ईश्वर-प्राप्ति के साधन और क्या ईश्वर पाप क्षमा करता है?
मनुष्य जीवन का सर्वोच्च उद्देश्य ईश्वर का ज्ञान और उसकी प्राप्ति माना गया है। किंतु एक प्रश्न सदैव उठता है—ईश्वर की प्राप्ति कैसे होती है? और यदि मनुष्य से पाप हो जाए, तो क्या ईश्वर उसे क्षमा कर देता है?
इन दोनों प्रश्नों का उत्तर वेद, उपनिषद, योगदर्शन और अन्य भारतीय दर्शन अत्यंत स्पष्ट रूप से देते हैं।
ईश्वर-प्राप्ति क्या है?
ईश्वर-प्राप्ति का अर्थ किसी स्थान विशेष पर जाकर ईश्वर को देख लेना नहीं है। ईश्वर सर्वव्यापक है, इसलिए उसकी "प्राप्ति" का वास्तविक अर्थ है—उसके सत्य स्वरूप का ज्ञान, उसके प्रति अटूट श्रद्धा, योग द्वारा उसका साक्षात्कार और उसके नियमों के अनुरूप जीवन जीना।
ईश्वर-प्राप्ति के प्रमुख साधन
1. सत्य का आचरण
सत्य ईश्वर का प्रमुख गुण है। जो व्यक्ति सत्य बोलता है, सत्य सोचता है और सत्य का पालन करता है, वह ईश्वर के अधिक निकट होता है।
2. धर्माचरण
धर्म केवल कर्मकाण्ड नहीं, बल्कि न्याय, दया, संयम, परोपकार और कर्तव्यपालन का नाम है। धर्मयुक्त जीवन मन को शुद्ध करता है।
3. यज्ञ और सत्कर्म
वेदों में यज्ञ का व्यापक अर्थ है—ऐसे कर्म जो स्वयं और समाज दोनों का कल्याण करें। सेवा, दान, शिक्षा, पर्यावरण संरक्षण और लोकहित भी यज्ञ की भावना में आते हैं।
4. स्वाध्याय
वेद, उपनिषद और सत्यविद्या का अध्ययन मनुष्य की बुद्धि को निर्मल करता है। अज्ञान दूर होने पर ईश्वर का यथार्थ ज्ञान प्राप्त होता है।
5. योग और ध्यान
पतंजलि योगदर्शन में कहा गया है—
"योगश्चित्तवृत्तिनिरोधः।"
जब चित्त की वृत्तियाँ शांत होती हैं, तब साधक अपने वास्तविक स्वरूप और ईश्वर के निकट अनुभव को प्राप्त करता है।
6. ईश्वर-प्रणिधान
योगदर्शन (2.45)
"समाधिसिद्धिरीश्वरप्रणिधानात्।"
अर्थात् ईश्वर के प्रति पूर्ण समर्पण से समाधि की सिद्धि होती है।
7. इन्द्रिय-निग्रह
जिसका मन और इन्द्रियाँ संयमित हैं, वही स्थिर होकर ईश्वर का चिंतन कर सकता है।
8. निष्काम कर्म
फल की आसक्ति छोड़कर कर्तव्य का पालन करना मन को शुद्ध करता है और आध्यात्मिक उन्नति का मार्ग प्रशस्त करता है।
क्या केवल पूजा से ईश्वर मिल जाता है?
वेदों के अनुसार केवल बाहरी पूजा, व्रत या अनुष्ठान पर्याप्त नहीं हैं। यदि जीवन में सत्य, दया, न्याय, संयम और सदाचार नहीं है, तो केवल कर्मकाण्ड ईश्वर-प्राप्ति का साधन नहीं बनता। आंतरिक शुद्धि और श्रेष्ठ आचरण अनिवार्य हैं।
क्या ईश्वर पाप क्षमा करता है?
यही सबसे महत्वपूर्ण प्रश्न है।
वैदिक दर्शन के अनुसार ईश्वर न्यायकारी और दयालु दोनों है। वह किसी के साथ पक्षपात नहीं करता।
वेदों के अनुसार संसार का संचालन कर्मफल के अटल नियम से होता है। मनुष्य जैसा कर्म करता है, वैसा ही फल प्राप्त करता है।
यदि ईश्वर बिना कर्मफल दिए ही पाप क्षमा कर दे, तो उसका न्याय नष्ट हो जाएगा। इसलिए ईश्वर मनमाने ढंग से पापों को समाप्त नहीं करता।
वह प्रत्येक जीव को उसके कर्मानुसार फल देता है।
फिर ईश्वर की दया किस रूप में है?
ईश्वर की दया अनेक रूपों में प्रकट होती है—
- उसने मनुष्य को विवेक दिया।
- धर्म और अधर्म का ज्ञान दिया।
- वेदों के माध्यम से सत्य का उपदेश दिया।
- पश्चात्ताप और सुधार का अवसर दिया।
- नए सत्कर्म करके जीवन को श्रेष्ठ बनाने की क्षमता दी।
इस प्रकार ईश्वर पाप का फल मिटाता नहीं, बल्कि मनुष्य को पाप छोड़कर धर्म के मार्ग पर चलने की प्रेरणा और सामर्थ्य देता है।
पश्चात्ताप का क्या महत्व है?
यदि मनुष्य अपने अपराध को स्वीकार करता है, सच्चा पश्चात्ताप करता है और भविष्य में वही पाप न करने का दृढ़ संकल्प लेकर सत्कर्म करता है, तो उसका चरित्र शुद्ध होता है। इससे भविष्य के कर्म श्रेष्ठ बनते हैं, परंतु पहले किए गए कर्मों का सिद्धांत समाप्त नहीं हो जाता।
कर्म और न्याय का सिद्धांत
भारतीय दर्शन का मूल सिद्धांत है—
जैसा कर्म, वैसा फल।
यही व्यवस्था संसार में नैतिक संतुलन बनाए रखती है। यदि बिना कर्मफल के पाप समाप्त हो जाएँ, तो न्याय और उत्तरदायित्व का आधार ही समाप्त हो जाएगा।
ईश्वर की कृपा कैसे प्राप्त होती है?
ईश्वर की कृपा किसी पक्षपात का नाम नहीं है। उसकी कृपा का अनुभव उस व्यक्ति को होता है जो—
- सत्य का पालन करता है,
- धर्ममय जीवन जीता है,
- योग और ध्यान करता है,
- स्वाध्याय करता है,
- परोपकार करता है,
- और अपने कर्मों को शुद्ध बनाता है।
ऐसे व्यक्ति का मन निर्मल होता है और वह ईश्वर के अधिक निकट अनुभव करता है।
ईश्वर प्राप्ति के कई साधन होते हैं, लेकिन सभी साधकों का अंतिम ध्यान है और ध्यान से समाधि ही होगी। किसी भी आध्यात्मिक साधन का बार-बार प्रयोग करने से व्यक्तिगत आगे बढ़ जाता है और साधन का प्रयोग न करने से व्यक्तिगत प्रगति में खुद ही संस्थागत बन जाता है।
हम संसार में अपने पूर्वजन्मों के कर्मों का फल भोगने और जन्म-मरण के चक्र से मुक्ति पाने या दुःखों से मुक्ति पाने के लिए आये हैं। इंसान जो बोता है वही काटता है। यदि टेल्स बोया है तो टेल्स ही उत्पन्न होता है। यदि कर्म शुभ हैं तो फल भी शुभ होगा और अशुभ कर्मों का फल अशुभ ही होगा। मनुष्य का शरीर अनेक ज्ञान व विज्ञान का समावेश परमात्मा ने बनाया है। मनुष्य अपने व अन्य प्राणियों के शरीर की रचना नहीं कर सकता।
जो विद्वान सत्य आध्यात्मिक ज्ञान से युक्त होते हैं वे ईश्वर व जीवात्मा के दर्शन, स्वरूप तथा भिन्न गुण, कर्म तथा स्वभाव को जानते हैं। जो भौतिक विषयों का ज्ञान प्राप्त होता है या अल्पशिक्षित होता है वह स्वाध्याय के बिना, उपदेशों के श्रवण वा सत्संग के ईश्वर और जीवात्मा को यथार्थ रूप में नहीं जानता। मत-मतान्तरों के ग्रन्थ अविद्या से युक्त होने के कारण उन्हें ईश्वर का सत्य ज्ञान उपलब्ध नहीं होता। इस कारण से उनके ईश्वर और जीवात्मा के सत्य ज्ञान से बहस होती है और परिणामस्वरूप ईश्वर का ज्ञान न होने के कारण ईश्वर का साक्षात्कार नहीं हो सकता है।
ईश्वर की प्राप्ति के लिए मनुष्य को वैदिक साहित्य का अध्ययन करना होता है जिसमें वेद व इसके भाष्य सहित उपनिषद, दर्शन, मनुस्मृति, सत्यार्थप्रकाश, तथा ऋग्वेदादिभाष्यभूमिका आदि ग्रंथों का सर्वोपरि स्थान है। इन ग्रन्थों के अध्ययन से ईश्वर को जाना जाता है और योग साधना से मनुष्य को ध्यान-समाधि प्राप्त होती है जिससे ईश्वर का ज्ञान प्राप्त होता है, प्रत्यक्ष साक्षात्कार होता है। आर्य समाज के अन्य नियमों में ऋषि दयानन्द ने ईश्वर के सत्यस्वरूप सहित उनके गुण, कर्म व स्वभावों का वर्णन किया है। इस नियम को कंठ वा स्मरण कर इस चिंतन से मनुष्य ईश्वर के सत्यस्वरूप को जाना जाता है।
ईश्वर का मुख्य व निज नाम ओ३म् है। ओ3म् के जप तथा गायत्री मन्त्र के अर्थ जिसमें जप से भी मनुष्य ईश्वर को प्राप्त कर अपने जीवन को दुःखों से मुक्ति एवं सुखों से युक्त कर सकते हैं। मनुष्य का जन्म ईश्वर व जीवात्मा को जानकर ईश्वर की पूजा करने से दुःखों का निवारण तथा सुखों की प्राप्ति होती है। हमारे वैदिक ऋषियों ने ईश्वर के स्वरूप और पूजा-अर्चना के लिए कई सिद्धांतों और ग्रंथों की रचना की है। ईश्वर और आत्मा को सम्मिलित करते हुए ईश्वर के कर्म-फल निर्धारण को जान लेने से मनुष्य के दुःखों का कारण बनता है और अशुभ कर्मों का त्याग कर दुःखों से मुक्त हो जाता है और शुभ कर्मों को मिलाकर उनसे मिलने वाले सुखों की प्राप्ति होती है - जन्मान्तरों में सुखों की प्राप्ति होती है।
आध्यात्मिक पथ पर कभी सफलता तो कभी असफलता का दौर बना रहता है। वाद्ययंत्र का प्रयोग करने से सफलता और अनुचित ढंग से प्रयोग करने से विफलता होती है।
ध्यान रहे कि जब कभी भी असफलता मिलती है तो व्यक्ति निराश ना हो जाता है क्योंकि आशावादी बनने से अधिक नुकसान होता है, आशावादी व्यक्ति कभी भी अपने लक्ष्य को प्राप्त नहीं कर पाता है। जब भी भूल हो जाए तो उसका प्रायश्चित(पश्चाताप) करके यानी कोई पेनल्टी डेक से फिर उस कार्य को खरीदें। व्यवसाय करने का लाभ यह है कि व्यवसाय करने का व्यवसाय समाप्त हो जाता है और व्यक्ति सावधान हो जाता है।
क्या ईश्वर पाप क्षमा करता है ?
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१.आत्मना विहितं दुःख आत्मना विहितं सुखम् | गर्भशय्यामुपादाय भुज्यते पौर्वदेहिकम् ||
अर्थ :- दुःख अपने ही किए हुए कर्मों का फल है और सुख भी अपने ही पूर्व कृत कर्मो का परिणाम है ।जीव माता के गर्भ में आते ही पूर्व जन्म में किए कर्मों का फल भोगने लगता है
२.यथा धेनु सहस्त्रेषु वत्सो विदन्ति मातरम् |
तथा पूर्वकृतं कर्म कर्तारमनुगच्छति ||
अर्थ :-जैसे बछड़ा हजारों गायों के बीच में अपनी माँ को पहचान कर उसे पा लेता है , ठीक इसी प्रकार किया हुआ कर्म भी अपने कर्ता के पास पहुँच जाता है ||
३.श्री रामचन्द्र जी कहते हैं कि हमने इच्छानुसार पहले जन्मों में बार बार बहुत सारे पाप कर्म किए हैं ,आज उन्हीं का फल मिल रहा है । इसी कारण हमारे ऊपर दुःख के ऊपर दुःख पड़ रहे हैं ।राज्य का नाश होना ,पिताजी का मरना ,माता जी का व समस्त परिवार का छूटना यह सब बातें जब याद आती हैं तो मुझे दुःख के सागर में डुबो देती हैं ||
४.अवश्यमेव भोक्तव्यं कृतं कर्म शुभाशुभम् | नाभुक्तं क्षीयते कर्म कल्पकोटिशतैरपि ||
अर्थ :-अच्छा या बुरा कर्मफल अवश्य ही भोगना पड़ता है,चाहे जितना भी समय हो जाए बिना भोगे कर्म की समाप्ति नहीं होती।
कितना भी जप, तप, तीर्थ ,धूप ,अगरबती, व्रत , उपवास आदि कर लो पाप कर्मों का फल भुगतना ही पडता है । शुभ अशुभ मिश्रित व निष्काम कर्मों का अपना अपना फल है ।
यज्ञ योग जैसे निष्काम कर्म ही बन्धनों से छुडा कर मोक्ष दिलाने वाले हैं।
शुभ कर्म व निष्काम कर्म-- यज्ञ , योग , वेद पढो , वेद पढाओ ! स्वर्ग पाना है ,मोक्ष पाना है और पापों से बचना है तो यही एक मात्र उपाय है।
निष्कर्ष
ईश्वर-प्राप्ति का मार्ग आडम्बर नहीं, बल्कि सत्य, धर्म, योग, स्वाध्याय, संयम, निष्काम कर्म और ईश्वर-प्रणिधान है।
जहाँ तक पाप-क्षमा का प्रश्न है, वैदिक दृष्टि में ईश्वर न्यायकारी है। वह कर्मों के अनुसार फल देता है और पक्षपातपूर्वक पापों को निरस्त नहीं करता। उसकी करुणा इस रूप में प्रकट होती है कि वह मनुष्य को ज्ञान, विवेक, सुधार का अवसर और धर्ममार्ग प्रदान करता है। इसलिए मनुष्य का कर्तव्य है कि वह पाप का त्याग करे, सत्कर्म अपनाए और ईश्वर के नियमों के अनुसार जीवन जीकर आत्मोन्नति तथा मोक्ष की दिशा में अग्रसर हो।

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