आज का वैदिक भजन
ओ३म् नम॒ इदु॒ग्रं नम॒ आ वि॑वासे॒ नमो॑ दाधार पृथि॒वीमु॒त द्याम्। नमो॑ दे॒वेभ्यो॒ नम॑ ईश एषां कृ॒तं चि॒देनो॒ नम॒सा वि॑वासे ॥८॥
ऋग्वेद 6/51/8
ऋग्वेद ६.५१.८ मन्त्र का भावार्थ एवं विस्तृत व्याख्या
मन्त्र:
ॐ नम॒ इदु॒ग्रं नम॒ आ वि॑वासे॒ नमो॑ दाधार पृथि॒वीमु॒त द्याम्। नमो॑ दे॒वेभ्यो॒ नम॑ ईश एषां कृ॒तं चि॒देनो॒ नम॒सा वि॑वासे ॥
(ऋग्वेद ६.५१.८)
शब्दार्थ
- नमः — नमस्कार, विनम्र प्रणाम।
- उग्रम् — महान्, प्रबल, सर्वशक्तिमान।
- दाधार — धारण किया, संभाला।
- पृथिवीम् उत द्याम् — पृथ्वी और द्युलोक (आकाश) को।
- देवेभ्यः — देवों (विद्वानों, दिव्य गुणों अथवा देवतुल्य शक्तियों) को।
- ईशः — स्वामी, नियन्ता।
- एनः — पाप, अपराध।
- नमसा — नम्रता, विनय और उपासना के द्वारा।
- विवासे — दूर करता हूँ, मिटाने का प्रयास करता हूँ।
भावार्थ
हे सर्वशक्तिमान परमेश्वर! मैं आपको नमस्कार करता हूँ। आप ही पृथ्वी और आकाश को धारण करने वाले हैं। मैं उन दिव्य गुणों एवं देवतुल्य श्रेष्ठ जनों को भी नमस्कार करता हूँ, क्योंकि आप ही उन सबके भी स्वामी हैं। यदि मुझसे कोई पाप या अपराध हुआ है, तो मैं विनम्र प्रार्थना, पश्चात्ताप और आपकी उपासना के द्वारा उसे दूर करने का प्रयास करता हूँ।
व्याख्या
यह मन्त्र केवल प्रणाम करने की बात नहीं करता, बल्कि विनम्रता, उत्तरदायित्व और आत्मशुद्धि का संदेश देता है।
- पहला नमस्कार उस परमेश्वर को है जो समस्त ब्रह्माण्ड का धारणकर्ता है। पृथ्वी, आकाश और समस्त सृष्टि उसी के नियमों से संचालित होती है।
- दूसरा नमस्कार उन देवों के लिए है जो ज्ञान, प्रकाश, सद्गुण और लोककल्याण का कार्य करते हैं। वैदिक साहित्य में "देव" का एक अर्थ प्रकाशमान, विद्वान और उपकारी भी है।
- तीसरा संदेश आत्मचिन्तन का है। मनुष्य से भूल हो सकती है, परन्तु उसे स्वीकार करना, पश्चात्ताप करना और अपने आचरण को सुधारना ही वास्तविक धर्म है। केवल औपचारिक नमस्कार नहीं, बल्कि नम्रता के साथ जीवन में सुधार लाना ही इस मन्त्र का उद्देश्य है।
वैदिक सन्देश
- ईश्वर ही सम्पूर्ण सृष्टि का आधार और नियन्ता है।
- विद्वानों, माता-पिता, गुरु तथा उपकारी व्यक्तियों का सम्मान करना चाहिए।
- यदि जीवन में भूल हो जाए तो उसे छिपाने के बजाय स्वीकार कर सुधार करना चाहिए।
- विनम्रता मनुष्य का सबसे बड़ा आभूषण है; अहंकार पतन का कारण बनता है।
- ईश्वर की उपासना तभी सार्थक है जब उसके साथ सत्य, सदाचार और आत्मसुधार भी जुड़ा हो।
आधुनिक जीवन में प्रेरणा
आज के समय में मनुष्य अक्सर अपनी भूल का दोष दूसरों पर डाल देता है। यह मन्त्र सिखाता है कि महान वही है जो अपनी त्रुटियों को स्वीकार करे, उन्हें सुधारने का प्रयास करे और ईश्वर के नियमों के अनुरूप जीवन जिए। सच्ची प्रार्थना केवल शब्दों से नहीं, बल्कि विनम्र हृदय, श्रेष्ठ कर्म और निरन्तर आत्म-संशोधन से होती है।
निष्कर्ष
यह मन्त्र हमें तीन अमूल्य शिक्षाएँ देता है—परमेश्वर के प्रति श्रद्धा, श्रेष्ठ जनों के प्रति सम्मान और अपनी भूलों के प्रति ईमानदार आत्मस्वीकृति। जो व्यक्ति इन तीनों गुणों को अपनाता है, उसका जीवन धर्म, शान्ति और उन्नति की दिशा में अग्रसर होता है।
ॐ शान्तिः शान्तिः शान्तिः।
झुकते-झुकते दुरित पाप धुल गए
रास्ते भी प्रायश्चित के खुल गए
है प्रचूर शक्ति इस नमन में
कितने नमितों को ईश्वर भी मिल गए
झुकते-झुकते दुरित पाप धुल गए
द्यावा पृथ्वी से लेकर मैं शिक्षा
विप्रों पर है नमन की इक्षा
उनके सद्गुण पालन की है एषा
धन्य मानूँ जो स्तुति योग्य मिल गए
झुकते-झुकते दुरित पाप धुल गए
मात-पिता देव गुरु हैं हितैषी
वे भी नमितों के रहते आपेक्षी
उनके चरणों में शीश नवाऊँ
धन्य धन्य हूँ अनुरक्त मिल गए
झुकते-झुकते दुरित पाप धुल गए
हमने यदि कोई अपराध किया है
या हृदय को दु:खा भी दिया है
क्षम्य भाव से करते शर्मिंदा
आशुतोष हृदय उनके मिल गए
झुकते-झुकते दुरित पाप धुल गए
देवजन हैं नमन के वशवर्ती
आर्द्र-भावों से उनको अपनाएँ
भूलों पर वे प्रायश्चित कराते
भाग्य से ऐसे सुधी लोग मिल गए
झुकते-झुकते दुरित पाप धुल गए
रास्ते भी प्रायश्चित के खुल गए
है प्रचूर शक्ति इस नमन में
कितने नमितों को ईश्वर भी मिल गए
झुकते-झुकते दुरित पाप धुल गए
*राग :- जोगिया*
गायन समय प्रातः काल का प्रथम प्रहर, ताल नाट्य ८ मात्रा
*शीर्षक :- नमः ने द्यावा पृथ्वी को धारा है*
*तर्ज :-
शब्दार्थ :-
इक्षा = इच्छा
आपेक्षी = अपेक्षा करने वाले
अनुरक्त = अनुराग युक्त प्रेमी
आशुतोष = शीघ्र पिघलने वाले
आर्द्रभाव = कोमल भाव
सुधी = बुद्धिमान
*प्रस्तुत भजन से सम्बन्धित पूज्य श्री ललित साहनी जी का सन्देश :--
नमः ने द्यावा पृथ्वी को धारा है।
'नमः'के अंदर बहुत बड़ी शक्ति है।'नम:' में नमस्कार, झुकना किसी को बड़ा मानना किसी की शरण में जाना,अपराध स्वीकार करना, प्रायश्चित करना, किसी अवसर पर झुककर अपने आप को बचा लेना आदि अनेक अर्थ समाविष्ट हैं।
'नम:' ने ही द्यावापृथ्वी को धारण किया हुआ है। यदि भूमि सूर्य के सम्मुख नज़र ना होती, उसे महत्वपूर्ण मानकर उसके चारों ओर परिक्रमा ना करती, तो वह किसी भी आकाशीय पिंड से टकराकर कभी का अपना अस्तित्व खो चुकी होती। पृथ्वी के क्षेत्र में विद्यमान वृक्ष-वनस्पतियां नदियां,बादल आदि भी झुक कर ही अपनी सत्ता बनाए हुए हैं। जब तीव्र झंझावात आता है उस समय वृक्ष यदि अपनी शाखाओं को झुका ना लें, तो वे टूट कर एक ओर जा गिरें। नदियों ने भी झुकने का व्रत धारण किया हुआ है। वे नीचे की ओर बहती हुई, अपने अमृत सलील से धरा को सींचती हुई समुद्र में जा मिलती है। समुद्र से जल-वाष्प बनकर जो बादल अपनी ऊर्ध्वयात्रा आरम्भ करते हैं, वे नमः का व्रत ले, जल- भार से नत हो, भूमि पर बरस जाते हैं। अनेक बार संसार के बड़े-बड़े ज्योतिषियों ने गणना करके जहां भविष्यवाणी की है कि अमुक वर्ष अमुक दिन और अमुक समय पर हमारा भूमंडल या अन्य कोई ग्रह उपग्रह हमको आकाशीय पिंड से टकराकर चूर चूर हो जाएगा। किन्तु हमने देखा कि समय आने पर वह पिंड थोड़ा सा झुक गया और विनाश टल गया। सूर्य भी यदि झुके नहीं तो दिवस रात्रि के चक्कर का प्रवर्तन ही समाप्त हो जाए।
द्यावापृथ्वी के 'नम:' से शिक्षा लेकर मैं भी नमः को अपनाता हूं। मैं भी विद्वज्जनों के प्रति झुकता हूं, उन्हें नमस्कार करता हूं, उनकी चरण-रज का स्पर्श कर अपने आप को धन्य मानता हूं। माता देवी है, उसके चरणों में लोटता हूं। पिता देव हैं उनको शीश नवाता हूं। गुरुजन देव हैं, उन्हें प्रणाम करता हूं। अतीत और वर्तमान काल के अन्य महापुरुष देव है उनकी वन्दना करता हूं। देवजन नमः के वशवर्ती हैं, 'नम:' को देखकर पसीज उठते हैं। अतः मुझसे यदि कोई अपराध हो गया है तो मैं 'नमः' को धारण कर शुद्ध हृदय से अपना अपराध उनके सम्मुख निवेदन कर देता हूं। उस अपराध के लिए क्षमा कर देते हैं। वे कहते हैं कि प्रायश्चित के आंसुओं से तुम्हारा पाप धुल गया।
आओ, हम सब 'नमः' की स्तुति करें, 'नम': को अपने अन्दर धारण करें और 'नम:' के द्वारा ही ऊंचे उठें।

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