अंतरात्मा और आत्मा की सत्ता व स्वरूप
वैदिक, उपनिषदिक और दार्शनिक प्रमाणों सहित विस्तृत विवेचन
"आत्मा को जानना ही समस्त ज्ञान का सार है।"
मानव जीवन का सबसे गहन प्रश्न है—मैं कौन हूँ? क्या मैं केवल यह शरीर हूँ, या शरीर से परे भी मेरा कोई वास्तविक अस्तित्व है? यदि आत्मा है, तो क्या अंतरात्मा और आत्मा एक ही हैं, या दोनों में कोई भेद है?
भारतीय वैदिक दर्शन में इन प्रश्नों पर अत्यंत गंभीर चिंतन हुआ है। वेद, उपनिषद, दर्शनशास्त्र और योगशास्त्र बताते हैं कि मनुष्य का वास्तविक स्वरूप शरीर नहीं, बल्कि चेतन आत्मा है। वहीं "अंतरात्मा" शब्द उस आंतरिक चेतना, विवेक अथवा अंतःकरण के संदर्भ में भी प्रयुक्त होता है, जिसके माध्यम से आत्मा संसार का अनुभव करती है।
आत्मा का अर्थ
"आत्मा" शब्द संस्कृत धातु 'अत्' से बना है, जिसका अर्थ है—सतत विद्यमान रहने वाली चेतन सत्ता।
आत्मा न जन्म लेती है, न मरती है। वह शरीर के साथ केवल संबंध स्थापित करती है।
प्रमाण
कठोपनिषद् (1.2.18)
न जायते म्रियते वा विपश्चित्।
नायं कुतश्चिन्न बभूव कश्चित्।
अर्थात् आत्मा का न जन्म होता है, न मृत्यु। वह नित्य, शाश्वत और अविनाशी है।
आत्मा की सत्ता
आत्मा की सत्ता को तीन स्तरों पर समझा जा सकता है—
1. प्रत्यक्ष प्रमाण
जीवित और मृत शरीर में सभी भौतिक तत्व लगभग समान रहते हैं, फिर भी जीवित शरीर चेतन होता है और मृत शरीर जड़। यह चेतना किसी भौतिक पदार्थ से उत्पन्न नहीं होती, बल्कि आत्मा की उपस्थिति का संकेत देती है।
2. अनुमान प्रमाण
इच्छा, ज्ञान, सुख, दुःख, स्मृति, संकल्प, निर्णय आदि गुण शरीर के नहीं हैं। शरीर केवल साधन है। इन गुणों का आश्रय चेतन आत्मा है।
प्रमाण
वैशेषिक दर्शन (3.2.4)
प्राणापाननिमेषोन्मेषजीवनमनोगतीन्द्रियान्तरविकाराः सुखदुःखेच्छाद्वेषप्रयत्नाश्चात्मनो लिङ्गानि।
अर्थात् प्राण, अपान, इच्छा, द्वेष, सुख, दुःख आदि आत्मा के लक्षण हैं।
3. शास्त्र प्रमाण
यजुर्वेद (40.8)
स पर्यगाच्छुक्रमकायमव्रणम्...
यह मंत्र परमात्मा का वर्णन करता है, किंतु साथ ही यह भी स्पष्ट करता है कि चेतना का स्वरूप भौतिक शरीर से भिन्न है।
आत्मा का स्वरूप
वेद और उपनिषद आत्मा के निम्न स्वरूप बताते हैं—
- चेतन
- नित्य
- अविनाशी
- अजर
- अमर
- सूक्ष्म
- ज्ञाता
- भोक्ता
- कर्ता (कर्म करने में स्वतंत्र)
- कर्मफल का भोग करने वाला
प्रमाण
श्वेताश्वतर उपनिषद् (5.9)
बालाग्रशतभागस्य शतधा कल्पितस्य च।
भागो जीवः स विज्ञेयः स चानन्त्याय कल्पते॥
अर्थात् जीवात्मा अत्यंत सूक्ष्म है।
अंतरात्मा क्या है?
सामान्य भाषा में "अंतरात्मा" का अर्थ है—भीतर स्थित वह चेतना जो सत्य-असत्य का बोध कराती है।
दार्शनिक दृष्टि से "अंतरात्मा" दो अर्थों में प्रयुक्त होती है—
- आत्मा का अंतःकरण के साथ कार्यशील रूप।
- भीतर स्थित विवेक जो धर्म-अधर्म का निर्णय कराता है।
जब मनुष्य कोई अनुचित कार्य करता है, तो भीतर से जो आवाज़ आती है—"यह उचित नहीं"—उसे सामान्यतः अंतरात्मा की आवाज़ कहा जाता है।
अंतःकरण क्या है?
योग और सांख्य दर्शन के अनुसार अंतःकरण चार भागों का समूह है—
- मन
- बुद्धि
- चित्त
- अहंकार
आत्मा इन्हीं उपकरणों के माध्यम से संसार का अनुभव करती है।
इसलिए अंतरात्मा को आत्मा और अंतःकरण के संयुक्त कार्यरूप के रूप में भी समझा जाता है।
आत्मा और अंतरात्मा में अंतर
| आत्मा | अंतरात्मा |
|---|---|
| शुद्ध चेतन सत्ता | अंतःकरण सहित चेतना की कार्यशील अभिव्यक्ति |
| नित्य | व्यवहारिक अनुभव का क्षेत्र |
| साक्षी | विवेक का अनुभव |
| जन्म-मरण से परे | मन-बुद्धि के माध्यम से कार्य करती है |
इस प्रकार आत्मा मूल सत्ता है, जबकि अंतरात्मा उसके आंतरिक अनुभव का व्यवहारिक पक्ष है।
आत्मा का अनुभव कैसे होता है?
आत्मा इंद्रियों से दिखाई नहीं देती।
प्रमाण
कठोपनिषद् (1.3.12)
एष सर्वेषु भूतेषु गूढोऽात्मा न प्रकाशते।
अर्थात् आत्मा सभी प्राणियों में स्थित है, परंतु सामान्य दृष्टि से दिखाई नहीं देती।
योग, ध्यान, सत्याचरण और मन की शुद्धि द्वारा उसका अनुभव संभव है।
वेदों का दृष्टिकोण
ऋग्वेद और यजुर्वेद दोनों मनुष्य को आत्मज्ञान की ओर प्रेरित करते हैं।
यजुर्वेद (40.6)
यस्तु सर्वाणि भूतानि आत्मन्येवानुपश्यति।
जो सभी प्राणियों में आत्मा को देखता है, वही वास्तविक ज्ञानी है।
आत्मा और परमात्मा
वैदिक दर्शन के अनुसार—
- आत्मा चेतन है।
- परमात्मा भी चेतन है।
- दोनों अनादि हैं।
- दोनों कभी एक नहीं बन जाते।
- परमात्मा सर्वज्ञ है।
- आत्मा अल्पज्ञ है।
- परमात्मा सर्वव्यापक है।
- आत्मा एकदेशीय है।
यह भेद अनेक वैदिक आचार्यों ने स्वीकार किया है।
आत्मा का उद्देश्य
मनुष्य जीवन का उद्देश्य केवल भौतिक सुख नहीं, बल्कि—
- आत्मज्ञान
- धर्म
- योग
- सत्य
- मोक्ष
की प्राप्ति है।
आत्मा का वैज्ञानिक पक्ष
आधुनिक विज्ञान चेतना की पूर्ण व्याख्या अभी तक नहीं कर पाया है। मस्तिष्क की गतिविधियों का अध्ययन संभव है, परंतु "अनुभव करने वाला कौन है?" यह प्रश्न अभी भी दर्शन और चेतना-विज्ञान में खुला हुआ है। वैदिक दर्शन इस अनुभवकर्ता को आत्मा कहता है।
अंतरात्मा'
🔥"राजन! तू अपने दिल में निवास करने वाले ऋषि से भय खा।" ये शब्द थे जो शकुंतला ने राजा दुष्यन्त से हस्तिनापुर में उस समय कहा था जब उन्होंने अपने रनिवास में स्थान की सूचना दी थी और किसी भी प्रकार की उद्यत न हुई थी और शकुन्तला ने उस अंगुठी को दिखाया था जिसे देखकर उन्हें यह स्मरण हो आया था कि शकुन्तला उन्हें उनकी शिष्या पत्नी है। हृदय में निवास करने वाले ऋषि से अभिप्राय अंतरात्मा से था जो प्रभु की वाणी है और जो मनुष्य अधर्म से बच जाता है एवं धर्म में प्रवृत्त होने की प्रेरणा देता है।
क्या धर्म है और क्या अधर्म, क्या है और क्या अनुचित, क्या ठीक है और क्या ग़लत, इसका निर्णय एकमात्र अंतरात्मा से नहीं होता। यह कार्य तो औचित्य वा धर्म का निर्देश करना होता है। धर्म का निर्णय तो सम्यक्तया वेदानुकूल स्मृतियों, सत्पुरुषों के आचार अर्थात् वेद द्वारा प्रतिपादित कर्म और अपनी आत्मा में प्रिय आत्मा जैसा चाहती है वैसा ही सत्य उपदेशादि से होता है। जिस कार्य में प्रवृत्त में से उत्साह, उत्साह और निर्भयता की अनुभूति होती है तो समझ लीजिए यह पवित्रात्मा की ध्वनि है।
शुद्ध अंतरात्मा मानव का सबसे अच्छा मित्र होता है जो हमेशा सन्मार्ग में रहता है और कुमार्ग से मुक्ति की शिक्षा देता है। वे व्यक्ति धन्य होते हैं अलग-अलग अंतरात्मा पवित्र होते हैं जो केवल बुराई को छोड़कर उन्हें अपने पास भी बचा लेते हैं। जब तक अंतरात्मा हमारा मित्र बना रहता है तब तक मन की शांति बनी रहती है। असंतुष्ट हो जाने पर वह हमारा साथ छोड़ देता है और मन की शांति भंग हो जाती है।
हृदय के गुह्यतम भाग में अंतरात्मा हमारी भलाई और शेष सभी संकल्पों और कर्मों का साक्षी होता है। अगर हम कोई बुरा विचार या काम छिपाते हैं तो इससे क्या फायदा, हमारा अंतरात्मा तो उसे ही देखें। अंतरात्मा का कोर्ट हार्ट के अंदर होता है। जो व्यक्ति इस साक्षी के साथ ही न्यायाधीश से डरता रहता है वह कदाचित ही ऐसा कार्य करता है जिस पर उसे पछताने की आवश्यकता पड़ती है। अंतरात्मा मित्र के समान हमें सत् शिक्षा और न्यायशास्त्री के समान दंड देता है।
मूल एवं छोटी-छोटी वस्तुओं में भी सत्य निष्ठा एवं दृढ़ आस्था और राष्ट्रों की महान विभूतियाँ होती हैं।
बुराई और पाप करने वाले को दंड की भावना बिना नहीं रहती। अंतरात्मा ने इस बात को अपने सामने रखा है।
सत्य और न्यायवादी व्यक्ति अंतरात्मा के विरुद्ध किसी तर्क या युक्ति पर कान नहीं देते। उनका आचरण आत्मा के अविरुद्ध धर्म के साँचे में दिव्य ज्योति से प्रकाशमान रहता है। वे छोटे से छोटे बुराई के प्रति सावधान रहते हैं क्योंकि यदि छोटे से छोटे को भी अंतरात्मा में शरण दे दिया जाता है तो वह भयंकर रूप धारण कर लेता है।
अंतरात्मा की आवाज सूक्ष्म दिखाई देने पर भी बेहद स्पष्ट होती है। यदि इसमें कठिनाइयां शामिल हैं तो वह समझ में आनी चाहिए कि हमें उपदेश दे रही है। यदि दो कठिनाइयां उत्पन्न होती हैं तो वह हमारी भर्त्सना होती है।
अंतरात्मा, विश्वास और सम्मान इन तीनों का अंतिम संबंध होता है। अंतरात्मा द्वारा लिखित विश्वास और सम्मान का ही कोई अर्थ होता है। शैतान व्यवहार और व्यक्तिगत आचरण में अंतरात्मा को आगे रखना और सत्य और न्याय के लिए बड़े से बड़ा त्याग करना और जोखिम उठाने से ही मनुष्य कुंडन बनता है।
संसार और ईश्वर की दृष्टि में असंतात्मा मानव की अनुपम निधि और बहुमूल्य विरासत सत्ता युग युगान्तर तक स्थित है। ऐसे व्यक्ति दुनिया से हंसते-2 विदा होता है। अपने और प्रभु के दर्शन में एक व्यक्ति जब मृत्यु साया होता है तो अंतरात्मा रूपी छोटा सा जीव भयंकर विषधर उसके पास आकर विश्वास दिलाता है।
भीरुता प्रश्न यह है कि यह सुरक्षा क्या है? आपका प्रश्न यह है कि यह लोक प्रियता क्या है? औचित्य प्रश्न यह है कि यह क्या है? अंतात्मा यह प्रश्न करता है कि क्या यह ठीक है? अपने को सन्मार्ग में रखें ही अंतरात्मा के आदेश निर्देशों का परिपालन करना है। प्रत्येक व्यक्ति को इसके आदेश का पालन करने का यत्न करना चाहिए और हृदय में यह भावना वद्ध मूल रखनी चाहिए कि श्रेष्ठ अंतरात्मा प्रभु का मंदिर और आनंद का भंडार होता है।
आत्मा की सत्ता व स्वरूप।
एक व्यक्ति का कहना है कि 'मैं हूं'। यहां 'मैं' का प्रयोग शरीर के लिए नहीं आध्यात्म के लिए होता है। ऐसा इसलिए भी है क्योंकि शरीर के लिए कोई 'मैं' का प्रयोग नहीं होता, बल्कि 'मेरा शरीर' का अर्थ होता है।
सांख्य शास्त्र के रचयिता महर्षि कपिल ने अन्य प्रकार से इस बात को बताया है―
प्रधानसृष्टि: पार्थं स्वतोऽप्यभोकत्रत्वात् उष्ट्रकुन्कुमवहनवत्।
अर्थात- प्रकृति से परे जगत् आत्मा के लिए ही है, प्रकृति के स्वयं भोक्ता न होने से, उंट के द्वारा केशर धोए जाने के समान।
ऊँट केशर को अपने लिए नहीं, मार्केटप्लेस के लिए स्टॉक लेना है। इसी प्रकार प्रकृति से बना जगत आपके लिए न तो सपने, न ही सपनों के लिए होता है।
कैवल्यार्थं प्रवृत्तेश्च।―(सांख्य 1/109)
'और मोक्ष के लिए उत्सुकता से।'
दु:ख की अत्यंत निवृत्ति को मोक्ष कहते हैं। दु:खों से बचने के लिए जो प्रवृत्त होता है वह आत्मा का ज्ञानी है।
स्थिर देह को यदि चेतन मन लिया जाए, तो आत्मा के साथ संवाद की क्या आवश्यकता है? इस संकट का समाधान करते हुए सूत्रधार कहते हैं―
न सांसिद्धिकं चैतन्यं प्रत्येकदृष्टे:।
―(सां0 3/20)
'हर भूतकाल में न देखें जाने से भौतिक तत्त्व में स्वभावत: चैतन्य नहीं है।'
पंचमहाभूतों के समागम में खुद का नहीं पाया जाता, अत: पंचमहाभूतों के समागम में अपने का तो सवाल ही नहीं। कुछ वैज्ञानिकों का कहना है कि कुछ भौतिक तत्त्वों से कोई भी तत्व स्वयं उत्पन्न नहीं हो सकता। इससे पता चलता है कि मनुष्य का अपना कोई अधिकार नहीं है। यदि पंचमहाभूतों को चेतन माना जाए, तो इसके क्या परिणाम होंगे, इस विषय में महर्षि कपिल कहते हैं―
प्रपंचमरणद्यभावश्च।―(3/21)
'समस्त जड़ जगत् और मरांडी का अभाव होना चाहिए।'
यदि पंचमहाभूतों को चेतन माना जाए, तो फिर संपूर्ण जगत में जड़ता नहीं रहनी चाहिए, संपूर्ण जगत में जड़ता नहीं रहनी चाहिए; लेकिन ऐसा अनुभव नहीं आता. यदि पंचमहाभूतों को चेतन माना जाए, तो उनके प्रभाव जो शरीर में हैं, उन्हें कभी मरना नहीं चाहिए। लेकिन हम शरीर की मृत्यु देखते हैं। इससे स्पष्ट ज्ञात होता है कि स्वतंत्र पंचमहाभूतों का धर्म नहीं है, यह कोई अन्य तत्त्व का धर्म है जिसे आत्मा कहते हैं।
न्यायदर्शन में आचार्य गौतम ने आत्मा की नित्यता के विषय में निम्नलिखित युक्तियाँ प्रस्तुत की हैं―
पूर्वाभ्यस्तस्मृत्युबन्धाजतस्य हर्षभयशोकसंप्रतिपत्ते:।
―(न्याय 3/1/19)
पहले अभ्यास की हुई स्मृति की धारणा उत्पन्न होने से हर्ष, भय, शोक की प्राप्ति होने से आत्मा नित्य है।
जो बच्चा अभी पैदा हुआ है उसे हर्ष, भय और शोक आदि से युक्त देखा जाता है। ये हर्ष, भय और शोक पूर्वजन्म में अभ्यास की हुई स्मृति के बोध से ही उत्पन्न होते हैं।
प्रेत्याहारभ्यासकृतात् स्थिर्याभिलाषात्।
―(न्याय 3/1/22)
मार्कर पूर्वाभ्यासकृत दूध का अभिलाषी होने से आत्मा नित्य है।
बच्चा पैदा होने पर ही माँ के स्तनों का पान करना प्रतीत होता है। इस जन्म में तो अभी उसने शराब पीने का अभ्यास ही नहीं किया। इससे पता चलता है कि आपके पूर्वजन्म में भोजन का अभ्यास है।
महर्षि गौतम ने न्याय-दर्शन में आत्मा की सिद्धि के विषय में निम्नलिखित युक्तियाँ निकालीं―
दर्शनस्पर्शनाभ्यामेकार्थगृहात्।
―(न्याय 3/1/1)
'दर्शन और स्पर्श से एक ही अर्थ का ग्रहण होना आत्मा शरीर से भिन्न है।'
जिस विषय को हम आँख से देखते हैं उसी को त्वचा से स्पर्श भी करते हैं। नींबू को देखकर रसाना में पानी भर जाता है। यदि इन्द्रियाँ ही चेतन होती हैं तो ऐसी कदापि नहीं हो सकती, क्योंकि एक के देखे हुए अर्थ का दूसरे को कभी स्मरण नहीं होता। फिर से एक नजर देखें विषय का जिह्वा वा त्वचा से क्यों किया जाता है अनुभव? जब हम इंद्रिय के अर्थ को दूसरी इंद्रिय से ग्रहण करते हैं तो इससे यह सिद्ध होता है कि उस अर्थ के ग्रहण में इंद्रिय का स्वातंत्र्य नहीं है, आपका अतिरिक्त ग्रहिता कोई और है जिसे आत्मा कहती है। यह बात महर्षि कणाद ने वैशेषिक शास्त्र में कही है―
इन्द्रियार्थप्रसिद्धिरिन्द्रियार्थेभ्योऽर्थन्तरस्य विकास:।
―(वै0 3,1,2)
इन्द्रियों के अर्थों से अन्य अर्थ (आत्मा) का साधक है।
नाक से सूंघकर जिह्वा से चखना, आंख से देखना त्वचा से छूना, और कान से सुनी हुई वस्तुओं को ग्रहण करना आत्मा को सिद्ध करता है।
इस तर्क के खंडन में यह तर्क दिया जाता है कि आँख और कान आदि इन्द्रियों के रूप और शब्द आदि विषय तो निश्चित हैं जो इन्द्रियों के ग्रहण होते हैं, तो फिर आत्मा के जादू की क्या आवश्यकता है? इसके उत्तर में महर्षि गौतम ने कहा है कि इन्द्रियों के विषयों की निश्चितता ही आत्मा की सत्ता का प्रमाण है कि वह इन्द्रियों के विषयों से अपने-अपने विषयों को ग्रहण करती है, अपनी भिन्न नहीं।
आचार्य गौतम ने आत्मा की सिद्धि में दूसरी युक्ति दी है―
शरीरदाहे पातकाभावात् ।―(न्याय 3/1/4)
'शरीर को जलाने में पाप नहीं होता।'
यह सिद्ध होता है कि आत्मा शरीर से अलग हो जाती है। इस पर सच कहा गया है कि आत्मा के शरीर में होने से शरीर में कोई पाप नहीं होता है।
निष्कर्ष
आत्मा मनुष्य की वास्तविक सत्ता है। शरीर उसका साधन है। मन, बुद्धि और चित्त उसके उपकरण हैं। अंतरात्मा वह आंतरिक विवेक है जिसके माध्यम से आत्मा धर्म और अधर्म का अनुभव करती है।
जब मनुष्य बाह्य आकर्षणों से हटकर अपने भीतर स्थित चेतना का साक्षात्कार करता है, तभी वास्तविक आत्मज्ञान प्रारंभ होता है। यही ज्ञान भय, शोक और अज्ञान से मुक्ति का मार्ग प्रशस्त करता है।
उपनिषदों का संदेश स्पष्ट है—
"आत्मा को जानो, क्योंकि आत्मज्ञान ही समस्त ज्ञान का मूल है।"
यही आत्मा की सत्ता का बोध है, यही अंतरात्मा की शुद्धि है, और यही मानव जीवन की सर्वोच्च उपलब्धि है।

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