यजुर्वेद ३।२९ : प्राणऊर्जा, विद्युत और चेतना-विज्ञान का वैदिक सिद्धान्त
भाग–१ : प्राण ही जीवन की मूल ऊर्जा है
मंत्र
भूमिका
वेदों के मंत्र केवल धार्मिक अनुष्ठानों के लिए रचित वाक्य नहीं हैं। प्रत्येक मंत्र अपने भीतर एक गहन रहस्य समेटे हुए है। जो साधक केवल शब्दों तक सीमित रहता है, वह मंत्र के बाहरी स्वरूप को ही देख पाता है; किन्तु जो उसके संकेतों, प्रतीकों और आंतरिक विज्ञान को समझने का प्रयास करता है, उसके लिए वही मंत्र ज्ञान का द्वार बन जाता है।
यजुर्वेद का यह मंत्र भी ऐसा ही एक रहस्यमय मंत्र है। सामान्य दृष्टि से देखने पर इसमें परमात्मा की स्तुति दिखाई देती है, किन्तु गहन चिंतन करने पर यह जीवन, प्राण, ऊर्जा, गति और चेतना के उस सार्वभौमिक सिद्धान्त का उद्घाटन करता है, जिसके बिना न जीव का अस्तित्व संभव है और न ही किसी प्रकार की क्रियाशीलता।
इस मंत्र का प्रत्येक शब्द किसी न किसी मूल सिद्धान्त का प्रतिनिधित्व करता है। यहाँ ऋषि केवल परमात्मा का गुणगान नहीं कर रहे, बल्कि यह बता रहे हैं कि समस्त ब्रह्माण्ड एक ऐसी अदृश्य ऊर्जा से संचालित हो रहा है जो प्रत्येक जीव के भीतर समान रूप से विद्यमान है।
"यः" — तीन बार प्रयुक्त शब्द का रहस्य
इस मंत्र की सबसे महत्वपूर्ण विशेषता है—"यः" शब्द का बार-बार प्रयोग।
साधारण दृष्टि से यह केवल व्याकरण का प्रयोग प्रतीत हो सकता है, किन्तु ऋषि अनावश्यक शब्दों का प्रयोग नहीं करते। प्रत्येक पुनरावृत्ति अपने भीतर एक विशेष संकेत छिपाए हुए है।
इस मंत्र में "यः" तीन बार आया है।
ये तीनों संकेत सृष्टि के तीन शाश्वत तत्त्वों की ओर इंगित करते हैं—
- प्रथम यः — परम चेतन परमात्मा।
- द्वितीय यः — जीवात्मा।
- तृतीय यः — प्रकृति।
यही तीनों मिलकर सम्पूर्ण सृष्टि की कार्यप्रणाली को पूर्ण करते हैं।
परमात्मा मूल चेतना है।
जीव उस चेतना का अनुभवकर्ता है।
प्रकृति उस चेतना की अभिव्यक्ति का क्षेत्र है।
इन तीनों के बिना सृष्टि की कोई व्यवस्था पूर्ण नहीं हो सकती।
रेवान् — निरंतर गति का शाश्वत सिद्धान्त
इसके पश्चात् मंत्र कहता है—
रेवान्।
इस शब्द का संकेत केवल ऐश्वर्य या सम्पन्नता तक सीमित नहीं है।
यह उस सत्ता की ओर संकेत करता है जो निरंतर गतिशील है।
जिसकी गति कभी रुकती नहीं।
जो अनादि से अनन्त तक समान रूप से कार्यरत है।
यदि सम्पूर्ण सृष्टि का सूक्ष्म निरीक्षण किया जाए, तो स्पष्ट होता है कि यहाँ कुछ भी स्थिर नहीं है।
ग्रह गतिशील हैं।
तारे गतिशील हैं।
परमाणु गतिशील हैं।
प्राण गतिशील है।
विचार गतिशील हैं।
जीवन गतिशील है।
इस अखण्ड गति का मूल आधार वही परम चेतना है।
यही रेवान् का रहस्य है।
जहाँ गति समाप्त होती है, वहीं जड़ता प्रारम्भ होती है।
जहाँ गति है, वहीं जीवन है।
अतः रेवान् वह है जो सम्पूर्ण अस्तित्व को निरंतर गति प्रदान कर रहा है।
अमीवहा — अमिट शाश्वत प्राणवायु
अगला शब्द है—
अमीवहा।
यहाँ ऋषि उस शाश्वत प्राणशक्ति की ओर संकेत करते हैं जो प्रत्येक जीव के भीतर समान रूप से प्रवाहित हो रही है।
शरीर बदलते रहते हैं।
जीवन के रूप बदलते रहते हैं।
किन्तु प्राण का सिद्धान्त नहीं बदलता।
प्राण ही शरीर को जीवित रखता है।
प्राण ही इन्द्रियों को सक्रिय रखता है।
प्राण ही मन को कार्य करने की सामर्थ्य देता है।
जब तक प्राण विद्यमान है, शरीर क्रियाशील है।
जैसे ही प्राण का सम्बन्ध टूटता है, वही शरीर निष्क्रिय हो जाता है।
इसलिए अमीवहा का तात्पर्य उस अमिट, अविनाशी और शाश्वत प्राणशक्ति से है जो सम्पूर्ण जीवन का आधार है।
प्राण का समान वितरण
प्राण किसी एक जाति, वर्ग या प्राणी तक सीमित नहीं है।
जिस प्रकार सूर्य का प्रकाश सभी पर समान रूप से पड़ता है, उसी प्रकार प्राण भी समस्त जीवों में समान रूप से प्रवाहित होता है।
चींटी हो या हाथी।
बालक हो या वृद्ध।
पक्षी हो या मनुष्य।
सभी उसी प्राणशक्ति से संचालित हैं।
अन्तर केवल शरीरों का है।
ऊर्जा का मूल स्रोत एक ही है।
इसीलिए ऋषि प्राण को सार्वभौमिक शक्ति के रूप में देखते हैं।
वसुवित् — जीवन की गति का आधार
अब मंत्र कहता है—
वसुवित्।
यही वह शक्ति है जो शरीर को गति प्रदान करती है।
यदि शरीर में प्राण न रहे, तो शरीर की समस्त संरचना होते हुए भी वह कुछ नहीं कर सकता।
आँखें होंगी, किन्तु देखेंगी नहीं।
कान होंगे, किन्तु सुनेंगे नहीं।
हृदय होगा, किन्तु स्पन्दित नहीं होगा।
मस्तिष्क होगा, किन्तु विचार नहीं करेगा।
अतः शरीर की वास्तविक शक्ति शरीर नहीं, बल्कि उसके भीतर प्रवाहित होने वाली जीवन-ऊर्जा है।
यही वसुवित् है।
यही जीवन की गति है।
यही क्रियाशीलता का मूल आधार है।
ऊर्जा के बिना कोई व्यवस्था संभव नहीं
यदि किसी भी व्यवस्था से उसकी ऊर्जा हटा दी जाए, तो उसका अस्तित्व केवल संरचना भर रह जाता है।
वह कार्य नहीं कर सकती।
ठीक यही स्थिति जीव की भी है।
प्राण के बिना शरीर केवल पदार्थ रह जाता है।
प्राण के साथ वही शरीर अनुभव करता है।
चलता है।
सोचता है।
निर्णय करता है।
सृजन करता है।
अतः शरीर की वास्तविक सत्ता उसके भीतर प्रवाहित जीवन-ऊर्जा में है।
भाग–१ का सार
यजुर्वेद ३।२९ का प्रारम्भिक भाग हमें यह बताता है कि समस्त सृष्टि का मूल आधार एक ऐसी सार्वभौमिक चेतना और प्राणशक्ति है जो निरंतर गतिशील है।
"यः" के तीन संकेत परमात्मा, जीव और प्रकृति के त्रिविध सम्बन्ध को उद्घाटित करते हैं।
रेवान् उस अनवरत गति का प्रतीक है जो सम्पूर्ण ब्रह्माण्ड को संचालित करती है।
अमीवहा शाश्वत प्राणशक्ति का द्योतक है, जो सभी जीवों के भीतर समान रूप से प्रवाहित होती है।
वसुवित् वही जीवनदायिनी शक्ति है, जो शरीर को गति, क्रियाशीलता और अस्तित्व प्रदान करती है।
इसी प्राणशक्ति के कारण जीवन संभव है, अनुभव संभव है और चेतना की अभिव्यक्ति संभव है।
यजुर्वेद ३।२९ : प्राणऊर्जा, विद्युत और चेतना-विज्ञान का वैदिक सिद्धान्त
भाग–२ : पुष्टिवर्धनः — जीवन, प्राण और चेतना का पोषण-विज्ञान
मंत्र
पुष्टिवर्धनः — केवल शरीर नहीं, सम्पूर्ण जीवन का पोषण
मंत्र का अगला शब्द है—पुष्टिवर्धनः।
सामान्यतः पुष्टिवर्धन का अर्थ केवल शरीर का पालन-पोषण कर देने से लगाया जाता है, किन्तु ऋषि का संकेत इससे कहीं अधिक व्यापक है।
जीवन केवल शरीर का नाम नहीं है।
शरीर, प्राण, मन, बुद्धि और चेतना—इन सबका समन्वित विकास ही वास्तविक पुष्टि है।
यदि शरीर पुष्ट हो और मन दुर्बल हो, तो जीवन असन्तुलित रहेगा।
यदि बुद्धि प्रखर हो और प्राणशक्ति क्षीण हो, तब भी पूर्णता सम्भव नहीं।
यदि शरीर और बुद्धि दोनों विकसित हों, किन्तु चेतना जागृत न हो, तो जीवन अपने उद्देश्य को प्राप्त नहीं कर सकता।
अतः पुष्टिवर्धनः उस परम जीवन-शक्ति का नाम है जो सम्पूर्ण अस्तित्व का संतुलित विकास करती है।
प्राण ही जीवन का वास्तविक पोषक है
मनुष्य सामान्यतः भोजन को जीवन का आधार मानता है।
किन्तु भोजन तभी तक उपयोगी है, जब तक शरीर में प्राण विद्यमान है।
प्राण के बिना अन्न भी शरीर का पोषण नहीं कर सकता।
जल भी उपयोगी नहीं रहता।
औषधि भी कार्य नहीं करती।
अतः शरीर का प्रथम पोषक अन्न नहीं, प्राण है।
अन्न शरीर का निर्माण करता है।
प्राण शरीर को चलाता है।
इसीलिए ऋषि प्राण को जीवन का मूल आधार स्वीकार करते हैं।
शरीर एक अद्भुत व्यवस्था है
मानव शरीर असंख्य अंगों से मिलकर बना है।
हृदय अपना कार्य करता है।
मस्तिष्क अपना कार्य करता है।
फेफड़े अपना कार्य करते हैं।
नेत्र, कर्ण, त्वचा, जिह्वा और समस्त इन्द्रियाँ अपने-अपने उत्तरदायित्व का निर्वाह करती हैं।
किन्तु इन सबको एक साथ सक्रिय रखने वाली शक्ति कौन है?
ऋषि का उत्तर है—
वही प्राणशक्ति।
यही वह अदृश्य सत्ता है जो प्रत्येक अंग में समान रूप से कार्य करती है।
वही शरीर को जीवित रखती है।
वही उसे निरन्तर गतिशील बनाए रखती है।
प्राण और मन का सम्बन्ध
मन स्वयं कोई स्थूल पदार्थ नहीं है।
उसकी गति अत्यन्त सूक्ष्म है।
मन इन्द्रियों से विषयों को ग्रहण करता है।
विचार उत्पन्न करता है।
निर्णय के लिए बुद्धि तक पहुँचाता है।
स्मृतियों से सम्बन्ध स्थापित करता है।
किन्तु यह सम्पूर्ण प्रक्रिया तभी तक सम्भव है, जब तक प्राण उसकी शक्ति बना रहता है।
जैसे दीपक की लौ तेल पर आश्रित रहती है, वैसे ही मन की समस्त क्रियाशीलता प्राण पर आश्रित रहती है।
इसलिए प्राण का संतुलन ही मन का संतुलन है।
पुष्टि का वास्तविक अर्थ विकास है
पुष्टि केवल स्थूल वृद्धि नहीं है।
विकास का अर्थ है—
शक्ति का विस्तार।
सामर्थ्य का जागरण।
चेतना का परिष्कार।
जब प्राणशक्ति संतुलित रहती है, तब शरीर स्वस्थ रहता है।
मन स्थिर रहता है।
बुद्धि स्पष्ट रहती है।
निर्णय शुद्ध होते हैं।
जीवन उद्देश्यपूर्ण बनता है।
यही वास्तविक पुष्टि है।
प्रकृति का सम्पूर्ण क्रम पुष्टि पर आधारित है
एक बीज अंकुरित होता है।
वह वृक्ष बनता है।
फूल देता है।
फल देता है।
फिर पुनः असंख्य बीज उत्पन्न करता है।
यह सम्पूर्ण प्रक्रिया केवल बाहरी वृद्धि नहीं है।
यह भीतर कार्य कर रही जीवन-ऊर्जा की अभिव्यक्ति है।
ठीक यही सिद्धान्त प्रत्येक जीव पर लागू होता है।
विकास बाहर दिखाई देता है।
किन्तु उसका मूल कारण भीतर कार्य कर रही प्राणशक्ति होती है।
इसीलिए ऋषि उसे पुष्टिवर्धनः कहते हैं।
चेतना और प्राण का समन्वय
प्राण गति देता है।
चेतना दिशा देती है।
यदि गति हो और दिशा न हो, तो ऊर्जा विनाश का कारण बन सकती है।
यदि दिशा हो और गति न हो, तो उद्देश्य पूरा नहीं हो सकता।
इसलिए जीवन की पूर्णता इन दोनों के संतुलन में है।
परमात्मा से प्राप्त चेतना और प्राण से प्राप्त शक्ति—इन दोनों का समन्वय ही जीवन को सार्थक बनाता है।
जीवन एक सुव्यवस्थित तंत्र है
मानव शरीर को देखने पर प्रतीत होता है कि प्रत्येक अंग स्वतंत्र है।
किन्तु वास्तव में सब एक-दूसरे से जुड़े हुए हैं।
एक अंग में उत्पन्न विकार का प्रभाव दूसरे अंगों पर भी पड़ता है।
उसी प्रकार मन, बुद्धि, चित्त और इन्द्रियाँ भी परस्पर सम्बद्ध हैं।
इन सबको एक सूत्र में बाँधने वाली शक्ति प्राण है।
वही सम्पूर्ण व्यवस्था का अदृश्य आधार है।
संतुलन ही पुष्टि है
जब प्राण संतुलित होता है—
शरीर स्वस्थ रहता है।
मन प्रसन्न रहता है।
बुद्धि जागृत रहती है।
चेतना निर्मल रहती है।
यही सम्पूर्ण पुष्टि है।
इसीलिए ऋषि केवल स्वास्थ्य की नहीं, बल्कि जीवन की पूर्णता की बात करते हैं।
भाग–२ का सार
पुष्टिवर्धनः का अर्थ केवल शरीर का पोषण नहीं, बल्कि सम्पूर्ण जीवन-व्यवस्था का संतुलित विकास है।
प्राण ही शरीर, मन और समस्त आन्तरिक क्रियाओं का वास्तविक पोषक है।
उसी के कारण शरीर जीवित रहता है, मन कार्य करता है और चेतना अपनी अभिव्यक्ति पाती है।
जीवन का प्रत्येक विकास उसी अदृश्य प्राणशक्ति पर आधारित है।
इसलिए परमात्मा की यह प्राणशक्ति ही सम्पूर्ण सृष्टि की पालनकर्ता, पोषणकर्ता और विकासकर्ता शक्ति है।
यजुर्वेद ३।२९ : प्राणऊर्जा, विद्युत और चेतना-विज्ञान का वैदिक सिद्धान्त
भाग–३ : स नः सिषक्तु यस्तुरः — चेतना, विद्युत और यांत्रिक विज्ञान का वैदिक रहस्य
मंत्र
ॐ यो रेवान् यो अमीवहा वसुवित्पुष्टिवर्द्धनः।
स नः सिषक्तु यस्तुरः।
सः — वही एक सार्वभौमिक शक्ति
मंत्र के अंतिम चरण का आरम्भ "सः" शब्द से होता है।
यह वही परम प्राणशक्ति है जिसका वर्णन मंत्र के प्रारम्भ में किया गया है।
वही समस्त सृष्टि में समान रूप से व्याप्त है।
वही गति का आधार है।
वही जीवन का आधार है।
वही पालन और विकास की शक्ति है।
अब ऋषि उसी शक्ति के कार्य का अगला रहस्य प्रकट करते हैं।
नः — प्रत्येक जीव के लिए समान
ऋषि किसी एक व्यक्ति, समाज या राष्ट्र की बात नहीं करते।
वे कहते हैं—"नः", अर्थात् हम सब।
प्राण किसी एक शरीर तक सीमित नहीं है।
जिस प्रकार सूर्य का प्रकाश किसी भेदभाव के बिना सबको प्राप्त होता है, उसी प्रकार परम प्राणशक्ति भी समस्त जीवों में समान रूप से कार्य करती है।
इसलिए यह मंत्र सम्पूर्ण मानवता ही नहीं, समस्त जीवन के लिए है।
सिषक्तु — जुड़ने का वैदिक विज्ञान
इस मंत्र का सबसे महत्वपूर्ण शब्द है—
सिषक्तु।
सामान्य अर्थ में इसका तात्पर्य जोड़ना, संयोग स्थापित करना या सम्बद्ध करना है।
किन्तु यहाँ इसका संकेत अत्यन्त गहरा है।
कोई भी व्यवस्था तब तक कार्य नहीं कर सकती जब तक वह अपनी मूल ऊर्जा से जुड़ी न हो।
सम्बन्ध टूटते ही गति समाप्त हो जाती है।
क्रिया समाप्त हो जाती है।
जीवन समाप्त हो जाता है।
अतः सिषक्तु केवल जोड़ना नहीं है, बल्कि उस मूल शक्ति से ऐसा सम्बन्ध स्थापित करना है जिससे सम्पूर्ण व्यवस्था सक्रिय हो उठे।
विद्युत का सिद्धान्त
यदि किसी यंत्र का निर्माण अत्यन्त उत्कृष्ट ढंग से किया जाए, उसके सभी पुर्जे सही प्रकार से लगाए जाएँ, उसका ढाँचा पूर्ण हो, फिर भी यदि उसमें विद्युत का प्रवाह न हो, तो वह निष्क्रिय रहेगा।
जैसे ही विद्युत उससे जुड़ती है, वही यंत्र कार्य करना प्रारम्भ कर देता है।
उसके सभी भाग एक साथ सक्रिय हो जाते हैं।
उसकी गति प्रारम्भ हो जाती है।
उसका उद्देश्य पूर्ण होने लगता है।
यही सिषक्तु का संकेत है।
ऊर्जा का सम्बन्ध ही क्रियाशीलता का कारण है।
मानव शरीर का संचालन-विज्ञान
मानव शरीर भी एक अत्यन्त सूक्ष्म व्यवस्था है।
नेत्र हैं।
कर्ण हैं।
मस्तिष्क है।
हृदय है।
स्नायु हैं।
इन्द्रियाँ हैं।
किन्तु इन सबको सक्रिय कौन करता है?
उत्तर है—
चेतना।
चेतना के साथ प्रवाहित होने वाली प्राणशक्ति सम्पूर्ण शरीर को कार्यशील बनाती है।
मन निर्देश देता है।
इन्द्रियाँ सूचना ग्रहण करती हैं।
बुद्धि उनका परीक्षण करती है।
चित्त उन्हें सुरक्षित रखता है।
अहंकार उन्हें अपने अनुभव के रूप में स्वीकार करता है।
किन्तु यह सम्पूर्ण प्रक्रिया तभी तक चलती है जब तक मूल चेतना विद्यमान रहती है।
मन — केंद्रीय संचालन तंत्र
मानव शरीर में मन केंद्रीय संचालन तंत्र का कार्य करता है।
इन्द्रियाँ बाहरी जगत से विषयों का ग्रहण करती हैं।
मन उन्हें स्वीकार करता है।
बुद्धि तक पहुँचाता है।
बुद्धि उनका विश्लेषण करती है।
चित्त उपयोगी अनुभवों को संग्रहित करता है।
अहंकार उन्हें अपनी पहचान के साथ जोड़ता है।
फिर मन उसी के अनुसार सम्पूर्ण शरीर को निर्देश देता है।
यह एक सतत् चलने वाली प्रक्रिया है।
इसी व्यवस्था से सम्पूर्ण जीवन संचालित होता है।
यंत्र की रचना का सिद्धान्त
यदि इसी व्यवस्था को यांत्रिक रूप दिया जाए, तो एक ऐसा यंत्र निर्मित किया जा सकता है जो निश्चित निर्देशों के अनुसार कार्य करने में समर्थ हो।
उसमें ऊर्जा होगी।
उसका केंद्रीय संचालन तंत्र होगा।
उसके पास सूचना ग्रहण करने वाले उपकरण होंगे।
सूचना का विश्लेषण करने की व्यवस्था होगी।
संग्रह करने की क्षमता होगी।
निर्णय के अनुसार कार्य करने वाले अंग होंगे।
किन्तु यह सम्पूर्ण व्यवस्था तभी तक कार्य करेगी जब तक उसमें ऊर्जा का प्रवाह रहेगा।
ऊर्जा समाप्त होते ही उसकी समस्त क्रियाशीलता समाप्त हो जाएगी।
चेतना और विद्युत का संकेत
इस मंत्र में प्राणशक्ति और विद्युत के सिद्धान्त का गूढ़ संकेत निहित है।
परमात्मा से प्रवाहित होने वाली चेतना जीव को सक्रिय करती है।
विद्युत यंत्र को सक्रिय करती है।
दोनों के बिना उनकी-उनकी व्यवस्था निष्क्रिय हो जाती है।
अतः ऊर्जा ही गति का कारण है।
ऊर्जा ही कार्य का आधार है।
ऊर्जा ही सम्पूर्ण व्यवस्था को एक सूत्र में बाँधती है।
यही सिषक्तु का वास्तविक रहस्य है।
यस्तुरः — तीव्र गति का सामर्थ्य
मंत्र का अंतिम शब्द है—
तुरः।
जब कोई व्यवस्था अपनी मूल ऊर्जा से पूर्ण रूप से जुड़ जाती है, तब उसमें गति उत्पन्न होती है।
सामर्थ्य उत्पन्न होता है।
कार्य करने की क्षमता उत्पन्न होती है।
यही तुरः है।
यह केवल वेग नहीं है।
यह उस शक्ति का नाम है जो निष्क्रियता को क्रियाशीलता में परिवर्तित कर देती है।
जिस प्रकार विद्युत से जुड़ते ही यंत्र तीव्र गति से कार्य करने लगता है, उसी प्रकार परम प्राणशक्ति से जुड़कर जीव अपनी समस्त आन्तरिक शक्तियों को जाग्रत कर लेता है।
भाग–३ का सार
मंत्र का अंतिम चरण ऊर्जा और संचालन के रहस्य को उद्घाटित करता है।
सः वही सार्वभौमिक प्राणशक्ति है।
सिषक्तु उस शक्ति से जुड़ने का सिद्धान्त है, जिसके बिना कोई भी व्यवस्था सक्रिय नहीं हो सकती।
मानव शरीर में यही सम्बन्ध चेतना और प्राण के माध्यम से प्रकट होता है।
यांत्रिक व्यवस्था में यही सिद्धान्त विद्युत और संचालन तंत्र के रूप में कार्य करता है।
तुरः उस पूर्ण सामर्थ्य, तीव्र गति और कार्यक्षमता का प्रतीक है, जो मूल ऊर्जा से जुड़ने पर प्रकट होती है।
इसी प्रकार यह मंत्र जीवन, प्राण, चेतना, ऊर्जा और यांत्रिक संचालन के एक अखण्ड वैदिक सिद्धान्त का उद्घाटन करता है।
(क्रमशः – अंतिम भाग में इस मंत्र का समग्र भावार्थ, जीवन-दर्शन एवं उपसंहार प्रस्तुत किया जाएगा।)

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