🔥ओ३म् इन्द्रं वर्धन्तो अप्तुर: कृण्वन्तो विश्वमार्यम्।अपघ्नन्तो अराव्ण:।। ऋग्वेद -९-६३-५ ।।
इन्द्रं वर्धन्त:-* ईश्वर के प्रति श्रद्धा ,
अप्तुर:-* सत्कर्मो की प्रेरणा ।
विश्वं आर्यं कृण्वन्त:-* सारे विश्व को आर्य बनाते हुए ,
*अराव्ण: अपघ्नन्त: -* दुष्टो कंजूसो मक्खीचूसो को मार भगाते हुए।
जो मनुष्य ज्ञानी है ,विद्वान है ,तपस्वी है उन्हें चाहिये की वे वेद की इन बातो ,आदेशो का पालन करते हुए सदा उन्नति करे ,ऊपर उठे। पहला आदेश इन्द्रं उनको चाहिये कि वे लोगो को आस्तिक बनाये। लोगो के मन मे ईश्वर के प्रति श्रद्धा उत्पन्न करे ,विश्वास पैदा करे, निष्ठा पैदा करे।जिससे वे पुरुषार्थी बने।जब लोग ईश्वर भक्त और पुरुषार्थी होगे , तो वे गलत तरीके से धन नहीं कमायेगे। जो कुछ उन्हें पुरुषार्थ करके मिलेगा उस पर ही सन्तोष करेगे।क्योंकि वे ईश्वर की न्याय व्यवस्था पर विश्वास करेंगे।
दूसरा तपस्वी विद्वानो को चाहिये कि वे लोगो को कर्म करने की प्रेरणा दे,लोग कर्मठ बने।जब लोग उद्यमशील होगे तो समृद्धि आयेगी ,देश उन्नति करेगा।किसी वस्तु का अभाव नहीं रहेगा।और लोग खाली न रहने से अनेक बुराई से बच जायेंगे। अक्सर सरकारे वोटो की राजनीति के कारण जनता को मुफ़्त मे अनाज व दूसरे सामान व पैसा देती है इससे लोगो मे काम न करने की भावना आती है।वह कर्महीन निठल्ला हो जाता है। और निठल्ला मनुष्य अनेकों बुराई मे फंस जाता है।क्योंकि कहा जाता है कि खाली मस्तिष्क शैतान का घर होता है।यदि मनुष्य की सोच सकारात्मक नहीं तो नकारात्मक अपने आप हो जायेगी।उसको कोई रोक नहीं सकता ।इसलिए यदि सरकार वास्तव मे भला करना चाहती है तो लोगो को काम दे अनाज नहीं ।
तीसरा ज्ञानी लोग विश्व को आर्य बनाने श्रेष्ठ बनाने की दिशा मे कार्य करे। यहाँ किसी व्यक्ति विशेष ,देश विशेष या संप्रदाय विशेष को श्रेष्ठ बनाने की बात नहीं कही बल्कि मानव मात्र को श्रेष्ठ बनाने की बात कही है क्योंकि ईश्वर सबको आर्य श्रेष्ठ चाहता है।जब सब आर्य होगे श्रेष्ठ होगे उनका आहार ,व्यवहार भी शुद्ध पवित्र होगा और सभी सुख शांति से जीवन बितायेगे।
चौथा और महत्वपूर्ण कर्तव्य यह है अराव्ण- वे अपने इन लक्ष्यो के रास्ते मे आने वाली सब बुराईयो को बाधा को मार भगाये वे बाधा चाहे बाहरी हो या भीतरी हो।उन्हें चाहिये कि शुभ कार्यो में बाधा डालने वाले जो भाव है जैसे अराति की भावना ,स्वार्थ व काम क्रोध ,लोभ ,मोह आदि की वृत्ति और समाज मे जो अदानी ,स्वार्थी ,कञ्जूस मक्खीचूस व्यक्ति है उन सबको अपने रास्ते से हटाकर सदा उन्नति के मार्ग पर चले।
ऋग्वेद 9.63.5 : विश्व को आर्य बनाने का वैदिक संदेश
मंत्र
ॐ इन्द्रं वर्धन्तो अप्तुरः कृण्वन्तो विश्वमार्यम्।
अपघ्नन्तो अराव्णः॥
(ऋग्वेद 9.63.5)
भावार्थ
जो पुरुष परिश्रमी, पुरुषार्थी और सत्यनिष्ठ हैं, वे ऐश्वर्य, शक्ति और श्रेष्ठ गुणों को बढ़ाते हुए समस्त विश्व को आर्य अर्थात् श्रेष्ठ, सभ्य, विद्वान और सदाचारी बनाने का प्रयत्न करें तथा अज्ञान, अन्याय, शत्रुता और दुष्प्रवृत्तियों का नाश करें।
'आर्य' का वास्तविक अर्थ
इस मंत्र का सबसे महत्वपूर्ण शब्द है — "आर्यम्"।
वेदों में आर्य किसी जाति, नस्ल, भाषा या समुदाय का नाम नहीं है। आर्य का अर्थ है—
- श्रेष्ठ आचरण वाला,
- सत्य का अनुसरण करने वाला,
- विद्वान,
- न्यायप्रिय,
- सभ्य और संस्कारित व्यक्ति।
इसीलिए ऋषि कहते हैं—
"कृण्वन्तो विश्वमार्यम्"
अर्थात् पूरे विश्व को श्रेष्ठ गुणों से युक्त बनाओ।
यह मानवता के उत्थान का सार्वभौमिक संदेश है, किसी संकीर्ण समूह का नहीं।
इन्द्र का वैदिक अर्थ
वेदों में "इन्द्र" का अर्थ केवल किसी देवता-विशेष तक सीमित नहीं है। इन्द्र शब्द शक्ति, ऐश्वर्य, नेतृत्व, पराक्रम और उत्कृष्टता का भी बोध कराता है।
अतः "इन्द्रं वर्धन्तः" का अर्थ है—
- समाज में ज्ञान बढ़ाना,
- शक्ति बढ़ाना,
- सद्गुण बढ़ाना,
- नेतृत्व क्षमता विकसित करना।
अज्ञान और अन्याय के विरुद्ध संघर्ष
मंत्र का अंतिम भाग है—
"अपघ्नन्तो अराव्णः"
अर्थात् शत्रुतापूर्ण, अन्यायी, अज्ञानपूर्ण और समाज-विरोधी प्रवृत्तियों को दूर करो।
यहाँ संघर्ष किसी व्यक्ति के विरुद्ध नहीं, बल्कि—
- अज्ञान के विरुद्ध,
- अंधविश्वास के विरुद्ध,
- अन्याय के विरुद्ध,
- आलस्य के विरुद्ध,
- दुर्गुणों के विरुद्ध है।
राष्ट्र निर्माण का वैदिक सूत्र
यदि किसी राष्ट्र को महान बनाना है तो उसके नागरिकों में ये गुण होने चाहिए—
- शिक्षा
- चरित्र
- परिश्रम
- अनुशासन
- राष्ट्रप्रेम
- मानवता
ऋषि चाहते हैं कि प्रत्येक व्यक्ति स्वयं श्रेष्ठ बने और दूसरों को भी श्रेष्ठ बनाने का प्रयास करे।
आज के युग में मंत्र की प्रासंगिकता
आज संसार अनेक चुनौतियों से घिरा है—
- हिंसा,
- भ्रष्टाचार,
- नैतिक पतन,
- पर्यावरण संकट,
- सामाजिक विभाजन।
इन समस्याओं का समाधान केवल कानूनों से नहीं, बल्कि श्रेष्ठ चरित्र वाले मनुष्यों से होगा।
इसलिए वैदिक उद्घोष आज भी उतना ही प्रासंगिक है—
"कृण्वन्तो विश्वमार्यम्"
विश्व को श्रेष्ठ, शिक्षित, संस्कारित और नैतिक बनाओ।
निष्कर्ष
ऋग्वेद का यह मंत्र मानवता के लिए एक वैश्विक घोषणा है। यह हमें प्रेरित करता है कि हम स्वयं ज्ञान, सत्य और सदाचार के मार्ग पर चलें तथा समाज से अज्ञान, अन्याय और दुर्गुणों को दूर करने का प्रयास करें।
संदेश
"आर्य जन्म से नहीं, कर्म से बनता है।
जो सत्य, ज्ञान, न्याय और परोपकार का जीवन जीता है, वही वास्तविक आर्य है।"
ॐ कृण्वन्तो विश्वमार्यम्।
आइए, हम स्वयं श्रेष्ठ बनें और विश्व को श्रेष्ठ बनाने का संकल्प लें। 🙏📖✨
*💐🙏आज का वेद मंत्र 💐🙏*
🌷ओ३म् अग्न आ याहि वीतये गृणाणो हव्यदातये। नि होता सत्सि बर्हिषि।(सामवेद पूर्वार्चिक १|१ )
💐अर्थ :- हे प्रकाशस्वरूप परमात्मन् ! चित्त की एकाग्रता के लिए, जीवन में गति देने के लिए, हमारे सब कार्यों में सदगुण देने तथा सुपथ प्रदान करने के लिए आप आओ।यज्ञादि शुभ कर्मों द्वारा सदा हमारे ह्रदय में विराजो, हम सदा आपको स्मरण करते रहें।
सामवेद पूर्वार्चिक 1.1 : ज्ञान, ऊर्जा और श्रेष्ठ कर्म का वैदिक आह्वान
मंत्र
ॐ अग्न आ याहि वीतये गृणाणो हव्यदातये।
नि होता सत्सि बर्हिषि॥
(सामवेद पूर्वार्चिक 1.1)
भावार्थ
हे अग्ने! (हे प्रकाशस्वरूप, ज्ञानदायक और ऊर्जा प्रदान करने वाले परमात्मन् अथवा अग्नितत्त्व!) हमारे पास पधारो। हमारे स्तुतिपूर्ण कर्मों और यज्ञमय जीवन को स्वीकार करो तथा हमारे जीवन में मार्गदर्शक, प्रेरक और कल्याणकारी शक्ति के रूप में प्रतिष्ठित हो जाओ।
सामवेद का प्रथम मंत्र और उसका संदेश
सामवेद का आरम्भ अग्नि की स्तुति से होता है। यह कोई संयोग नहीं है। वैदिक संस्कृति में अग्नि केवल भौतिक आग नहीं, बल्कि प्रकाश, ज्ञान, ऊर्जा, प्रेरणा और प्रगति का प्रतीक है।
जिस प्रकार अग्नि अंधकार को दूर करती है, उसी प्रकार ज्ञान अज्ञान को दूर करता है। इसलिए ऋषि सबसे पहले अपने जीवन में ज्ञानरूपी अग्नि का आवाहन करते हैं।
वैज्ञानिक दृष्टिकोण
संपूर्ण ब्रह्माण्ड ऊर्जा पर आधारित है। सूर्य की अग्नि से ही पृथ्वी पर प्रकाश, ऊष्मा, वर्षा, वनस्पति और जीवन संभव है।
आज विज्ञान बताता है कि—
- सूर्य की ऊर्जा के बिना जीवन असंभव है।
- शरीर की प्रत्येक क्रिया ऊर्जा पर आधारित है।
- भोजन भी अग्नि-ऊर्जा का परिवर्तित रूप है।
वैदिक ऋषियों ने अग्नि को जीवन और विकास का मूल आधार मानकर उसका सम्मान किया।
आध्यात्मिक अर्थ
यह मंत्र बाहरी अग्नि के साथ-साथ आंतरिक अग्नि को भी जागृत करने का संदेश देता है—
- ज्ञान की अग्नि
- विवेक की अग्नि
- सत्य की अग्नि
- पुरुषार्थ की अग्नि
जब यह आंतरिक अग्नि प्रज्वलित होती है, तब मनुष्य आलस्य, अज्ञान और भय पर विजय प्राप्त करता है।
यज्ञ का व्यापक अर्थ
मंत्र में "हव्यदातये" शब्द आया है। इसका तात्पर्य केवल अग्नि में आहुति देना नहीं है।
वैदिक दृष्टि में यज्ञ का अर्थ है—
- समाज के लिए कार्य करना,
- प्रकृति का संरक्षण करना,
- ज्ञान का प्रसार करना,
- परोपकार करना,
- अपने कर्तव्यों का निष्ठापूर्वक पालन करना।
ऐसे सभी श्रेष्ठ कर्म यज्ञ हैं।
आज के युग के लिए प्रेरणा
आज संसार में ज्ञान का अभाव नहीं, लेकिन विवेक का अभाव दिखाई देता है। तकनीक बढ़ रही है, परन्तु चरित्र का विकास उतनी गति से नहीं हो रहा।
सामवेद का यह प्रथम मंत्र हमें प्रेरित करता है कि—
- जीवन में ज्ञान का प्रकाश लाएँ,
- अपने कर्तव्यों का यज्ञभाव से पालन करें,
- समाज और राष्ट्र के हित में कार्य करें,
- अपने भीतर की सकारात्मक ऊर्जा को जागृत करें।
निष्कर्ष
सामवेद का प्रथम मंत्र मानव जीवन के लिए एक महान उद्घोष है। यह हमें बताता है कि सफलता, प्रगति और कल्याण का आधार बाहरी साधन नहीं, बल्कि भीतर जागृत ज्ञान और पुरुषार्थ की अग्नि है।
"जब जीवन में ज्ञान की अग्नि प्रज्वलित होती है, तब अज्ञान का अंधकार स्वयं समाप्त हो जाता है।"
ॐ अग्न आ याहि वीतये।
हे प्रकाशस्वरूप परमात्मन्! हमारे जीवन में ज्ञान, शक्ति और सद्बुद्धि का प्रकाश स्थापित करें। 🙏🔥📖॥

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