वैदिक धर्म एवं संस्कृति प्रश्नोत्तरी: प्राचीन भारत का इतिहास और सत्य ज्ञान (101 Q&A)

वैदिक प्रश्नोत्तरी

वैदिक धर्म एवं संस्कृति: प्रश्नोत्तरी

उत्तर- हमारे देश का प्राचीन और प्रथम नाम आर्यावर्त्त था।
उत्तर- हम भारतवासियों का प्राचीन नाम आर्य था।
उत्तर- हम भारतीयों का प्राचीनतम धर्म वैदिक धर्म है।
उत्तर- हम वैदिक धर्मियों की धार्मिक पुस्तक वेद है।
उत्तर- चार - ऋग्वेद, यजुर्वेद, सामवेद, अथर्ववेद।
उत्तर- वेद १,९६,०८,५३,१०८ वर्ष पुराने हैं।
Ž पुस्तक के संस्करण के वर्ष के अनुसार इस समय में बदलाव आपेक्षित है।
उत्तर- चारों वेदों में २०३७९ मन्त्र है। ऋग्वेद में १०५५२, यजुर्वेद में १९७५, सामवेद में १८७५ और अथर्ववेद में ५९७७ मन्त्र हैं।
उत्तर- वेद की भाषा वैदिक संस्कृत है।
उत्तर- वेदों में मनुष्यों के लिए आवश्यक समस्त ज्ञान-विज्ञान है। संक्षेप में वेदों का विषय ईश्वर, जीव, प्रकृति का विज्ञान अथवा ज्ञान-कर्म-उपासना है।
उत्तर- वेदों का ज्ञान ईश्वर ने सृष्टि के आदि में चार ऋषियों को प्रदान किया। जिनका नाम अग्नि, वायु, आदित्य और अंगिरा था।
उत्तर- अनादि वस्तुएँ तीन हैं - ईश्वर, जीव और प्रकृति।
उत्तर- ऐसी संभावना है कि सृष्टि के प्रारंभ में कुछ काल के बाद वेद पुस्तक रूप में बने।
उत्तर- जिस वस्तु की उत्पत्ति न हो, उसे अनादि कहते हैं।
उत्तर- ईश्वर के मुख्य कर्म ५ हैं - १ संसार को बनाना, २ संसार का पालन करना, ३ संसार का विनाश करना, ४ वेदों का ज्ञान देना और ५ अच्छे-बुरे कर्मों का फल देना।
उत्तर- ईश्वर का मनुष्यों के साथ पिता-पुत्र, माता-पुत्र, गुरु-शिष्य, राजा—प्रजा, साध्य-साधक, उपास्य-उपासक, व्याप्य-व्यापक आदि अनेक सम्बन्ध हैं।
उत्तर- वेदों में ईश्वर को सर्वव्यापक, सर्वज्ञ, निराकार, न्यायकारी, कर्मफलदाता आदि गुणों वाला बताया गया है।
उत्तर- संसार १,९६,०८,५३,१०८ वर्ष पूर्व बना।
Ž पुस्तक के लिखे जाने के वर्ष के अनुसार इस समय में बदलाव आपेक्षित है।
उत्तर- यह संसार २,३५,९९,४६,८९२ वर्ष तक और चलेगा।
Ž पुस्तक के लिखे जाने के वर्ष के अनुसार इस समय में बदलाव आपेक्षित है।
उत्तर- रामायण का काल लगभग १० लाख वर्ष पुराना है।
उत्तर- महाभारत का काल लगभग ५२०0 वर्ष पुराना है।
Ž पुस्तक के लिखे जाने के वर्ष के अनुसार इस समय में बदलाव आपेक्षित है।
उत्तर- पारसी मत लगभग ४,५०० वर्ष पुराना है।
Ž पुस्तक के लिखे जाने के वर्ष के अनुसार इस समय में बदलाव आपेक्षित है।
उत्तर- यहूदी मत लगभग ४००० वर्ष पुराना है।
Ž पुस्तक के लिखे जाने के वर्ष के अनुसार इस समय में बदलाव आपेक्षित है।
उत्तर- जैनबौद्ध मत का काल लगभग २५०० वर्ष पुराना है।
Ž पुस्तक के लिखे जाने के वर्ष के अनुसार इस समय में बदलाव आपेक्षित है।
उत्तर- शंकराचार्य का काल लगभग २३०० वर्ष पुराना है।
Ž पुस्तक के लिखे जाने के वर्ष के अनुसार इस समय में बदलाव आपेक्षित है।
उत्तर- हिन्दु-पुराण मत का काल लगभग २२०० वर्ष पुराना है।
Ž पुस्तक के लिखे जाने के वर्ष के अनुसार इस समय में बदलाव आपेक्षित है।
उत्तर- ईसाई मत लगभग २००० वर्ष पुराना है।
Ž पुस्तक के लिखे जाने के वर्ष के अनुसार इस समय में बदलाव आपेक्षित है।
उत्तर- इस्लाम मत लगभग १४०० वर्ष पुराना है।
Ž पुस्तक के लिखे जाने के वर्ष के अनुसार इस समय में बदलाव आपेक्षित है।
उत्तर- सिक्ख मत लगभग ५०० वर्ष पुराना है।
Ž पुस्तक के लिखे जाने के वर्ष के अनुसार इस समय में बदलाव आपेक्षित है।
उत्तर- देश में सैंकड़ों की संख्या में प्रचलित वर्तमान सम्प्रदाय १००-१५० वर्ष पूर्व के आसपास के काल के ही हैं।
Ž पुस्तक के लिखे जाने के वर्ष के अनुसार इस समय में बदलाव आपेक्षित है।
उत्तर- ईश्वर को मूर्ति रूप में बनाकर पूजना लगभग २५०० वर्ष पूर्व से आरम्भ हुआ। इससे पूर्व लोग निराकर ईश्वर की ही उपासना करते थे।
Ž पुस्तक के लिखे जाने के वर्ष के अनुसार इस समय में बदलाव आपेक्षित है।
उत्तर- धैर्य रखना, क्षमा करना, मन पर नियन्त्रण, चोरी न करना, पवित्रता, इन्द्रिय निग्रह, बुद्धि बढ़ाना, ज्ञान-विज्ञान प्राप्त करना, सत्य बोलना, क्रोध न करना।
उत्तर- पृथ्वी पर सबसे पूर्व मनुष्य तिब्बत में उत्पन्न हुए।
उत्तर- उत्तम गुण-कर्म-स्वभाव वाले मनुष्य का नाम आर्य होता है।
उत्तर- आर्य लोग भारतवर्ष में बाहर से नहीं आये थे।
उत्तर- इतिहास में गलत पढ़ाया जा रहा है, आर्य लोग भारत के ही मूलनिवासी थे।
उत्तर- सम्पूर्ण पृथ्वी के राजा को चक्रवर्ती सम्राट कहते हैं।
उत्तर- सृष्टि के प्रारम्भ से लेकर महाभारत पर्यन्त इस पृथ्वी पर चक्रवर्ती राजा ही होते रहे हैं।
उत्तर- युधिष्ठिर भारतवर्ष के अन्तिम चक्रवर्ती राजा थे।
उत्तर- पृथ्वी पर वैदिक साम्राज्य सृष्टि के प्रारम्भ से लेकर महाभारत काल पर्यन्त अर्थात् लगभग १,९६,०८,४८,००० वर्ष तक रहा।
उत्तर- वैदिक काल में विश्व के लोग केवल एक निराकार ईश्वर को मानते थे।
उत्तर- वैदिक साम्राज्य के काल में विश्व शासन की भाषा संस्कृत थी।
उत्तर- वैदिक काल में शिक्षा प्रणाली गुरुकुलीय थी।
उत्तर- वैदिक धर्म में व्यक्तिगत जीवन को चार भागों में बाँटा गया है। जिन्हें चार आश्रम कहते हैं।
उत्तर- चार आश्रमों के नाम निम्न हैं - ब्रह्मचर्य आश्रम, गृहस्थ आश्रम, वानप्रस्थ आश्रम और सन्यास आश्रम।
उत्तर- वैदिक धर्म में कर्म के आधार पर मानव समाज को चार भागों में बाँटा गया है जिन्हें चार वर्ण कहते हैं। जिनके नाम हैं - ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य और शूद्र।
उत्तर- वैदिक धर्म में ईश्वर का अवतार लेना नहीं बताया गया है। क्योंकि सर्वव्यापक, निराकार ईश्वर का अवतार लेना संभव नहीं है।
उत्तर- वैदिक-धर्मी के लिए पंचमहायज्ञ करने अनिवार्य है।
उत्तर- पंचमहायज्ञों के नाम हैं – ब्रह्मयज्ञ (ईश्वर का ध्यान करना, वेद को पढ़ना), देवयज्ञ (हवन करना), पितृ–यज्ञ (माता-पिता, बड़े व्यक्तियों की सेवा करना), अतिथियज्ञ (विद्वान, सन्यासी, समाजसेवी व्यक्तियों का सत्कार करना), बलिवैश्वदेवयज्ञ (पशु-पक्षी आदि की सेवा करना)।
उत्तर- वैदिक धर्म में जीवन को श्रेष्ठ बनाने के लिए १६ संस्कारों का करना अनिवार्य बतलाया गया है।
उत्तर- १६ संस्कारों के नाम निम्न हैं - गर्भाधान, पुंसवन, सीमन्तोन्नयन, जातकर्म, नामकरण, अन्नप्राशन, निष्क्रमणम्, चूड़ाकर्म, कर्णवेध, उपनयन, वेदारम्भ, समावर्तन, विवाह, वानप्रस्थ, सन्यास और अन्त्येष्टि।
उत्तर- वैदिक धर्मियों का अभिवादन शब्द ‘नमस्ते’ है।
उत्तर- वैदिक धर्म में त्रुटि, भूल, दोष, पाप के लिए ईश्वर की ओर से क्षма का विधान नहीं है।
उत्तर- शास्त्र ६ हैं और उनके नाम निम्न हैं - योगदर्शन, सांख्यदर्शन, वैशेषिकदर्शन, न्यायदर्शन, वेदान्तदर्शन, और मीमांसादर्शन।
उत्तर- वेदों के अंग ६ हैं और उनके नाम निम्न हैं - शिक्षा, कल्प, व्याकरण, निरुक्त, छन्द और ज्योतिष।
उत्तर- वेदों के आधार पर ऋषियों द्वारा बनाया गया सामाजिक विधि-विधान तथा आचार संहिता का प्रसिद्ध, प्राचीन और महत्त्वपूर्ण धार्मिक ग्रन्थ ‘मनुस्मृति’ है।
उत्तर- वैदिक धर्म में छुआछूत, जातिभेद, जादूटोना, डोराधागा, ताबीज, शकुन, फलित-ज्योतिष, जन्मकुण्डली, हस्तरेखा, नवग्रह पूजा, नदी स्नान, बलिप्रथा, सतीप्रथा, मांसाहार, मद्यपान, बहुविवाह, भूत-प्रेत, मृतकों के नाम पिण्डदान, भविष्यवाणी आदि का विधान नहीं है।
उत्तर- वैदिक धर्म में मनुष्य जीवन का अंतिम लक्ष्य/ उद्देश्य/प्रयोजन समस्त दुःखों से छूटना और पूर्ण आन्नद को प्राप्त करना बताया गया है।
उत्तर- आध्यात्मिक अज्ञान के नष्ट हो जाने पर सभी दुखों से छूटना संभव है।
उत्तर- आध्यात्मिक अज्ञान ईश्वर द्वारा आध्यात्मिक शु़द्ध ज्ञान देने पर नष्ट होता है।
उत्तर- ईश्वर आध्यात्मिक शुद्ध ज्ञान मन की समाधि अवस्था में देता है।
उत्तर- समाधि की अवस्था अष्टांग योग की विधि से मन, इन्द्रियों पर पूर्ण नियन्त्रण करने पर प्राप्त होती है।
उत्तर- मन, इन्द्रियों पर पूर्ण नियन्त्रण आत्मा का साक्षात्कार करने पर होता है।
उत्तर- आत्मा का साक्षात्कार आत्मा से सम्बन्धित विज्ञान को पढ़कर, विचारकर, निर्णय लेकर, दृढ़ निश्चय करके तपस्या और पुरुषार्थ पूर्वक कार्यों के करने से होता है।
उत्तर- ईश्वर का ध्यान करने से मन पर अधिकार होता है, इन्द्रियों पर नियन्त्रण होता है, एकाग्रता बढ़ती है, स्मृतिशक्ति तेज होती है, बुद्धि सही और शीघ्र निर्णय लेने वाली बनती है, बुरे संस्कार नष्ट होते हैं, अच्छे संस्कार उभरते हैं, आत्मिक बल बढ़ता है, धैर्य, सहनशक्ति, क्षमा, दया, निष्कामता की वृद्धि होती है और विशेष आनन्द, शान्ति, निर्भीकता की प्राप्ति होती है।
उत्तर- मनुष्य राग, द्वेष और मोह अर्थात् अज्ञान के कारण duxi होता हैं।
उत्तर- वैराग्य का अर्थ है राग-द्वेष से रहित, एषणाओं से रहित, लौकिक सुख लेने की इच्छा से रहित होकर निष्काम भावना से कर्तव्य कर्मों को करना।
उत्तर- आध्यात्मिकता शब्द का अर्थ है आत्मा, परमात्मा, मन, बुद्धि, मोक्ष, बन्ध, पुनर्जन्म, कर्म और उनका फल, संस्कार, समाधि इत्यादि विषयों का ज्ञान-विज्ञान प्राप्त करना और तदनुसार आचरण करना।
उत्तर- मनुष्य के मन में अशान्ति, भय, चिन्ता पाप कर्म करने से उत्पन्न होते है।
उत्तर- अधर्माचरण को पाप कहते हैं।
उत्तर- ईश्वर की आज्ञाओं, शास्त्रों के विधि-विधानों, महापुरुषों के निर्देषों तथा अपनी पवित्र आत्मा में उत्पन्न होने वाले विचारों के विपरीत व्यवहार करने का नाम अधर्माचरण है।
उत्तर- धर्म की सामान्य परिभाषा यह है कि जो व्यवहार अपने को अच्छा लगे वह दूसरों के प्रति करें और जो व्यवहार अपने को अच्छा न लगे वह दूसरों के प्रति न करें ।
उत्तर- जो मनुष्य शरीर, मन, इन्द्रियों से जितने भी अच्छे-बुरे कर्म करता है, उसे उन सबका फल सुख-दुख के रूप में अवश्य ही मिलता है।
उत्तर- वेदों के अनुसार बुरे कर्मों के फल किसी प्रकार से भी माफ नहीं हो सकते हैं।
उत्तर- दान-पुण्य, जप-तप, सेवा-परोपकार आदि का अलग से अच्छा फल मिलता है, इससे बुरे कर्मों के फल न कम होते हैं, न माफ होते हैं।
उत्तर- ईश्वर की उपासना करने से बुद्धि पवित्र होती है और आनन्द की प्राप्ति होती है, आत्मिक बल मिलता है, मन में उत्तम विचार उत्पन्न होते हैं, परिणामस्वरूप मनुष्य भविष्य में बुरे कर्म नहीं करता है अथवा कम करता है।
उत्तर- हमारा भविष्य निश्चित नहीं है और इसको कोई भी जानकर बता नहीं सकता है।
उत्तर- हाँ, ज्योतिषी लोगों का भविष्य की बातों का बताना सत्य नहीं है ।
उत्तर- किसी भी परिस्थिति में झूठ बोलना न लाभकारी है और न उचित होता है।
उत्तर- ईश्वर अपनी इच्छा से किसी मनुष्य को बिना कर्म किए सुख-दुख रुपी फल नहीं देता है।
उत्तर- जी हाँ, अज्ञान व मिथ्याज्ञान के कारण किए गए बुरे कर्मों का फल भी अवश्य मिलता है। हमारा कर्तव्य है कि अज्ञान को दूर करें।
उत्तर- किसी कार्य के करने से पहले, करते समय और करने के बाद मन में आनन्द, उत्साह, प्रसन्नता, शान्ति, सन्तोष उत्पन्न होता हो, साथ ही जिससे व्यक्तिगत, पारिवारिक, सामाजिक और राष्ट्र की किसी प्रकार की हानि न हो, ऐसे कार्य को अच्छा मानना चाहिए।
उत्तर- किसी कार्य के करने से पहले, करते समय और करने के बाद मन में भय, शंका, लज्जा उत्पन्न होती हो, साथ ही जिससे व्यक्तिगत, पारिवारिक, सामाजिक और राष्ट्र की कोई हानि होती हो, ऐसे कार्य को बुरा मानना चाहिए।
उत्तर- मन के ऊपर नियन्त्रण आध्यात्मिक शुद्ध ज्ञान का प्रयोग करने से होता है।
उत्तर- यह विचार करके कि मैं एक चेतन तत्त्व हूँ और मन, इन्द्रियाँ और शरीर का स्वामी हूँ, शरीर, मन, इन्द्रियाँ जड़ हैं, मेरी इच्छा और प्रयत्न के बिना शरीर, मन, इन्द्रियाँ अपने आप कोई भी काम नहीं कर सकते हैं। मैं अपनी इच्छा से जिस काम को करना चाहूँगा, वह करूँगा, जिस काम को नहीं करना चाहूँगा, वह नहीं करूँगा। मैं जिस विचार को उठाना चाहूँगा, वह उठाऊँगा और जिस विचार को उठाना नहीं चाहूँगा, वह नहीं उठाऊँगा। ऐसा दृढ़ निश्चय करके मन, वाणी ओर शरीर से सावधानी और सतर्कता पूर्वक व्यवहार करने से आध्यात्मिक शुद्ध ज्ञान बढ़ता रहता है।
उत्तर- कार्यों में सफलता के निम्न उपाय हैं - १ कार्य को करने की मन में तीव्र इच्छा २ कार्य को पूरा करने के लिए पर्याप्त साधनों का संग्रह ३ कार्य को सरलता से, शीघ्रता से और सुन्दर रूप में करने की यथार्थ विधि को जानना ४ कार्य के पूरा होने तक पूर्ण पुरुषार्थ करते रहना ५ कार्य करते हुए मार्ग में आने वाले बाधा, कष्ट, अभाव, विरोध, प्रतिकूलताओं आदि को प्रसन्नता पूर्वक सहन करना, हताश-निराश, खिन्न न होना ६ ईश्वर से कार्य की सफलता के लिए ज्ञान, बल, साहस, उत्साह, पराक्रम आदि की प्राप्ति के लिए प्रार्थना करना।
उत्तर- किसी पुस्तक के ईश्वरीय होने में निम्न प्रमाण हैं - १ जो सृष्टि के आदि में बनी हो २ जिसमें विज्ञान विरुद्ध बातें न हों ३ जिसमें मनुष्यों का इतिहास न हो ४ जिसमें परस्पर विरोध न हो ५ जिसमें अन्धविश्वास, पाखण्ड, अज्ञानयुक्त, अप्रमाणिक बातों का वर्णन न हों ६ जिसमें मनुष्य के सर्वोत्कृष्ट उन्नति हेतु सब प्रकार के विषयों का वर्णन किया गया हो ७ जिसमें सृष्टि के प्रत्यक्ष नियमों के विरुद्ध सिद्धान्तों का वर्णन न हो ८ जिस प्रकार के गुण-कर्म-स्वभाव वाला ईश्वर है अथवा उसको होना चाहिए वैसे ही गुणों का वर्णन पुस्तक में किया हो ९ जिसमें पक्षपात रहित समान रूप से सब मनुष्यों के लिए विधि-विधान, नियम-अनुशासन का विधान किया गया हो १० जो किसी देश-विदेश के मनुष्यों, जाति, मत, पंथ, सम्प्रदाय के लिए न होकर सार्वजनिक, सार्वभौमिक, सार्वकालिक हो ११ जो किसी मनुष्यकृत भाषा में न हो।
उत्तर- जिस मनुष्य के जीवन में सुख, शान्ति, सन्तोष, तृप्ति, निर्भीकता, स्वतन्त्रता नहीं होती है, वह जीवन असफल होता है, चाहे उसके पास में कितना ही धन, सम्पत्ति, रूप, बल, विद्या, प्रतिष्ठा, सम्मान, यश, कीर्ति क्यों न हो।
उत्तर- जिस मनुष्य के जीवन में सुख, शान्ति, सन्तोष, तृप्ति, निर्भीकता, स्वतन्त्रता होती है, वह जीवन सफल होता है, चाहे उसके पास में धन, सम्पत्ति, रूप, बल, विद्या, प्रतिष्ठा, सम्मान, यश, कीर्ति थोड़ी क्यों न हो या न भी क्यों न हो।
उत्तर- यज्ञ शब्द का अर्थ है दान, त्याग, श्रेष्ठ कार्यों को पूर्ण पुरुषार्थ के साथ निष्काम भावना से करना। अग्निहोत्र भी यज्ञ शब्द से ग्रहण होता है ।
उत्तर- निम्न प्रकार का जीवन चलाने से मनुष्य को अधिकतम सुख की प्राप्ति हो सकती है - आदर्श दिनचर्या, शीघ्र जागरण, भ्रमण, व्यायाम, स्नान, यज्ञ, ईश्वर का ध्यान, उत्तम पुस्तकों का स्वाध्याय, सत्य का पालन, राग-द्वेष रहित व्यवहार, दूसरों के धन और अधिकारों को ग्रहण न करने की इच्छा, परोपकार, समाज-राष्ट्र की उन्नति हेतु संगठन, त्याग, सेवा, बलिदान की भावना, मन में उत्तम कार्यों को करने और बुरे कार्यों को न करने का दृढ़ संकल्प, सात्विक भोजन, मधुर व्यवहार, आत्मनिरीक्षण, महापुरुषों, विद्वानों का सत्संग, संयम, त्याग, तपस्या आदि गुण-कर्म-स्वभाव को धारण करने से जीवन में अधिकतम सुख की प्राप्ति हो सकती है।
उत्तर- राष्ट्र/विश्व की उन्नति के वैदिक उपाय निम्न हैं - सम्पूर्ण विश्व के लोग जब एक ईश्वर को मानेंगे, उनकी भाषा एक होगी, धर्म एक होगा, संविधान एक होगा, शिक्षा एक होगी, आचार-विचार एक होंगे, न्याय और राजनीति एक प्रकार की होगी, हानि और लाभ एक समान होगा, तभी सम्पूर्ण राष्ट्र और विश्व की उन्नति हो सकती है।
उत्तर- सम्पूर्ण राष्ट्र और विश्व में एकता तभी स्थापित हो सकती है जब १ सभी मनुष्यों का लक्ष्य एक हो २ उस लक्ष्य को प्राप्त करने का मार्ग एक हो ३ उस लक्ष्य को प्राप्त करने के साधन एक हों तथा ४ उस मार्ग पर चलने की विधि/सिद्धान्त एक हों। और इसका उपाय ईश्वरीय ज्ञान केवल वेद ही है।
उत्तर- जीवन को शीघ्रता से और सरलता से बिना भौतिक साधनों के उन्नत करने का आध्यात्मिक उपाय है आत्मनिरीक्षण। रात्रि के समय में सोने से पूर्व अथवा कभी भी मनुष्य को चाहिए कि शान्त, एकान्त स्थान में बैठकर एकाग्रता से अपने जीवन के क्रिया व्यवहारों का सूक्ष्मता से परीक्षण करे और यह जानने का प्रयास करे कि मेरे जीवन में क्या बुराईयाँ हैं... दोषों को भविष्य में पुनः नहीं होने दूँगा। साथ ही दिनभर व्यवहार करते समय मन, वाणी और शरीर से सतर्क और सावधान रहें। ईश्वर से भी प्रतिदिन जीवन को उन्नत बनाने में आत्मिक बल, ज्ञान-विज्ञान, धैर्य, सहिष्णुता आदि गुणों की प्राप्ति हेतु प्रार्थना करता रहें।
उत्तर- पुनर्जन्म होता है इसमें निम्न प्रमाण है - १ जन्मते ही मनुष्य-पशु आदि के बच्चे दूध पीते हैं। २ चार-छः मास का शिशु माँ की गोद में आँखें बंद किए हुए अथवा सोते हुए का कभी प्रसन्न होना, कभी भयभीत होना। ३ संसार में ऊँची-नीची योनियाँ ४ बाल्यावस्था में बौद्धिक स्तर का भेद देखकर यह अनुमान होता है कि जीवात्मा का पुनः जन्म होता है।
उत्तर- समाज में चार प्रकार के व्यक्ति होते हैं - उनके साथ चार प्रकार का व्यवहार करना चाहिए। १ जो व्यक्ति धनादि के द्वारा सुखी और समृद्ध है उनके साथ मित्रता रखनी चाहिए। २ जो व्यक्ति धनादि से रहित, निर्धन, दुखी हैं उनके ऊपर दया करके उनका यथाशक्ति सहयोग करना चाहिए। ३ जो व्यक्ति त्यागी, तपस्वी, सेवाभावी हैं उनको देखकरके मन में प्रसन्न होना चाहिए और उनका आदर-सत्कार करना चाहिए। ४ जो व्यक्ति दुष्ट है उनके साथ उपेक्षा करनी चाहिए। अर्थात् न उनसे बैर रखें न प्रेम करें।
उत्तर- तत्काल - थोड़े से काल में ही नया जन्म ले लेता है।
उत्तर- मरने के बाद आधे से अधिक बुरे कर्म हो तो पशु-पक्षी कीट पतंग आदि का जन्म मिलता है।
उत्तर- मनुष्य की आयु निश्चित नहीं है। आयु को घटाया-बढ़ाया जा सकता है।
उत्तर- आयु को बढ़ाने के निम्न उपाय हैं - सात्त्विक भोजन, नियमित दिनचर्या, ब्रह्मचर्य का पालन, पूर्ण निद्रा, व्यायाम, अच्छी पुस्तकों को पढ़ना, सत्संग, विद्वान और श्रेष्ठ मनुष्यों के साथ मित्रता, ईश्वर पर श्रद्धा और विश्वास, सतर्कता, सावधानी, शान्ति, प्रसन्नता, धैर्य, दया, क्षमा आदि का प्रयोग।
उत्तर- तामसिक भोजन, अनियमित दिनचर्या, असंयम, व्यभिचार, अधिक जागना, स्वाध्याय-सत्संग न करना, बुरे व्यक्तियों के साथ मित्रता, नास्तिकता, असावधानी, क्रूरता, अशान्ति, चिन्ता, शोक, भय, रोग आदि से मनुष्य की शारीरिक व मानसिक शक्तियाँ कम हो जाती हैं और वह अल्पआयु में-अकाल मृत्यु को प्राप्त हो जाता है।
उत्तर- मनुष्य को अपनी व्यक्तिगत और पारिवारिक उन्नति के साथ-साथ समाज और राष्ट्र के लोगों में विद्यमान अज्ञान, अन्याय और अभाव को दूर करने का तन-मन-धन से पूर्ण प्रयास करते रहना चाहिए, क्योंकि समाज-राष्ट्र के सभी व्यक्तियों के उन्नत हुए बिना कोई भी व्यक्ति या परिवार पूर्णरुपेण सुख, शान्ति, सुरक्षा निश्चिन्तता, निर्भीकता आदि को प्राप्त नहीं कर सकता।

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