श्रीमन्महाभारते आदिपर्वणि संभवपर्वणि अष्टनवतितमोऽध्यायः

श्रीमन्महाभारते आदिपर्वणि संभवपर्वणि अष्टनवतितमोऽध्यायः

श्लोक 1-4

एवमुक्तो वरारोहा व्रीडितेव मनस्विनी। विसंज्ञेव च दुःखेन तस्थौ स्थूणेव निश्चला।। (1-98-1) संरम्भामर्षताम्राक्षी स्फुरमाणोष्ठसंपुटा। कटाक्षैर्निर्दहन्तीव तिर्यग्राजानमैक्षत।। (1-98-2) आकारं गूहमाना च मन्युना च समीरितम्। तपसा संभृतं तेजो धारयामास वै तदा।। (1-98-3) सा मुहूर्तमिव ध्यात्वा दुःखामर्षसमन्विता। भर्तारमभिसंप्रेक्ष्य यथान्यायं वचोऽब्रवीत्।। (1-98-4)

हिंदी अनुवाद: राजा दुष्यंत द्वारा ऐसा कहे जाने पर उत्तम अंगों वाली, मनस्विनी शकुंतला मानो लज्जित हो गईं। वे दुःख के कारण अचेत-सी होकर खंभे की तरह निश्चल खड़ी रहीं। क्रोध और अमर्ष (रोष) से जिनके नेत्र लाल हो गए थे, जिनके होंठ फड़क रहे थे, ऐसी वे तिरछी नजरों से मानो राजा को अपने कटाक्षों से जलाती हुई देखने लगीं। अपने रूप व आकार को छिपाती हुई, तथा क्रोध से प्रेरित अपने तप द्वारा संचित तेज को उन्होंने उस समय किसी प्रकार धारण किया। दुःख और रोष से युक्त होकर लगभग एक मुहूर्त तक ध्यान करने के बाद, उन्होंने अपने पति की ओर देखकर यथान्यय वचन कहा।

व्याख्या: राजा दुष्यंत द्वारा अस्वीकार किए जाने पर शकुंतला को घोर आघात पहुँचता है। उनका संकोच अब अपमान की आग और तीव्र क्रोध में बदल जाता है। उनके भीतर तपस्या का जो प्रचंड तेज था, वे उसे संभालते हुए अत्यंत धैर्य और रोष के साथ राजा को उत्तर देने के लिए तैयार होती हैं।

श्लोक 5-8

जानन्नपि महाराज कस्मादेवं प्रभाषसे। न जानामीति निःशङ्कं यथान्यः प्राकृतस्तथा।। (1-98-5) तस्य ते हृदयं वेद सत्यस्यैवानृतस्य च। साक्षिणं बत कल्याणमात्मानमवमन्यसे।। (1-98-6) योऽन्यथा सन्तमात्मानन्यथा प्रतिपद्यते। किं तेन न कृतं पापं चोरेणात्मापहारिणा।। (1-98-7) एकोऽहमस्मीति च मन्यसे त्वं न हृच्छयं वेत्सि मुनिं पुराणम्। यो वेदिता कर्मणः पापकस्य तस्यान्तिके त्वं वृजिनं करोषि।। (1-98-8)

हिंदी अनुवाद: शकुंतला बोलीं— "हे महाराज! सब कुछ जानते हुए भी आप किसी साधारण व्यक्ति की तरह निःशंक होकर 'मैं नहीं जानता' ऐसा क्यों कह रहे हैं? आपका हृदय सत्य और असत्य दोनों को भली-भांति जानता है, किंतु आप उस कल्याणकारी आंतरिक साक्षी (आत्मा) का ही अपमान कर रहे हैं! जो व्यक्ति अपनी वास्तविक स्थिति (सत्य) को छिपाकर अन्यथा (असत्य) आचरण करता है, उस आत्मा का अपहरण करने वाले चोर पापियों द्वारा ऐसा कौन सा पाप है जो नहीं किया गया हो? आप मन में यह सोचते हैं कि 'मैं अकेला (छिपकर) हूँ', किंतु आप हृदय में स्थित उन प्राचीन मुनि (अंतर्यामी परमात्मा) को नहीं जानते, जो समस्त पाप कर्मों के ज्ञाता हैं। उन्हीं के समक्ष आप यह पाप (असत्य और अन्याय) कर रहे हैं।"

व्याख्या: शकुंतला राजा दुष्यंत के पाखंड और असत्य वचन पर सीधा प्रहार करती हैं। वे समझाती हैं कि भले ही भरी सभा में कोई गवाही न हो, किंतु मनुष्य की अपनी अंतरात्मा और हृदय में बैठे ईश्वर सब कुछ जानते हैं। सत्य को छिपाना अपनी ही आत्मा के साथ विश्वासघात और सबसे बड़ा पाप है।

श्लोक 9-14

धर्म एव हि साधूनां सर्वेषां हितकारणम्। नित्यं मिथ्याविहीनानां न च दुःखावहो भवेत्।। (1-98-9) मन्यते पापकं कृत्वा न कश्चिद्वेत्ति मामिति। विदन्ति चैनं देवाश्च यश्चैवान्तरपूरुषः।। (1-98-10) आदित्यचन्द्रावनिलोऽनलश्च द्यौर्भूमिरापो हृदयं यमश्च। अहश्च रात्रिश्च उभे च सन्ध्ये धर्मश्च जानाति नरस्य वृत्तम्।। (1-98-11) यमो वैवस्वतस्तस्य निर्यातयति दुष्कृतम्। हृदि स्थितः कर्मसाक्षी क्षेत्रज्ञो यस्य तुष्यति।। (1-98-12) न तुष्यति च यस्यैष पुरुषस्य दुरात्मनः। तं यमः पापकर्माणं निर्भर्त्सयति दुष्कृतम्।। (1-98-13) योऽवमत्यात्मनात्मानमन्यथा प्रतिपद्यते। न तस्य देवाः श्रेयांसो यस्यात्मापि न कारणम्।। (1-98-14)

हिंदी अनुवाद: "नित्य मिथ्या (झूठ) से रहित समस्त साधुओं के लिए धर्म ही एकमात्र हित का कारण है और वह कभी दुःखदायक नहीं होता। मनुष्य पाप कर्म करके यह समझता है कि 'मुझे कोई नहीं जानता', किंतु देवता और शरीर के भीतर बैठे अंतर्यामी पुरुष उसे भली-भांति जानते हैं। सूर्य, चंद्रमा, वायु, अग्नि, आकाश, पृथ्वी, जल, हृदय, यमराज, दिन, रात्रि, दोनों संध्याएँ और धर्म— ये सभी मनुष्य के आचरण को भली-भांति जानते हैं। जिसके हृदय में स्थित कर्मसाक्षी क्षेत्रज्ञ (आत्मा) संतुष्ट रहता है, वैवस्वत यमराज उसी के दुष्कृत्यों (पापों) का निवारण करते हैं; किंतु जिस दुरात्मा पुरुष के भीतर यह साक्षी संतुष्ट नहीं होता, उस पापी पुरुष को यमराज उसके बुरे कर्मों के लिए भर्त्सना (दंड) देते हैं। जो व्यक्ति अपनी आत्मा का अनादर करके सत्य को अन्यथा (झूठा) सिद्ध करता है, देवता भी उसका कल्याण नहीं करते, क्योंकि जिसके लिए उसकी अपनी आत्मा ही प्रमाण नहीं है, उसका कोई क्या भला कर सकता है?"

व्याख्या: इन श्लोकों में शकुंतला ने उच्च कोटि के दार्शनिक और नैतिक सिद्धांतों का उपदेश दिया है। वे दुष्यंत को ब्रह्मांडीय शक्तियों और अंतरात्मा के साक्षीभाव का भय और बोध कराती हैं। उनका तर्क है कि कोई भी पाप या झूठ प्रकृति की शक्तियों से छिप नहीं सकता।

श्लोक 15-17

स्वयं प्राप्तेति मामेवं मावमंस्था पतिव्रताम्। अर्चार्हां नार्चयसि मां स्वयं भार्यामुपस्थिताम्।। (1-98-15) किमर्थं मां प्राकृतवदुपप्रेक्षसि संसदि। नखल्वहमिदं शून्ये रौमि किं न शृणोषि मे।। (1-98-16) यदि मे याचमानाया वचनं न करिष्यसि। दुष्यन्त शतधा त्वद्य मूर्धा ते विफलिष्यति।। (1-98-17)

हिंदी अनुवाद: "स्वयं मेरे पास (राजदरबार में) आ जाने पर भी आप मुझ पतिव्रता का ऐसा अपमान न करें। मैं पूजा के योग्य हूँ, फिर भी आप स्वयं उपस्थित हुई अपनी भार्या (पत्नी) का आदर नहीं कर रहे हैं। इस सभा के बीच आप मुझे किसी साधारण स्त्री की तरह उपेक्षित दृष्टि से क्यों देख रहे हैं? मैं यह सब किसी सूने स्थान में नहीं, बल्कि सबके सामने कह रही हूँ, क्या आप मेरी बात नहीं सुन रहे हैं? हे दुष्यंत! यदि आप मेरे याचना करने पर भी मेरा यह वचन स्वीकार नहीं करेंगे, तो आज आपके सिर के टुकड़े-टुकड़े होकर वह सौ भागों में बिखर जाएगा!"

व्याख्या: शकुंतला अब पूरी दृढ़ता और क्षुब्ध स्वर में राजा दुष्यंत को उनके कर्तव्य का बोध कराती हैं। वे चेतावनी देती हैं कि एक पतिव्रता और अपनी ही पत्नी की उपेक्षा करना उनके लिए घातक सिद्ध होगा और वे अपने सत्य तथा तप के बल पर राजा को शाप देने तक की चेतावनी दे डालती हैं।

श्लोक 18-20

जायां पतिः संप्रविश्य यदस्यां जायते पुनः। जायायास्तद्धि जायात्वं पौराणाः कवयो विदुः।। (1-98-18) यदागमवतः पुंसस्तदपत्यं प्रजायते। तत्तारयति संतत्या पूर्वप्रेतान्पितामहान्।। (1-98-19) पुन्नाम्नो नरकाद्यस्मात्पितरं त्रायते सुतः। तस्मात्पुत्र इति प्रोक्तः पूर्वमेव स्वयंभुवा।। (1-98-20)

हिंदी अनुवाद: "पति जब अपनी पत्नी (जाया) में प्रवेश करता है (अर्थात पुत्र रूप में) और उससे पुनः जन्म लेता है, तो पत्नी का 'जाया' होना इसी से सिद्ध होता है— ऐसा प्राचीन विद्वान और कवि लोग जानते हैं। वेद-शास्त्रों के ज्ञाता पुरुष से जब संतान उत्पन्न होती है, तो वह अपनी संतति के माध्यम से पहले मर चुके पितामहों (पूर्वजों) का भी उद्धार कर देती है। 'पुद्' नामक नरक से जो पिता की रक्षा करता है, इसीलिए ब्रह्माजी ने पहले ही उसका नाम 'पुत्र' कहा है।"

व्याख्या: शकुंतला यहाँ 'जाया' और 'पुत्र' शब्दों की वैदिक व पौराणिक निरूक्ति (व्युत्पत्ति) समझाते हुए विवाह और संतान के आध्यात्मिक एवं सामाजिक महत्त्व को रेखांकित करती हैं। वे बताती हैं कि पुत्र केवल एक बालक नहीं, बल्कि पूर्वजों का उद्धार करने वाला और वंश की निरंतरता का आधार है, जिसे दुष्यंत ठुकरा रहे हैं।

श्लोक 21-25

पुत्रेण लोकाञ्जयन्ति पौत्रेणानन्त्यमश्नुते। अथ पौत्रस्य पुत्रेण मोदन्ते प्रपितामहाः।। (1-98-21) सा भार्या या गृहे दक्षा सा भार्या या प्रजावती। सा भार्या या पतिप्राणा सा भार्या या पतिव्रता।। (1-98-22) अर्धं भार्या मनुष्यस्य भार्या श्रेष्ठतमः सखा। भार्या मूलं त्रिवर्गस्य यः सभार्यः स बन्धुमान्।। (1-98-23) भार्यावन्तः क्रियावन्तः सभार्या गृहमेधिनः। भार्यावन्तः प्रमोदन्ते भार्यावन्तः श्रियावृताः।। (1-98-24) सखायः प्रविविक्तेषु भवन्त्येताः प्रियंवदाः। पितरो धर्मकार्येषु भवन्त्यार्तस्य मातरः।। (1-98-25)

हिंदी अनुवाद: पुत्र से मनुष्य लोकों को जीतता है, पौत्र (पोते) से अनंतता (मोक्ष/अक्षय फल) प्राप्त करता है और पौत्र के पुत्र (परपोते) से प्रपितामह लोग आनंदित होते हैं। सच्ची पत्नी वही है जो घर के कार्यों में दक्ष हो, जो संतान उत्पन्न करने वाली (प्रजावती) हो, जो पति को ही अपने प्राण मानती हो और जो सच्ची पतिव्रता हो। पत्नी मनुष्य का आधा भाग है, पत्नी ही सबसे श्रेष्ठ मित्र है और पत्नी ही धर्म, अर्थ व काम— इन तीनों वर्गों का मूल है। जिसके पास पत्नी है, वही सच्चा बन्धुमान (परिवार वाला) है। पत्नी वाले ही कर्म (यज्ञ आदि) करने के अधिकारी होते हैं, पत्नी वाले ही गृहस्थ कहलाते हैं, पत्नी वाले ही आनंदित होते हैं और पत्नी वाले ही शोभा से युक्त होते हैं। एकांत में ये पत्नियाँ प्रिय बोलने वाली सखी के समान होती हैं, धर्म-कार्य में पिता के समान (मार्गदर्शक) होती हैं और दुःखी होने पर माता के समान सांत्वना देने वाली होती हैं।

व्याख्या: शकुंतला भारतीय संस्कृति में पत्नी और संतान के महत्त्व को शाश्वत सत्यों के माध्यम से समझाती हैं। वे बताती हैं कि गृहस्थ जीवन का आधार पत्नी ही है और पुरुष का संपूर्ण जीवन, उसके धर्म-कर्म और परलोक की गति इसी संस्था पर टिकी हुई है।

श्लोक 26-30

कान्तारेष्वपि विश्रामो जनस्याध्वनि कस्य वै। यः सदारः स विश्वास्यस्तस्माद्दाराः परा गतिः।। (1-98-26) संसरन्तमभिप्रेतं विषमेष्वेकपातिनम्। भार्यैवान्वेति भर्तारं सततं या पतिव्रता।। (1-98-27) प्रथमं संस्थिता भार्या पतिं प्रेत्य प्रतीक्षते। पूर्वप्रेतं तु भर्तारं पश्चात्साप्यनुगच्छति।। (1-98-28) एतस्मात्कारणाद्राजन्पाणिग्रहणमिष्यते। यदाप्नोति पतिर्भार्यामिह लोके परत्र च।। (1-98-29) पोषणार्थं शरीरस्य पाथेयं स्वर्गतस्य वै। आत्माऽऽत्मनैव जनितः पुत्र इत्युच्यते बुधैः।। (1-98-30)

हिंदी अनुवाद: मार्ग के भयानक कांटारों (जंगलों) में यात्रा करते हुए मनुष्य के लिए जैसे विश्राम का स्थान सुखद होता है, वैसे ही जो स्री के साथ (सदार) है, वही विश्वास करने योग्य होता है; इसलिए पत्नियाँ ही मनुष्य की परम गति हैं। इस संसार में विषमता और संकटों के बीच अकेले भटकते हुए पति का जो निरंतर अनुसरण करती है, वह सच्ची पतिव्रता भार्या ही है। यदि पत्नी की पहले मृत्यु हो जाए, तो वह परलोक में पति की प्रतीक्षा करती है और यदि पति की पहले मृत्यु हो जाए, तो पतिव्रता पत्नी उसका अनुसरण करती है (सती होती है अथवा परलोक में मिलती है)। हे राजन्! इसी कारण विवाह में पाणिग्रहण संस्कार की परंपरा है, जिससे पति इस लोक और परलोक दोनों में अपनी पत्नी को प्राप्त करता है। शरीर के पोषण और स्वर्ग की यात्रा के लिए जो पाथेय (मार्ग का भोजन) है, तथा जो आत्मा से ही उत्पन्न दूसरा रूप है, उसे विद्वान लोग 'पुत्र' कहते हैं।

व्याख्या: यहाँ शकुंतला जीवन के मार्ग में जीवनसंगिनी के संबल और उसकी अटूट निष्ठा का गुणगान करती हैं। वे याद दिलाती हैं कि विवाह केवल इस लोक का समझौता नहीं, बल्कि जन्म-जन्मांतर और परलोक तक का साथ है।

श्लोक 31-35

तस्माद्भार्यां पतिः पश्येन्मातृवत्पुत्रमातरम्। अन्तरात्मैव सर्वस्य पुत्रो नामोच्यते सदा।। (1-98-31) गती रूपं च चेष्टा च आवर्ता लक्षणानि च। पितॄणां यानि दृश्यन्ते पुत्राणां सन्ति तानि च।। (1-98-32) तेषां शीलगुणाचारास्तत्संपर्काच्छुभाशुभात्। भार्यायां जनितं पुत्रमादर्शे स्वमिवाननम्।। (1-98-33) जनिता मोदते प्रेक्ष्य स्वर्गं प्राप्येव पुण्यकृत्। पतिव्रतारूपधराः परबीजस्य संग्रहात्।। (1-98-34) कुलं विनाश्य भर्तॄणां नरकं यान्ति दारुणम्। परेण जनिताः पुत्राः स्वभार्यायां यथेष्टतः।। (1-98-35)

हिंदी अनुवाद: इसलिए पति को चाहिए कि वह पुत्र की माता (अपनी पत्नी) को माता के समान देखे। पुत्र को हमेशा सबका 'अन्तरात्मा' ही कहा गया है। माता-पिता की चाल, रूप, चेष्टाएँ, शरीर के आवर्त और लक्षण जैसे होते हैं, वैसे ही उनके पुत्रों में भी स्पष्ट दिखाई देते हैं। उनके शील, गुण और आचार तथा संपर्क के शुभ-अशुभ प्रभाव से उत्पन्न पुत्र ऐसा प्रतीत होता है मानो दर्पण में अपना ही मुख देख रहे हों। अपनी पत्नी से उत्पन्न पुत्र को देखकर पिता ऐसे आनंदित होता है, जैसे कोई पुण्यत्मा पुरुष स्वर्ग प्राप्त करके आनंदित होता है। इसके विपरीत, जो स्त्रियाँ पतिव्रता धर्म का त्याग करके परपराए बीज (другого पुरुष) को ग्रहण करती हैं, वे कुल का नाश करके दारुण नरक को प्राप्त होती हैं।

व्याख्या: शकुंतला दुष्यंत को नैतिक और आनुवंशिक सत्य का बोध कराती हैं कि संतान पिता की ही प्रतिकृति होती है। साथ ही, वे स्त्री की पवित्रता और कुल की मर्यादा के शाश्वत नियमों की कठोरता का भी उल्लेख करती हैं।

श्लोक 36-40

मम पुत्रा इति मतास्ते पुत्रा अपि शत्रवः। द्विषन्ति प्रतिकुर्वन्ति न ते वचनंकारिणः।। (1-98-36) द्वेष्टि तांश्च पिता चापि स्वबीजे न तथा नृप। न द्वेष्टि पितरं पुत्रो जनितारमथापि वा।। (1-98-37) न द्वेष्टि जनिता पुत्रं तस्मादात्मा सुतो भवेत्। दह्यमाना मनोदुःखैर्व्याधिभिस्तुमुलैर्जनः।। (1-98-38) ह्लादन्ते स्वेषु दारेषु घर्मार्ताः सलिलेष्विव। विप्रवासकृशा दीना नरा मलिनवाससः। तेऽपि स्वदारांस्तुष्यन्ति दरिद्रा धनलाभवत्।। (1-98-40) अप्रियोक्तोपि दाराणां न ब्रूयादप्रियं बुधः।। (1-98-40) (अंतिम चरण)

हिंदी अनुवाद: पराए पुरुष से उत्पन्न पुत्रों को भले ही कोई 'ये मेरे पुत्र हैं' माने, किंतु वे पुत्र वास्तव में शत्रु के समान होते हैं; वे द्वेष करते हैं, उलटा प्रतिकार करते हैं और कभी्ञ्ञाकारी नहीं होते। पिता भी अपने सच्चे बीज (अपने और वैध पत्नी के पुत्र) से जैसी प्रीति रखता है, वैसी पराए बीज से उत्पन्न पुत्र से नहीं रख सकता। पुत्र भी अपने जन्मदाता पिता से द्वेष नहीं करता और जन्मदाता पिता भी अपने पुत्र से द्वेष नहीं करता, इसीलिए पुत्र को अपनी ही 'आत्मा' कहा गया है। मनोदुःखों और भीषण व्याधियों से जलता हुआ मनुष्य जैसे शीतल जल में जाने पर शांति पाता है, वैसे ही वह अपनी पत्नी के पास जाकर आनंदित होता है। परदेशवास से कृश, दीन और मैले वस्त्रों वाले दरिद्र मनुष्य जिस प्रकार धन पाकर संतुष्ट होते हैं, वैसे ही मनुष्य अपनी पत्नी को पाकर संतुष्ट होते हैं। इसलिए बुद्धिमान मनुष्य को चाहिए कि यदि पत्नियाँ कभी अप्रिय वचन भी बोल दें, तब भी वह उन्हें कभी अप्रिय (कठोर) उत्तर न दे।

व्याख्या: शकुंतला अपने तर्कों का समापन करते हुए पति-पत्नी के पवित्र और स्वाभाविक प्रेम को रेखांकित करती हैं। वे समझाती हैं कि रक्त और आत्मा का जो संबंध वैध पत्नी और अपने पुत्र से होता है, वह अद्वितीय है और एक समझदार पुरुष को अपनी सहधर्मिणी के प्रति हमेशा संयम और स्नेह रखना चाहिए।

श्लोक 41-44

रतिं प्रीतिं च धर्मं च तदायत्तमवेक्ष्य च। आत्मनोऽर्धमिति श्रौतं सा रक्षति धनं प्रजाः।। (1-98-41) शरीरं लोकयात्रां वै धर्मं स्वर्गमृषीन्पितॄन्। आत्मनो जन्मनः क्षेत्रं पुण्या रामाः सनातनाः।। (1-98-42) ऋषीणामपि का शक्तिः स्रष्टुं रामामृते प्रजा-। देवानामपि का शक्तिः कर्तुं संभवमात्मनः।। (1-98-43) पण्डितस्यापि लोकेषु स्त्रीषु सृष्टिः प्रतिष्ठिता। ऋषिभ्यो ह्यृषयः केचिच्चण्डालीष्वपि जज्ञिरे।। (1-98-44)

हिंदी अनुवाद: रति, प्रीति और धर्म— ये सभी स्त्री पर ही आश्रित हैं, ऐसा समझकर श्रुति भी कहती है कि पत्नी मनुष्य का आधा भाग है और वही धन तथा प्रजा की रक्षा करती है। शरीर, लोकयात्रा, धर्म, स्वर्ग, ऋषि और पितर— इन सबका जो मूल तथा जन्म का क्षेत्र है, वे सनातन और पवित्र स्त्रियाँ ही हैं। स्त्रियों के बिना ऋषियों में भी प्रजा (संतान) उत्पन्न करने की क्या शक्ति है? और देवताओं में भी स्वयं उत्पन्न होने (संभव) की क्या शक्ति है? बड़े-बड़े पंडितों और लोकों की संपूर्ण सृष्टि भी स्त्रियों पर ही प्रतिष्ठित है। यहाँ तक कि कुछ ऋषि तो चण्डाली (निम्न कुल की स्त्रियों) के गर्भ से भी उत्पन्न हुए हैं।

व्याख्या: शकुंतला इस प्रसंग में स्त्री के सनातन, पूजनीय और सृजनात्मक महत्त्व को प्रतिपादित करती हैं। वे बताती हैं कि समाज, धर्म, वंश और ऋषि-मुनियों का अस्तित्व भी स्त्री के बिना असंभव है।

श्लोक 45-48

परिसृत्य यथा सूनुर्धरणीरेणुकुण्ठितः। पितुरालिङ्गतेऽङ्गानि किमस्त्यभ्यधिकं ततः।। (1-98-45) स त्वं सूनुमनुप्राप्तं साभिलाषं मनस्विनम्। प्रेक्षमाणं कटाक्षेण किमर्थमवमन्यसे।। (1-98-46) अण्डानि बिभ्रति स्वानि न त्यजन्ति पिपीलिकाः। किं पुनस्त्वं न मन्येथाः सर्वथा पुत्रमीदृशम्।। (1-98-47) न भरेथाः कथं नु त्वं मयि जातं स्वमात्मजम्। ममाण्डानीति वर्ध्ते कोकिलाण्डानि वायसाः।। (1-98-48)

हिंदी अनुवाद: पृथ्वी की धूल से सने हुए बालक के दौड़कर अपने पिता के अंगों से लिपट जाने से बढ़कर इस संसार में दूसरा कौन सा सुख हो सकता है? ऐसे में, आपके पास आए हुए, अभिलाषा से भरे और मनस्वी इस बालक को आप तिरछी नजरों से देखकर क्यों अपमानित कर रहे हैं? चीटियाँ भी अपने अंडों की रक्षा करती हैं और उन्हें कभी नहीं त्यागतीं, फिर आप तो मनुष्य हैं, ऐसे सर्वगुणसंपन्न पुत्र को अपना क्यों नहीं मान रहे हैं? मुझ जैसी पत्नी से उत्पन्न अपने इस आत्मज (पुत्र) का आप पालन-पोषण क्यों नहीं करेंगे? कौए भी तो कोयल के अंडों को 'ये हमारे अंडे हैं' समझकर उनका वर्धन (पालन) करते हैं।

व्याख्या: शकुंतला एक माँ के रूप में वात्सल्य और तर्कों की पराकाष्ठा पर पहुँच जाती हैं। वे एक साधारण पशु-पक्षियों (चींटी और कौए) का उदाहरण देती हैं कि जब वे पराये या अपने बच्चों की रक्षा करती हैं, तो एक क्षत्रिय राजा होकर आप अपने ही खून को क्यों ठुकरा रहे हैं।

श्लोक 49-53

किं पुनस्त्वं न मन्येथाः सर्वज्ञः पुत्रमीदृशम्। मलयाच्चन्दनं जातमतिशीतं वदन्ति वै।। (1-98-49) शिशोरालिङ्गनं तस्माच्चन्दनादधिकं भवेत्। न वाससां न रामाणां नापां स्पर्शस्तथाविधः।। (1-98-50) शिशुनालिङ्ग्यमानस्य स्पर्शः सूनोर्यथा सुखः। पुत्रस्पर्शात्प्रियतरः स्पर्शो लोके न विद्यते।। (1-98-51) स्पृशतु त्वां समालिङ्ग्य पुत्रोऽयं प्रियदर्शनः। ब्राह्मणो द्विपदां श्रेष्ठो गौर्वरिष्ठा चतुष्पदाम्।। (1-98-52) मुरुर्गरीयसां श्रेष्ठः पुत्रः स्पर्शवतां वरः। त्रिषु वर्षेषु पूर्णेषु प्रजातोऽयमरिन्दमः।। (1-98-53)

हिंदी अनुवाद: हे सर्वज्ञ! आप ऐसे श्रेष्ठ पुत्र को अपना क्यों नहीं मानते? मलय पर्वत से उत्पन्न चंदन को अत्यंत शीतल कहा जाता है, किंतु छोटे शिशु का आलिङ्गन उस चंदन से भी अधिक शीतलता (आनंद) देने वाला होता है। न वस्त्रों का, न स्त्रियों का और न जल का स्पर्श वैसा होता है, जैसा शिशु (पुत्र) से आलिङ्गन करने पर सुख मिलता है। इस संसार में पुत्र के स्पर्श से बढ़कर प्रिय दूसरा कोई स्पर्श नहीं है। यह प्रियदर्शन पुत्र आपको आलिङ्गन करे, आप इसे स्पर्श करने दें। द्विपादों में ब्राह्मण श्रेष्ठ हैं, चौपायों में गाय श्रेष्ठ है, पूजनीय (गरीयसां) में गुरु श्रेष्ठ हैं और स्पर्श करने योग्य वस्तुओं में पुत्र सबसे श्रेष्ठ है। हे अरिंदम! यह बालक पूरे तीन वर्ष की आयु का हो चुका है।

व्याख्या: यहाँ बालक के स्पर्श से मिलने वाले दैवीय और मानसिक सुख का अत्यंत हृदयस्पर्शी वर्णन किया गया है। शकुंतला राजा के कठोर हृदय को पिघलाने के लिए वात्सल्य रस से ओतप्रोत इन पंक्तियों का सहारा लेती हैं।

श्लोक 54-60

अद्यायं मन्नियोगात्तु तवाह्वानं प्रतीक्षते। कुमारो राजशार्दूल तव शोकप्रणाशनः।। (1-98-54) आहर्ता वाजिमेधस्य शतसङ्ख्यस्य पौरवः। राजसूयादिकानन्यान्क्रतूनमितदक्षिणान।। (1-98-55) इति गौरन्तरिक्षे मां सूतके ह्यवदत्पुरा। हन्त स्वमङ्कमारोप्य स्नेहाद्ग्रामान्तरं गताः।। (1-98-56) मूर्ध्नि पुत्रानुपाघ्राय प्रतिनन्दन्ति मानवाः। वेदेष्वपि वदन्तीमं मन्त्रग्रामं द्विजातयः।। (1-98-57) जातकर्मणि पुत्राणां तवापि विदितं ध्रुवम्। अङ्गादङ्गात्संभवसि हृदयादधिजायसे।। (1-98-58) आत्मा वै पुत्रनामासि स जीव शरदः शतम्। उपजिघ्रन्ति पितरो मन्त्रेणानेन मूर्धनि।। (1-98-59) पोषणं त्वदधीनं मे सन्तानमपि चाक्षयम्। तस्मात्त्वं जीव मे पुत्र स सुखी शरदां शतम्।। (1-98-60)

हिंदी अनुवाद: "हे राजशार्दूल! यह कुमार मेरे कहने से आपके आह्वान (स्वीकार करने) की प्रतीक्षा कर रहा है और यह आपके समस्त शोकों का नाश करने वाला है। यह पौरववंशी बालक सैकड़ों अश्वमेध यज्ञों और अपरिमित दक्षिणा वाले राजसूय आदि महायज्ञों का करने वाला होगा।" जन्म के समय अंतरिक्ष में आकाशवाणी (गौ रूप में) ने मुझसे ऐसा कहा था। अरे! लोग स्नेहपूर्वक अपने पुत्र को गोद में बैठाकर और दूसरे गाँवों (स्थानों) को जाते हैं तथा मस्तक पर पुत्र को सूँघकर (आशीर्वाद देकर) आनंदित होते हैं। पुत्रों के जातकर्म संस्कार के समय द्विजों (ब्राह्मणों) द्वारा वेदों में भी यह मन्त्र समूह बोला जाता है, जो आपको भी भली-भांति विदित है— "हे पुत्र! तू मेरे अंग-अंग से संभव होता है और हृदय से उत्पन्न होता है। तू ही मेरा 'आत्मा' (पुत्र) नामक रूप है, इसलिए तू सौ वर्षों तक जीवित रह।" पिता इसी मंत्र से पुत्र के मस्तक को सूँघते हैं। हे मेरे पुत्र! मेरा और इस अक्षय संतान का पोषण अब आपके ही अधीन है, इसलिए हे मेरे पुत्र! तू सौ वर्षों तक सुखी होकर जीवित रह!

व्याख्या: शकुंतला अपने वक्तव्य के अंत में उस आकाशवाणी का स्मरण कराती हैं जो बालक के जन्म के समय हुई थी, जिसमें इसके महान चक्रवर्ती सम्राट बनने और यज्ञों के आयोजन की भविष्यवाणी थी। अंत में वेदों के जातकर्म मंत्रों का उच्चारण करते हुए वे राजा दुष्यंत के सम्मुख अपनी अंतिम अपील करती हैं कि वे इस अमर संतान और उसकी माता को अपनाएँ।

श्लोक 61-63

एको भूत्वा द्विधा भूत इति वादः प्रवर्तते। त्वदङ्गेभ्यः प्रसूतोऽयं पुरुषात्पुरुषः परः।। (1-98-61) सरसीवामलेऽऽत्मानं द्वितीयं पश्य ते सुतम्। सरसीवामले सोमं प्रेक्षात्मानं त्वमात्मनि।। (1-98-62) यथाचाहवनीयोऽग्निर्वर्हपत्यात्प्रणीयते। एवं त्वत्तः प्रणीतोऽयं त्वमेकः सन्द्विधा कृतः।। (1-98-63)

हिंदी अनुवाद: "यह प्रसिद्ध वाद है कि 'एक ही मनुष्य दो रूपों में बँट जाता है'। यह श्रेष्ठ पुरुष (पुत्र) भी तुम्हारे ही अंगों से प्रसूता (उत्पन्न) हुआ है। जैसे निर्मल जलाशय में अपना दूसरा रूप दिखाई देता है, वैसे ही तुम इस निर्मल जल रूपी सुत में अपनी आत्मा को देखो। जिस प्रकार गार्हपत्य अग्नि से आहत्यनीय अग्नि प्रज्वलित की जाती है, उसी प्रकार तुम से ही यह दूसरा रूप प्रणीत हुआ है और इस प्रकार तुम एक से दो हो गए हो।"

व्याख्या: शकुंतला दार्शनिक और शास्त्रीय तर्कों के माध्यम से समझाती हैं कि पिता और पुत्र का संबंध केवल जैविक नहीं, बल्कि आत्मा के विस्तार का है। जिस प्रकार एक अग्नि से दूसरी अग्नि प्रज्वलित होती है, उसी प्रकार दुष्यंत ही इस बालक के रूप में विभाजित हुए हैं।

श्लोक 64-69

मृगापकृष्टेन हि वै मृगयां परिधावता। अहमासादिता राजन्कुमारी पितुराश्रमे।। (1-98-64) उर्वशी पूर्वचित्तिश्च सहजन्या च मेनका। विश्वाची च घृताची च षडेवाप्सरसां वराः।। (1-98-65) तासां वै मेनका नाम ब्रह्मयोनिर्वराप्सराः। दिवः संप्राप्य जगतीं विश्वामित्रादजीजनत्।। (1-98-66) श्रीमानृषिर्धर्मपरो वैश्वानर इवापरः। ब्रह्मयोनिः कुशो नाम विश्वामित्रपितामहः।। (1-98-67) कुशस्य पुत्रो बलवान्कुशनाभश्च धार्मिकः। गाधिस्तस्य सुतो राजन्विश्वामित्रस्तु गाधिजः।। (1-98-68) एवंविधो मम पिता मेनका जननी वरा।' सा मां हिमवतः पृष्ठे सुषुवे मेनकाऽप्सराः।। (1-98-69)

हिंदी अनुवाद: "हे राजन्! मृग के पीछे दौड़ते हुए और शिकार की खोज में भटकते हुए आपने ही मेरे पिता के आश्रम में मुझ कुमारी कन्या को प्राप्त किया था। उर्वशी, पूर्वचित्ति, सहजन्या, मेनका, विश्वाची और घृताची— ये अप्सराओं में छह श्रेष्ठ मानी गई हैं। उनमें जो मेनका नाम की श्रेष्ठ अप्सरा हैं, जो ब्रह्मयोनि (ब्रह्मचर्य/दिव्य योनि से उत्पन्न) हैं, उन्होंने स्वर्ग से पृथ्वी पर आकर विश्वामित्र से मुझे उत्पन्न किया था। दूसरे वैश्वानर (अग्नि) के समान तेजस्वी, धर्मपरायण और ब्रह्मयोनि ऋषि कुश, विश्वामित्र के पितामह थे। कुश के बलवान और धार्मिक पुत्र कुशनाभ हुए, उनके पुत्र गाधि हुए और गाधि के पुत्र विश्वामित्र हैं। इस प्रकार के महान विश्वामित्र मेरे पिता हैं और श्रेष्ठ अप्सरा मेनका मेरी माता हैं।"

व्याख्या: शकुंतला अपने उच्च कुल और वंश का परिचय देती हैं ताकि राजा दुष्यंत उनके वंश, प्रतिष्ठा और गरिमा को लेकर किसी भी प्रकार के संशय में न रहें। वे बताती हैं कि वे किसी साधारण कुल की कन्या नहीं, बल्कि महर्षि विश्वामित्र और अप्सरा मेनका की पुत्री हैं।

श्लोक 70-75

परित्यज्य च मां याता परात्मजमिवासती। पक्षिणः पुम्यवन्तस्ते सहिता धर्मतस्तदा।। (1-98-70) पक्षैस्तैरभिगुप्ता च तस्मादस्मि शकुन्तला। ततोऽहमृषिणा दृष्टा काश्यपेन महात्मना।। (1-98-71) जलार्थमग्निहोत्रस्य गतं दृष्ट्वा तु पक्षिणः। न्यासभूतामिव मुनेः प्रददुर्मां दयावतः।। (1-98-72) कण्वस्त्वालोक्य मां प्रीतो हसन्तीति हविर्भुजः। स माऽरणिमिवादाय स्वमाश्रममुपागमत्।। (1-98-73) सा वै संभाविता राजन्ननुक्रोशान्महर्षिणा। तेनैव स्वसुतेवाहं राजन्वै वरवर्णिनी।। (1-98-74) विश्वामित्रसुता चाहं वर्धिता मुनिना नृप। यौवने वर्तमानां च दृष्टवानसि मां नृप।। (1-98-75)

हिंदी अनुवाद: "वे मेनका मुझे किसी पराये बच्चे की तरह जन्म देते ही (असंती की भाँति) त्यागकर चली गईं। उस समय पुण्यवान पक्षियों ने धर्मपूर्वक मेरे चारों ओर अपने पंख फैलाकर मेरी रक्षा की, इसी कारण मेरा नाम 'शकुन्तला' पड़ा। तदनन्तर, अग्निहोत्र के लिए जल लेने गए महात्मा काश्यप (कण्व) ऋषि ने जब उन पक्षियों को देखा, तो दयालु मुनि को मुझ अनाथ को धरोहर के रूप में सौंप दिया। हविष्य ग्रहण करने वाले कण्व ऋषि ने हँसती हुई मुझे देखकर प्रीतिवश उठा लिया और जैसे अरणिसहित अग्नि को लाया जाता है, वैसे ही वे मुझे अपने आश्रम ले आए। हे राजन्! उस महर्षि के अनुकम्पा (दया) से मेरा पालन-पोषण हुआ और उन्होंने मुझे अपनी पुत्री की भाँति ही पाला। इस प्रकार मैं विश्वामित्र की पुत्री हूँ और उस मुनि द्वारा पाली-बढ़ाई गई हूँ। हे नृप! जब मैं यौवन अवस्था में थी, तब आपने मुझे देखा था।"

व्याख्या: शकुंतला अपने जन्म के बाद के संघर्षपूर्ण प्रसंग और कण्व ऋषि द्वारा उनके पालन-पोषण की कथा सुनाती हैं। वे यह भी स्पष्ट करती हैं कि वे विश्वामित्र की रक्त से उत्पन्न सुता हैं और कण्व ऋषि की मानस पुत्री हैं।

श्लोक 76-80

आश्रमे पर्णशालायां कुमारीं विजने तदा। धात्रा प्रचोदितां शून्ये पित्रा विरहितां मिथः।। (1-98-76) वाग्भिस्त्वं सूनृताभिर्मामपत्यार्थमचूचुदः। अकार्षीस्त्वाश्रमे वासं धर्मकामार्थनिश्चितम्।। (1-98-77) गान्धर्वेण विवाहेन विधिना पाणिमग्रहीः। साऽहं कुलं च शीलं च सत्यवादित्वमात्मनः।। (1-98-78) स्वधर्मं च पुरस्कृत्य त्वामद्य शरणं गता। तस्मान्नर्हसि संश्रुत्य तथेति वितथं वचः।। (1-98-79) स्वधर्मं पृष्ठतः कृत्वा परित्यक्तुमुपस्थिताम्। त्वन्नाथां लोकनाथस्त्वं नार्हसि त्वमनागसम्।। (1-98-80)

हिंदी अनुवाद: "उस समय आश्रम की सूनी पर्णशाला में जब मैं पिता से रहित अकेली थी, तब विधाता की प्रेरणा से आपने ही मीठे वचनों द्वारा मुझसे संतान प्राप्ति (प्रेम संबंध) के लिए आग्रह किया था। आपने धर्म, काम और अर्थ का निश्चय करते हुए वहीं आश्रम में निवास किया था और गंधर्व विवाह की विधि से मेरा पाणिग्रहण (विवाह) किया था। ऐसी मैं अपने कुल, शील, सत्यवादिता और अपने स्वधर्म को आगे रखकर आज आपकी शरण में आई हूँ। अतः हे राजन्! पहले 'तथास्तु' (स्वीकार है) कहकर अब अपने उस वचन को झूठा करना आपके लिए शोभा नहीं देता। अपने स्वधर्म को पीठ पीछे डालकर, पूरी तरह अनादोष (अपराधहीन) और आपकी ही शरण में आई हुई मुझ अबला का इस प्रकार परित्याग करना हे लोकनाथ! आपको कदापि शोभा नहीं देता।"

व्याख्या: शकुंतला अपने तर्कों के उपसंहार में राजा दुष्यंत को उनके द्वारा किए गए गंधर्व विवाह और दिए गए वचनों की याद दिलाती हैं। वे अत्यंत आर्त और दृढ़ स्वर में कहती हैं कि एक राजा और धर्मरक्षक होने के नाते उनका यह कर्तव्य है कि वे निर्दोष पत्नी और पुत्र का त्याग न करें, बल्कि उन्हें अपनाएँ।

श्लोक 81-83

किं नु कर्माशुभं पूर्वं कृतवत्यस्मि पार्थिव। यदहं बान्धवैस्त्यक्ता बाल्ये संप्रति वै त्वया।। (1-98-81) कामं त्वया परित्यक्ता गमिष्याम्यहमाश्रमम्। इमं बालं तु संत्युक्तं नार्हस्यात्मजमात्मना।। (1-98-82) दुष्यन्त उवाच। न पुत्रमभिजानामि त्वयि जातं शकुन्तले। असत्वचना नार्यः कस्ते श्रद्धास्यते वचः।। (1-98-83)

हिंदी अनुवाद: शकुंतला बोलीं— "हे पार्थिव (राजन्)! मैंने पूर्वजन्म में कौन सा अशुभ कर्म किया था, जिसके कारण बाल्यावस्था में सगे-सम्बन्धियों द्वारा और अब इस समय आपके द्वारा मैं छोड़ी जा रही हूँ? भले ही आप मेरा परित्याग कर दें, मैं तो आश्रम वापस चली जाऊँगी, किंतु अपने ही इस पुत्र को त्यागना आपके लिए उचित नहीं है।" दुष्यंत ने कहा— "हे शकुंतले! मैं नहीं जानता कि यह पुत्र तुमसे उत्पन्न हुआ है। स्त्रियाँ असत्यवादी होती हैं, भला तुम्हारी बात पर कौन विश्वास करेगा?"

व्याख्या: शकुंतला अपने भाग्य और दुष्यंत के कठोर व्यवहार पर विलाप करती हैं कि वे हर तरफ से अनाथ और परित्यक्त हो रही हैं। वे स्वयं के त्याग से आहत नहीं हैं, बल्कि अपने निर्दोष पुत्र के अधिकारों के हनन से दुःखी हैं। इसके उत्तर में राजा दुष्यंत और अधिक कठोरता दिखाते हुए स्त्रियों की विश्वसनीयता पर प्रश्न उठाते हैं और शकुंतला के वचनों को नकार देते हैं।

श्लोक 84-89

अश्रद्धेयमिदं वाक्यं कथयन्ती न लज्जसे। विशेषतो मत्सकाशे दुष्टतापसि गम्यताम्।। (1-98-84) क्व महर्षिस्तपस्युग्रः क्वाप्सराः सा च मेनका। क्व च त्वमेवं कृपणा तापसीवेषधारिणी।। (1-98-85) अतिकायश्च पुत्रस्ते बालोऽतिबलवानयम्। कथमल्पेन कालेन सालस्कन्ध इवोद्गतः।। (1-98-86) सुनिकृष्टा च योनिस्ते पुंश्चली प्रतिभासि मे। यदृच्छया कामरागाज्जाता मेनकया ह्यसि।। (1-98-87) सर्वमेव परोक्षं मे यत्त्वं वदसि तापसि। सर्वा वामाः स्त्रियो लोके सर्वाः कामपरायणाः।। (1-98-88) सर्वाः स्त्रियः परवशाः सर्वाः क्रोधसमाकुलाः। असत्योक्ताः स्त्रियः सर्वा न कण्वं वक्तुमर्हसि।। (1-98-89)

हिंदी अनुवाद: राजा दुष्यंत ने आगे कहा— "तुम ऐसी अश्रद्धेय (अविश्वसनीय) बातें कहते हुए लज्जित क्यों नहीं हो रही हो? विशेषकर मेरे सामने ऐसी बातें मत करो, हे दुष्ट तापसी! यहाँ से चली जाओ। कहाँ वे उग्र तपस्या करने वाले महर्षि विश्वामित्र, कहाँ वह अप्सरा मेनका और कहाँ तुम ऐसी दीन-हीन तापसी का वेश धारण करने वाली! तुम्हारा यह पुत्र भी अत्यंत बड़ा और बलवान है, यह इतने कम समय में साल के वृक्ष के तने की तरह कैसे बढ़ गया? तुम्हारी योनि (उत्पत्ति) भी अत्यंत निकृष्ट है और तुम मुझे पुंश्चली (चरित्रहीन) जैसी प्रतीत होती हो, क्योंकि तुम मेनका द्वारा कामराग के वश में होकर यदृच्छया उत्पन्न हुई हो। हे तापसी! तुम जो कुछ भी कह रही हो, वह सब मेरी दृष्टि से परे (अप्रत्यक्ष) है। इस संसार में सभी स्त्रियाँ वामा (उल्टी बुद्धि वाली), कामपरायणा, परवश, क्रोध से भरी और असत्य बोलने वाली होती हैं। अतः तुम कण्व ऋषि का नाम लेकर अहंकार मत करो।"

व्याख्या: दुष्यंत क्रोध और अहंकार में भरकर शकुंतला के चरित्र और उनके जन्म पर ही गंभीर लांछन लगाते हैं। वे विश्वामित्र और मेनका के प्रसंग को भी अपमानजनक रूप में प्रस्तुत करते हैं और सामान्यस्त्री जाति पर तीखा कटाक्ष करते हुए शकुंतला के तर्कों को पूरी तरह खारिज कर देते हैं।

श्लोक 90-95

मेनका निरनुक्रोशा वर्धकी जननी तव। यया हिमवतः पादे निर्माल्यवदुपेक्षिता।। (1-98-90) स चापि निरनुक्रोशः क्षत्रयोनिः पिता तव। विश्वामित्रो ब्राह्मणत्वे लुब्धः कामपरायणः।। (1-98-91) सुषाव सुरनारी मां विश्वामित्राद्यथेष्टतः। अहो जानामि ते जन्म कुत्सितं कुलटे जनैः।। (1-98-92) मेनकाऽप्सरसां श्रेष्ठा महर्षिश्चापि ते पिता। तयोरपत्यं कस्मात्त्वं पुंश्चलीवाभिभाषसे।। (1-98-93) जातिश्चापि निकृष्टो ते कुलीनेति विजल्पसे। जनयित्वा त्वमुत्सृष्टा कोकिलेन परैर्भृता।। (1-98-94) अरिष्टैरिव दुर्बुद्धिः कण्वो वर्धयिता पिता। अश्रद्धेयमिदं वाक्यं यत्त्वं जल्पसि तापसि।। (1-98-95)

हिंदी अनुवाद: "तुम्हारी जननी मेनका भी निर्दयी और वर्धकी (त्यागने वाली) थी, जिसने हिमालय की तलहटी में तुम्हें निर्माल्य (फूले हुए बासी हार) की तरह उपेक्षित छोड़ दिया था। और तुम्हारे पिता भी निर्दयी थे, जो क्षत्रिय कुल में उत्पन्न होकर भी ब्राह्मणत्व के लोभी और कामपरायण विश्वामित्र थे। (शकुंतला के आक्षेप के स्वर में राजा कहते हैं—) सुरनारी मेनका ने विश्वामित्र से स्वेच्छा से मुझे उत्पन्न किया था, अरे! मैं अच्छी तरह जानता हूँ कि तुम्हारा कुल और जन्म लोगों द्वारा कुत्सित (निंदित) है। तुम कहती हो कि मेनका अप्सराओं में श्रेष्ठ हैं और महर्षि तुम्हारे पिता हैं, फिर तुम उन्हीं माता-पिता की संतान होकर पुंश्चली की तरह आचरण क्यों कर रही हो और ऐसी बातें बोल रही हो? तुम्हारी जाति भी निकृष्ट है और तुम अपने आपको कुलीन बताती हो। जन्म देते ही तुम्हें त्याग दिया गया था और कोयल की तरह परायों द्वारा तुम्हारा पालन-पोषण किया गया है। दुर्बुद्धि कण्व तुम्हारे पालक पिता हैं, जो अरिष्ट (कौए) की तरह तुम्हारा पालन करने वाले हैं। हे तापसी! तुम जो यह असत्य और अश्रद्धेय बातें बोल रही हो, वह बिल्कुल व्यर्थ है।"

व्याख्या: राजा दुष्यंत अपने तर्कों में अत्यधिक आक्रामक और अपमानजनक हो जाते हैं। वे शकुंतला के माता-पिता (विश्वामित्र और मेनका) के त्याग का हवाला देकर शकुंतला के कुल को दूषित ठहराने का प्रयास करते हैं और कण्व ऋषि की पालक-पितृ भूमिका पर भी कटाक्ष करते हैं।

श्लोक 96-97

ब्रुवन्ती राजसान्निध्ये गम्यतां यत्र चेच्छसि। सुवर्णमणिमुक्तानि वस्त्राण्याभरणानि च।। (1-98-96) यदिहेच्छसि भोगार्थं तापसि प्रतिगृह्यताम्। नाहं त्वां द्रष्टुमिच्छामि यथेष्टं गम्यतामितः।। (1-98-97)

हिंदी अनुवाद: "राजसभा के बीच ऐसा बोलने वाली! अब जहाँ तुम्हारी इच्छा हो, वहाँ चली जाओ। हे तापसी! यदि तुम भोग-विलास के लिए स्वर्ण, मणि, मोती, वस्त्र और आभूषण चाहती हो, तो उन्हें यहाँ से ग्रहण कर लो। मैं तुम्हें अब देखना भी नहीं चाहता हूँ, अतः यहाँ से जहाँ तुम्हारी इच्छा हो, चली जाओ!"

व्याख्या: राजा दुष्यंत शकुंतला के सभी दावों को सिरे से खारिज करते हुए उन्हें दरबार से जाने का आदेश देते हैं। राजा के इस कठोर, अहंकारी और अपमानजनक निर्णय से भरी सभा में एक अत्यंत मर्मस्पर्शी और नाटकीय संकट उत्पन्न हो जाता है, जहाँ सत्य और न्याय एकला पड़े नजर आते हैं।

।। इति श्रीमन्महाभारते आदिपर्वणि संभवपर्वणि अष्टनवतितमोऽध्यायः।। 98 ।।

संभवपर्वणि सप्तनवतितमोऽध्यायः

संभवपर्वणि एकोनशततमोऽध्यायः