प्रकरण ५० महाभारत आदिपर्व मनोवैज्ञानिक विष्लेशण
मनोज पाण्डेय
गुप्त सुरंग:
जब चेतना ने मृत्यु के भीतर से जीवन का मार्ग खोज लिया
लाक्षागृह में प्रवेश करने के बाद पाण्डवों के सामने
सबसे बड़ी समस्या यह नहीं थी कि उन्हें शत्रु का पता चल गया था। समस्या यह थी कि
शत्रु को अभी यह पता नहीं चलना चाहिए था कि पाण्डवों को शत्रु की योजना का पता चल
चुका है। यही वह सूक्ष्म अंतर है जहाँ सामान्य भय और जाग्रत चेतना के बीच अंतर
दिखाई देता है। यदि कोई व्यक्ति जान ले कि उसके विरुद्ध षड्यंत्र हो रहा है, तो स्वाभाविक रूप
से उसका मन तुरंत प्रतिक्रिया करना चाहता है—स्थान छोड़ दो,
विरोध करो, शत्रु को पकड़ो या किसी सुरक्षित
स्थान पर भाग जाओ। लेकिन युधिष्ठिर ने परिस्थिति को केवल तत्काल संकट के रूप में
नहीं देखा। उन्होंने यह समझ लिया कि उनके पास हस्तिनापुर जैसी राजनीतिक शक्ति नहीं
है, उनके पास स्वतंत्र सेना नहीं है, उनके
पास पर्याप्त धन नहीं है और उनके शत्रु के पास राजसत्ता, सहयोगी
और गुप्तचर सब हैं। इसलिए यदि वे केवल भय की प्रतिक्रिया में लाक्षागृह से निकल
जाते, तो सम्भव था कि अगला संकट रास्ते में उनका इंतजार कर
रहा हो। महाभारत में युधिष्ठिर स्वयं इसी कारण कहते हैं कि यदि पुरोचन को यह पता
चल गया कि पाण्डव उसकी योजना समझ चुके हैं, तो वह बिना
विलम्ब आग लगा सकता है; और यदि वे भय के कारण खुले रूप से
भागते हैं, तो दुर्योधन अपने गुप्तचरों द्वारा उनका पीछा
करवा सकता है।
यही कारण था कि पाण्डवों ने बाहर से अपने व्यवहार में
कोई परिवर्तन नहीं आने दिया। वे पुरोचन के साथ ऐसे ही रहने लगे जैसे उन्हें उसकी
किसी बात पर संदेह न हो। वे उसके साथ भोजन करते, उसके द्वारा उपलब्ध कराई गई सुविधाओं
का उपयोग करते और भवन में रहने से असंतोष प्रकट नहीं करते। लेकिन यह विश्वास
वास्तविक विश्वास नहीं था। यह रणनीतिक विश्वास का अभिनय था। महाभारत इस
स्थिति को अत्यन्त स्पष्ट शब्दों में रखता है कि पाण्डव पुरोचन को विश्वास और
प्रसन्नता का प्रदर्शन करके भ्रमित करते रहे, जबकि भीतर से
वे उस पर बिल्कुल विश्वास नहीं करते थे। मूल कथा में उनके इस व्यवहार का वर्णन
करते हुए कहा गया है कि वे बाहर से प्रसन्न और विश्वासपूर्ण दिखाई देते थे,
पर भीतर से पूरी तरह सावधान थे।
यहाँ मनुष्य के व्यवहार का एक गहरा रहस्य सामने आता
है। हम सामान्यतः मान लेते हैं कि सत्यनिष्ठ व्यक्ति हमेशा अपने मन की सारी बातें
सामने रख देता है। लेकिन जीवन की हर परिस्थिति ऐसी नहीं होती। जब सामने वाला
व्यक्ति आपकी स्वतंत्रता, सुरक्षा या जीवन के विरुद्ध षड्यंत्र कर रहा हो, तब
अपने मन की पूरी स्थिति उसके सामने प्रकट कर देना विवेक नहीं होता। सत्य और
सरलता महत्वपूर्ण हैं, लेकिन विवेकहीन सरलता स्वयं को
शत्रु के हाथों सौंप सकती है। पाण्डवों का मौन झूठ के
लिए नहीं था; वह जीवन की रक्षा के लिए था। उन्होंने पुरोचन
को धोखा इसलिए नहीं दिया कि उन्हें किसी अन्यायपूर्ण लाभ की इच्छा थी, बल्कि इसलिए कि पुरोचन स्वयं उन्हें धोखे से मृत्यु तक पहुँचाने के लिए
वहाँ उपस्थित था।
युधिष्ठिर ने इस परिस्थिति में एक और महत्वपूर्ण
निर्णय लिया। उन्होंने केवल भवन से बाहर निकलने की योजना नहीं बनाई, बल्कि भवन के भीतर
से निकलने वाला गुप्त मार्ग बनाने का निर्णय लिया। यह विचार साधारण नहीं था।
लाक्षागृह इस प्रकार बनाया गया था कि आग लगने पर भीतर रहने वाले लोग बाहर निकल न
सकें। उसके आसपास ऐसी व्यवस्था थी कि अचानक भागना कठिन हो। इसलिए बाहर निकलने का
मार्ग बाहर से नहीं, भीतर से बनाना आवश्यक था। यही वह क्षण
है जहाँ महाभारत की कथा एक अत्यन्त गहरी प्रतीकात्मक संरचना ग्रहण करती है—मृत्यु से बचने का मार्ग उसी स्थान के भीतर बनाया जा रहा था जिसे मृत्यु
का घर बनाया गया था।
विदुर ने पहले ही इस संभावना को समझ लिया था। वे
स्वयं पाण्डवों के साथ वारणावत नहीं रह सकते थे, क्योंकि ऐसा करने पर षड्यंत्रकारियों
को संदेह हो जाता। इसलिए उन्होंने अपने एक अत्यन्त विश्वसनीय व्यक्ति को भेजा जो
भूमिगत मार्ग बनाने की कला जानता था। महाभारत उसे खनक अर्थात् भूमि खोदने
में निपुण व्यक्ति के रूप में प्रस्तुत करता है। वह गुप्त रूप से पाण्डवों के पास
पहुँचा और उसने विदुर की ओर से अपनी पहचान प्रमाणित करने के लिए वही संकेत दिए जो
पहले विदुर ने युधिष्ठिर को दिए थे। उसने स्पष्ट किया कि वह विदुर का भेजा हुआ
व्यक्ति है और यह भी बताया कि विदुर ने उसे पाण्डवों की रक्षा के लिए भेजा है।
यह प्रसंग विश्वास की मनोवैज्ञानिक संरचना को समझने
के लिए अत्यन्त महत्वपूर्ण है। संकट के समय केवल किसी व्यक्ति का नाम लेना
पर्याप्त नहीं होता। यह प्रमाण देना पड़ता है कि वह वास्तव में वही व्यक्ति है
जिसका वह दावा कर रहा है। विदुर ने पहले युधिष्ठिर से गुप्त संकेतों में बात की थी; अब वही संकेत उस
व्यक्ति की पहचान का प्रमाण बन गए। युधिष्ठिर ने जब उसके मुँह से वही गुप्त बातें
सुनीं, तब उन्हें विश्वास हुआ कि वह वास्तव में विदुर का
विश्वस्त व्यक्ति है। इस प्रकार एक सूचना दूसरी सूचना की पुष्टि बनती है। यह केवल
कथा का कौशल नहीं, बल्कि मानवीय विश्वास की गहरी प्रक्रिया
है। मनुष्य किसी अजनबी पर केवल इसलिए विश्वास नहीं करता कि वह स्वयं को विश्वसनीय
बताता है। विश्वास तब बनता है जब उसके पास ऐसी जानकारी होती है जिसे केवल वास्तविक
संबंध वाला व्यक्ति ही जान सकता है।
खनक ने पाण्डवों से कहा कि पुरोचन कृष्ण पक्ष की
चतुर्दशी की रात भवन में आग लगाने वाला है और उसका उद्देश्य पाण्डवों तथा कुन्ती
को जला देना है। वह केवल सामान्य चेतावनी लेकर नहीं आया था; उसके पास कार्य
करने की योजना भी थी। उसने कहा कि वह भूमि के भीतर एक बड़ा मार्ग बनाएगा जिससे आग
लगने पर पाण्डव बाहर निकल सकें।
युधिष्ठिर ने उसे स्वीकार किया और उससे कहा कि वह इस
कार्य को पुरोचन की जानकारी के बिना पूरा करे। अब एक ओर ऊपर की दुनिया चल रही थी—भोजन, अतिथि-सत्कार, राजकीय भवन, शिकार,
नागरिकों से मिलना-जुलना और सामान्य जीवन का अभिनय; दूसरी ओर उसी भवन के नीचे एक ऐसा मार्ग बनना शुरू हुआ जिसकी जानकारी केवल
कुछ लोगों को थी। यही द्विस्तरीय जीवन इस पूरे प्रसंग का मनोवैज्ञानिक केंद्र है।
मनुष्य का बाहरी जीवन और आंतरिक जीवन हमेशा एक जैसा
नहीं होता। कभी-कभी व्यक्ति समाज के सामने सामान्य दिखाई देता है, लेकिन उसके भीतर
एक दूसरी प्रक्रिया चल रही होती है। वह सोच रहा होता है, गणना
कर रहा होता है, निर्णय ले रहा होता है और भविष्य के लिए
तैयारी कर रहा होता है। यहाँ इस द्विस्तरीयता को छल के रूप में नहीं समझना चाहिए।
यह संकट के समय चेतना की सुरक्षा-व्यवस्था थी। पाण्डवों ने अपने शत्रु को अपनी
वास्तविक मानसिक स्थिति जानने नहीं दी। उनके चेहरे पर शांति थी, लेकिन मन में जागरूकता थी। उनके जीवन का बाहरी भाग सामान्य था, लेकिन भीतर से हर क्षण मृत्यु की संभावना को ध्यान में रखा जा रहा था।
महाभारत में खनक द्वारा सुरंग बनाने का वर्णन अत्यन्त
स्पष्ट है। सुरंग का मुख भवन के भीतर ही बनाया गया और उसे इस प्रकार ढक दिया गया
कि पुरोचन को उसका पता न चल सके। यह केवल तकनीकी तैयारी नहीं थी। यह उस चेतना का
निर्माण था जो संकट आने से पहले संकट के बाहर निकलने का मार्ग तैयार करती है।
यहाँ आधुनिक मनोविज्ञान की भाषा में preparedness और anticipatory
cognition की बात की जा सकती है। जब मनुष्य किसी संभावित खतरे
को पहचान लेता है, तो उसके सामने दो रास्ते होते हैं। पहला—वह लगातार भय में जीता रहे और हर क्षण आने वाली विपत्ति की कल्पना करता
रहे। दूसरा—वह संभावित खतरे के लिए ठोस तैयारी करे और फिर
अपनी मानसिक ऊर्जा को नियंत्रित रखे। पहला मार्ग चिंता को बढ़ाता है; दूसरा मार्ग नियंत्रण की अनुभूति को बढ़ा सकता है। पाण्डवों ने दूसरा
मार्ग चुना। उन्होंने यह नहीं किया कि दिन-रात भय से काँपते रहें। उन्होंने सुरंग
बनवाई, मार्गों को पहचाना, शस्त्र
तैयार रखे और अपनी दिनचर्या ऐसी रखी कि पुरोचन को उनके वास्तविक उद्देश्य का पता न
चले।
यही कारण है कि महाभारत बताता है कि पाण्डव दिन के
समय वन में शिकार के लिए निकलते थे और रात में अपने कक्षों में शस्त्रों सहित सोते
थे। बाहर से वे सामान्य जीवन जी रहे थे, भीतर से वे किसी भी क्षण आने वाले
संकट के लिए तैयार थे। यह व्यवस्था केवल शरीर की सुरक्षा नहीं थी। यह मन की सुरक्षा
भी थी। जो व्यक्ति जानता है कि उसके पास संकट से निकलने का मार्ग है, उसकी मानसिक स्थिति उस व्यक्ति से अलग होती है जो स्वयं को पूरी तरह बंद
कमरे में कैद समझता है।
यहाँ फिर शक्ति + चेतना + संकल्प + दिशा का
सूत्र सामने आता है। शक्ति केवल भीम की शारीरिक शक्ति नहीं है। शक्ति वह सामर्थ्य
भी है जिससे मनुष्य संकट के भीतर सक्रिय रह सके। चेतना वह है जो खतरे को पहचानती
है। संकल्प वह है जो कहता है कि परिस्थिति चाहे जैसी हो, जीवन की रक्षा
करनी है। और दिशा वह है जो बताती है कि किस मार्ग से बाहर निकलना है। यदि सुरंग बन
गई होती लेकिन पाण्डवों में संकल्प न होता, तो उसका कोई अर्थ
नहीं था। यदि संकल्प होता लेकिन सुरंग न होती, तो केवल इच्छा
उन्हें आग से नहीं बचा सकती थी। यदि शक्ति होती लेकिन दिशा न होती, तो शक्ति केवल प्रतिक्रिया बन सकती थी। चारों का समन्वय ही उन्हें बचाने वाला
था।
इस बीच पुरोचन लगातार उनकी निगरानी करता रहा। उसके
लिए यह आवश्यक था कि पाण्डव उसके विश्वास में रहें और उसे किसी प्रकार का संदेह न
हो। लेकिन पाण्डव भी उसके व्यवहार को पढ़ रहे थे। यहाँ एक प्रकार का मानसिक खेल चल
रहा था—पुरोचन सोच रहा था कि वह पाण्डवों को धोखा दे रहा है, जबकि पाण्डव जानते थे कि वह धोखा दे रहा है। दूसरी ओर पाण्डव ऐसा व्यवहार
कर रहे थे कि पुरोचन समझे कि उसका षड्यंत्र सफलतापूर्वक छिपा हुआ है। इस प्रकार एक
ही स्थान पर दो अलग-अलग मानसिक वास्तविकताएँ चल रही थीं।
पुरोचन की सबसे बड़ी कमजोरी यही थी कि वह यह मान चुका
था कि शक्ति उसके पक्ष में है। उसके पास भवन था, योजना थी, आदेश
था और अवसर था। लेकिन उसने यह नहीं समझा कि जानकारी भी शक्ति होती है। जिसके
पास सूचना है, उसके पास परिस्थिति को बदलने की क्षमता
आ जाती है। पाण्डवों ने शस्त्र उठाने से पहले सूचना को
अपनी शक्ति बना लिया था।
यहाँ विदुर की भूमिका और अधिक स्पष्ट होती है। विदुर
ने स्वयं युद्ध नहीं किया। उन्होंने दुर्योधन को रोकने के लिए सेना नहीं जुटाई।
उन्होंने खुले दरबार में षड्यंत्र का पर्दाफाश भी नहीं किया। फिर भी उन्होंने पूरी
परिस्थिति की दिशा बदल दी। इसका कारण था—सही समय पर सही सूचना और सही साधन। कभी-कभी किसी व्यक्ति की शक्ति उसकी बाहरी सत्ता में नहीं होती, बल्कि इस बात में होती है कि वह संकट के भीतर किसी दूसरे व्यक्ति को सही
निर्णय लेने योग्य बना दे।
इस दृष्टि से विदुर केवल पाण्डवों के हितैषी नहीं हैं; वे महाभारत की कथा
में विवेक-चेतना के प्रतिनिधि के रूप में भी दिखाई देते हैं। दुर्योधन की
बुद्धि भविष्य के भय से संचालित हो रही थी। शकुनि की बुद्धि योजना और चाल में लगी
थी। कर्ण की निष्ठा मित्रता और संघर्ष के पक्ष में खड़ी थी। धृतराष्ट्र का मन पुत्र-स्नेह
और राजधर्म के बीच उलझा था। लेकिन विदुर की दृष्टि घटना के पीछे के परिणाम को देख
रही थी। उन्होंने खतरे को पहचानकर पाण्डवों को केवल चेताया नहीं, बल्कि उनके लिए वास्तविक बचाव का साधन भी उपलब्ध कराया।
यहाँ एक और महत्वपूर्ण मनोवैज्ञानिक बात है—संकट में सहायता
तभी प्रभावी होती है जब सहायता प्राप्त करने वाला व्यक्ति भी स्वयं सक्रिय हो। विदुर सुरंग नहीं खोद सकते थे, क्योंकि वे वहाँ
उपस्थित नहीं थे। उन्होंने खनक भेजा। खनक ने सुरंग खोदी। लेकिन पाण्डवों को स्वयं
सावधान रहना था, स्वयं शत्रु को भ्रमित करना था और स्वयं सही
समय पर सुरंग का उपयोग करना था। इस प्रकार बचाव सामूहिक था। किसी एक व्यक्ति ने
अकेले पाण्डवों को नहीं बचाया। सूचना, तकनीकी कौशल, धैर्य, शक्ति और निर्णय—सभी एक
साथ आए।
पाण्डवों के लिए यह समय एक प्रकार की मानसिक साधना भी
था। उन्हें प्रतिदिन उस व्यक्ति के साथ रहना था जिसके बारे में वे जानते थे कि वह
उन्हें मारना चाहता है। फिर भी उन्हें अपनी घृणा को हर क्षण चेहरे पर नहीं आने
देना था। यह बहुत कठिन स्थिति है। यदि कोई व्यक्ति अपने शत्रु के सामने लगातार
क्रोध में रहे, तो उसका शरीर और व्यवहार स्वयं उसके मन का रहस्य खोल सकता है। आँखों की
गति, आवाज का स्वर, व्यवहार में अचानक
परिवर्तन—ये सब संकेत बन सकते हैं। इसलिए पाण्डवों को केवल
शत्रु से बचना नहीं था; उन्हें अपनी आंतरिक प्रतिक्रिया पर
भी नियंत्रण रखना था।
इस अर्थ में लाक्षागृह केवल अग्नि की परीक्षा नहीं था; यह आत्म-नियंत्रण
की परीक्षा भी था। शत्रु बाहर था, लेकिन उसका प्रभाव
भीतर प्रवेश न कर सके—यह सुनिश्चित करना भी उतना ही आवश्यक
था। भय यदि मन पर अधिकार कर लेता, तो पाण्डव जल्दबाजी करते।
क्रोध अधिकार कर लेता, तो वे पुरोचन को चुनौती देते।
अविश्वास इतना बढ़ जाता कि उनका सामान्य व्यवहार बदल जाता। लेकिन उन्होंने इन सबको
नियंत्रित रखा।
युधिष्ठिर की यही विशेषता इस प्रसंग में फिर दिखाई
देती है। वे यह जानते थे कि शत्रु शक्तिशाली है, परंतु वे स्वयं को असहाय मानकर बैठते
नहीं। वे यह जानते थे कि परिस्थिति खतरनाक है, लेकिन वे केवल
खतरे की चर्चा नहीं करते। वे योजना बनाते हैं। और योजना बनाकर उसे गुप्त रखते हैं।
यह चेतना की परिपक्व अवस्था है—खतरे को स्वीकार करना,
लेकिन अपने मन को खतरे का दास न बनने देना।
इस बीच सुरंग धीरे-धीरे पूर्ण होने लगी। ऊपर से भवन
वैसा ही था जैसा पहले था। दीवारें खड़ी थीं, कक्ष सजे थे, पुरोचन
पहरा दे रहा था और नागरिकों को कुछ भी पता नहीं था। नीचे से एक मार्ग उस
मृत्यु-भवन की सीमा को काट रहा था। यह मार्ग अभी किसी ने देखा नहीं था, लेकिन यही मार्ग आने वाले समय में जीवन और मृत्यु के बीच का अंतर बनने
वाला था।
महाभारत इस रहस्य को बहुत स्पष्ट रखता है कि वारणावत
के नागरिकों को पाण्डवों की वास्तविक योजना का पता नहीं था। पुरोचन भी नहीं जानता
था। पाण्डवों के अतिरिक्त केवल विदुर का वह खनक इस योजना से परिचित था। यह
गोपनीयता स्वयं योजना का एक आवश्यक अंग थी। जितने अधिक लोग किसी रहस्य को जानते
हैं, उसके बाहर आने की संभावना उतनी ही बढ़ती है। इसलिए पाण्डवों ने अपने जीवन
की सबसे महत्वपूर्ण योजना को कुछ ही व्यक्तियों तक सीमित रखा।
यह आधुनिक संगठनात्मक और मनोवैज्ञानिक दृष्टि से भी
एक महत्वपूर्ण सिद्धांत है—महत्वपूर्ण निर्णयों में सूचना का अनुशासन। हर
व्यक्ति को हर बात बता देना पारदर्शिता का पर्याय नहीं है। जिन परिस्थितियों में
किसी की सुरक्षा खतरे में हो, वहाँ सूचना की सीमा स्वयं
सुरक्षा का साधन बन जाती है। महाभारत का यह प्रसंग इस बात को हजारों वर्ष पुरानी
कथा-संरचना में दिखाता है।
धीरे-धीरे समय बीतता गया। पाण्डवों का व्यवहार देखकर
पुरोचन निश्चिंत होने लगा। उसे लगा कि उसकी योजना सफल है। वह यह समझ नहीं पाया कि
जिन लोगों को वह मृत्यु के घर में बंद समझ रहा है, उन्होंने उसी घर के नीचे जीवन का
मार्ग बना लिया है। यही मनुष्य के अहंकार की एक बड़ी भूल है—वह
अपनी योजना को अंतिम सत्य समझ लेता है। वह मान लेता है कि सामने वाला वही देख रहा
है जो वह उसे दिखा रहा है।
लेकिन चेतना केवल दिखाई देने वाली वस्तु नहीं देखती।
वह संकेतों के बीच के संबंध को भी देखती है।
पुरोचन के लिए लाक्षागृह एक जाल था। पाण्डवों के लिए
वही लाक्षागृह अब एक परीक्षा बन चुका था। उनके लिए सुरंग केवल मिट्टी में खोदी गई
एक गुफा नहीं थी। वह उस मानसिक निर्णय का बाहरी रूप थी कि वे परिस्थितियों के
हाथों स्वयं को समाप्त नहीं होने देंगे। उन्हें अपने जीवन का अगला चरण स्वयं चुनना
था।
और यही इस प्रकरण का सबसे गहरा अर्थ है—मृत्यु का भय जब
विवेक के साथ जुड़ता है, तो वह केवल भय नहीं रहता; वह जीवन की रक्षा का संकल्प बन जाता है।
पाण्डव अभी भी लाक्षागृह में थे। आग अभी नहीं लगी थी।
पुरोचन अभी जीवित था। वारणावत के नागरिक अभी अनजान थे। लेकिन अब पाण्डवों के पास
वह चीज थी जो उनके शत्रुओं के पास नहीं थी—सत्य का ज्ञान और उससे बचने की
तैयारी।
अब केवल समय की प्रतीक्षा थी।
और वह समय भी आने वाला था।
कृष्ण पक्ष की वह निर्णायक रात निकट आ रही थी, जिसके बारे में
विदुर पहले ही चेतावनी दे चुके थे। उस रात केवल एक भवन नहीं जलने वाला था। उस
अग्नि में दुर्योधन की यह धारणा भी जलने वाली थी कि वह पाण्डवों के भाग्य का अंतिम
निर्णय कर सकता है।
जिस मृत्यु को शत्रु ने अंत समझकर तैयार किया था, वही अग्नि
पाण्डवों के जीवन के एक नए अध्याय का द्वार बनने वाली थी।
