ऋग्वेद सूक्त ४५ (मंत्र १-३): चेतना विज्ञान की गुप्त मीमांसा
ऋषि प्रस्कण्व के मंत्रों का आध्यात्मिक, तंत्रिका-वैज्ञानिक और बोधयुक्त विश्लेषण
साधारण भाष्यकार जब वेदों का अध्ययन करते हैं, तो वे इसे केवल बाहरी कर्मकांड, भौतिक अग्नि या इतिहास के चश्मे से देखते हैं। परंतु, ऋग्वेद का सूक्त ४५ किसी साधारण देहधारी की कथा नहीं है। सूक्त ४४ के जीवन-संग्राम से सन्नद्ध होकर जब जीव आगे बढ़ता है, तो यहाँ ऋषि प्रस्कण्व 'परम परिपक्व चेतना' (The Mature Consciousness) और जीवन्मुक्त पुरुष के गूढ़ विज्ञान को प्रकट करते हैं। आइए, इस सूक्त के प्रथम तीन मंत्रों का अक्षर-दर-अक्षर सारगर्भित निचोड़ समझते हैं।
१. प्रथम मंत्र का सार: प्रकृति का मंथन और शाश्वत प्राणाग्नि
"त्वम् अग्ने वसून् इह रुद्रान् आदित्यान् उत... यजा स्वध्वरं जनं मनुजातं घृतप्रुषम् ॥१॥"
इस धरातल पर जो चेतना रूपी जीव (अग्नि) विद्यमान है, वह कोई भौतिक आग नहीं है। वह इस जड़ शरीर रूपी पुर में वास करने वाली 'जठराग्नि' और 'प्राणाग्नि' है।
- वसून्-इह: यह चेतना इस भौतिक देह को गति और जीवन देने वाला जीवित बल है।
- रुद्रान् और आदित्यान्: यह अंतःकरण (मन, बुद्धि, चित्त, अहंकार) को अनुशासित करने वाली रुद्र सत्ता है, जो सूर्य के समान अपने तेज से शरीर की अरबों कोशिकाओं (Cells) को नवजीवन देती है।
- घृत-प्रुषम्: जैसे दूध के भयंकर मंथन से अमृत तुल्य 'घी' निकलता है, वैसे ही यह चेतना संसार के अनुभवों और साधना के मंथन से निकला हुआ शुद्ध आत्म-अमृत है, जो 'सु-अध्वरम्' यानी श्रेष्ठतम कृत्यों को संपादित करता है।
२. द्वितीय मंत्र का सार: तंत्रिका तंत्र (Nervous System) पर चेतना का आधिपत्य
"श्रुष्टीवानो हि दाशुषे देवा अग्ने विचेतसः... तान्रोहिदश्व गिर्वणस्त्रयस्त्रिंशतमा वह ॥२॥"
जब जीव साधारण धरातल से उठकर 'विचेतसः' (विशेष चेतन सामर्थ्य से युक्त) हो जाता है, तब पंचतत्वों (क्षिति, जल, पावक, गगन, समीरा) से निर्मित यह मानव देह और ब्रह्मांड की शक्तियाँ (देवता) उसके अधीन हो जाती हैं।
- तान्रोहिदश्व: 'तान्रो' (तंत्रिका तंत्र का जाल) के माध्यम से 'हिदश्व' (हृदय की गुहा/अनाहत चक्र) में स्थित होकर यह चेतना 'अश्व' की तीव्रता वाले प्राण-वेग को स्वेच्छा से नियंत्रित करती है।
- गिर्वणः: यह चेतना कंठ के शब्दों से नहीं, बल्कि अपनी गुप्त गुहा से उठने वाले अतीन्द्रिय स्पंदनों और नाद से शरीर की सैकड़ों नाड़ियों के अवरोधों को अस्त्र की भाँति भेद देती है।
- त्रयस्त्रिंशतम्: यहाँ 'स्त्री' तत्व (प्रकृति/ऊर्जा रूपी नाड़ियाँ) का स्वामी वह पुरुष रूपी चेतना है, जो इन सब शक्तियों से सर्वथा भिन्न और परे रहकर इनका संचालन (वहन) करती है।
३. तृतीय मंत्र का सार: 'वत्' का सिद्धांत और शब्द-ब्रह्म का साक्षात्कार
"प्रियमेधवदत्रिवज्जातवेदो विरूपवत्... अङ्गिरस्वन्महिव्रत प्रस्कण्वस्य Irish श्रुधी हवम् ॥३॥"
इस मंत्र में बार-बार आने वाला 'वत्' (Like that, but NOT that) शब्द वेदांत के परम सत्य को दिखाता है कि चेतना लौकिक उदाहरणों जैसी प्रतीत होती है, पर वह उनसे सर्वथा भिन्न है।
- प्रियमेध-वत्: यह घना, अंधकारमय प्राकृतिक शरीर (मेघ) चेतना के स्पंदन से युक्त होने के कारण चेतना 'जैसा' लगता है, पर चेतना इससे पृथक है।
- अत्रि-वत् व विरूप-वत्: यह आत्मा त्रिगुणात्मक दुखों से 'त्राण' (मुक्त) है। यह 'विरूप' (अरूप/कुरूप) है; इसका कोई नाम, रूप या गणितीय संस्कार (पहेली) नहीं है। यह केवल कर्म करने का जाग्रत सामर्थ्य है।
- अङ्गिरस्-वत्: यह अंगों के भीतर बहने वाले जैव-विद्युत रस (Bio-electricity) जैसी है, पर उस भौतिक रस से सर्वथा परे है।
- हवम् (प्राण स्वरूप): श्रुति वाणी (मंत्र) प्रस्कण्व से पहले भी ब्रह्मांड में मौजूद थी। उन्होंने अपनी विशुद्ध चेतना से इसका साक्षात्कार किया, जिससे यह सत्य 'हवा' में प्राण स्वरूप होकर शाश्वत रूप से गूँज रहा है।

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