मन के दो पंख तृष्णा और वासना

 

🔥मन के दो पंख तृष्णा और वासना

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   मन एक पंछी की तरह है। इस पंछी के दो पंख हैं तृष्णा और वासना जो तुमको उड़ाकर या तो भविष्य में ले जाता है या भूतकाल में ले जाता है। मन के भीतर छुपा होता है लोभ और मोह। लोभ का अर्थ होता है जो मुझे अभी नहीं मिला है, वह मिले। मोह का अर्थ होता है मेरा, मतलब जो मिल गया है, वह छूट न जाए। मन चाहता है कि जो है उसे पकड़ कर रखूं, वह छूट न जाए और जो नहीं है, वह भी मेरी पकड़ में आ जाए। एक हाथ में जो है उसे सम्हाले रखूं और एक हाथ उस पर फैलाता रहूं जो मेरे पास नहीं है। मोह लोभ की छाया है क्योंकि जो तुम्हें नहीं मिला है उसे पाना है और जो मिल गया है उसे पकड़ कर रखना है। इन्हीं दो के बीच आदमी खींचा-खींचा मर जाता है। 

   मन के ये दो पंख तृष्णा और वासना व्यक्ति को नर्क में उतार देते हैं और वह नष्ट हो जाता है। तुम अपने अनुभव पर खुद गहराई से चिंतन करो कि तुम्हारा अनुभव क्या कहता है तुम अपने अनुभव को स्वयं परखो। जब भी तुमने कुछ पकड़ना चाहा तभी तुम दुखी और अशांत हुए हो। 

   इस संसार में सब क्षणभंगुर है। पकड़ा कुछ भी नहीं जा सकता है और तुम पकड़ना चाहते हो। तुम प्रकृति के विपरीत चलते हो इसलिए हारते हो। हारने में दुख है। जैसे कोई आदमी नदी के धार के विपरीत तैरने लगे तो शायद हाथ दो हाथ तैर भी जाए। लेकिन कितना तैर सकेगा? थकेगा और टूटेगा। थोड़ी ही देर में धार की विराट शक्ति उसकी शक्ति को छिन्न भिन्न कर देगी। वह थकेगा, हारेगा, पैर उखड़ने लगेंगे और नीचे की तरफ बहने लगेगा, तब विषाद घेरेगा कि हार गया। जो चाहिए था, नहीं पा सका। तब चित्त में बड़ी ग्लानि होगी। दुख गहन होगा। जो जानता है, वह नदी की धार के साथ बहता है। वह कभी हारता ही नहीं फिर कैसा दुख? वह नदी की धार को शत्रु नहीं मानता, उसका सहारा साधता है। शांति आती कैसे है? शांति की शुरुआत स्वयं के भीतर से होती है। ध्यान के अभ्यास से मन को स्वांसों की धार के साथ बहाने और स्वांसों का सहारा साधने से आती है। निरंतर अभ्यास से एक पल ऐसा आता है कि मन स्वांसों के साथ एकाकार हो जाता है और उसी पल स्वयं के बोध से शांति का अनुभव हो जाता है।

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 🕉🚩 अनन्तेश्वर स्तुति 🕉🚩

🌷ओ३म् वयं त्वां स्मरामो वयं त्वां जम्मो, वयं त्वां जगत्सक्षिरूपं नमाम:। सदेकं निधानं निरालम्बमीशम्, भवाम्भोमि- पोतं शरण्यं ब्रजाम:।।

💐अर्थ :- हे प्रभो! हम आपका स्मरण तथा सेवन करते हैं तथा जगत् का साक्षीरूप मानकर नमस्कार करते हैं ।सत्यस्वरूप, जगदाधार, संसार रूपी सागर के बीच नौका के तुल्य आप ( ईश्वर) की शरण को प्राप्त होते हैं।

यह पद परमात्मा की स्तुति और पूर्ण समर्पण की भावना से युक्त है। इसका भावार्थ और संक्षिप्त व्याख्या इस प्रकार है—

ओ३म् वयं त्वां स्मरामो वयं त्वां भजामः,
वयं त्वां जगत्साक्षिरूपं नमामः।
सदेकं निधानं निरालम्बमीशं,
भवाम्भोधिपोतं शरण्यं व्रजामः॥

भावार्थ

हे परमात्मन्! हम आपका निरन्तर स्मरण करते हैं, आपकी उपासना करते हैं और आपको सम्पूर्ण जगत् के साक्षीस्वरूप जानकर नमस्कार करते हैं। आप ही एकमात्र शाश्वत आश्रय, समस्त ऐश्वर्य के आधार, स्वयं किसी अन्य पर आश्रित न रहने वाले सर्वशक्तिमान ईश्वर हैं। आप ही संसाररूपी दुःख-सागर से पार उतारने वाली नौका हैं। इसलिए हम आपकी ही शरण ग्रहण करते हैं।

व्याख्या

इस प्रार्थना में ईश्वर के पाँच महत्वपूर्ण स्वरूपों का वर्णन किया गया है—

  1. स्मरणीय — मनुष्य को प्रत्येक कार्य में ईश्वर का स्मरण करना चाहिए। ईश्वर-स्मरण से मन पवित्र, स्थिर और निर्भय बनता है।

  2. जगत्साक्षी — परमात्मा प्रत्येक जीव के कर्म, विचार और भाव का साक्षी है। उससे कुछ भी छिपा नहीं है। इसलिए मनुष्य को सदैव सत्य और धर्म का पालन करना चाहिए।

  3. सदेकं निधानम् — समस्त ज्ञान, शक्ति, आनन्द और ऐश्वर्य का वास्तविक स्रोत केवल एक परमात्मा है। उसी पर निर्भर होकर जीवन सार्थक बनता है।

  4. निरालम्ब ईश्वर — ईश्वर स्वयं किसी पर आश्रित नहीं है। वह स्वयम्भू, नित्य और सर्वाधार है, जबकि सम्पूर्ण सृष्टि उसी पर आश्रित है।

  5. भवाम्भोधिपोतम् — संसार को भवसागर कहा गया है, जहाँ अज्ञान, मोह, राग, द्वेष और दुःख की लहरें उठती रहती हैं। ईश्वर का ज्ञान, उसकी उपासना और उसके बताए धर्ममार्ग का पालन ही उस भवसागर से पार कराने वाली नौका है।

जीवनोपयोगी संदेश

  • प्रतिदिन ईश्वर का स्मरण करें।
  • अपने प्रत्येक कर्म को ईश्वर-साक्षी मानकर करें।
  • किसी मनुष्य, वस्तु या धन को अंतिम आश्रय न मानें; वास्तविक आश्रय केवल परमात्मा है।
  • वेदसम्मत ज्ञान, सत्य, धर्म और उपासना के द्वारा जीवन को उन्नत बनाएं।
  • ईश्वर की शरण में रहकर निर्भय, संयमी और परोपकारी जीवन जिएँ।

निष्कर्ष:
यह प्रार्थना मनुष्य को सिखाती है कि जीवन का वास्तविक आधार, रक्षक और उद्धारक केवल एक निराकार, सर्वव्यापक, सर्वज्ञ परमात्मा है। उसका स्मरण, उपासना और शरणागति ही मनुष्य को संसार के दुःखों से मुक्त कर सच्चे आनन्द और मोक्ष की दिशा में अग्रसर करती है। ॐ॥


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