उपनिषदों में ईश्वर का स्वरूप सबसे महत्वपूर्ण विषय क्यों है?


  🔥उपनिषदों में ईश्वर का विवरण


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🌺 उपनिषदों में ईश्वर का स्वरूप सबसे महत्वपूर्ण विषय क्यों है?

वैदिक दर्शन की दृष्टि से एक प्रामाणिक विवेचन

उपनिषद् वेदों का ज्ञानकाण्ड हैं। इनका मुख्य उद्देश्य मनुष्य को आत्मा, परमात्मा, प्रकृति, कर्म और मोक्ष का यथार्थ ज्ञान कराना है। इनमें सबसे अधिक महत्व ईश्वर (ब्रह्म) के स्वरूप को दिया गया है, क्योंकि ईश्वर का यथार्थ ज्ञान ही मानव जीवन को सही दिशा प्रदान करता है।


📖 1. ईश्वर को जानना ही मोक्ष का मार्ग है

वेदाहमेतं पुरुषं महान्तम् आदित्यवर्णं तमसः परस्तात्।
तमेव विदित्वाऽतिमृत्युमेति नान्यः पन्था विद्यतेऽयनाय॥
(यजुर्वेद 31.18)

भावार्थ: उस महान्, प्रकाशस्वरूप परमात्मा को जानकर ही मनुष्य जन्म-मरण के बन्धन से मुक्त होता है। मोक्ष के लिए दूसरा कोई मार्ग नहीं है।


📖 2. ईश्वर समस्त जगत का आधार है

ईशावास्यमिदं सर्वं यत्किञ्च जगत्यां जगत्।
— 1

भावार्थ: इस सम्पूर्ण जगत में जो कुछ भी है, वह सब ईश्वर से व्याप्त है।

यदि ईश्वर ही समस्त सृष्टि का आधार है, तो उसका ज्ञान जीवन का मूल विषय बन जाता है।


📖 3. ईश्वर का स्वरूप कैसा है?

स पर्यगाच्छुक्रमकायमव्रणमस्नाविरं शुद्धमपापविद्धम्।
— 40.8

भावार्थ: परमात्मा सर्वव्यापक, निराकार, शुद्ध, सर्वज्ञ और पापरहित है।

उपनिषदों का उद्देश्य ईश्वर के ऐसे यथार्थ स्वरूप का ज्ञान कराना है, जिससे मनुष्य अंधविश्वास से मुक्त होकर सत्य को ग्रहण कर सके।


📖 4. ईश्वर का अनुभव कैसे हो?

तिलेषु तैलं दधिनीव सर्पिरापः स्रोतःसु अरणीषु चाग्निः।
एवमात्मात्मनि गृह्यतेऽसौ सत्येनैनं तपसाऽनुपश्यति॥
**— **

भावार्थ: जैसे तिल में तेल और दही में घी छिपा होता है, वैसे ही परमात्मा का अनुभव सत्य, तप, आत्मसंयम और साधना से होता है।


🌿 उपनिषद् ईश्वर पर इतना बल क्यों देते हैं?

क्योंकि ईश्वर का सही ज्ञान—

  • जीवन का उद्देश्य स्पष्ट करता है।
  • आत्मा की पहचान कराता है।
  • नैतिक जीवन की प्रेरणा देता है।
  • भय, अज्ञान और अंधविश्वास को दूर करता है।
  • मोक्ष का मार्ग प्रशस्त करता है।

🌺 ईश्वर-ज्ञान का व्यावहारिक प्रभाव

जो व्यक्ति ईश्वर को—

  • सर्वव्यापक मानता है, वह छल-कपट से बचता है।
  • न्यायकारी मानता है, वह धर्म का पालन करता है।
  • दयालु मानता है, वह करुणा और परोपकार अपनाता है।
  • सर्वज्ञ मानता है, वह अपने कर्मों के प्रति सजग रहता है।

इस प्रकार ईश्वर का ज्ञान केवल दार्शनिक विचार नहीं, बल्कि जीवन-निर्माण का आधार है।


📖 मुण्डक उपनिषद् का संदेश

सत्यमेव जयते नानृतम्।

भावार्थ: सत्य की ही विजय होती है।

परमात्मा सत्यस्वरूप है, इसलिए सत्य का अनुसरण करना ही ईश्वर की ओर बढ़ना है।


🌸 निष्कर्ष

उपनिषदों में ईश्वर का विवरण इसलिए सबसे महत्वपूर्ण विषय है क्योंकि ईश्वर का यथार्थ ज्ञान ही आत्मज्ञान, धर्म, नैतिकता, शान्ति और मोक्ष का आधार है। उपनिषद् मनुष्य को केवल ईश्वर के बारे में बताने के लिए नहीं, बल्कि उसके साथ अपने जीवन का संबंध समझाने के लिए रचे गए हैं।

"जो ईश्वर को जानता है, वह स्वयं को जानता है; और जो स्वयं को जानता है, वही जीवन के परम उद्देश्य को प्राप्त करता है।"

१. "यद्वाचाऽनभ्युदितं, येन वागभ्युद्यते ।

    तदेव ब्रह्म त्वं विद्धि, नेदं यदिदमुपासते ।।"

(केनोपनिषद् १/४) 

जो वाणी द्वारा प्रकाशित नहीं होता, जिससे वाणी का प्रकाश होता है, उसी को तू ब्रह्म जान । जिसका वाणी से सेवन किया जाता जाता है, वह ब्रह्म नहीं है ।

२. "यन्मनसा न मनुते, येनाहुर्मनो मतम् ।

    तदेव ब्रह्म त्वं विद्धि, नेदं यदिदमुपासते ।।"

(केन० १/५) 

जिसका मन से मनन नहीं किया जाता, जिसकी शक्ति से मन मनन करता है, उसी को तू ब्रह्म जान । जिसका मन से मनन किया जाता है, वह ब्रह्म नहीं है ।

३. "यच्चक्षुषा न पश्यति, येन चक्षूंषि पश्यन्ति ।

    तदेव ब्रह्म त्वं विद्धि, नेदं यदिदमुपासते ।।"

(केन. १/६) 

जो आंख से नहीं देखा जाता, जिसकी शक्ति से आँख देखती है, उसी को तू ब्रह्म जान । जो आँख से देखा जाता है, वह ब्रह्म नहीं है ।

४. "यच्छ्रोत्रेण न श्रृणोति, येन श्रोत्रमिदं श्रुतम् ।

     तदेव ब्रह्म त्वं विद्धि, नेदं यदिदमुपासते ।।"

(केन. १/७) 

जो कान से नहीं सुना जाता, जिससे कान सुनता है, उसी को तू ब्रह्म जान । जो कान से सुना जाता है, वह ब्रह्म नहीं है ।

५. "यत्प्राणेन न प्राणिति, येन प्राणः प्रणीयते ।

     तदेव ब्रह्म त्वं विद्धि, नेदं यदिदमुपासते ।।"

(केन० १/८) 

जो प्राण से प्राण के व्यापार में नहीं आता, जिससे प्राण अपना व्यापार करता है, उसी को तू ब्रह्म जान । जो प्राण के व्यापार में आता है, वह ब्रह्म नहीं है ।

६. अशरीरं शरीरेष्वनवस्थेष्ववस्थितम् ।

    महान्तं विभुमात्मानं मत्वा धीरो न शोचति ॥

(कठोपनिषद ७/२/२२) 

वह परमात्मा लोगों के अस्थिर शरीरों में रहकर भी शरीर-रहित हुआ स्थित है । उस महान् विभु/सर्वव्यापी परमात्मा को जानकर धीरपुरुष शोक नहीं करता ।

७. एष सर्वेषु भूतेषु गूढ़ोऽऽत्मा न प्रकाशते ।

    दृश्यते त्वग्र्यया बुद्ध्या सूक्ष्मया सूक्ष्मदर्शिभिः ॥

(कठोपनिषद १/३/१२)  

सभी भूतों अर्थात् प्राणियों और वस्तुओं में छिपा हुआ, यह परमात्मा चर्म-चक्षुओं से प्रत्यक्ष नहीं होता । सूक्ष्मदर्शी पुरुष ध्यान-योग लगाकर, सूक्ष्म और तीक्ष्ण बुद्धि द्वारा उसे देखते हैं।

८. अणोरणीयान्महतो महीयानात्माऽस्य जन्तोर्निहितो गुहायाम् । तमक्रतुः पश्यति वीतशोको धातुप्रसादान्महिमानमात्मनः ॥

(कठोपनिषद १/२/२०) 

अणु से भी अणु और महान से भी महान परमात्मा, जीव की हृदय-गुहा में स्थित है । निष्काम और शोकरहित साधक, परब्रह्म के प्रसाद/कृपा से ही, उस परमात्मा की महिमा को देखता है।

९. यत्तदद्रेश्यमग्राह्यमगोत्रमवर्णमक्षुः श्रोत्रं तदपाणिपादम् । नित्यं विभुं सर्वगतं सुसूक्ष्मं तदव्ययं यद्भूतयोनिं परिपश्यन्ति धीराः। (मुण्डकोपनिषद १/१/६) 

वह जो परमात्मा अदृश्य, अग्राह्य, अगोत्र, अवर्ण, और चक्षु, श्रोत्र इत्यादि से रहित है, एवं हाथ-पैर इत्यादि कर्मेन्द्रियों से भी रहित है, वह नित्य, विभु, सर्वगत, अत्यन्त सूक्ष्म, अव्यय है तथा समस्त भूतों का कारण है, उसे धीर पुरुष सब ओर देखते हैं ।

१०. दिव्यो ह्यमूर्तः पुरुषः स बाह्याभ्यन्तरो ह्यजः ।

अप्राणो ह्यमनाः शुभ्रो ह्यक्षरात् परतः परः ॥

(मुण्डकोपनिषद २/१/२) दिव्य और अमूर्त वह पुरुष, बाहर एवं भीतर होकर भी जन्मादि से रहित है । वह प्राण-रहित और मन-रहित और सर्वथा विशुद्ध है, एवं अक्षर/अविनाशी प्रकृति और जीव से भी सूक्ष्म वा श्रेष्ठ है।

११. न चक्षुषा गृह्यते नापि वाचा नान्यैर्देवैस्तपसा कर्मणा वा । ज्ञानप्रसादेन विशुद्धसत्त्वस्ततस्तु तं पश्यते निष्कलं ध्यायमानः ॥

(मुण्डकोपनिषद ३/१/८)

 वह ब्रह्म न नेत्र से ग्रहण किया जा सकता है, न ही वाणी से, न अन्य इन्द्रियों से, न केवल तप अथवा केवल कर्म से ही । ज्ञान के प्रसाद से विशुद्ध चित्तवाला ही ध्यान करता हुआ उस कलारहित ब्रह्म को साक्षात्कार करता है।

१२. सत्येन लभ्यस्तपसा ह्येष आत्मा सम्यग्ज्ञानेन ब्रह्मचर्येण नित्यम्। अन्तःशरीरे ज्योतिर्मयो हि शुभ्रो यं पश्यन्ति यतयः क्षीणदोषाः। (मुण्डकोपनिषद ३/१/५) 

यह परमात्मा सदैव ही सत्य, तप, सम्यक् ज्ञान और ब्रह्मचर्य के द्वारा प्राप्त किया जा सकता है । जिनके दोष क्षीण हो गए हैं, वे यत्नशील पुरुष शरीर के भीतर ही इस ज्योतिर्मय शुभ्र परमात्मा को देखते हैं।

१३. सर्वव्यापिनमात्मानं क्षीरे सर्पिरिवार्पितम् ।

     आत्मविद्यातपोमूलं तद्ब्रह्मोपनिषत् परम्।

(श्वेताश्वतरोपनिषद १/१६)

 वह सर्वव्यापी परमात्मा दूध में घी की भाँति सबमें विद्यमान है, और आत्मविद्या एवं तप उसकी प्राप्ति का मूल है । वह उपनिषद में कहा गया परम् ब्रह्म है।

१४. सर्वेन्द्रियगुणाभासं सर्वेन्द्रियविवर्जितम् ।

      सर्वस्य प्रभुमीशानं सर्वस्य शरणं बृहत् ॥

(श्वेताश्वतरोपनिषद ३/१७) 

वह नेत्र, कर्ण, हाथ-पैर आदि समस्त इन्द्रियों से रहित होकर भी समस्त इन्द्रियों के विषय-गुणों को जानने वाला है अर्थात बिना इंद्रियों के वह सब इंद्रियों के देखना, सुनना आदि कार्यों को कर लेता है । वह सबका स्वामी, नियन्ता और सबका बृहद् आश्रय है |

१५. अपाणिपादो जवनो ग्रहीता पश्यत्यचक्षुः स शृणोत्यकर्णः । स वेत्ति वेद्यं न च तस्यास्ति वेत्ता तमाहुरग्र्यं पुरुषं महान्तम् ॥     

(श्वेताश्वतरोपनिषद ३/१९) 

वह बिना हाथ के भी सबका ग्रहण करने वाला, पैर से रहित होकर भी वेग वाला है । आँखों से रहित होकर भी देखता है, और कानों से रहित होकर भी सुनता है । वह प्रत्येक जानने योग्य वस्तु को जानता है, परंतु उसका अंत जानने वाला अन्य कोई नहीं है । उसे ज्ञानीजन महान, श्रेष्ठ आदि कहते हैं।

१६. सर्वतः पाणिपादं तत् सर्वतोऽक्षिशिरोमुखम् ।

      सर्वतः श्रुतिमल्लोके सर्वमावृत्य तिष्ठति ॥

(श्वेताश्वतरोपनिषद ३/१६)  

वह सब जगह हाथ-पैर वाला अर्थात सब ओर गति वाला है । सब जगह आँख वाला अर्थात सब ओर देखने वाला है । सर्वत्र सिर और मुख वाला अर्थात सब कुछ जानने वाला है । और सब जगह कानों वाला अर्थात सर्वत्र सुनने वाला है । वही लोक में सबको व्याप्त करके स्थित है।

१७. न तस्य कश्चित् पतिरस्ति लोके न चेशिता नैव च तस्य  लिङ्गम् । स कारणं करणाधिपाधिपो न चास्य कश्चिज्जनिता न चाधिपः ॥ (श्वेताश्वतरोपनिषद ६/९)

 इस जगत में कोई उस परमात्मा का स्वामी नहीं है, उसका कोई शासक नहीं है एवं उसका कोई लिंग/चिह्न भी नहीं है । वह जगत् का निमित्त कारण है अर्थात संसार को बनाने वाला है‌ । वह इन्द्रियों के अधिष्ठाता जीवों का अधिपति है । उसका न कोई उत्पत्तिकर्ता है, न कोई अधिपति।

१८. तिलेषु तैलं दधिनीव सर्पिरापः स्रोतःस्वरणीषु चाग्निः । एवमात्माऽत्मनि गृह्यतेऽसौ सत्येनैनं तपसा योऽनुपश्यति ॥ (श्वेताश्वतरोपनिषद १/१५) 

जिस प्रकार तिलों में तैल, दही में घी, स्रोतों में जल और अरणियों में अग्नि क्रमशः पेरने, बिलोने, खोदने और रगड़ने से प्राप्त होते हैं, उसी प्रकार जो सत्य और तप के द्वारा परमात्मा को ध्यान-दृष्टि से देखता है, वह आत्मा में ही परमात्मा को प्राप्त करता है।

१९. नित्यो नित्यानां चेतनश्चेतनानां एको बहूनां यो विदधाति कामान् । तत्कारणं सांख्ययोगाधिगम्यं ज्ञात्वा देवं मुच्यते सर्वपाशैः ॥ (श्वेताश्वतरोपनिषद ६/१३) 

जो नित्यों का नित्य, चेतनों का चेतन अर्थात सर्वोपरि है, और एक अकेला ही सम्पूर्ण प्राणियों को उनके कर्मों का भोग प्रदान करता है, उस साँख्य एवं योग द्वारा अनुभूतिगम्य, सब जगत और शरीरों के कारणरूप/बनाने-वाले देव को जानकर, उपासक सम्पूर्ण पाशों/बन्धनों से मुक्त हो जाता है ।

बहुत अच्छा। आइए भाग–1 आरम्भ करते हैं।

🌺 उपनिषदों में ईश्वर का स्वरूप

भाग–1 : केनोपनिषद् (मन्त्र 1–5) का वैदिक भाष्य

उपनिषदों का मुख्य उद्देश्य मनुष्य को यह बताना है कि ईश्वर इन्द्रियों का विषय नहीं, बल्कि समस्त इन्द्रियों, मन और प्राण का आधार है। केनोपनिषद् का प्रथम अध्याय इसी सत्य की स्थापना करता है।


मन्त्र 1

यद्वाचाऽनभ्युदितं, येन वागभ्युद्यते।
तदेव ब्रह्म त्वं विद्धि, नेदं यदिदमुपासते॥
(केनोपनिषद् 1/4)

पदच्छेद

  • यत् = जो
  • वाचा = वाणी से
  • अनभ्युदितम् = जिसका पूर्ण वर्णन नहीं किया जा सकता
  • येन = जिससे
  • वाक् = वाणी
  • अभ्युद्यते = बोलती है, शक्ति प्राप्त करती है
  • तत् = वही
  • एव = ही
  • ब्रह्म = परमात्मा
  • त्वम् विद्धि = तू जान
  • न = नहीं
  • इदम् = यह
  • यत् = जिसे
  • इदम् उपासते = लोग इन्द्रियों से ग्रहण करते हैं

भावार्थ

जिस परमात्मा का वाणी द्वारा पूर्ण वर्णन नहीं किया जा सकता, किन्तु जिसकी शक्ति से वाणी बोलती है, उसी को ब्रह्म जान। जो वाणी का विषय बन जाए, वह परम ब्रह्म नहीं है।


दार्शनिक विवेचन

यहाँ उपनिषद् ईश्वर की अनन्तता का वर्णन करता है।

मनुष्य की भाषा सीमित है।

परमात्मा असीम है।

सीमित साधन असीम सत्ता का सम्पूर्ण वर्णन नहीं कर सकते।

इसका अर्थ यह नहीं कि ईश्वर का ज्ञान असम्भव है, बल्कि यह कि ईश्वर का सम्पूर्ण स्वरूप शब्दों में नहीं समा सकता।

जैसे—

एक बच्चा समुद्र को एक गिलास में नहीं भर सकता।

वैसे ही भाषा परमात्मा को सीमित नहीं कर सकती।


वैदिक प्रमाण

"न तस्य प्रतिमा अस्ति।"
(यजुर्वेद 32.3)

अर्थात् उसकी कोई प्रतिमा, समानता या तुल्य रूप नहीं।


"स पर्यगाच्छुक्रमकायमव्रणम्..."
(यजुर्वेद 40.8)

वह निराकार, सर्वव्यापक और सर्वज्ञ है।


जीवन में शिक्षा

यदि ईश्वर शब्दों से परे है,

तो धर्म केवल वाद-विवाद का विषय नहीं,

बल्कि अनुभूति का विषय है।


मन्त्र 2

यन्मनसा न मनुते, येनाहुर्मनो मतम्।
तदेव ब्रह्म त्वं विद्धि, नेदं यदिदमुपासते॥
(केनोपनिषद् 1/5)


भावार्थ

जिस परमात्मा का मन पूर्ण विचार नहीं कर सकता,

परन्तु जिसकी शक्ति से मन सोचता है,

उसी को ब्रह्म जान।


व्याख्या

मन अत्यन्त तीव्र है।

वह पृथ्वी से आकाश तक कल्पना कर सकता है।

किन्तु मन भी सीमित है।

परमात्मा असीम है।

इसलिए मन ईश्वर को पूरी तरह नहीं घेर सकता।

किन्तु मन उसी की शक्ति से सोचता है।

जैसे—

बल्ब प्रकाश देता है,

परन्तु बिजली के बिना नहीं।

वैसे ही मन परमात्मा की सत्ता से ही कार्य करता है।


वैदिक प्रमाण

"यो भूतं च भव्यम् च सर्वं यश्चाधितिष्ठति।"
(अथर्ववेद 10.8.1)

वही सबका आधार है।


जीवन की शिक्षा

मन को ईश्वर का स्वामी मत समझो।

मन ईश्वर का उपकरण है।


मन्त्र 3

यच्चक्षुषा न पश्यति, येन चक्षूंषि पश्यन्ति।
तदेव ब्रह्म त्वं विद्धि, नेदं यदिदमुपासते॥


भावार्थ

जिसे आँख नहीं देख सकती,

परन्तु जिसकी शक्ति से आँख देखती है,

उसी को ब्रह्म जान।


व्याख्या

आँख केवल रूप देखती है।

परन्तु परमात्मा रूपरहित है।

इसलिए वह आँखों का विषय नहीं।

यदि ईश्वर किसी आकार में दिखाई दे,

तो वह सीमित पदार्थ होगा।

परमात्मा सर्वव्यापक है।

इसलिए वह किसी एक दृश्य वस्तु में सीमित नहीं हो सकता।


वैदिक प्रमाण

"न तस्य प्रतिमा अस्ति।"
(यजुर्वेद 32.3)


जीवन की शिक्षा

ईश्वर को आँखों से नहीं,

ज्ञान, योग, सत्य और ध्यान से जाना जाता है।


मन्त्र 4

यच्छ्रोत्रेण न शृणोति, येन श्रोत्रमिदं श्रुतम्।
तदेव ब्रह्म त्वं विद्धि, नेदं यदिदमुपासते॥


भावार्थ

जिसे कान नहीं सुन सकते,

किन्तु जिसकी शक्ति से कान सुनते हैं,

उसी को ब्रह्म जान।


व्याख्या

ध्वनि पदार्थ का गुण है।

परमात्मा पदार्थ नहीं।

इसलिए उसकी कोई भौतिक ध्वनि नहीं।

किन्तु वही श्रवण शक्ति का दाता है।


शिक्षा

धार्मिक संगीत सुनना उपयोगी है,

किन्तु केवल सुन लेने से ईश्वर प्राप्त नहीं होता।

जीवन में सत्य और धर्म भी चाहिए।


मन्त्र 5

यत्प्राणेन न प्राणिति, येन प्राणः प्रणीयते।
तदेव ब्रह्म त्वं विद्धि, नेदं यदिदमुपासते॥


भावार्थ

जो प्राणों से संचालित नहीं होता,

बल्कि जिसकी सत्ता से प्राण कार्य करते हैं,

उसी को ब्रह्म जान।


व्याख्या

ईश्वर सांस नहीं लेता।

उसे भोजन नहीं चाहिए।

उसे विश्राम नहीं चाहिए।

वह स्वयं जीवनदाता है।

जीव प्राण से जीवित है।

प्राण ईश्वर की व्यवस्था से कार्य करते हैं।


वैदिक प्रमाण

"स नो बन्धुर्जनिता स विधाता।"
(यजुर्वेद 32.10)

वही हमारा उत्पन्न करने वाला, पालनकर्ता और विधाता है।


🌺 पाँचों मन्त्रों का सार

केनोपनिषद् के प्रथम पाँच मन्त्र बताते हैं कि—

  • ईश्वर वाणी का विषय नहीं, वाणी का आधार है।
  • ईश्वर मन का विषय नहीं, मन का प्रेरक है।
  • ईश्वर आँखों से दिखाई नहीं देता, पर आँखों को देखने की शक्ति देता है।
  • ईश्वर कानों से सुनाई नहीं देता, पर श्रवण शक्ति का आधार है।
  • ईश्वर प्राणों पर आश्रित नहीं, बल्कि प्राण उसी पर आश्रित हैं।

अतः ईश्वर को इन्द्रियों से नहीं, बल्कि सत्य, ज्ञान, योग, तप, ब्रह्मचर्य और आत्मानुभूति से जाना जाता है।

🌺 उपनिषदों में ईश्वर का स्वरूप

भाग–2 : कठोपनिषद् (मन्त्र 6–8) का वैदिक भाष्य

में और का संवाद मानव जीवन के सबसे गहन प्रश्नों—आत्मा, परमात्मा और मोक्ष—का समाधान प्रस्तुत करता है। इन मन्त्रों में परमात्मा की सर्वव्यापकता, सूक्ष्मता और उसकी अनुभूति का मार्ग बताया गया है।


मन्त्र 6

अशरीरं शरीरेष्वनवस्थेष्ववस्थितम्।
महान्तं विभुमात्मानं मत्वा धीरो न शोचति॥
(कठोपनिषद् 1.2.22)

पदच्छेद

  • अशरीरम् = शरीररहित
  • शरीरेषु = शरीरों में
  • अनवस्थेषु = नश्वर शरीरों में
  • अवस्थितम् = स्थित
  • महान्तम् = महान
  • विभुम् = सर्वव्यापक
  • आत्मानम् = परमात्मा
  • मत्वा = जानकर
  • धीरः = विवेकी मनुष्य
  • न शोचति = शोक नहीं करता

भावार्थ

परमात्मा स्वयं शरीररहित है, फिर भी सभी नश्वर शरीरों में व्यापक रूप से विद्यमान है। उस महान् सर्वव्यापक परमात्मा को जान लेने वाला विवेकी मनुष्य शोक से मुक्त हो जाता है।


दार्शनिक व्याख्या

यह मन्त्र ईश्वर के निराकार और सर्वव्यापक स्वरूप की घोषणा करता है।

यदि ईश्वर का शरीर होता, तो वह भी सीमित होता। जो शरीरधारी है, वह एक समय में केवल एक स्थान पर रह सकता है। परन्तु परमात्मा सर्वव्यापक है, इसलिए वह शरीरधारी नहीं हो सकता।

वैदिक प्रमाण

"स पर्यगाच्छुक्रमकायमव्रणमस्नाविरं शुद्धमपापविद्धम्।"
— 40.8

भावार्थ: परमात्मा शरीररहित, शुद्ध और सर्वव्यापक है।


जीवन की शिक्षा

जो व्यक्ति समझ लेता है कि आत्मा अमर है और परमात्मा सदा उसके साथ है, वह विपत्तियों में भी धैर्य नहीं खोता।


मन्त्र 7

एष सर्वेषु भूतेषु गूढोऽात्मा न प्रकाशते।
दृश्यते त्वग्र्यया बुद्ध्या सूक्ष्मया सूक्ष्मदर्शिभिः॥
(कठोपनिषद् 1.3.12)


पदच्छेद

  • एषः = यह
  • सर्वेषु भूतेषु = सभी प्राणियों में
  • गूढः = छिपा हुआ
  • आत्मा = परमात्मा
  • न प्रकाशते = प्रत्यक्ष दिखाई नहीं देता
  • दृश्यते = देखा जाता है
  • अग्र्यया बुद्ध्या = श्रेष्ठ बुद्धि से
  • सूक्ष्मया = सूक्ष्म विवेक से
  • सूक्ष्मदर्शिभिः = सूक्ष्म दृष्टि वाले ज्ञानी पुरुषों द्वारा

भावार्थ

परमात्मा सभी प्राणियों में विद्यमान है, पर सामान्य दृष्टि से दिखाई नहीं देता। शुद्ध, सूक्ष्म और विवेकयुक्त बुद्धि वाले साधक ही उसका अनुभव करते हैं।


दार्शनिक व्याख्या

ईश्वर छिपा हुआ नहीं है, बल्कि हमारी दृष्टि सीमित है।

जैसे—

  • रेडियो तरंगें वातावरण में रहती हैं, पर विशेष यंत्र से ही ग्रहण होती हैं।
  • गुरुत्वाकर्षण दिखाई नहीं देता, पर उसका प्रभाव अनुभव होता है।

वैसे ही परमात्मा प्रत्यक्ष आँखों से नहीं, बल्कि शुद्ध बुद्धि, योग और ध्यान से अनुभव किया जाता है।

वैदिक प्रमाण

"तिलेषु तैलं दधिनीव सर्पिः..."
— 1.15

जैसे तिल में तेल छिपा रहता है, वैसे ही परमात्मा का अनुभव साधना से होता है।


जीवन की शिक्षा

ईश्वर की अनुभूति के लिए केवल बाहरी अनुष्ठान पर्याप्त नहीं; मन की पवित्रता, सत्य और आत्मसंयम आवश्यक हैं।


मन्त्र 8

अणोरणीयान्महतो महीयानात्माऽस्य जन्तोर्निहितो गुहायाम्।
तमक्रतुः पश्यति वीतशोको धातुप्रसादान्महिमानमात्मनः॥
(कठोपनिषद् 1.2.20)


पदच्छेद

  • अणोः अणीयान् = अणु से भी सूक्ष्म
  • महतः महीयान् = महान से भी महान
  • आत्मा = परमात्मा
  • जन्तोः = जीव के
  • गुहायाम् = हृदय-गुहा में
  • निहितः = स्थित
  • अक्रतुः = निष्काम, शुद्धचित्त
  • वीतशोकः = शोक से रहित
  • धातुप्रसादात् = अन्तःकरण की शुद्धि से
  • महिमानम् = महिमा
  • आत्मनः = परमात्मा की

भावार्थ

परमात्मा अणु से भी सूक्ष्म और सबसे महान है। वह प्रत्येक जीव के अन्तःकरण में विद्यमान है। निष्काम, शुद्ध और शोकमुक्त साधक अन्तःकरण की निर्मलता से उसकी महिमा का अनुभव करता है।


दार्शनिक व्याख्या

"अणोरणीयान्"

इसका अर्थ यह नहीं कि परमात्मा वास्तव में किसी भौतिक अणु से छोटा है, बल्कि वह इतना सूक्ष्म है कि किसी इन्द्रिय से पकड़ा नहीं जा सकता।

"महतो महीयान्"

वह सम्पूर्ण ब्रह्माण्ड से भी महान है, क्योंकि वही उसका आधार और नियन्ता है।

"गुहायाम्"

हृदय-गुहा का अर्थ भौतिक हृदय नहीं, बल्कि अन्तःकरण (चेतना का क्षेत्र) है।


वैदिक प्रमाण

"ईशावास्यमिदं सर्वं यत्किञ्च जगत्यां जगत्।"
— 1

परमात्मा सम्पूर्ण जगत में व्याप्त है।


🌺 इन तीन मन्त्रों का समन्वित निष्कर्ष

कठोपनिषद् के ये मन्त्र स्पष्ट करते हैं कि—

  1. परमात्मा निराकार है, पर सब शरीरों में व्यापक है।
  2. परमात्मा सर्वव्यापक है, पर सामान्य इन्द्रियों से दिखाई नहीं देता।
  3. परमात्मा अत्यन्त सूक्ष्म भी है और अनन्त महान भी।
  4. ईश्वर की अनुभूति शुद्ध बुद्धि, सत्य, योग और आत्मसंयम से होती है।
  5. जिसने परमात्मा को जान लिया, वह भय, शोक और मोह से मुक्त हो जाता है।

📖 वैदिक सिद्धान्त

इन मन्त्रों से यह सिद्ध होता है कि परमात्मा—

  • निराकार है।
  • अजन्मा है।
  • सर्वव्यापक है।
  • सर्वज्ञ है।
  • सर्वशक्तिमान है।
  • सबका आधार और नियन्ता है।

यही स्वरूप वेदों, उपनिषदों और वैदिक दर्शन में प्रतिपादित है।

🌺 उपनिषदों में ईश्वर का स्वरूप

भाग–3 : मुण्डकोपनिषद् (मन्त्र 9–12) का वैदिक भाष्य

का प्रमुख उद्देश्य मनुष्य को यह समझाना है कि परमात्मा न तो इन्द्रियों का विषय है, न कल्पना का, बल्कि सत्य, ज्ञान, ब्रह्मचर्य, तप और ध्यान से अनुभव होने वाली परम सत्ता है। इन मन्त्रों में ईश्वर के स्वरूप और उसकी प्राप्ति के साधनों का अत्यन्त गम्भीर विवेचन है।


मन्त्र 9

यत्तदद्रेश्यमग्राह्यमगोत्रमवर्णम्
अचक्षुःश्रोत्रं तदपाणिपादम्।
नित्यं विभुं सर्वगतं सुसूक्ष्मं
तदव्ययं यद्भूतयोनिं परिपश्यन्ति धीराः॥ (मुण्डकोपनिषद् 1.1.6)


पदच्छेद एवं शब्दार्थ

  • अद्रेश्यम् = जो दिखाई नहीं देता।
  • अग्राह्यम् = जिसे इन्द्रियाँ पकड़ नहीं सकतीं।
  • अगोत्रम् = जिसका कोई वंश या जन्म नहीं।
  • अवर्णम् = जिसका कोई रंग या रूप नहीं।
  • अचक्षुः-श्रोत्रम् = जिसके भौतिक नेत्र और कान नहीं।
  • अपाणिपादम् = जिसके हाथ-पैर नहीं।
  • नित्यम् = सदा रहने वाला।
  • विभुम् = सर्वव्यापक।
  • सर्वगतम् = सब स्थानों में स्थित।
  • सुसूक्ष्मम् = अत्यन्त सूक्ष्म।
  • अव्ययम् = जिसका कभी नाश नहीं होता।
  • भूतयोनिम् = समस्त सृष्टि का कारण।

भावार्थ

परमात्मा ऐसा है जो आँखों से दिखाई नहीं देता, इन्द्रियों से ग्रहण नहीं किया जा सकता, जिसका कोई जन्म, रंग, रूप या शरीर नहीं है। वह नित्य, सर्वव्यापक, अत्यन्त सूक्ष्म, अविनाशी तथा समस्त सृष्टि का कारण है। विवेकी पुरुष उसी का साक्षात्कार करते हैं।


दार्शनिक व्याख्या

यह मन्त्र ईश्वर के निराकार स्वरूप का सबसे स्पष्ट वर्णन करता है।

यदि ईश्वर का रंग होता—

तो वह सीमित होता।

यदि उसका शरीर होता—

तो उसका आकार होता।

यदि उसका जन्म होता—

तो उसका जन्मदाता भी होता।

परन्तु उपनिषद् कहता है—

अगोत्रम्।

अर्थात उसका कोई उत्पन्न करने वाला नहीं।

वह स्वयंभू है।


वैदिक प्रमाण

"न तस्य प्रतिमा अस्ति।"
— 32.3


"स पर्यगाच्छुक्रमकायमव्रणम्..."
— 40.8


जीवन की शिक्षा

ईश्वर को किसी सीमित रूप में बाँधना उसके अनन्त स्वरूप को सीमित करना है।


मन्त्र 10

दिव्यो ह्यमूर्तः पुरुषः स बाह्याभ्यन्तरो ह्यजः।
अप्राणो ह्यमनाः शुभ्रो ह्यक्षरात्परतः परः॥ (मुण्डकोपनिषद् 2.1.2)


शब्दार्थ

  • दिव्यः = दिव्य स्वरूप वाला।
  • अमूर्तः = निराकार।
  • बाह्याभ्यन्तरः = बाहर और भीतर दोनों में।
  • अजः = अजन्मा।
  • अप्राणः = जिसे जीवों की तरह प्राणों की आवश्यकता नहीं।
  • अमनाः = मन से रहित (जीव की भाँति चंचल मन वाला नहीं)।
  • शुभ्रः = सर्वथा शुद्ध।
  • अक्षरात् परः = अविनाशी प्रकृति और जीव से भी श्रेष्ठ।

भावार्थ

परमात्मा दिव्य, निराकार, सबके भीतर और बाहर विद्यमान, अजन्मा, प्राण और मन से रहित (जीव की भाँति उन पर आश्रित नहीं), सर्वथा शुद्ध तथा जीव और प्रकृति दोनों से श्रेष्ठ है।


दार्शनिक व्याख्या

यहाँ "अप्राणः" का अर्थ यह नहीं कि परमात्मा निर्जीव है।

बल्कि—

वह जीव की तरह श्वास नहीं लेता।

उसे ऑक्सीजन की आवश्यकता नहीं।

"अमनाः"

का अर्थ यह नहीं कि उसमें ज्ञान नहीं।

बल्कि—

वह मन का उपयोग करके नहीं सोचता।

उसका ज्ञान स्वतः, पूर्ण और सर्वज्ञ है।


वैदिक प्रमाण

"कविर्मनीषी परिभूः स्वयंभूः।"
— 40.8


जीवन की शिक्षा

मनुष्य का ज्ञान साधनों पर निर्भर है।

परमात्मा का ज्ञान स्वाभाविक है।


मन्त्र 11

न चक्षुषा गृह्यते नापि वाचा
नान्यैर्देवैस्तपसा कर्मणा वा।
ज्ञानप्रसादेन विशुद्धसत्त्वः
ततस्तु तं पश्यते निष्कलं ध्यायमानः॥ (मुण्डकोपनिषद् 3.1.8)


भावार्थ

परमात्मा को न आँखों से देखा जा सकता है, न वाणी से व्यक्त किया जा सकता है, न केवल इन्द्रियों, तप या कर्म से ही पाया जा सकता है। शुद्ध ज्ञान और निर्मल चित्त वाला साधक ध्यान के द्वारा उस अखण्ड परमात्मा का अनुभव करता है।


दार्शनिक व्याख्या

यह मन्त्र बताता है—

केवल कर्मकाण्ड पर्याप्त नहीं।

केवल तप पर्याप्त नहीं।

केवल अध्ययन पर्याप्त नहीं।

ज्ञान + शुद्ध चरित्र + ध्यान

इन तीनों के समन्वय से ईश्वर का अनुभव होता है।


वैदिक प्रमाण

"तमेव विदित्वाऽतिमृत्युमेति।"
— 31.18


जीवन की शिक्षा

धर्म केवल पूजा नहीं।

धर्म है—

  • सत्य
  • ज्ञान
  • आत्मसंयम
  • ध्यान
  • सदाचार

मन्त्र 12

सत्येन लभ्यस्तपसा ह्येष आत्मा
सम्यग्ज्ञानेन ब्रह्मचर्येण नित्यम्।
अन्तःशरीरे ज्योतिर्मयो हि शुभ्रो
यं पश्यन्ति यतयः क्षीणदोषाः॥ (मुण्डकोपनिषद् 3.1.5)


शब्दार्थ

  • सत्येन = सत्य के पालन से।
  • तपसा = तप द्वारा।
  • सम्यग्ज्ञानेन = यथार्थ ज्ञान से।
  • ब्रह्मचर्येण = इन्द्रियनिग्रह और ब्रह्मचर्य से।
  • यतयः = प्रयत्नशील साधक।
  • क्षीणदोषाः = जिनके राग-द्वेष आदि दोष नष्ट हो गए हैं।

भावार्थ

यह परमात्मा सत्य, तप, यथार्थ ज्ञान और ब्रह्मचर्य के द्वारा प्राप्त होता है। जिन साधकों के दोष क्षीण हो गए हैं, वे अपने अन्तःकरण में उस ज्योतिर्मय, निर्मल परमात्मा का अनुभव करते हैं।


दार्शनिक व्याख्या

यह मन्त्र ईश्वर-प्राप्ति का सम्पूर्ण वैदिक मार्ग बताता है—

(1) सत्य

सत्य बोलना ही नहीं,

सत्य को जीना।


(2) तप

इन्द्रियों का संयम।


(3) सम्यक् ज्ञान

वेद और उपनिषद् के अनुसार सत्य का ज्ञान।


(4) ब्रह्मचर्य

शरीर, मन और इन्द्रियों की पवित्रता।


वैदिक प्रमाण

"ऋतेन सत्येन परिशुद्ध आत्मा।"

सत्य ही आत्मा को निर्मल बनाता है।


🌺 चारों मन्त्रों का समन्वित निष्कर्ष

इन मन्त्रों से स्पष्ट होता है कि—

  • परमात्मा निराकार है।
  • वह इन्द्रियों से परे है।
  • वह सर्वव्यापक और सर्वज्ञ है।
  • वह न जन्म लेता है, न नष्ट होता है।
  • वह जीव की तरह मन और प्राण पर निर्भर नहीं है।
  • उसकी प्राप्ति केवल बाहरी कर्मकाण्ड से नहीं होती।
  • सत्य, तप, सम्यक् ज्ञान, ब्रह्मचर्य और ध्यान से उसका अनुभव होता है।

उपनिषदों का सिद्धान्त

उपनिषद् बार-बार यह बताते हैं कि ईश्वर को देखा नहीं जाता, अनुभव किया जाता है; कल्पना नहीं, साधना उसका मार्ग है; और साधना का आधार सत्य, ज्ञान, तप तथा चरित्र की पवित्रता है।

🌺 उपनिषदों में ईश्वर का स्वरूप

भाग–4 : श्वेताश्वतरोपनिषद् (मन्त्र 13–19) का वैदिक भाष्य

उपनिषदों में ईश्वर के स्वरूप का अत्यन्त स्पष्ट और दार्शनिक निरूपण करने वाला ग्रन्थ है। यहाँ परमात्मा की सर्वव्यापकता, सर्वज्ञता, निराकारता, सर्वशक्तिमत्ता, स्वतंत्र सत्ता तथा उसकी प्राप्ति के साधनों का अत्यन्त वैज्ञानिक एवं आध्यात्मिक विवेचन मिलता है।


मन्त्र 13

सर्वव्यापिनमात्मानं क्षीरे सर्पिरिवार्पितम्।
आत्मविद्यातपोमूलं तद्ब्रह्मोपनिषत्परम्॥ (श्वेताश्वतर उपनिषद् 1.16)

भावार्थ

जैसे दूध में घी छिपा रहता है, वैसे ही परमात्मा सम्पूर्ण जगत में व्यापक है। आत्मविद्या और तप ही उसकी प्राप्ति के मूल साधन हैं।


व्याख्या

दूध को देखकर घी दिखाई नहीं देता।

लेकिन घी उसी में उपस्थित रहता है।

उसे प्राप्त करने के लिए—

  • दूध जमाना पड़ता है।
  • दही बनाना पड़ता है।
  • मथना पड़ता है।

तब घी प्रकट होता है।

उसी प्रकार—

परमात्मा सर्वत्र है,

लेकिन सत्य, योग, तप, स्वाध्याय और आत्मशुद्धि के बिना उसका अनुभव नहीं होता।

वैदिक प्रमाण

"ईशावास्यमिदं सर्वं यत्किञ्च जगत्यां जगत्।"
— 1


मन्त्र 14

सर्वेन्द्रियगुणाभासं सर्वेन्द्रियविवर्जितम्।
सर्वस्य प्रभुमीशानं सर्वस्य शरणं बृहत्॥ (श्वेताश्वतर उपनिषद् 3.17)

भावार्थ

परमात्मा स्वयं इन्द्रियों से रहित है, फिर भी सभी इन्द्रियों के कार्यों को जानता है। वह सबका स्वामी, नियन्ता और महान आश्रय है।


व्याख्या

मनुष्य देखने के लिए आँख चाहता है।

सुनने के लिए कान चाहता है।

परन्तु परमात्मा किसी भौतिक अंग पर निर्भर नहीं।

उसका ज्ञान स्वाभाविक है।

वैदिक प्रमाण

"कविर्मनीषी परिभूः स्वयंभूः।"
— 40.8


मन्त्र 15

अपाणिपादो जवनो ग्रहीता पश्यत्यचक्षुः स शृणोत्यकर्णः।
स वेत्ति वेद्यं न च तस्यास्ति वेत्ता तमाहुरग्र्यं पुरुषं महान्तम्॥ (श्वेताश्वतर उपनिषद् 3.19)

भावार्थ

परमात्मा बिना हाथों के ग्रहण करता है, बिना पैरों के सर्वत्र पहुँचता है, बिना आँखों के देखता है और बिना कानों के सुनता है। वह सबको जानता है, पर उसे पूर्ण रूप से कोई नहीं जान सकता।


व्याख्या

इस मन्त्र में विरोधाभास नहीं, बल्कि ईश्वर की अलौकिक सत्ता का वर्णन है।

"बिना आँखों के देखता है" का अर्थ है—

वह देखने के लिए नेत्रों पर निर्भर नहीं।

"बिना कानों के सुनता है" का अर्थ है—

वह ध्वनि ग्रहण करने के लिए भौतिक कानों का मोहताज नहीं।

इसीलिए वह सर्वज्ञ है।

वैदिक प्रमाण

"स पर्यगाच्छुक्रमकायमव्रणम्..."
— 40.8


मन्त्र 16

सर्वतः पाणिपादं तत् सर्वतोऽक्षिशिरोमुखम्।
सर्वतः श्रुतिमल्लोके सर्वमावृत्य तिष्ठति॥ (श्वेताश्वतर उपनिषद् 3.16)

भावार्थ

परमात्मा मानो सब ओर हाथ-पैर, आँखें, मुख और कान वाला है; अर्थात् वह सम्पूर्ण जगत को व्याप्त करके सब कुछ जानता और नियंत्रित करता है।


व्याख्या

यहाँ "सर्वत्र हाथ-पैर" का अर्थ भौतिक अंग नहीं है।

इसका तात्पर्य है—

जहाँ भी कोई क्रिया हो रही है,

वहाँ परमात्मा का ज्ञान और शासन उपस्थित है।

वह किसी विशेष स्थान में सीमित नहीं।


मन्त्र 17

न तस्य कश्चित्पतिरस्ति लोके न चेशिता नैव च तस्य लिङ्गम्।
स कारणं करणाधिपाधिपो न चास्य कश्चिज्जनिता न चाधिपः॥ (श्वेताश्वतर उपनिषद् 6.9)

भावार्थ

परमात्मा का कोई स्वामी नहीं, कोई शासक नहीं, कोई जन्मदाता नहीं। वही जगत का कारण और सभी कारणों का भी कारण है।


व्याख्या

यदि ईश्वर का भी कोई निर्माता हो,

तो वह निर्माता ईश्वर कहलाएगा।

इसलिए परमात्मा—

  • अजन्मा है।
  • स्वयंभू है।
  • अनादि है।
  • सर्वश्रेष्ठ है।

वैदिक प्रमाण

"अजो एकपात्।"


मन्त्र 18

तिलेषु तैलं दधिनीव सर्पिरापः स्रोतःस्वरणीषु चाग्निः।
एवमात्माऽत्मनि गृह्यतेऽसौ सत्येनैनं तपसा योऽनुपश्यति॥ (श्वेताश्वतर उपनिषद् 1.15)

भावार्थ

जैसे तिल में तेल, दही में घी, लकड़ी में अग्नि छिपी रहती है, वैसे ही परमात्मा आत्मा में अनुभव किया जाता है। सत्य और तप से युक्त साधक उसे प्राप्त करता है।


व्याख्या

यह उपनिषद् का अत्यन्त प्रसिद्ध उदाहरण है।

तेल तिल में है,

पर अपने आप बाहर नहीं आता।

परिश्रम करना पड़ता है।

इसी प्रकार—

परमात्मा की अनुभूति के लिए भी—

  • सत्य
  • तप
  • योग
  • ब्रह्मचर्य
  • ध्यान

आवश्यक हैं।


मन्त्र 19

नित्यो नित्यानां चेतनश्चेतनानामेको बहूनां यो विदधाति कामान्।
तत्कारणं सांख्ययोगाधिगम्यं ज्ञात्वा देवं मुच्यते सर्वपाशैः॥ (श्वेताश्वतर उपनिषद् 6.13)

भावार्थ

वह परमात्मा समस्त नित्य जीवों में भी सर्वोच्च नित्य है, सभी चेतन प्राणियों का परम चेतन है। वही सबको उनके कर्मानुसार फल देता है। उसे ज्ञान और योग से जानकर मनुष्य सभी बन्धनों से मुक्त हो जाता है।


दार्शनिक व्याख्या

यह मन्त्र तीन अनादि सत्यों को स्पष्ट करता है—

  1. परमात्मा — परम चेतन, सर्वज्ञ, स्वतंत्र।
  2. जीवात्मा — चेतन, किन्तु सीमित ज्ञान वाला।
  3. प्रकृति — जड़, जिससे सृष्टि की रचना होती है।

परमात्मा जीव नहीं है।

जीव परमात्मा नहीं है।

दोनों चेतन हैं,

किन्तु परमात्मा सर्वज्ञ और सर्वशक्तिमान है, जबकि जीव अल्पज्ञ और कर्मफल का भोक्ता है।

वैदिक प्रमाण

"द्वा सुपर्णा सयुजा सखाया..."
— 1.164.20

एक ही वृक्ष पर दो पक्षी—एक जीव, दूसरा परमात्मा।


🌺 सम्पूर्ण श्वेताश्वतर उपनिषद् का निष्कर्ष

इन सात मन्त्रों से ईश्वर के निम्न गुण सिद्ध होते हैं—

  • वह सर्वव्यापक है।
  • वह निराकार है।
  • वह सर्वज्ञ है।
  • वह सर्वशक्तिमान है।
  • वह अजन्मा है।
  • उसका कोई स्वामी या जन्मदाता नहीं।
  • वह सबका नियन्ता है।
  • वह सत्य, तप, योग और आत्मविद्या से अनुभव किया जाता है।
  • वही कर्मानुसार फलदाता है।
  • उसे जानकर जीव बन्धनों से मुक्त हो जाता है।

🌸 चारों भागों का समग्र निष्कर्ष

केनोपनिषद्, कठोपनिषद्, मुण्डकोपनिषद् और श्वेताश्वतरोपनिषद् के इन 19 मन्त्रों का एक स्वर में संदेश है कि—

  • ईश्वर निराकार है।
  • ईश्वर सर्वव्यापक है।
  • ईश्वर सर्वज्ञ और न्यायकारी है।
  • ईश्वर अजन्मा और अनन्त है।
  • ईश्वर इन्द्रियों से नहीं, शुद्ध अन्तःकरण से अनुभूत होता है।
  • सत्य, तप, ब्रह्मचर्य, योग, ज्ञान और ध्यान उसके साक्षात्कार के साधन हैं।
  • उसी का ज्ञान मानव जीवन का परम लक्ष्य है, क्योंकि उसी से शोक, भय और जन्म-मरण के बन्धनों से मुक्ति मिलती है।

ॐ पूर्णमदः पूर्णमिदं पूर्णात्पूर्णमुदच्यते।
पूर्णस्य पूर्णमादाय पूर्णमेवावशिष्यते॥

ॐ शान्तिः शान्तिः शान्तिः॥

🍁🍀🍁🍀🍁🍀🍁🍀

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