प्रामाणिक आध्यात्मिक एवं प्रज्ञा कथाएं (भाग-2

प्रामाणिक आध्यात्मिक एवं प्रज्ञा कथाएं (भाग-2)

वेदों, उपनिषदों, गीता और संत चरित्रों से संकलित संस्कृत श्लोकों सहित 20 दिव्य प्रसंग।

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कुरुक्षेत्र के युद्ध मैदान में जब अर्जुन ने अपने ही सगे-संबंधियों, गुरुओं और पिताओं को सामने खड़े देखा, तो उनका गांडीव हाथ से छूट गया। मोह और शोक से ग्रस्त होकर अर्जुन रथ के पिछले भाग में बैठ गए और युद्ध करने से मना कर दिया। उन्होंने तर्क दिया कि अपनों को मारकर मिलने वाले राजपाठ से अच्छा भिक्षा मांगना है। तब भगवान कृष्ण ने उन्हें चेतना के शाश्वत स्वरूप का बोध कराया और कर्म के मर्म को समझाया।

सुखदुःखे समे कृत्वा लाभालाभौ जयाजयौ।
ततो युद्धाय युज्यस्व नैवं पापमवाप्स्यसि॥
**अर्थ:** सुख-दुःख, लाभ-हानि और जय-पराजय को समान समझकर, उसके बाद युद्ध के लिए तैयार हो जाओ; इस प्रकार युद्ध करने से तुम पाप को प्राप्त नहीं होओगे।

कृष्ण ने अर्जुन को सिखाया कि जब कर्म फल की आसक्ति से मुक्त होकर केवल कर्तव्य भाव से किया जाता है, तो वह बंधन नहीं बनता। यही समत्व बुद्धि अध्यात्म की नींव है।

📖 संदर्भ: श्रीमद्भगवद्गीता (द्वितीय अध्याय, श्लोक 38)

शुकदेव जी परम विरक्त थे, लेकिन उनके मन की अंतिम शंका का निवारण राजा जनक के संसर्ग में होना था। जब वे मिथिला पहुँचे, तो उन्होंने देखा कि राजा जनक चारों ओर से राजसी ठाट-बाट, रानियों और मंत्रियों से घिरे हैं। शुकदेव के मन में विचार आया कि इतने ऐश्वर्य के बीच रहने वाला व्यक्ति आत्मज्ञानी कैसे हो सकता है? राजा जनक भांप गए। उन्होंने शुकदेव को नगर भ्रमण पर भेजा और लौटते ही पूछा कि क्या उन्हें कोई कमी दिखी?

न कर्मणा न प्रजया धनेन त्यागेनैके अमृतत्वमानशुः। **अर्थ:** न कर्म से, न प्रजा (संतति) से और न धन से, बल्कि केवल त्याग के द्वारा ही अमृतत्व (मोक्ष) की प्राप्ति संभव है।

जनक ने समझाया कि आसक्ति का त्याग मन से होता है, शरीर के स्थान से नहीं। राजा जनक महल में रहकर भी जल में कमल के पत्ते की तरह निर्लिप्त थे, जिसने शुकदेव के वैराग्य को पूर्णता दी।

📖 संदर्भ: कैवल्योपनिषद (1.2) / महाभारत

राजा रंतिदेव अत्यंत दानी थे। एक बार उनके राज्य में भयंकर अकाल पड़ा। अड़तालीस दिनों तक भूखे-प्यासे रहने के बाद, उनचासवें दिन सुबह उन्हें थोड़ा सा अन्न और जल प्राप्त हुआ। जैसे ही वे भोजन करने बैठे, क्रमशः एक ब्राह्मण, एक शूद्र, और अंत में कुत्तों के साथ एक भूखा चांडाल आया। रंतिदेव ने अपना सारा भोजन और पानी उन भूखे जीवों को हंसते-हंसते दे दिया और स्वयं भूखे रह गए।

न त्वहं कामये राज्यं न स्वर्गं नापुनर्भवम्।
कामये दुःखतप्तानां प्राणिनामार्तिनाशनम्॥
**अर्थ:** मैं न राज्य की कामना करता हूँ, न स्वर्ग की और न ही मोक्ष की। मैं तो केवल दुःख से तड़पते हुए प्राणियों के दुःखों का नाश चाहता हूँ।

इस निश्छल दया को देखकर देवता प्रकट हुए और बोले कि वे ही परीक्षा लेने आए थे। रंतिदेव की यह करुणा साक्षात ब्रह्म का स्वरूप थी।

📖 संदर्भ: श्रीमद्भागवत पुराण (नवम स्कन्ध, अध्याय 21)

श्वेतकेतु बारह वर्ष तक गुरुकुल में रहकर सभी वेदों का अध्ययन करके घर लौटा। उसे अपनी विद्वत्ता पर बहुत अहंकार था। उसके पिता महर्षि उद्दालक ने उसके अहंकार को देखकर पूछा, "पुत्र! क्या तुमने उस तत्व को जाना, जिसे सुन लेने पर सब कुछ सुन लिया जाता है और जान लेने पर सब कुछ ज्ञात हो जाता है?" श्वेतकेतु निरुत्तर हो गया। तब उद्दालक ने उसे वटवृक्ष के बीज और पानी में नमक घोलकर अदृश्य चेतना का पाठ पढ़ाया।

स य एषोऽणिमैतदात्म्यमिदं सर्वं तत्सत्यं स आत्मा।
तत्त्वमसि श्वेतकेतो इति॥
**अर्थ:** वह जो यह अत्यंत सूक्ष्म तत्व है, वही इस संपूर्ण जगत की आत्मा है, वही सत्य है, वही आत्मा है और हे श्वेतकेतु! वह 'तत्' (ब्रह्म) तुम ही हो।

इस उपदेश से श्वेतकेतु का अहंकार गल गया और उसने जाना कि ज्ञान का अंत किताबों में नहीं, आत्म-साक्षात्कार में है।

📖 संदर्भ: छान्दोग्य उपनिषद (षष्ठ प्रपाठक)

जब अष्टावक्र ऋषि ने राजा जनक को तत्वज्ञान दिया, तो जनक को एक ही क्षण में बोध हो गया कि वे न तो यह दृश्य शरीर हैं और न ही चंचल मन; वे तो केवल द्रष्टा साक्षी हैं। जनक ने सभा में उठकर घोषणा की कि अज्ञान के कारण ही मैं स्वयं को इस संकुचित शरीर की सीमाओं में बांधकर दुःखी हो रहा था।

अहो निरंजनः शान्तो बोधोऽहं प्रकृतेः परः।
एतावन्तमहं कालं मोहेनैव विडम्बितः॥
**अर्थ:** अहो! मैं दोषरहित, शांत, ज्ञानस्वरूप और प्रकृति से सर्वथा परे हूँ। मैं इतने लंबे समय तक केवल मोह के द्वारा ही छला गया था।

अष्टावक्र गीता का यह प्रसंग जीव को तत्काल बंधनमुक्त होने का मार्ग दिखाता है, यदि उसमें सत्य को ग्रहण करने की तीव्र पात्रता हो।

📖 संदर्भ: अष्टावक्र गीता (द्वितीय अध्याय, श्लोक 1)

महान गृहस्थ शौनिक ने विधिपूर्वक महर्षि अंगिरस के पास जाकर विनीत भाव से पूछा, "हे भगवन! इस संसार में ऐसा क्या है जिसके जान लेने पर यह सब कुछ जान लिया जाता है?" महर्षि अंगिरस ने उत्तर दिया कि जानने योग्य दो विद्याएं हैं—अपरा विद्या (वेद, व्याकरण, खगोल, आधुनिक विज्ञान आदि) और परा विद्या (जिसके द्वारा उस अविनाशी परमात्मा को जाना जाता है)।

तत्रापरा ऋग्वेदो यजुर्वेदः सामवेदोऽथर्ववेदः...।
अथ परा यया तदक्षरमधिगम्यते॥
**अर्थ:** उनमें अपरा विद्या ऋग्वेद, यजुर्वेद आदि हैं। और परा विद्या वह है जिसके द्वारा उस 'अक्षर' (अविनाशी तत्व) का अनुभव होता है।

यह कथा आज के समय में विज्ञान और अध्यात्म के संतुलन को समझने के लिए सबसे बड़ी प्रामाणिक मार्गदर्शिका है।

📖 संदर्भ: मुण्डकोपनिषद (प्रथम मुण्डक, प्रथम खण्ड)

परम तपस्वी राजा भरत सब कुछ त्यागकर वन में साधना कर रहे थे। एक दिन नदी में बहते हुए एक नवजात मृग (हिरण) के बच्चे को देखकर उनका हृदय द्रवित हो गया। वे उसकी रक्षा करने लगे। धीरे-धीरे उनकी साधना छूट गई और उनका पूरा मन उस हिरण के बच्चे में लग गया। मृत्यु के अंतिम क्षण में भी वे उसी हिरण के बारे में सोच रहे थे, जिसके कारण उनका अगला जन्म हिरण के रूप में हुआ।

यं यं वापि स्मरन्भावं त्यजत्यन्ते कलेवरम्।
तं तमेवैति कौन्तेय सदा तद्भावभावितः॥
**अर्थ:** हे कुन्तीपुत्र अर्जुन! मनुष्य अंतकाल में जिस-जिस भाव का स्मरण करते हुए शरीर का त्याग करता है, वह निश्चित रूप से उसी भाव को प्राप्त होता है।

यह प्रसंग सचेत करता है कि ध्यान और चेतना की दिशा जीवन के अंतिम क्षण तक कितनी जागृत होनी चाहिए।

📖 संदर्भ: श्रीमद्भगवद्गीता (अष्टम अध्याय, श्लोक 6) / भागवत

राजा जनक की सभा में ब्रह्मविद्या पर शास्त्रार्थ चल रहा था। विदुषी गार्गी ने महर्षि याज्ञवल्क्य से अत्यंत तीखे प्रश्न पूछे कि यह संपूर्ण संसार जल में ओतप्रोत है, तो जल किसमें ओतप्रोत है? इस प्रकार वे ब्रह्मांड के सूक्ष्म तत्वों की परतें खोलती गईं। जब उन्होंने पूछा कि ब्रह्मलोक किसमें ओतप्रोत है, तो याज्ञवल्क्य ने उन्हें रोका कि तर्क की एक सीमा होती है, ईश्वर बुद्धि का नहीं, अनुभव का विषय है।

नैषा तर्केण मतिरापनेया प्रोक्तान्येनैव सुज्ञानाय प्रेष्ठ। **अर्थ:** हे प्रिय नचिकेता! यह आत्मज्ञान कोरी तर्कबुद्धि से प्राप्त करने योग्य नहीं है। यह तो किसी तत्वदर्शी द्वारा उपदिष्ट होने पर ही सम्यक रूप से जाना जाता है।

गार्गी ने इस मर्यादा को समझा और याज्ञवल्क्य की श्रेष्ठता को सहर्ष स्वीकार किया। यह प्रसंग अध्यात्म में बुद्धि के समर्पण को दर्शाता है।

📖 संदर्भ: बृहदारण्यक उपनिषद / कठोपनिषद (1.2.9)

हिरण्यकशिपु ने अपने पुत्र प्रह्लाद को ईश्वर भक्ति छोड़ने के लिए अनेक यातनाएं दीं। अंत में उसने क्रोध में आकर पूछा, "बता तेरा भगवान कहाँ है? क्या वह इस सूखे खंभे में भी है?" प्रह्लाद ने अत्यंत शांत और दृढ़ भाव से कहा, "हाँ पिताजी, मेरे प्रभु घट-घट वासी हैं, वे इस खंभे में भी हैं।" राजा ने जैसे ही खंभे पर प्रहार किया, साक्षात भगवान नृसिंह प्रकट हो गए।

ईशा वास्यमिदं सर्वं यत्किञ्च जगत्यां जगत्।
तेन त्यक्तेन भुञ्जीथा मा गृधः कस्यस्विद्धनम्॥
**अर्थ:** इस गतिशील संसार में जो कुछ भी चराचर जगत है, वह सब ईश्वर से व्याप्त है। इसलिए त्यागपूर्वक इसका भोग करो, किसी के धन का लोभ मत करो।

यह कथा हमें सिखाती है कि श्रद्धा जब प्रामाणिक और अटूट होती है, तो जड़ वस्तु से भी चेतन परमात्मा का प्राकट्य हो जाता है।

📖 संदर्भ: ईशावास्योपनिषद (श्लोक 1) / विष्णु पुराण

छह परम जिज्ञासु ऋषि महर्षि पिप्पलाद के पास समिधा हाथ में लेकर पहुँचे और सृष्टि, प्राण और जीव के दुःखों के मूल संबंध में प्रश्न किए। पिप्पलाद ने उन्हें सीधे उत्तर नहीं दिया। उन्होंने कहा, "तुम लोग एक वर्ष तक ब्रह्मचर्य, श्रद्धा और तपपूर्वक मेरे आश्रम में निवास करो, उसके बाद जो चाहो पूछना।" एक वर्ष बाद जब उन्होंने पूछा, तो पिप्पलाद ने बताया कि प्राण ही ब्रह्मांड की मुख्य ऊर्जा है और वासना ही दुःख का कारण है।

तपसा ब्रह्मचर्येण श्रद्धया च युक्ताः सम्बत्सरं संवत्स्यथ। **अर्थ:** तुम सब तप, ब्रह्मचर्य और श्रद्धा से युक्त होकर एक वर्ष तक यहाँ निवास करो (तभी ज्ञान प्राप्त करने की पात्रता आएगी)।

यह प्रसंग सिद्ध करता है कि ज्ञान कोई सूचना नहीं है जिसे तुरंत परोस दिया जाए, इसके लिए अंतःकरण की शुद्धता अनिवार्य है।

📖 संदर्भ: प्रश्नोपनिषद (प्रथम प्रश्न)

कृतयुग के राजा सत्यव्रत जब नदी में अंजलि दे रहे थे, तो उनके हाथ में एक छोटी सी मछली आ गई। मछली ने कहा, "राजन! मुझे बड़ी मछलियों से बचाइए।" राजा ने उसे अपने कमंडल में रख लिया। वह मछली रात भर में इतनी बड़ी हो गई कि उसे तालाब और अंततः समुद्र में डालना पड़ा। साक्षात भगवान ने मत्स्य रूप में प्रकट होकर राजा को आसन्न प्रलय की सूचना दी और वेदों की रक्षा की।

यदा यदा ही धर्मस्य ग्लानिर्भवति भारत।
अभ्युत्थानमधर्मस्य तदात्मानं सृजाम्यहम्॥
**अर्थ:** हे भारत (अर्जुन)! जब-जब धर्म की हानि और अधर्म का उत्थान होता है, तब-तब मैं अपने साकार रूप को प्रकट करता हूँ।

यह कथा हमें आश्वस्त करती है कि जब भी सृष्टि पर संकट गहराता है, ईश्वरीय चेतना किसी न किसी रूप में संतुलन स्थापित करने अवश्य आती है।

📖 संदर्भ: श्रीमद्भगवद्गीता (चतुर्थ अध्याय) / मत्स्य पुराण

तमसा नदी के तट पर महर्षि वाल्मीकि एक क्रौंच (सारस) पक्षी के जोड़े को देख रहे थे जो प्रेम में मग्न था। अचानक एक व्याध (शिकारी) ने बाण मारकर नर पक्षी का वध कर दिया। मादा पक्षी का विलाप देखकर वाल्मीकि का हृदय करुणा से छटपटा उठा। उनके मुख से अनायास ही एक श्लोक फूट पड़ा, जो लौकिक संस्कृत साहित्य का पहला श्लोक बना। इसी करुणा से रामायण महाकाव्य का जन्म हुआ।

मा निषाद प्रतिष्ठां त्वमगमः शाश्वतीः समाः।
यत्क्रौञ्चमिथुनादेकमवधीः काममोहितम्॥
**अर्थ:** हे शिकारी! तुम्हें शाश्वत काल तक कभी प्रतिष्ठा प्राप्त न हो, क्योंकि तुमने प्रेम में मग्न क्रौंच पक्षी के जोड़े में से एक का बिना किसी अपराध के वध कर दिया।

अध्यात्म सिखाता है कि जब हृदय पराई पीड़ा को देखकर पूरी तरह पिघल जाता है, तभी भीतर से वास्तविक रचना और प्रज्ञा का जन्म होता है।

📖 संदर्भ: वाल्मीकि रामायण (बालकाण्ड)

राजा हरिश्चंद्र ने सपने में अपना सारा राज्य महर्षि विश्वामित्र को दान कर दिया था। जागने पर उन्होंने इसे सत्य माना और राजपाट छोड़ दिया। दान की दक्षिणा चुकाने के लिए उन्होंने स्वयं को, अपनी पत्नी शैव्या और पुत्र रोहित को बेच दिया। श्मशान घाट पर कर वसूलने की नौकरी करते हुए भी, जब उनकी पत्नी अपने मृत पुत्र का शव लेकर आई, तो हरिश्चंद्र ने बिना टैक्स (कर) के अंत्येष्टि करने से मना कर दिया।

चन्द्रस्तरेज्जगत्सर्वं कल्पान्ते सागरोऽपि च।
तथापि हरिश्चन्द्रस्य सत्यवाक्यं न चञ्चलेत्॥
**अर्थ:** कल्प का अंत होने पर चंद्रमा अपनी शीतलता छोड़ सकता है, सागर अपनी मर्यादा लांघ सकता है, किंतु सत्यवादी हरिश्चंद्र का वचन कभी विचलित नहीं हो सकता।

सत्य के प्रति ऐसी अटूट निष्ठा को देखकर स्वयं देवता प्रकट हुए और उनका राज्य व पुत्र उन्हें वापस मिल गए।

📖 संदर्भ: मार्कण्डेय पुराण

महर्षि धौम्य के शिष्य उपमन्यु को गुरु ने गायें चराने का काम सौंपा। गुरु ने उनकी परीक्षा लेने के लिए कहा कि तुम बिना मुझसे पूछे दूध या भिक्षा का अन्न नहीं ग्रहण कर सकते। उपमन्यु ने सब छोड़ दिया। एक दिन अत्यधिक भूख के कारण उन्होंने जंगल में आक के पत्ते खा लिए, जिससे वे अंधे हो गए और एक कुएं में गिर गए। कुएं में गिरकर भी वे गुरु का स्मरण करते रहे।

गुरुर्ब्रह्मा गुरुर्विष्णुः गुरुर्देवो महेश्वरः।
गुरुः साक्षात् परं ब्रह्म तस्मै श्रीगुरवे नमः॥
**अर्थ:** गुरु ही ब्रह्मा हैं, गुरु ही विष्णु हैं और गुरु ही भगवान शिव हैं। गुरु ही साक्षात परब्रह्म हैं, ऐसे श्री गुरु को मैं नमन करता हूँ।

गुरु धौम्य ने वहां आकर उन्हें अश्विनी कुमारों की स्तुति करने को कहा, जिससे उनकी आंखें ठीक हो गईं और उन्हें पूर्ण ज्ञान प्राप्त हुआ।

📖 संदर्भ: महाभारत (आदि पर्व)

जब श्री राम वनवास में थे, तो ऋषि जाबालि उन्हें वापस अयोध्या ले जाने के लिए आए। उन्होंने राम को मनाने के लिए चार्वाक (नास्तिक) दर्शन का सहारा लिया और कहा कि कौन पिता, कौन माता? जीव अकेला आता है, अकेला जाता है। धर्म-कर्म सब ढोंग हैं, आप अयोध्या लौटकर राजसुख भोगिए। राम ने अत्यंत विनम्रतापूर्वक इस भौतिकवादी सोच का खंडन किया और कहा कि राजा का चरित्र ही प्रजा का मार्ग तय करता है।

सत्यमेवानृशंसं च राजवृत्तं सनातनम्।
तस्मात्सत्यात्मकं राज्यं सत्ये लोकः प्रतिष्ठितः॥
**अर्थ:** सत्य और दयालुता ही राजा का शाश्वत कर्तव्य है। इसलिए राज्य सत्य पर ही आधारित होना चाहिए, क्योंकि संपूर्ण संसार सत्य में ही प्रतिष्ठित है।

राम के वचनों को सुनकर जाबालि ने स्वीकार किया कि वे तो केवल राम के मन की दृढ़ता की परीक्षा ले रहे थे।

📖 संदर्भ: वाल्मीकि रामायण (अयोध्याकाण्ड)

राजा यदु ने जब भगवान दत्तात्रेय को वन में अत्यंत आनंदित और प्रफुल्लित मुद्रा में घूमते देखा, तो पूछा, "हे महाभाग! आपकी इस अगाध शांति का रहस्य क्या है? आपका गुरु कौन है?" दत्तात्रेय ने उत्तर दिया कि उन्होंने किसी एक व्यक्ति को नहीं, बल्कि प्रकृति के २४ तत्वों (जैसे पृथ्वी, वायु, आकाश, जल, अग्नि, यहाँ तक कि मकड़ी और मधुमक्खी) को अपना गुरु बनाया है और उनसे गुण सीखे हैं।

सन्ति मे गुरवो राजन् बहवो बुद्ध्युपाश्रिताः।
यतो बुद्धिमुपादाय मुक्तोऽचरामीह तान् शृणु॥
**अर्थ:** हे राजन्! मेरी बुद्धि के आश्रय से मेरे अनेक गुरु हैं, जिनसे शिक्षा ग्रहण करके मैं इस संसार में मुक्त होकर विचरता हूँ, उनके बारे में सुनिए।

यह प्रसंग सिखाता है कि यदि आपके भीतर सीखने की लालसा और प्रामाणिक दृष्टि है, तो पूरी सृष्टि आपकी गुरु बन जाती है।

📖 संदर्भ: श्रीमद्भागवत पुराण (एकादश स्कन्ध, अध्याय 7)

लंका विजय के बाद जब अयोध्या में राज्याभिषेक हुआ, तो माता सीता ने हनुमान जी को एक बहुमूल्य मोतियों की माला भेंट की। हनुमान जी एक-एक मोती को तोड़कर देखने लगे। विभीषण ने पूछा, "अरे वानर! इस अमूल्य माला को क्यों नष्ट कर रहे हो?" हनुमान जी ने कहा, "मैं देख रहा हूँ कि इन मोतियों के भीतर मेरे प्रभु राम और माता सीता का नाम है या नहीं। जिस वस्तु में राम नहीं, वह मेरे लिए मिट्टी के समान है।"

अनन्याश्चिन्तयन्तो मां ये जनाः पर्युपासते।
तेषां नित्याभियुक्तानां योगक्षेमं वहाम्यहम्॥
**अर्थ:** जो अनन्य भक्त केवल मुझ परमात्मा का ही चिंतन करते हुए निष्काम भाव से मेरी उपासना करते हैं, उन निरंतर मुझमें स्थित भक्तों का योगक्षेम (आवश्यकताएं) मैं स्वयं वहन करता हूँ।

हनुमान जी ने अपनी छाती चीरकर साक्षात राम-सीता के दर्शन करा दिए। यह अनन्य और प्रामाणिक समर्पण की पराकाष्ठा है।

📖 संदर्भ: श्रीमद्भगवद्गीता (नवम अध्याय, श्लोक 22)

दरिद्रता से त्रस्त सुदामा जब अपनी पत्नी के कहने पर द्वारकाधीश श्री कृष्ण से मिलने पहुँचे, तो संकोचवश अपनी फटी पोटली में छिपे चार मुट्ठी कच्चे चावल (तंदुल) छिपाने लगे। अंतर्यामी कृष्ण ने उसे छीन लिया और बड़े चाव से खाने लगे। उन्होंने जैसे ही पहली मुट्ठी खाई, सुदामा को एक लोक का वैभव दे दिया। अध्यात्म में प्रभु को धन-दौलत नहीं, भक्त के भाव की प्रामाणिकता चाहिए।

पत्रं पुष्पं फलं तोयं यो मे भक्त्या प्रयच्छति।
तदहं भक्त्युपहृतमश्नामि प्रयतात्मनः॥
**अर्थ:** जो कोई भक्त मेरे लिए प्रेम से एक पत्ता, फूल, फल या जल भी अर्पित करता है, उस शुद्ध बुद्धि निष्काम भक्त के द्वारा प्रेमपूर्वक दिए गए उपहार को मैं प्रकट होकर ग्रहण करता हूँ।

सुदामा ने कुछ मांगा नहीं, लेकिन परमात्मा ने बिना मांगे ही उनका जीवन बदल दिया।

📖 संदर्भ: श्रीमद्भगवद्गीता (नवम अध्याय, श्लोक 26) / भागवत

महाराष्ट्र के संत तुकाराम एक दिन खेत से लौट रहे थे। खेत के मालिक ने उन्हें खाने के लिए कुछ गन्ने दिए। जब वे गांव से गुजर रहे थे, तो बच्चों ने उनसे गन्ने मांग लिए। तुकाराम ने उदारतापूर्वक सारे गन्ने बांट दिए, केवल एक गन्ना बचा। जब वे घर पहुँचे, तो उनकी क्रोधी स्वभाव की पत्नी ने चिल्लाते हुए वह गन्ना उनके पीठ पर दे मारा, जिससे गन्ने के दो टुकड़े हो गए। तुकाराम मुस्कुराए और बोले, "प्रभु की कितनी कृपा है, तुमने गन्ने के दो टुकड़े कर दिए ताकि हम दोनों आराम से एक-एक टुकड़ा खा सकें।"

अक्रोधेन जयेत् क्रोधं असाधुं साधुना जयेत्।
जयेत् कदर्यं दानेन जयेत् सत्येन चानृतम्॥
**अर्थ:** क्रोध को शांति (अक्रोध) से जीतना चाहिए, दुष्ट को साधुता (अच्छाई) से जीतना चाहिए, कंजूस को दान से और असत्य को सत्य से जीतना चाहिए।

संतों की यह समता और क्षमा ही उनकी प्रामाणिक आध्यात्मिक शक्ति की पहचान होती है।

📖 संदर्भ: महाभारत (उद्योग पर्व) / संत चरित्र

एक बार राजा जनक ने महर्षि याज्ञवल्क्य से पूछा, "हे मुनि! इस मनुष्य की वास्तविक ज्योति (प्रकाश) क्या है? वह किसके सहारे देखता और कार्य करता है?" याज्ञवल्क्य ने कहा, "सूर्य की ज्योति से।" जनक ने पूछा, "जब सूर्य डूब जाए तब?" मुनि ने कहा, "चंद्रमा की ज्योति से।" जनक ने फिर पूछा, "जब दोनों डूब जाएं तब?" मुनि ने कहा, "अग्नि से।" अंत में जनक ने पूछा, "जब अग्नि भी शांत हो जाए, तब मनुष्य किस ज्योति के सहारे जीता है?" याज्ञवल्क्य ने उत्तर दिया, "तब वह अपनी 'आत्म-ज्योति' के प्रकाश में ही सब कुछ करता है।"

अस्तमित आदित्ये याज्ञवल्क्य चन्द्रमस्यस्तमिते...
आत्मैवास्य ज्योतिर्भवतीत्यात्मनैवायं ज्योतिषास्ते॥
**अर्थ:** हे याज्ञवल्क्य! सूर्य और चंद्रमा के अस्त होने पर यह पुरुष किस ज्योति वाला होता है? (उत्तर मिला-) आत्मा ही इसकी ज्योति होती है, यह आत्मा रूपी ज्योति के सहारे ही बैठता और कार्य करता है।

यह उपनिषद का सर्वोच्च सत्य है, जो हमें बाहरी संसार से मोड़कर भीतर छिपे अनंत चैतन्य दीप की ओर ले जाता है।

📖 संदर्भ: बृहदारण्यक उपनिषद (चतुर्थ अध्याय, तृतीय ब्राह्मण)

ज्ञानवर्धक कथाए भाग-42

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