआ ही मनुष्य जीने की इच्छा करे । अन्यथा राम रहीम जैसा ,लोगों को उल्लू बना कर , डरा कर धमका कर ,अन्धश्रद्धा पैदा कर अपना उल्लू सीधा करने वाला ,परार्थ भी स्वार्थ के लिये संपादन करने वाला ,एक इन्द्रियासक्ति के लिये तदर्थ सभी इन्द्रियों को झोंक देने वाला ,विषयासक्त बलात्कारी ,जघन्य निकृष्टतम पाप कर्म करके इह लोक तथा परलोक में कठोरातिकठोर दंड भोगने के लिये तैयार रहे ।इस निकृष्ट ने पिक्चरों से करोड़ों रुपये कमाये तो विषयभोगों के लिये ,सैंकड़ों कन्याओं की अस्मिता लूटी तो विषयतृप्ति के लिये न कि परमात्म दर्शन कराने के लिये , हज़ारों साधुओं को नपुंसक बनाया तो केवल मात्र अपनी स्वार्थ सिद्धि के लिये ,विषयाग्नि को तृप्त करने के लिये ,नकि भगवद्भक्ति के लिये । जितने भी इसके परोपकार के कार्यों के इनके समर्थक गीत गा रहे हैं उन सब के पीछे विषय लोलुपता बख़ूबी झाँक रही है ।शास्त्रों में ठीक ही लिखा है -
इन्द्रियाणां तु सर्वेषां यद्येकं क्षरतीन्द्रियम् ।
तेनास्य हरति प्रज्ञां दृते पात्रादिवोदकम् ।।
इन्द्रियों में से यदि एक भी इन्द्रिय क्षरण कर जाती है ,विकृत हो जाती है ,कुमार्ग पर चल पड़ती है तो वह उसकी बुद्धि का हरण कर लेती है ।
यही कारण है कि एक विषयेन्द्रिय के कारण से ही ये आज विनाश के कगार पर है । वृत्ततस्तु हतो हत: ।
ऐसे दुष्ट राम के नाम को लांछित करने वाले ,बारह वर्ष तक जितेन्द्रिय रह कर तपस्या करने वाले योगिराज कृष्ण की सोलह हज़ार रानियाँ थी यह कहकर अपने पक्ष में दुहाई देकर सैंकड़ों कन्याओं को फुसलाने वाले , वेद न पढ़ने वाले ,अतपस्वी। दान लेने में तत्पर ,जल में पत्थर की नौका के समान उसके साथ ही डूब मरते हैं ,ऐसे लोगों को दान देना दाता के लिये अनर्थ कारी होता है और लेने वाले का परलोक बिगाड़ देता है अर्थात्अतपस्वी भवसागर में डूब मरता है । वह चिरन्तन आनंद को तो प्राप्त कर ही नहीं सकता इहलोक में भी दुर्गति को प्राप्त करता है ।
ऐसे व्यभिचारी भ्रष्टाचारी बलात्कारी आततायी विषय लोलुप कामान्ध दुराचारियों के लिये वेद में राष्ट्रपति से प्रार्थना की गई है जो सर्वथा उचित और मान्य है - वि न इन्द्र मृधो जहि - हे राजन् हमारे मसलने वाले प्रजापीडकों ,आततायियों ,चोरों डाकुओं ,कर्महीनों ,दुष्कर्मियों ,समाजशोषकों को मसल दे । मसले हुये मूल वाले वृक्ष के समान ऐसे दुष्टों को जड़ सहित उखाड़ने पर ही राष्ट्र में स्थिर शान्ति हो सकती है । नष्टे मूले नैव शाखा न पत्रम् । प्रजाशोषकों के हनु ज़बाडे तोड़ देने चाहियें । दूसरी माँग यह रखी है - नीचा यच्छ पृतन्यत: -फसादियों उपद्रवकारियों को नीचा दिखा उन्हें दबा दो ,दमन कर दो ।
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🕉️🚩 आज का वेद मंत्र 🕉️🚩
🌷ओ३म् सम्यक् स्रवन्ति सरितो न धेनाऽअन्तर्हृदा मनसा
पूयमाना:।एतेऽअर्षन्त्यूर्मयो घृतस्य मृगाऽइव क्षिपणोरीषमाणा:॥ यजुर्वेद १७-९४॥
💐 अर्थ :- हमारे हृदय में मन द्वारा पवित्र की हुई ज्ञान की दिव्य धाराऐं नदी के प्रवाह की तरह निरंतर प्रवाहित होती हैं। ये बाहरी वासनाओं से इस तरह दूर होती हैं, जैसे की एक हिरण शिकारी की पहुंच से बाहर हो गया
तपस्याहीन, कामचोर और निठल्ले:
कर्मयोग के दर्पण में 'पाप' की नई परिभाषा
आमतौर पर 'पाप' का अर्थ चोरी, हिंसा या झूठ से लगाया जाता है। लेकिन हमारे ऋषियों और आधुनिक विचारकों ने इससे भी गहरा एक और पाप बताया है—'कर्म का त्याग'। पुरुषार्थ विहीन जीवन जीना, समाज के संसाधनों का उपभोग करना लेकिन बदले में कोई योगदान न देना, साक्षात् पाप है। तपस्याहीन, कामचोर और निठल्ले—ये तीनों श्रेणियां मनुष्यता पर बोझ हैं और अध्यात्म से लेकर व्यावहारिक जीवन तक, तीनों को पापी माना गया है।
शरीरयात्रापि च ते न प्रसिद्ध्येद्कर्मणः॥
"तू शास्त्रविहित कर्तव्य कर्म कर, क्योंकि कर्म न करने की अपेक्षा कर्म करना श्रेष्ठ है। कर्म न करने से तो तेरा शरीर-निर्वाह (जीवन यात्रा) भी सिद्ध नहीं होगा।"
भगवान कृष्ण गीता में स्पष्ट कहते हैं कि जो व्यक्ति कर्म चुराता है, वह समाज और सृष्टि के चक्र को बिगाड़ता है। आइए समझते हैं कि ये तीनों प्रवृत्तियां कैसे और क्यों पाप की भागीदार हैं:
1. तपस्याहीन: संघर्ष से भागने वाला मन
यहाँ 'तपस्या' का अर्थ केवल जंगलों में जाकर धूनी रमाना नहीं है। अपने लक्ष्य के प्रति ईमानदार रहना, विद्यार्थी का देर रात तक पढ़ना, किसान का धूप में पसीना बहाना और उद्यमी का जोखिम उठाना ही वास्तविक तप है। जो व्यक्ति जीवन में कठिनाइयों और अनुशासन (Discipline) से बचता है, वह तपस्याहीन है।
- यह पाप क्यों है? बिना तपे कोई भी आत्मा निखर नहीं सकती। तपस्याहीन व्यक्ति अपनी प्रतिभा को नष्ट कर देता है, जो उसे ईश्वर द्वारा समाज कल्याण के लिए मिली थी।
2. कामचोर: अपनी जिम्मेदारी दूसरों पर डालने वाला
कामचोर वह है जिसके पास सामर्थ्य है, अवसर है, जिम्मेदारी भी है, लेकिन वह काम से बचने के लिए बहाने ढूंढता है। वह दफ्तर में, घर में या समाज में अपना काम ठीक से नहीं करता और उसका बोझ दूसरों के कंधों पर आ जाता है।
3. निठल्ला: ऊर्जा का सबसे बड़ा अपव्यय
निठल्ला वह है जो पूरी तरह सक्रिय होने के बावजूद कोई रचनात्मक या उत्पादक कार्य नहीं करता। गपशप करना, सोशल मीडिया पर अकारण समय गंवाना और दूसरों की कमियां निकालना ही उसकी दिनचर्या होती है। निठल्लापन केवल समय की बर्बादी नहीं, बल्कि मानसिक ऊर्जा का विनाश है। खाली दिमाग सचमुच शैतान का घर बन जाता है, जिससे समाज में अपराध और नकारात्मकता फैलती है।
सृष्टि के यज्ञ में 'चोर' हैं ये तीनों
गीता के तीसरे अध्याय में एक और अद्भुत बात कही गई है—यह सृष्टि एक 'यज्ञ' (Cooperative System) है। प्रकृति हमें हवा, पानी, अन्न सब मुफ्त देती है। बदले में हमारा कर्तव्य है कि हम अपने कर्म द्वारा इस सृष्टि को वापस लौटाएं। कृष्ण कहते हैं:
"तैर्दत्तानप्रदायैभ्यो यो भुङ्क्ते स्तेन एव सः॥" (गीता 3.12)
अर्थात्, जो समाज और प्रकृति से सब कुछ लेता तो है, लेकिन अपने पुरुषार्थ और कर्म द्वारा बदले में कुछ योगदान नहीं देता, वह 'स्तेन' यानी चोर (पापी) है। तपस्याहीन, कामचोर और निठल्ले इसी श्रेणी में आते हैं।
निष्कर्ष: पुरुषार्थ ही पुण्य है
आज के दौर में इस संदेश की प्रासंगिकता बहुत अधिक है, जहाँ हर कोई शॉर्टकट और बिना मेहनत के सब कुछ पा लेना चाहता है। हमें समझना होगा कि कर्महीनता ही सबसे बड़ा पतन है। राष्ट्र और समाज का निर्माण निठल्ले बैठकर नहीं, बल्कि निरंतर कर्म की भट्टी में तपकर होता है। इसलिए, आलस्य का त्याग करें, कर्म को ही अपनी पूजा बनाएं और इस आत्मघाती पाप से बचें।

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