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भर्तृहरि शृङ्गार शतक: श्लोक 67 से 73 व्याख्या | सौंदर्य और विवेक का द्वंद्व
धन, बन्धु, अवस्था, कर्म और विद्या – जीवन के पाँच मान्य स्थान | वैदिक दर्शन
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