ऋग्वेद मण्डल १, सूक्त 107 का विस्तृत वैदिक विवेचन

ऋग्वेद मण्डल १, सूक्त 107 का विस्तृत वैदिक विवेचन


अथ त्र्यृचस्य सप्तोत्तरशततमस्य सूक्तस्याङ्गिरसः ऋषिः। विश्वे देवा देवताः। 1 विराट् त्रिष्टुप्। 2 निचृत् त्रिष्टुप्। 3 त्रिष्टुप् च च्छन्दः। धैवतः स्वरः॥ विश्वे देवाः कीदृशा इत्युपदिश्यते॥

 अब तीन ऋचावाले एकसौ सातवें सूक्त का प्रारम्भ है। उसके प्रथम मन्त्र में समस्त विद्वान् जन कैसे हों, यह उपदेश किया है॥ य॒ज्ञो दे॒वानां॒ प्रत्ये॑ति सु॒म्नमादि॑त्यासो॒ भव॑ता मृळ॒यन्तः॑। आ वो॒ऽर्वाची॑ सुम॒तिर्व॑वृत्यादं॒होश्चि॒द्या व॑रिवो॒वित्त॒रास॑त्॥1॥

 य॒ज्ञः। दे॒वाना॑म्। प्रति॑। ए॒ति॒। सु॒म्नम्। आदि॑त्यासः। भव॑त। मृ॒ळ॒यन्तः॑। आ। वः॒। अ॒र्वाची॑। सु॒ऽम॒तिः। व॒वृ॒त्या॒त्। अं॒होः। चि॒त्। या। व॒रि॒वो॒वित्ऽत॑रा अस॑त्॥1॥

 पदार्थः—(यज्ञः) सङ्गत्या सिद्धः शिल्पाख्यः (देवानाम्) (प्रति) (एति) प्राप्नोति प्रापयति। अत्रान्तर्गतो ण्यर्थः। (सुम्नम्) सुखम् (आदित्यासः) सूर्य्यवद्विद्यायोगेन प्रकाशिता विद्वांसः (भवत) अत्रान्येषामपि दृश्यत इति दीर्घः। (मृडयन्तः) आनन्दयन्तः (आ) (वः) युष्माकम् (अर्वाची) इदानीन्तनी (सुमतिः) शोभना प्रज्ञा (ववृत्यात्) वर्त्तेत। अत्र व्यत्ययेन परस्मैपदम् शपः स्थाने श्लुश्च। (अंहोः) विज्ञानवत्। अत्राहि धातोरौणादिक उः प्रत्ययः। (चित्) अपि (या) (वरिवोवित्तरा) वरिवः सेवनं विद्वद्वन्दनं वा यया सुमत्या सातिशयिता (असत्) भवतु॥1॥

 अन्वयः—हे मृडयन्त आदित्यासो विद्वांसो! यूयं यो देवानां यज्ञः सुम्नं प्रत्येति तस्य प्रकाशका भवत। या वोंऽहोरर्वाची सुमतिर्ववृत्यात् सा चिदस्मभ्यं वरिवोवित्तराऽऽसद् भवतु॥1॥ भावार्थः—अस्मिञ्जगति विद्वद्भिः स्वपुरुषार्थेन याः शिल्पक्रियाः प्रत्यक्षीकृतास्ताः सर्वेभ्यो मनुष्येभ्यः प्रकाशिताः कार्या यतो बहवो मनुष्या शिल्पक्रियाः कृत्वा सुखिनः स्युः॥1॥

 पदार्थः—(मृडयन्तः) हे आनन्दित करते हुए (आदित्यासः) सूर्य्य के तुल्य विद्यायोग से प्रकाश को प्राप्त विद्वानो! तुम जो (देवानाम्) विद्वानों की (यज्ञः) संगति से सिद्ध हुआ शिल्प काम (सुम्नम्) सुख की (प्रति, एति) प्रतीति कराता है, उसको प्रकट करनेहारे (भवत) होओ, (या) जो (वः) तुम लोगों को (अंहोः) विशेष ज्ञान जैसे हो, वैसे (अर्वाची) इस समय की (सुमतिः) उत्तम बुद्धि (ववृत्यात्) वर्त्ति रही है वह (चित्) भी हम लोगों के लिये (वरिवोवित्तरा) ऐसी हो कि जिससे उत्तम जनों की अच्छी प्रकार शुश्रुषा (आ, असत्) सब ओर से होवे॥1॥

 भावार्थः—इस संसार में विद्वानों को चाहिये कि जो उन्होंने अपने पुरुषार्थ से शिल्पक्रिया प्रत्यक्ष कर रक्खी हैं, उनको सब मनुष्यों के लिये प्रकाशित करें कि जिससे बहुत मनुष्य शिल्पक्रियाओं को करके सुखी हों॥1॥ 

पुनस्ते कीदृशा इत्युपदिश्यते॥ 

फिर वे कैसे हों, यह विषय अगले मन्त्र में कहा है॥

 उप॑ नो दे॒वा अव॒सा ग॑म॒न्त्वङ्गि॑रसां॒ साम॑भिः स्तू॒यमा॑नाः। इन्द्र॑ इन्द्रि॒यैर्म॒रुतो॑ म॒रुद्भि॑रादि॒त्यैर्नो॒ अदि॑तिः॒ शर्म॑ यंसत्॥2॥ 

उप॑। नः॒। दे॒वाः। अव॑सा। आ। ग॒म॒न्तु॒। अङ्गि॑रसाम्। साम॑ऽभिः। स्तू॒यमा॑नाः। इन्द्रः॑। इ॒न्द्रि॒यैः। म॒रुतः॑। म॒रुत्ऽभिः॑। आ॒दि॒त्यैः। नः॒। अदि॑तिः। शर्म॑। यं॒स॒त्॥2॥ 

पदार्थः—(उप) सामीप्ये (नः) अस्माकम् (देवाः) विद्वांसः (अवसा) रक्षणादिना (आ) सर्वतः (गमन्तु) गच्छन्तु (अङ्गिरसाम्) प्राणविद्याविदाम् (सामभिः) सामवेदस्थैर्गानैः (स्तूयमानाः) (इन्द्रः) सभाद्यध्यक्षः (इन्द्रियैः) धनैः (मरुतः) पवनाः (मरुद्भिः) विद्वद्भिः पवनैर्वा (आदित्यैः) पूर्णविद्यैर्मनुष्यैर्द्वादशभिर्मासैर्वा सह (नः) अस्मभ्यम् (अदितिः) विद्वत्पिता सूर्यदीप्तिर्वा (शर्म्म) सुखम् (यंसत्) यच्छन्तु प्रददतु। अत्र वचनव्यत्ययेन बहुवचनस्थान एकवचनम्॥2॥ अन्वयः—सामभिः स्तूयमाना आदिर्त्यैर्मरुद्भिरिन्द्रियैः सहेन्द्रो मरुतोऽदितिर्देवाश्चाङ्गिरसां नोऽस्माकमवसोपागमन्तु ते नोऽस्मभ्यं शर्म्म यंसत् प्रददतु॥2॥

 भावार्थः—जिज्ञासवो येषां विदुषां विद्वांसो वा जिज्ञासूनां सामीप्यं गच्छेयुस्ते नैव विद्याधर्मसुशिक्षाव्यवहारं विहायान्यत्कर्म कदाचित्कुर्य्युः, यतो दुःखहान्या सुखं सततं सिध्येत्॥2॥

 पदार्थः—(सामभिः) सामवेद के गानों से (स्तूयमानाः) स्तुति को प्राप्त होते हुए (आदित्यैः) पूर्ण विद्यायुक्त मनुष्य वा बारह महीनों (मरुद्भिः) विद्वानों वा पवनों और (इन्द्रियैः) धनों के सहित (इन्द्रः) सभाध्यक्ष (मरुतः) वा पवन (अदितिः) विद्वानों का पिता वा सूर्य्य प्रकाश और (देवाः) विद्वान् जन (अङ्गिरसाम्) प्राणविद्या के जाननेवाले (नः) हम लोगों के (अवसा) रक्षा आदि व्यवहार से (उप, आ, गमन्तु) समीप में सब प्रकार से आवें और (न) हम लोगों के लिये (शर्म) सुख (यंसत्) देवें॥2॥

 भावार्थः—ज्ञानप्रचार सीखनेहारे जन जिन विद्वानों के समीप वा विद्वान् जन जिन विद्यार्थियों के समीप जावें वे विद्या, धर्म और अच्छी शिक्षा के व्यवहार को छोड़ कर और कर्म कभी न करें, जिससे दुःख की हानि होके निरन्तर सुख की सिद्धि हो॥2॥

 पुनस्ते कीदृशा इत्युपदिश्यते॥ 

फिर वे कैसे हों, यह विषय अगले मन्त्र में कहा है॥

 तन्न॒ इन्द्र॒स्तद्वरु॑ण॒स्तद॒ग्निस्तद॑र्य॒मा तत्स॑वि॒ता चनो॑ धात्। तन्नो॑ मि॒त्रो वरु॑णो मामहन्ता॒मदि॑तिः॒ सिन्धुः॑ पृथि॒वी उ॒त द्यौः॥3॥25॥ 

तत्। नः॒। इन्द्रः॑। तत्। वरु॑णः। तत्। अ॒ग्निः। तत्। अ॒र्य॒मा। तत्। स॒वि॒ता। चनः॑। धा॒त्। तत्। नः॒। मि॒त्रः। वरु॑णः। म॒म॒ह॒न्ता॒म्। अदि॑तिः। सिन्धुः॑। पृ॒थि॒वी। उ॒त। द्यौः॥3॥

 पदार्थः—(तत्) धनम्। अन्नम् (नः) अस्मभ्यम् (इन्द्रः) विद्युत् धनाध्यक्षो वा (तत्) शारीरं सुखम् (वरुणः) जलं गुणैरुत्कृष्टो वा (तत्) आत्मसुखम् (अग्निः) प्रसिद्धो भौतिको न्यायमार्गे गमयिता विद्वान् वा (तत्) इन्द्रियसुखम् (अर्यमा) नियन्ता वायुर्न्यायकर्त्ता वा (तत्) सामाजिकं सुखम् (सविता) सूर्यो धर्मकृत्येषु प्रेरको वा (तन्नो मित्रो॰) इति पूर्ववत्॥3॥

 अन्वयः—यथा मित्रो वरुणोऽदितिः सिन्धुः पृथिवी उत द्यौर्वा मामहन्तां तत् तथेन्द्रो नस्तद्वरुणस्तदग्निस्तदर्यमा तत् सविता तच्च नो धात्॥3॥ भावार्थः—विद्वद्भिर्यथा संसारस्थाः पृथिव्यादयः पदार्थाः सुखप्रदाः सन्ति, तथैव सुखप्रदातृभिर्भवितव्यम्॥3॥ अत्र विश्वेषां देवानां गुणवर्णनादेतदर्थस्य पूर्वसूक्तार्थेन सह सङ्गतिरस्तीति वेद्यम्॥ इति सप्तोत्तरशततमं 107 

सूक्तं पञ्चविंशो 25 वर्गश्च समाप्तः॥

 पदार्थः—जैसे (मित्रः) मित्रजन (वरुणः) श्रेष्ठ विद्वान् (अदितिः) अखण्डित आकाश (सिन्धुः) समुद्र (पृथिवी) भूमि (उत) और (द्यौः) सूर्य आदि का प्रकाश (नः) हम को (मामहन्ताम्) आनन्दित करते हैं (तत्) वैसे (इन्द्रः) बिजुली वा धनाढ्य जन (नः) हमारे लिये (तत्) उस धन वा अन्न को अर्थात् उनके दिये हुए धनादि पदार्थ को (वरुणः) जल वा गुणों से उत्कृष्ट (तत्) उस शरीरसुख को (अग्निः) पावक अग्नि वा न्यायमार्ग में चलानेवाला विद्वान् (तत्) उस आत्मसुख को (अर्यमा) नियमकर्त्ता पवन वा न्यायकर्त्ता सभाध्यक्ष (तत्) इन्द्रियों के सुख को (सविता) सूर्य वा धर्म कार्य्यों में प्रेरणा करनेवाला धर्मज्ञ जन (तत्) उस सामाजिक सुख और (चनः) अन्न को (धात्) धारण करता वा धारण करे॥3॥ 

भावार्थः—जैसे संसारस्थ पृथिवी आदि पदार्थ सुख देनेवाले हैं, वैसे ही विद्वानों को सुख देनेवाले होना चाहिये॥ इस सूक्त में समस्त विद्वानों के गुणों का वर्णन है। इनसे इस सूक्त की पिछले सूक्त के अर्थ के साथ संगति है, यह जानना चाहिये॥ 

यह एकसौ सातवाँ 107 सूक्त और पच्चीसवाँ 25 वर्ग समाप्त हुआ॥

ऋग्वेद मण्डल १, सूक्त 107 का विस्तृत वैदिक विवेचन

विश्वदेव सूक्त : विद्वानों का कर्तव्य और ज्ञान का लोककल्याण

ऋषि — अङ्गिरस

देवता — विश्वे देवाः

छन्द — त्रिष्टुप्


प्रस्तावना

ऋग्वेद का यह सूक्त अत्यन्त महत्वपूर्ण है क्योंकि इसमें "विश्वे देवाः" अर्थात् श्रेष्ठ विद्वानों, वैज्ञानिकों, आचार्यों, समाज-निर्माताओं और लोकहितैषी पुरुषों के कर्तव्य का वर्णन किया गया है।

यहाँ "देव" शब्द का अर्थ किसी मूर्ति या काल्पनिक देवता से नहीं है। वेद में "देव" धातु "दिवु" से बना है, जिसका अर्थ है—

  • प्रकाश देना,
  • ज्ञान देना,
  • प्रेरणा देना,
  • उपकार करना।

इस प्रकार जो स्वयं ज्ञानवान हो तथा दूसरों का जीवन भी प्रकाशित करे, वही वेद की दृष्टि में "देव" है।

महर्षि दयानन्द सरस्वती ने भी अनेक स्थानों पर "देव" का अर्थ विद्वान, उपकारी, प्रकाशमान तथा गुणवान पुरुष किया है।

इस सूक्त का मुख्य उद्देश्य समाज में ज्ञान, विज्ञान, शिल्प, शिक्षा और लोककल्याण का प्रसार करना है।


प्रथम मन्त्र

यज्ञो देवानां प्रत्येति सुम्नम्। आदित्यासो भवता मृळयन्तः॥


मन्त्र का सरल भाव

हे ज्ञानरूपी सूर्य के समान प्रकाशमान विद्वानो!

तुम ऐसे बनो कि तुम्हारे द्वारा किया गया यज्ञ अर्थात् लोकहितकारी पुरुषार्थ सम्पूर्ण समाज को सुख प्रदान करे।

तुम अपनी विद्या को अपने तक सीमित न रखो, बल्कि संसार के प्रत्येक मनुष्य तक पहुँचाओ।


"यज्ञ" का वास्तविक अर्थ

आज अधिकांश लोग यज्ञ का अर्थ केवल अग्नि में घी डालना समझते हैं।

किन्तु वैदिक साहित्य में यज्ञ का अर्थ बहुत व्यापक है।

यज्ञ का अर्थ है—

  • लोककल्याण,
  • सहयोग,
  • वैज्ञानिक अनुसंधान,
  • शिक्षा,
  • शिल्प निर्माण,
  • कृषि,
  • उद्योग,
  • समाजोपयोगी पुरुषार्थ।

महर्षि दयानन्द ने यहाँ "यज्ञ" का अर्थ शिल्प एवं लोकहितकारी कार्य किया है।

अर्थात् मनुष्य जो भी कार्य समाज के हित के लिए करता है वही यज्ञ है।


शिल्प का महत्व

महर्षि दयानन्द लिखते हैं—

"विद्वानों ने अपने पुरुषार्थ से जिन शिल्पों और विद्याओं की खोज की है, उन्हें सब मनुष्यों के लिए प्रकाशित करना चाहिए।"

यह कितना आधुनिक विचार है!

आज विज्ञान, चिकित्सा, अभियांत्रिकी, कृषि, ऊर्जा, परिवहन, संचार—ये सभी शिल्प ही हैं।

यदि वैज्ञानिक अपने ज्ञान को छिपा लें तो मानव समाज का विकास रुक जाएगा।

इसलिए वेद कहता है—

ज्ञान का उद्देश्य संग्रह नहीं, बल्कि समाज का कल्याण है।


"आदित्य" शब्द का अर्थ

यहाँ "आदित्य" केवल सूर्य नहीं है।

महर्षि दयानन्द इसका अर्थ करते हैं—

सूर्य के समान प्रकाश देने वाले विद्वान।

जिस प्रकार सूर्य बिना भेदभाव सबको प्रकाश देता है,

वैसे ही विद्वान भी—

  • जाति नहीं देखते,
  • सम्प्रदाय नहीं देखते,
  • धन-दौलत नहीं देखते,

वे केवल ज्ञान का प्रकाश फैलाते हैं।

यही वैदिक आदर्श है।


"मृडयन्तः"

अर्थ—

दूसरों को सुख देने वाले।

विद्वान वही है—

जो दूसरों को भयमुक्त करे।

अज्ञान दूर करे।

विज्ञान दे।

रोज़गार दे।

शिक्षा दे।

सदाचार सिखाए।

यदि विद्या से समाज दुःखी हो रहा है तो वह विद्या नहीं, उसका दुरुपयोग है।


सुमति

मन्त्र में "सुमति" शब्द अत्यन्त महत्वपूर्ण है।

सुमति का अर्थ है—

सत्य पर आधारित बुद्धि।

विवेक।

निष्पक्ष चिन्तन।

कल्याणकारी निर्णय।

वेद कहता है—

मनुष्य की सबसे बड़ी सम्पत्ति धन नहीं,

बल्कि सुमति है।

सुमति होगी तो धन भी उचित मार्ग से आएगा।

सत्ता भी लोकहित में चलेगी।

विज्ञान भी मानवता का हित करेगा।


वरिवोवित्तरा

महर्षि दयानन्द इसका अर्थ करते हैं—

ऐसी बुद्धि जिससे श्रेष्ठ पुरुषों की सेवा और सम्मान हो।

अर्थात्

समाज में विद्वानों का सम्मान होना चाहिए।

जहाँ विद्वान उपेक्षित होते हैं,

वहाँ अन्धविश्वास बढ़ते हैं।

जहाँ ज्ञान का आदर होता है,

वहाँ सभ्यता विकसित होती है।


मन्त्र का आधुनिक सन्देश

यदि इस मन्त्र को आधुनिक भाषा में कहें तो उसका अर्थ होगा—

  • वैज्ञानिक अपने शोध मानवता के हित में करें।
  • शिक्षक निस्वार्थ शिक्षा दें।
  • अभियन्ता समाजोपयोगी तकनीक विकसित करें।
  • चिकित्सक सेवा को धर्म समझें।
  • उद्योगपति समाज का भी कल्याण करें।
  • विद्वान ज्ञान को छिपाएँ नहीं।

यही वेद का "यज्ञ" है।


निष्कर्ष

प्रथम मन्त्र सम्पूर्ण मानव सभ्यता को यह संदेश देता है कि—

ज्ञान का उद्देश्य व्यक्तिगत प्रसिद्धि नहीं,

बल्कि विश्व का कल्याण है।

विद्वान वही है जो सूर्य के समान स्वयं प्रकाशित हो और दूसरों को भी प्रकाशित करे।

ऐसा ज्ञान ही यज्ञ है,

ऐसा पुरुषार्थ ही धर्म है,

और ऐसा समाज ही वैदिक समाज कहलाता है।

ऋग्वेद मण्डल 1, सूक्त 107

द्वितीय मन्त्र का विस्तृत वैदिक विवेचन

उप नो देवा अवसा गमन्त्वङ्गिरसां सामभिः स्तूयमानाः।
इन्द्र इन्द्रियैर्मरुतो मरुद्भिरादित्यैर्नो अदितिः शर्म यंसत्॥


मन्त्र का मूल भाव

इस मन्त्र में ऋषि सम्पूर्ण समाज के लिए प्रार्थना करते हैं कि विद्वान, आचार्य, शिक्षक, वैज्ञानिक, धर्मात्मा और लोकहितकारी पुरुष हमारी रक्षा, शिक्षा और उन्नति के लिए हमारे समीप आएँ।

यहाँ किसी चमत्कार की याचना नहीं की गई है, बल्कि श्रेष्ठ मनुष्यों के सत्संग और उनके ज्ञान की कामना की गई है।


"देव" शब्द का वास्तविक अर्थ

वेद में "देव" शब्द का अर्थ अनेक स्थानों पर है—

  • परमेश्वर,
  • सूर्य आदि प्रकाशमान पदार्थ,
  • तथा विद्वान, उपकारी और तेजस्वी मनुष्य।

इस मन्त्र में महर्षि दयानन्द ने "देव" का अर्थ विद्वान पुरुष किया है।

अर्थात् ऐसे लोग जो अपने ज्ञान, चरित्र और सेवा से समाज को प्रकाशित करते हैं।

आज की भाषा में इन्हें हम शिक्षक, शोधकर्ता, वैज्ञानिक, चिकित्सक, अभियन्ता, न्यायविद्, दार्शनिक और समाज-सुधारक कह सकते हैं।


"उप नो... गमन्तु"

ऋषि कहते हैं—

वे हमारे समीप आएँ।

यह केवल शारीरिक निकटता नहीं है।

इसका अर्थ है—

  • हम उनके सम्पर्क में रहें।
  • उनसे शिक्षा ग्रहण करें।
  • उनके विचारों को समझें।
  • उनके चरित्र से प्रेरणा लें।
  • उनके अनुभव का लाभ उठाएँ।

मनुष्य अकेला पूर्ण नहीं बन सकता।

ज्ञान सदैव गुरु से शिष्य तक पहुँचता है।


"अवसा"

अवसा का अर्थ है—

  • सहायता,
  • संरक्षण,
  • उन्नति,
  • सहयोग।

विद्वान का कर्तव्य केवल पुस्तक पढ़ाना नहीं है।

उसे समाज का मार्गदर्शक भी होना चाहिए।

जो विद्या केवल परीक्षा पास करा दे, परन्तु चरित्र न बनाए, वह अधूरी शिक्षा है।

वेद सम्पूर्ण शिक्षा चाहता है—

  • बौद्धिक,
  • नैतिक,
  • सामाजिक,
  • आध्यात्मिक।

"अङ्गिरसाम्"

महर्षि दयानन्द इसका अर्थ करते हैं—

प्राणविद्या के ज्ञाता।

अर्थात् वे विद्वान जो जीवन के वास्तविक विज्ञान को जानते हैं।

यह केवल शरीर-विज्ञान नहीं,

बल्कि—

  • स्वास्थ्य,
  • योग,
  • प्राणायाम,
  • आत्मविद्या,
  • मनोविज्ञान,
  • तथा जीवन-शिक्षा—

इन सबका समन्वित ज्ञान है।


"सामभिः स्तूयमानाः"

सामवेद में संगीत का विशेष महत्व है।

ऋषि कहते हैं—

विद्वानों का सम्मान होना चाहिए।

परन्तु सम्मान किस बात का?

धन का नहीं।

पद का नहीं।

बल का नहीं।

बल्कि—

ज्ञान का।

चरित्र का।

सेवा का।

यही वैदिक संस्कृति का आदर्श है।


इन्द्र

यहाँ "इन्द्र" शब्द का अर्थ केवल देवराज नहीं है।

महर्षि दयानन्द ने इसका अर्थ किया है—

सभा का अध्यक्ष,

श्रेष्ठ नेता,

या धन एवं शक्ति का उचित संचालक।

जो समाज का नेतृत्व करे,

वह न्यायप्रिय हो।

शक्तिशाली हो।

विद्वानों का सम्मान करे।

तभी समाज उन्नति करेगा।


मरुत

मरुत का सामान्य अर्थ वायु है।

किन्तु यहाँ इसका अर्थ विद्वान भी किया गया है।

जैसे वायु सबको जीवन देती है,

वैसे ही विद्वान समाज को जीवन देते हैं।

यदि वायु दूषित हो जाए तो शरीर रोगी होता है।

यदि शिक्षा दूषित हो जाए,

तो समाज रोगी हो जाता है।


आदित्य

आदित्य यहाँ पुनः ज्ञान का प्रतीक है।

सूर्य स्वयं प्रकाशमान है।

दूसरों को भी प्रकाशित करता है।

सच्चा शिक्षक भी ऐसा ही होता है।

वह केवल स्वयं विद्वान नहीं होता,

बल्कि अनेक विद्वान उत्पन्न करता है।


अदिति

अदिति का अर्थ है—

जो खण्डित न हो।

जो सबको अपने भीतर समेटे।

महर्षि दयानन्द यहाँ इसका अर्थ—

विद्वानों का पिता,

या सूर्य का प्रकाश—

भी करते हैं।

दार्शनिक दृष्टि से अदिति व्यापकता का प्रतीक है।

संकुचित मन अदिति नहीं हो सकता।


शर्म

शर्म का अर्थ है—

सच्चा सुख।

मानसिक शान्ति।

सुरक्षा।

समृद्धि।

धर्ममय जीवन।

वेद धन के साथ शान्ति भी चाहता है।

केवल धन सुख नहीं देता।

केवल शक्ति भी नहीं।

सुख तभी मिलता है जब—

ज्ञान,

धर्म,

न्याय,

स्वास्थ्य,

और सदाचार—

साथ हों।


गुरु और शिष्य दोनों के कर्तव्य

इस मन्त्र की सबसे बड़ी विशेषता यह है कि इसमें केवल गुरु का नहीं,

शिष्य का भी उत्तरदायित्व बताया गया है।

गुरु—

ज्ञान दे।

चरित्र दे।

प्रेरणा दे।

शिष्य—

विनम्र रहे।

प्रश्न पूछे।

पुरुषार्थ करे।

सीखी हुई विद्या समाज के हित में लगाए।


वैदिक शिक्षा का उद्देश्य

आज शिक्षा का उद्देश्य प्रायः नौकरी माना जाता है।

वेद इससे आगे बढ़कर कहता है—

शिक्षा का उद्देश्य है—

  • विवेक,
  • आत्मनिर्भरता,
  • नैतिकता,
  • विज्ञान,
  • समाज-सेवा,
  • ईश्वर-चिन्तन।

ऐसी शिक्षा ही राष्ट्र को महान बनाती है।


आधुनिक समाज के लिए शिक्षा

यदि इस मन्त्र को आज लागू किया जाए तो—

  • विश्वविद्यालय शोध के केन्द्र बनें।
  • शिक्षक आदर्श बनें।
  • विद्यार्थी सत्य की खोज करें।
  • वैज्ञानिक मानवता की सेवा करें।
  • राजनीति विद्वानों से मार्गदर्शन ले।
  • धर्म ज्ञान पर आधारित हो, अन्धविश्वास पर नहीं।

मन्त्र का सार

यह मन्त्र बताता है कि किसी राष्ट्र की सबसे बड़ी शक्ति उसकी सेना या धन नहीं,

बल्कि उसके विद्वान होते हैं।

जहाँ विद्वानों का सम्मान होता है,

वहाँ विज्ञान विकसित होता है।

वहाँ संस्कृति जीवित रहती है।

वहाँ न्याय स्थापित होता है।

वहाँ धर्म फलता-फूलता है।

और वही राष्ट्र स्थायी उन्नति करता है।

इसलिए ऋषि प्रार्थना करते हैं कि ऐसे तेजस्वी, निष्पक्ष, लोकहितकारी विद्वान सदैव समाज के समीप रहें और अपने ज्ञान, चरित्र तथा सेवा से सबको सुख, सुरक्षा और समृद्धि प्रदान करें। यही इस मन्त्र का शाश्वत वैदिक संदेश है।

ऋग्वेद मण्डल 1, सूक्त 107

तृतीय मन्त्र का विस्तृत वैदिक विवेचन

तन्न इन्द्रस्तद्वरुणस्तदग्निस्तदर्यमा तत्सविता चनो धात्।
तन्नो मित्रो वरुणो मामहन्तामदितिः सिन्धुः पृथिवी उत द्यौः॥


प्रस्तावना

यदि इस मन्त्र को केवल पौराणिक दृष्टि से पढ़ा जाए तो ऐसा प्रतीत होगा कि अनेक देवताओं से अलग-अलग प्रकार के सुख माँगे जा रहे हैं। परन्तु वैदिक व्याकरण, निरुक्त और महर्षि दयानन्द के भाष्य के अनुसार यहाँ प्रत्येक नाम किसी विशेष गुण, शक्ति, प्राकृतिक तत्व या आदर्श मनुष्य का बोधक है।

वेद अनेक ईश्वरों की उपासना नहीं सिखाता। वेद एक ही निराकार, सर्वव्यापक परमेश्वर को स्वीकार करता है। इसलिए जहाँ अनेक नाम आते हैं, वहाँ उनके गुणात्मक अथवा दार्शनिक अर्थ ग्रहण किए जाते हैं।

इस मन्त्र में ऋषि का उद्देश्य यह बताना है कि समाज के विविध अंग यदि अपने-अपने धर्म का पालन करें, तो सम्पूर्ण मानव समाज सुखी बन सकता है।


"इन्द्र" का अर्थ

"इन्द्र" धातु का अर्थ है—श्रेष्ठ, सामर्थ्यवान, ऐश्वर्ययुक्त।

महर्षि दयानन्द ने यहाँ इसके दो अर्थ बताए हैं—

  1. विद्युत् जैसी शक्ति।
  2. धनाध्यक्ष अथवा योग्य नेता।

अर्थात् समाज में जो नेतृत्व करे, वह बलवान होने के साथ न्यायप्रिय भी हो।

नेता का कार्य केवल शासन करना नहीं, बल्कि समाज को उन्नति की दिशा देना है।

यदि नेतृत्व स्वार्थी हो जाए तो राष्ट्र दुर्बल हो जाता है।


"वरुण"

वरुण का मूल अर्थ है—आवरण करने वाला, धारण करने वाला।

यहाँ इसका अर्थ जल भी है और गुणसम्पन्न श्रेष्ठ पुरुष भी।

जैसे जल समस्त जीवन का आधार है, वैसे ही श्रेष्ठ चरित्र समाज का आधार है।

जल शरीर को शुद्ध करता है।

श्रेष्ठ आचरण समाज को शुद्ध करता है।


"अग्नि"

अग्नि केवल भौतिक अग्नि नहीं है।

वेद में अग्नि के अनेक अर्थ हैं—

  • प्रकाश,
  • ऊर्जा,
  • ज्ञान,
  • प्रेरणा,
  • न्याय,
  • तथा अग्रणी पुरुष।

महर्षि दयानन्द ने यहाँ अग्नि का अर्थ न्यायमार्ग में चलाने वाले विद्वान से भी किया है।

जिस प्रकार अग्नि अन्धकार दूर करती है,

वैसे ही विद्वान अज्ञान दूर करता है।


"अर्यमा"

अर्यमा का अर्थ है—

श्रेष्ठ व्यवस्था स्थापित करने वाला।

न्यायप्रिय अधिकारी।

अनुशासनकर्ता।

नियामक।

समाज तभी उन्नति करता है जब वहाँ नियम हों।

किन्तु नियम भी न्यायपूर्ण हों।

अन्यायपूर्ण व्यवस्था समाज को तोड़ देती है।


"सविता"

सविता का अर्थ है—

प्रेरणा देने वाला।

उत्पन्न करने वाला।

सूर्य।

धर्मकार्य में प्रेरित करने वाला विद्वान।

सूर्य प्रतिदिन बिना थके अपना कार्य करता है।

वह किसी से पुरस्कार नहीं चाहता।

इसी प्रकार सच्चा कर्मयोगी समाज की सेवा करता है।


"मित्र"

मित्र का अर्थ केवल मित्र नहीं।

जो सबका हित करे।

जो सबको जोड़कर रखे।

जो विश्वास उत्पन्न करे।

समाज का निर्माण केवल कानून से नहीं होता।

विश्वास से होता है।

जहाँ विश्वास टूटता है,

वहाँ परिवार,

समाज,

और राष्ट्र भी टूटने लगते हैं।


"अदिति"

अदिति—

अखण्डता का प्रतीक है।

जिसमें विभाजन न हो।

जो सबको अपने भीतर समेटे।

महर्षि दयानन्द ने इसका अर्थ सूर्य का प्रकाश और विद्वानों का संरक्षक भी किया है।

आज के समाज में अदिति का अर्थ होगा—

समावेशी दृष्टि।

मानवता।

सार्वभौमिक बन्धुत्व।


"सिन्धु"

सिन्धु का अर्थ समुद्र है।

समुद्र अनेक नदियों को अपने भीतर समाहित कर लेता है।

वह विशालता का प्रतीक है।

विद्वान का हृदय भी समुद्र के समान विशाल होना चाहिए।

उसमें संकीर्णता नहीं होनी चाहिए।


"पृथ्वी"

पृथ्वी सहनशीलता की मूर्ति है।

हम उसके ऊपर चलते हैं।

उसे खोदते हैं।

उससे अन्न लेते हैं।

फिर भी वह हमारा पालन करती है।

इसलिए वेद कहता है—

नेताओं,

शिक्षकों,

माता-पिता,

और विद्वानों में भी पृथ्वी जैसी धैर्य और सहनशीलता होनी चाहिए।


"द्यौ"

द्यौ का अर्थ है—

आकाश।

प्रकाश।

उच्च आदर्श।

उदार चिन्तन।

मनुष्य को केवल पृथ्वी तक सीमित नहीं रहना चाहिए।

उसकी दृष्टि आकाश जैसी व्यापक होनी चाहिए।


मन्त्र का समन्वित अर्थ

ऋषि कहते हैं—

हमारे समाज में—

इन्द्र जैसा नेतृत्व हो।

वरुण जैसी पवित्रता हो।

अग्नि जैसा तेज हो।

अर्यमा जैसा न्याय हो।

सविता जैसी प्रेरणा हो।

मित्र जैसा प्रेम हो।

अदिति जैसी अखण्डता हो।

सिन्धु जैसी विशालता हो।

पृथ्वी जैसी सहनशीलता हो।

और द्यौ जैसी उच्च दृष्टि हो।

ऐसा समाज कभी पतन को प्राप्त नहीं होता।


वैदिक समाज की संरचना

यह मन्त्र बताता है कि समाज केवल कानून से नहीं चलता।

समाज चलता है—

ज्ञान से।

चरित्र से।

विश्वास से।

न्याय से।

सेवा से।

और सहयोग से।

इसीलिए ऋषि सम्पूर्ण समाज को इन गुणों से सम्पन्न देखना चाहते हैं।


आधुनिक जीवन में शिक्षा

आज यदि इस मन्त्र को अपनाया जाए तो—

नेता भ्रष्टाचार से मुक्त हों।

शिक्षक ज्ञानवान हों।

न्यायाधीश निष्पक्ष हों।

वैज्ञानिक मानवहित में कार्य करें।

धनवान समाज की सेवा करें।

युवा सत्यनिष्ठ हों।

परिवार प्रेम का केन्द्र बने।

विद्यालय चरित्र निर्माण के केन्द्र बनें।

तभी वास्तविक उन्नति सम्भव है।


सम्पूर्ण सूक्त का सार

इस सूक्त के तीनों मन्त्रों का संदेश अत्यन्त स्पष्ट है—

पहला मन्त्र कहता है—

विद्या और विज्ञान सबके लिए उपलब्ध कराओ।

दूसरा मन्त्र कहता है—

विद्वान और विद्यार्थी परस्पर मिलकर समाज का निर्माण करें।

तीसरा मन्त्र कहता है—

समाज का प्रत्येक अंग अपने कर्तव्य का पालन करे और अपने श्रेष्ठ गुणों से दूसरों को सुख प्रदान करे।

यही वैदिक राष्ट्र-निर्माण का आदर्श है।

यही ऋषियों का सामाजिक दर्शन है।

और यही इस सूक्त का शाश्वत संदेश है।

मनुष्य की महानता उसके जन्म से नहीं, उसके गुण, कर्म, विद्या, सेवा और लोकहितकारी आचरण से सिद्ध होती है। इसलिए प्रत्येक मनुष्य को चाहिए कि वह सूर्य के समान प्रकाशवान, पृथ्वी के समान सहनशील, समुद्र के समान विशाल, अग्नि के समान तेजस्वी और मित्र के समान सबका हितकारी बने। यही वैदिक धर्म है, यही यज्ञ है और यही मानव जीवन की वास्तविक सफलता है।


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