ऋषियों के संदेश !प्रार्थना का भावार्थ एवं आध्यात्मिक व्याख्या

 



🔥 ऋषियों के संदेश !!!
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    💐 "मनुष्य जीवन ईश्वर प्राप्ति के लिए मिला है" इस मनुष्य लक्ष्य को छोड़कर अन्य किसी भी कार्य को प्राथमिकता मत दो, नहीं तो तुम्हारा जीवन चन्दन के वन को कोयला बनाकर नष्ट  करने के समान ही है ।

    💐 तुम्हारे जीवन की सफलता तो काम क्रोध, लोभ, मोह, अहंकार आदि अविद्या के कुसंस्कारो को नष्ट करने में ही है । यही समस्त दु:खो से छूटने का श्रेष्ठ उपाय है ।

   💐 जब तक तुम संसार के सुखों के पीछे छिपे हुए दुःखो को समझ नहीं लोगे, तब तक वैराग्य उतपन्न नही होगा। बिना वैराग्य के चंचल मन एकाग्र नही होगा, एकाग्रता के बिना समाधि नही लगेगी, समाधि के बिना ईश्वर का दर्शन नही होगा, बिना ईश्वर - दर्शन के अज्ञान का नाश नही होगा और अज्ञान का नाश हुए बिना दुःखो की समाप्ति और पूर्ण तथा स्थायी सुख  मुक्ति ) की प्राप्ति नही होगी ।

     💐 तुम इस सत्य को समझ लो कि ' अज्ञानी मनुष्य ही जड़ वस्तुओं  भूमि, भवन,  सोना, चांदी) तथा चेतन वस्तुओं  पति, पत्नी, पुत्र,  मित्र आदि) को अपनी आत्मा का एक भाग मानकर,  इनकी वृद्धि होने पर प्रशन्न तथा हानि होने पर दुःखी होता है ।

    💐 तुम्हारे लोहे रूपी मन को,  विषयभोग रूपी चुम्बक सदा अपनी ओर खींचते रहते हैं।ज्ञानी मनुष्य विषयभोगो से होने वाली हानियों का अनुमान लगाकर इनमें आसाक्त नही होते, किन्तु अज्ञानी मनुष्य इनमें फँसकर नष्ट हो जाते है।

    💐 महान ज्ञान, बल, आनन्द आदि गुणों का भण्डार, ईश्वर एक चेतन वस्तु है, जो अनादि काल से तुम्हारे साथ है, न कभी वह अलग हुआ, व कभी होगा ।उसी संसार के बनाने वाले, पालन करने वाले, सबके रक्षक, निराकार ईश्वर की स्तुति, प्रार्थना तथा उपासना तुम सब मनुष्यों को सदा करनी चाहिए ।
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  🕉🚩 अनन्तेश्वर स्तुति 🕉🚩

    🌷ओ३म् त्वमेकं शरण्यं त्वमेकं वरेण्यम्, त्वमेकं जगत्पालकं स्वप्रकाशम् । त्वमेकं जगत्कर्त्तृ, त्वमेकं परं पदम्। निश्चलं निर्विकल्पम्।।

💐 अर्थ:- हे परमानन्देश्वर! संसार में तू ही एकमात्र शरण में जाने योग्य स्थान है।तू ही एकमात्र वरण करने योग्य हैं ।तुझ एकमात्र जगत् के पालक, स्वयं प्रकाशक, रक्षा तथा प्रलय करने वाले, अचल, अपरिवर्तनशील को मेरा नमस्ते स्वीकार हो।
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प्रार्थना का भावार्थ एवं आध्यात्मिक व्याख्या

पद:

ॐ त्वमेकं शरण्यं त्वमेकं वरेण्यम्।
त्वमेकं जगत्पालकं स्वप्रकाशम्॥
त्वमेकं जगत्कर्तृ त्वमेकं परं पदम्।
निश्चलं निर्विकल्पं नमामि॥

भावार्थ

हे परमात्मन्! आप ही एकमात्र शरण देने वाले हैं, आप ही वरण करने योग्य हैं। आप ही सम्पूर्ण जगत् के पालनकर्ता तथा स्वयं प्रकाशस्वरूप हैं। आप ही इस सृष्टि के रचयिता हैं। आप ही सर्वोच्च सत्य हैं, जो सदा स्थिर, अविकार, निश्चल और संदेहरहित हैं।

व्याख्या

यह प्रार्थना परमात्मा के अद्वितीय स्वरूप का अत्यन्त सुन्दर वर्णन करती है।

1. त्वमेकं शरण्यम् — आप ही एकमात्र शरणदाता हैं

संसार के सभी सहारे सीमित हैं। धन, बल, पद और सम्बन्ध परिस्थितियों के अनुसार बदल सकते हैं, किन्तु परमात्मा का आश्रय कभी नहीं बदलता। वही मनुष्य को संकट में धैर्य, विवेक और शक्ति प्रदान करता है।

2. त्वमेकं वरेण्यम् — आप ही वरण करने योग्य हैं

मनुष्य अनेक वस्तुओं की इच्छा करता है, परन्तु सर्वोत्तम प्राप्ति परमात्मा का ज्ञान और उसका सान्निध्य है। इसी भाव को गायत्री मन्त्र में भी "वरेण्यं" शब्द द्वारा व्यक्त किया गया है—परमात्मा ही सर्वोत्तम वरणीय है।

3. त्वमेकं जगत्पालकं स्वप्रकाशम्

परमात्मा सम्पूर्ण सृष्टि का पालनकर्ता है। वह किसी अन्य के प्रकाश से प्रकाशित नहीं होता, बल्कि स्वयं ज्ञानस्वरूप और स्वप्रकाश है। उसी के ज्ञान से समस्त ज्ञान सम्भव होता है।

4. त्वमेकं जगत्कर्तृ

सृष्टि का निमित्त कारण परमेश्वर है। वह अपनी सर्वज्ञता और सर्वशक्ति से सृष्टि की रचना, व्यवस्था और नियमन करता है। उसकी व्यवस्था न्यायपूर्ण और अचूक है।

5. निश्चलं निर्विकल्पम्

परमात्मा परिवर्तन, भ्रम, संशय और विकार से रहित है। उसमें न जन्म है, न मृत्यु, न वृद्धि, न क्षय। वह नित्य, शुद्ध, बुद्ध और मुक्त है।

वैदिक सन्देश

यह प्रार्थना मनुष्य को सिखाती है कि—

  • जीवन का वास्तविक आश्रय केवल परमात्मा है।
  • उसी की उपासना और आज्ञापालन करना चाहिए।
  • सत्य, धर्म और सदाचार के मार्ग पर चलना ही ईश्वर की शरण ग्रहण करना है।
  • ईश्वर की नित्य स्मृति मनुष्य को निर्भय, संयमी और कर्तव्यनिष्ठ बनाती है।

निष्कर्ष

यह प्रार्थना वैदिक एकेश्वरवाद का अत्यन्त प्रभावशाली उद्घोष है। इसमें परमात्मा को एकमात्र शरणदाता, वरणीय, जगत् का रचयिता, पालनकर्ता, स्वप्रकाश, नित्य, निश्चल और निर्विकार बताया गया है। जो मनुष्य इस सत्य को हृदयंगम कर अपने जीवन को ईश्वर की आज्ञा के अनुसार ढालता है, वही वास्तविक शान्ति, निर्भयता और आनन्द प्राप्त करता है।

ॐ शान्तिः शान्तिः शान्तिः।

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