अन्यत्र धर्मादन्यत्राधर्मादन्यत्रास्मात्कृताकृतात्। अन्यत्र भूताच्च भव्याच्च यत्तत्पश्यसि तद्वद ॥
॥ लिप्यन्तरणम् ॥
anyatra dharmādanyatrādharmādanyatrāsmātkṛtākṛtāt | anyatra bhūtācca bhavyācca yattatpaśyasi tadvada ||
॥ अन्वयः ॥
धर्मात् अन्यत्र अधर्मात् अन्यत्र अस्मात् कृतकृतात् अन्यत्र भूयात् भव्यात् अन्यत्र यत् पश्यसि तत् वद ॥
॥ अन्वयलिप्यन्तरणम् ॥
dharmāt anyatra adharmāt anyatra asmāt kṛtakṛtāt anyatra bhūyāt bhavyāt anyatra yat paśyasi tat vada ||
॥ सुबोधिनीभाष्यम् - गोपालानन्दस्वामिरचितम् ॥
[ उपायोपेयपरमात्मविषयकः प्रश्नः ]
एवं सङ्गृह्य उक्तमर्थविशेषं विशिष्य ज्ञातुकामो नचिकेता : पृच्छति - अन्यत्रेति ।
अन्यत्र धर्मादन्यत्राधर्मादन्यत्रास्मात् कृताकृतात् ।
अन्यत्र भूताच्च भव्याच्च यत्तत्पश्यसि तद्वद ॥१४॥
धर्मादधर्माच्चान्यत्र यत्पश्यसि - पुण्यादपुण्याच्च विलक्षणं यत्साधनं पश्यसि, तद्वद । लोके शुभायाशुभाय वा फलाय पुण्यं पापमिति साधनं प्रसिद्धम् । 'देवं मत्वा हर्षशोकौ जहाति ' (कठोपनिषद् - २.१२) इति निगदता त्वया ताभ्यामन्यदेव किञ्चिच्छ्रेयस्साधनं प्रस्तुतं तद्विविच्य ब्रूहीति भावः । अन्यत्र अस्मात्कृताकृतात् समाहारविवक्षया एकवद्भावः, कृतादकृताच्चान्यदित्यर्थः कृतात् कार्यात्मनाऽवस्थितात्, अकृतात् कारणात्मनाऽवस्थिताच्च अन्यद्यत्प्राप्यस्वरूपं पश्यसि तद्वद इत्यर्थः । प्राप्यं हि लौकिकमैहिकमाऽऽमुष्मिकं वा, कार्यात्मना कारणात्मना वा विद्यमानादस्मात्प्रपञ्चान्नान्यत् । 'हर्षशोकौ जहाति' (कठोपनिषद् - २.१२) इति निगदता त्वया आभ्यामन्यदेव किमपि प्राप्यस्वरूपं प्रस्तुतं भवति । प्राप्यानामेषां प्रकृतानामनुस्यूतहर्षशोकत्वात् । तत् - प्रस्तुतं प्राप्यं विविच्य ज्ञापयेत्याशय:। ‘हर्षशोकौ जहाति' (कठोपनिषद् - २.१२) इति कर्तृतया निर्दिष्टो यः प्राप्ता तत्स्वरूपमपि सम्यग्विवेचय इत्याह - अन्यत्र भूताच्च भव्याच्चेति । अतीतानागताच्चान्यत्, कालत्रयेऽपि वर्तमानमित्यर्थः, एकस्वरूपमित्येतत् । यत्प्राप्तृस्वरूपं पश्यसि तद्वदेत्यर्थः । 'हर्षशोकौ जहाति ' (कठोपनिषद् - २.१२) इति हर्षशोकापगममात्रं निदर्शयता कालापरिच्छिन्नमुपेतृस्वरूपं प्रस्तुतं भवति, तद्विविच्य वद इत्याशयः ।
यद्वा भूताच्च भव्याच्चान्यद्यत्पश्यसि उपेतृस्वरूपं यत्पश्यसीत्यर्थः । लोके साधनवेलायां फलमागामि, फलवेलायां तु साधनमतीतम्, उभयत्रानुवर्तमानस्तूपेता, तदयं लक्ष्यते भूताद्भव्याच्चान्यदिति । उपेतृस्वरूपं यत्पश्यसि तद्वद इत्यर्थः । उपेतृस्वरूपम् 'अणुमेतमाप्य मोदनीयं हि लब्ध्वा " (कठोपनिषद् - २.१३ ) इत्यादिना उपास्याद्देवात् पृथगेव किञ्चिदस्तीति प्रस्तुतम्, तद्विविच्य ज्ञापयेत्याशयः ॥१४॥
॥ आङ्गल-अर्थः ॥
Tell me of That which thou seest otherwhere than in virtue and otherwhere than in unrighteousness, otherwhere than in the created and the uncreated, otherwhere than in that which has been and that which shall be.
॥ हिन्दी-अर्थः ॥
नचिकेता कहता हैː "मुझे उस 'परतत्त्व' के विषय में बताइये जिसे आप धर्म से परे (अन्यत्र), अधर्म से परे इस सृष्ट (कृत) तथा असृष्ट (अकृत) से अन्यत्र, भूत तथा भविष्यत् से भी अन्यत्र देखते हैं।''
॥ शब्दावली ॥
धर्मात् अन्यत्र - dharmāt anyatra - otherwhere than in virtue
अधर्मात् अन्यत्र - adharmāt anyatra - otherwhere than in unrighteousness
अस्मात् कृतकृतात् अन्यत्र - asmāt kṛtakṛtāt anyatra - otherwhere than in the created and the uncreated
भूयात् भव्यात् अन्यत्र - bhūyāt bhavyāt anyatra - otherwhere than in that which has been and that which shall be
यत् पश्यसि - yat paśyasi - which thou seest
तत् वद - tat vada - tell me of That
॥ अथ उपनिषद् ॥
धर्म और अधर्म से परे क्या है?
कठोपनिषद् का यह प्रश्न हमें परम सत्य की ओर ले जाता है
संस्कृत मंत्र
अन्यत्र धर्मादन्यत्राधर्मादन्यत्रास्मात्कृताकृतात्।
अन्यत्र भूताच्च भव्याच्च यत्तत्पश्यसि तद्वद॥— कठोपनिषद् (1.2.14)
भावार्थ
हे ज्ञानी! जो तत्व धर्म से भिन्न है, अधर्म से भी भिन्न है; जो किए हुए और न किए हुए कर्मों से परे है; जो भूत (अतीत) और भव्य (भविष्य) से भी परे है— उस परम सत्य को आप जैसा देखते हैं, वैसा मुझे बताइए।
मानव जीवन का सबसे महान प्रश्न
कठोपनिषद् में बालक मृत्यु के देवता से यह प्रश्न पूछता है।
वह धन नहीं माँगता।
वह राज्य नहीं माँगता।
वह लंबी आयु भी नहीं माँगता।
वह पूछता है—
"वह क्या है जो धर्म-अधर्म, कर्म-अकर्म, भूत-भविष्य सबके पार है?"
यह केवल नचिकेता का प्रश्न नहीं है।
यह प्रत्येक जिज्ञासु आत्मा का प्रश्न है।
धर्म और अधर्म से परे
सामान्यतः हम संसार को दो भागों में बाँटते हैं—
- अच्छा और बुरा
- धर्म और अधर्म
- पुण्य और पाप
ये सभी व्यवहारिक जगत के नियम हैं।
इनका महत्व है।
लेकिन उपनिषद् कहता है कि एक ऐसा सत्य भी है जो इन सब सीमाओं से परे है।
जैसे सूर्य के प्रकाश में अच्छे और बुरे दोनों दिखाई देते हैं, लेकिन सूर्य स्वयं उनमें से किसी का पक्ष नहीं होता।
उसी प्रकार परम सत्य सभी द्वंद्वों से परे है।
कृत और अकृत से परे
मंत्र कहता है—
"अन्यत्रास्मात्कृताकृतात्"
अर्थात जो किए हुए और न किए हुए कर्मों से भी परे है।
हमारा सम्पूर्ण जीवन कर्मों से बँधा हुआ है।
हम जो करते हैं, उसका फल प्राप्त करते हैं।
लेकिन आत्मा का शुद्ध स्वरूप कर्मों का कर्ता नहीं, बल्कि साक्षी है।
समुद्र की गहराई में शांति रहती है, चाहे सतह पर कितनी भी लहरें उठती रहें।
वैसे ही आत्मा कर्मों के बीच रहते हुए भी उनसे परे है।
समय से परे सत्य
मंत्र आगे कहता है—
"अन्यत्र भूताच्च भव्याच्च"
अर्थात जो अतीत और भविष्य दोनों से परे है।
मनुष्य का अधिकांश जीवन या तो बीती हुई स्मृतियों में बीतता है या आने वाले कल की चिंताओं में।
वह वर्तमान को खो देता है।
परम सत्य न अतीत में है, न भविष्य में।
वह शाश्वत वर्तमान में है।
जो था, जो है और जो रहेगा— वही सत्य है।
आत्मा का विज्ञान
उपनिषद् हमें बताता है कि शरीर समय के अधीन है।
मन विचारों के अधीन है।
बुद्धि तर्कों के अधीन है।
लेकिन आत्मा इन सबकी साक्षी है।
वह जन्म से पहले भी थी।
वह मृत्यु के बाद भी रहती है।
वह परिवर्तनशील नहीं, बल्कि नित्य है।
इसीलिए ऋषि उस परम तत्व को जानना चाहते हैं जो सभी परिवर्तनों के पीछे स्थिर बना रहता है।
आधुनिक मनुष्य के लिए संदेश
आज मनुष्य अनेक पहचानों में बँटा हुआ है—
- जाति
- धर्म
- राष्ट्र
- विचारधारा
- पद
- संपत्ति
लेकिन उपनिषद् पूछता है—
इन सबके पीछे जो शुद्ध चेतना है, क्या तुमने उसे जाना?
यदि नहीं, तो तुम्हारी खोज अभी अधूरी है।
आत्मचिंतन के प्रश्न
प्रतिदिन स्वयं से पूछिए—
- मैं वास्तव में कौन हूँ?
- क्या मैं केवल शरीर हूँ?
- क्या मैं केवल विचार हूँ?
- क्या मेरे भीतर कोई ऐसी सत्ता है जो सब कुछ देख रही है?
- क्या मैं समय और परिस्थितियों से परे अपने वास्तविक स्वरूप को जानता हूँ?
इन्हीं प्रश्नों से आत्मज्ञान की यात्रा प्रारम्भ होती है।
निष्कर्ष
कठोपनिषद् का यह महान मंत्र हमें संसार के सबसे गहरे रहस्य की ओर ले जाता है।
धर्म और अधर्म से परे,
कर्म और अकर्म से परे,
अतीत और भविष्य से परे,
एक ऐसा शाश्वत सत्य है जो कभी बदलता नहीं।
उपनिषद् का सम्पूर्ण प्रयास उसी सत्य की खोज है।
"जो समय से परे है, वही सत्य है।"
"जो कर्मों से परे है, वही आत्मा है।"
"जो द्वंद्वों से परे है, वही परमात्मा है।"
जब मनुष्य इस सत्य को जान लेता है, तब उसके सभी भय समाप्त हो जाते हैं और जीवन एक नई ज्योति से प्रकाशित हो उठता है।
॥ ॐ तत्सत् ॥

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