मानव हृदय से कङ्गाल क्यो बना?

 

मानव हृदय से कङ्गाल क्यो बना?

अध्याय 18

अविज्ञानवान् और अयुक्त मन — जब इन्द्रियाँ मनुष्य को चलाने लगती हैं

यस्त्वविज्ञानवान्भवत्ययुक्तेन मनसा सदा।
तस्येन्द्रियाण्यवश्यानि दुष्टाश्वा इव सारथेः॥

कठोपनिषद् अब अपने रथ-दृष्टान्त को एक निर्णायक मोड़ पर ले जाता है। पिछले मंत्र में बताया गया कि इन्द्रियाँ घोड़ों के समान हैं, विषय उनके मार्ग हैं, मन लगाम है और बुद्धि सारथि है। अब प्रश्न यह है कि यदि सारथि को मार्ग का ज्ञान ही न हो, और उसके हाथ में लगी लगाम भी ठीक प्रकार से नियंत्रित न हो, तो रथ कहाँ जाएगा? उत्तर है—इन्द्रियाँ “अवश्यानि”, अर्थात् नियंत्रण से बाहर हो जाती हैं। मंत्र कहता है—“यस्तु अविज्ञानवान् भवति अयुक्तेन मनसा सदा, तस्य इन्द्रियाणि अवश्यानि दुष्टाश्वा इव सारथेः।” अर्थात् जिस मनुष्य की बुद्धि विवेकपूर्ण ज्ञान से रहित है और जिसका मन सदा असंयत रहता है, उसकी इन्द्रियाँ उस सारथि के दुष्ट या अनियंत्रित घोड़ों के समान हो जाती हैं जो अपने चालक के नियंत्रण में नहीं रहते। यहाँ “अविज्ञान” का अर्थ केवल पढ़ाई-लिखाई का अभाव नहीं है। कोई व्यक्ति बहुत-सी पुस्तकें पढ़ सकता है, अनेक विषयों की जानकारी रख सकता है, बड़ी-बड़ी बातें कर सकता है, फिर भी अपने जीवन की दिशा के संबंध में अविवेकी हो सकता है। कठोपनिषद् के संदर्भ में वास्तविक विज्ञान वह है जो मनुष्य को वस्तु, इच्छा, परिणाम और अपने वास्तविक स्वरूप के सम्बन्ध को समझने योग्य बनाता है। इसलिए यहाँ ज्ञान का प्रश्न सूचना की मात्रा का नहीं, बल्कि जीवन को सही दिशा देने वाली समझ का है।

अविज्ञानवान् — ज्ञान की कमी नहीं, दिशा की कमी

यहाँ “विज्ञानवान्” और “अविज्ञानवान्” शब्दों को अत्यन्त सावधानी से समझना आवश्यक है। यदि विज्ञान का अर्थ केवल बाहरी विषयों की जानकारी मान लिया जाए, तो मंत्र का वास्तविक अर्थ बहुत छोटा हो जाएगा। एक व्यक्ति गणित जान सकता है, विज्ञान जान सकता है, तकनीक जान सकता है, व्यापार जान सकता है, इतिहास जान सकता है, लेकिन यदि वह अपनी इच्छा के उठने की प्रक्रिया, अपने क्रोध के कारण, अपने भय की गति, अपने लोभ की दिशा और अपने निर्णयों के परिणाम को नहीं समझता, तो उसके भीतर जीवन-निर्देशक विवेक का अभाव हो सकता है। इसलिए कठोपनिषद् का विज्ञान केवल “क्या है?” पूछने पर नहीं रुकता; वह यह भी पूछता है—“मैं इसे कैसे ग्रहण करूँ? इसका मेरे जीवन पर क्या प्रभाव पड़ेगा? क्या यह मेरे लिए श्रेय है या केवल प्रेय? और इन सबको जानने वाला मैं कौन हूँ?”

यही कारण है कि कठोपनिषद् के आरम्भ में नचिकेता ने धन, दीर्घायु और भोगों को छोड़कर मृत्यु के रहस्य का प्रश्न चुना था। उसके सामने भी विषय थे, आकर्षण थे और प्रेय के अनेक अवसर थे; लेकिन उसकी बुद्धि ने उनसे आगे प्रश्न किया। अब रथ-दृष्टान्त उसी घटना का मनोवैज्ञानिक ढाँचा प्रस्तुत कर रहा है। नचिकेता का प्रश्न केवल मृत्यु के बारे में नहीं था; वह यह पूछने का साहस था कि जीवन का वास्तविक सार क्या है?

अयुक्तेन मनसा — जब मन लगाम को पकड़कर नहीं रखता

मंत्र का दूसरा महत्वपूर्ण शब्द है—“अयुक्तेन मनसा”।

युक्त का अर्थ है जुड़ा हुआ, संयोजित, व्यवस्थित, उचित रूप से लगाया हुआ। अयुक्त अर्थात् जो संयोजित नहीं है, जिसका संचालन व्यवस्थित नहीं है। मन का अयुक्त होना केवल चंचल होना नहीं है। मनुष्य का मन स्वभावतः विचार करेगा, स्मृतियाँ लाएगा, भविष्य की कल्पना करेगा, इच्छाएँ उत्पन्न करेगा। समस्या विचारों के अस्तित्व में नहीं है। समस्या तब है जब मनुष्य स्वयं यह तय न कर सके कि किस विचार को महत्व देना है, किस इच्छा का अनुसरण करना है और किस आकर्षण से हट जाना है।

मान लीजिए किसी व्यक्ति को काम करना है। वह अपने सामने पुस्तक या कंप्यूटर खोलता है। उसी समय मोबाइल पर एक सूचना आती है। वह उसे देखता है। फिर दूसरी सूचना आती है। उसके बाद कोई वीडियो सामने आता है। फिर वह कुछ मिनटों के लिए मनोरंजन देखने लगता है। थोड़ी देर बाद उसे याद आता है कि उसे काम करना था। लेकिन अब मन किसी दूसरे आकर्षण की तलाश कर रहा है। यह केवल तकनीक की समस्या नहीं है; यह मन और ध्यान के सम्बन्ध की समस्या है। लगाम बार-बार एक दिशा से दूसरी दिशा में खिंच रही है और सारथि को स्थिर मार्ग निर्धारित करने में कठिनाई हो रही है।

इसी प्रकार क्रोध में भी होता है। किसी व्यक्ति के शब्द कान तक पहुँचते हैं। मन उन्हें अपमान के रूप में ग्रहण करता है। स्मृति पुराने अपमानों को जोड़ देती है। शरीर में उत्तेजना बढ़ती है। प्रतिक्रिया की इच्छा पैदा होती है। बुद्धि यदि उस क्षण स्पष्ट नहीं है तो मनुष्य तुरंत प्रतिक्रिया कर देता है। कुछ समय बाद परिस्थिति बदल जाती है और वही व्यक्ति सोचता है कि उसने इतना तीखा उत्तर क्यों दिया। उस क्षण घोड़े ने रथ को खींचा और सारथि पीछे रह गया।

दुष्टाश्वा इव — इन्द्रियाँ शत्रु नहीं, अनप्रशिक्षित शक्ति हैं

कठोपनिषद् इन्द्रियों को “दुष्ट अश्व” के समान कहता है। इसका अर्थ इन्द्रियाँ बुरी हैं, ऐसा नहीं है। घोड़ा शक्तिशाली होता है; उसकी शक्ति ही उसे उपयोगी बनाती है। लेकिन यदि वह प्रशिक्षित न हो, भयभीत हो, उत्तेजित हो या सारथि के संकेत को न माने, तो उसकी शक्ति दुर्घटना का कारण बन सकती है।

ठीक यही इन्द्रियों के साथ है। आँख मनुष्य को ज्ञान दे सकती है, लेकिन वही आँख आकर्षण का माध्यम बन सकती है। कान शिक्षा ग्रहण कर सकते हैं, लेकिन वही कान चापलूसी के अभ्यस्त हो सकते हैं। जिह्वा शरीर के पोषण में सहायता करती है, लेकिन वही जिह्वा स्वाद की आदतों को इतना शक्तिशाली बना सकती है कि विवेक पीछे हट जाए। त्वचा स्पर्श का अनुभव देती है, लेकिन वही स्पर्श मन में आसक्ति उत्पन्न कर सकता है। इसलिए समस्या इन्द्रियों को समाप्त करना नहीं है; समस्या है इन्द्रिय-शक्ति का विवेकहीन संचालन।

यही कारण है कि वैदिक दृष्टि में संयम को जीवन-विरोधी दमन नहीं माना जाता। संयम का अर्थ शक्ति को उसके उचित स्थान पर रखना है। जैसे घोड़े को बाँधकर हमेशा खड़ा कर देना रथ चलाने का समाधान नहीं है, वैसे ही इन्द्रियों को संसार से पूर्णतः काट देना ही समाधान नहीं है। प्रश्न यह है कि वे किसके आदेश पर चल रही हैं।

इच्छा कैसे मनुष्य की दिशा बदलती है?

इन्द्रिय-विषय के सम्पर्क से अनुभव उत्पन्न होता है। अनुभव से स्मृति बनती है। स्मृति से पुनरावृत्ति की इच्छा उत्पन्न हो सकती है। इच्छा से प्रयास होता है। बार-बार का प्रयास आदत बनाता है और आदत धीरे-धीरे व्यक्तित्व का हिस्सा बन सकती है।

इसे एक सूत्र में इस प्रकार समझा जा सकता है—

इन्द्रिय-स्पर्श → अनुभव → स्मृति → इच्छा → पुनरावृत्ति → आदत → संस्कार → व्यवहार।

यह क्रम हर व्यक्ति में एक ही प्रकार से नहीं चलता, लेकिन जीवन में अनेक आदतों को समझने के लिए यह एक अत्यन्त उपयोगी आन्तरिक मानचित्र है। किसी व्यक्ति को किसी वस्तु से पहली बार सुख मिलता है। मन उस सुख को याद रखता है। अगली बार उसी वस्तु का संकेत मिलते ही मन पहले से अधिक शीघ्रता से उसकी ओर आकर्षित होता है। बार-बार ऐसा होने पर इच्छा स्वतः उठने लगती है। धीरे-धीरे व्यक्ति यह भी भूल सकता है कि उसने कभी इस व्यवहार को स्वयं चुना था; अब वह व्यवहार स्वयं उसे खींचता है।

यहीं से मनुष्य के भीतर एक विचित्र स्थिति पैदा होती है—वह कहता है, “मैं यह करना नहीं चाहता, फिर भी मैं बार-बार यही कर रहा हूँ।” कठोपनिषद् की भाषा में यही वह स्थिति है जहाँ घोड़े सारथि की दिशा से अधिक शक्तिशाली हो गए हैं।

मन और बुद्धि का अन्तर

इस मंत्र को समझने के लिए मन और बुद्धि के बीच का अन्तर फिर से स्पष्ट करना आवश्यक है। मन अनुभव करता है, विकल्पों की ओर आकर्षित होता है, स्मृतियों को जोड़ता है और इच्छाओं को ग्रहण करता है। बुद्धि निर्णय करती है, तुलना करती है, परिणाम देखती है और उचित-अनुचित का विवेक करती है।

मन कह सकता है—

“मुझे अभी यह चाहिए।”

बुद्धि पूछ सकती है—

“यदि अभी इसे ले लिया तो आगे क्या होगा?”

मन कह सकता है—

“मुझे इसका उत्तर अभी देना है।”

बुद्धि कह सकती है—

“पहले शांत हो जाओ, फिर उत्तर देना।”

मन कह सकता है—

“सब लोग ऐसा कर रहे हैं।”

बुद्धि पूछ सकती है—

“सब लोग कर रहे हैं, इसलिए क्या यह मेरे लिए भी उचित है?”

यहीं से श्रेय और प्रेय का निर्णय जुड़ता है। प्रेय तत्काल आकर्षित करता है; श्रेय दूर का परिणाम देखता है। अविज्ञानवान् मनुष्य तत्काल खिंचाव को ही निर्णय मान लेता है। विज्ञानवान् या विवेकवान् मनुष्य खिंचाव को देखता है, लेकिन निर्णय उससे अलग स्तर पर करता है।

आधुनिक जीवन में दुष्ट अश्वों के नए रूप

आज इन्द्रियों के घोड़े केवल भोजन, वस्त्र और भौतिक वस्तुओं की ओर नहीं दौड़ते। अब उनके सामने डिजिटल संसार भी है। एक स्क्रीन पर हजारों विषय उपलब्ध हैं। समाचार, मनोरंजन, विज्ञापन, खेल, सामाजिक प्रतिक्रिया, खरीदारी, वीडियो और संदेश—हर वस्तु ध्यान चाहती है।

इस परिस्थिति में मनुष्य के सामने एक नई चुनौती है—ध्यान की रक्षा।

ध्यान जहाँ जाता है, मानसिक ऊर्जा का बड़ा भाग वहीं खर्च होता है। यदि ध्यान निरन्तर बाहरी संकेतों द्वारा खींचा जाता रहे तो मन में गहराई से विचार करने, अध्ययन करने, आत्मनिरीक्षण करने और किसी एक कार्य में स्थिर रहने की क्षमता प्रभावित हो सकती है। इसलिए आज कठोपनिषद् का रथ-दृष्टान्त पहले से भी अधिक प्रासंगिक दिखाई देता है। आधुनिक उपकरण बदल गए हैं, लेकिन मनुष्य के भीतर की संरचना का मूल प्रश्न वही है—क्या मैं अपने ध्यान का स्वामी हूँ, या प्रत्येक बाहरी संकेत मेरे ध्यान को अपनी ओर खींच सकता है?

यहाँ तकनीक को दोष देना भी उसी प्रकार अधूरा होगा जैसे इन्द्रियों को दोष देना। तकनीक एक शक्तिशाली साधन है। समस्या उसका अस्तित्व नहीं, बल्कि उसका उपयोग किस चेतना और किस अनुशासन के साथ किया जा रहा है। प्रशिक्षित सारथि उसी रथ को उपयोगी यात्रा में ले जा सकता है जिसे अनियंत्रित सारथि दुर्घटना में बदल सकता है।

मानव हृदय से कंगाल होने का एक और कारण

हमारे मूल प्रश्न पर लौटें—मानव हृदय से कंगाल क्यों बना?

क्योंकि उसने अपने भीतर के सारथि को प्रशिक्षित करने के बजाय घोड़ों को ही स्वामी बना दिया।

जब इच्छा निर्णय करने लगे, जब क्रोध निर्णय करने लगे, जब भय निर्णय करने लगे, जब लालच निर्णय करने लगे, जब दूसरों की प्रशंसा निर्णय करने लगे, जब सामाजिक तुलना निर्णय करने लगे, तब मनुष्य के पास बहुत कुछ होते हुए भी उसका आन्तरिक राज्य कमजोर हो जाता है।

यही पहले ऋग्वैदिक सूत्र के “राजन्तम्” से जुड़ता है। वहाँ मनुष्य के भीतर अपने राज्य का राजा बनने की बात थी। यहाँ कठोपनिषद् बताता है कि उस राज्य का प्रशासन कैसे चलता है। यदि बुद्धि सारथि है और मन लगाम है, तो राजा अर्थात् आत्मस्वरूप को अपने रथ की स्थिति का ज्ञान होना चाहिए। राजा यदि स्वयं को घोड़ा समझ बैठे तो राज्य की व्यवस्था उलट जाती है।

इसलिए बाहरी गरीबी से पहले एक गहरी आन्तरिक गरीबी आती है—विवेक की गरीबी, आत्मनिरीक्षण की गरीबी, संयम की गरीबी और अपने वास्तविक स्वरूप की विस्मृति।

धन इस गरीबी को ढक सकता है, वस्तुएँ इसे सजाकर प्रस्तुत कर सकती हैं, शिक्षा इसे शब्द दे सकती है और प्रतिष्ठा इसे समाज से सम्मान दिला सकती है; लेकिन यदि मनुष्य अपनी इन्द्रियों और इच्छाओं का स्वामी नहीं है तो उसके भीतर का रथ अभी भी दिशाहीन है।

आत्म-विज्ञान की दिशा

कठोपनिषद् का उद्देश्य मनुष्य को इन्द्रियों से डराना नहीं है। वह उसे उसके भीतर की संरचना समझाकर स्वतंत्र बनाना चाहता है।

इन्द्रियाँ — अनुभव के द्वार।
मन — अनुभव और इच्छा का क्षेत्र।
बुद्धि — निर्णय और विवेक का उपकरण।
शरीर — कर्म का रथ।
आत्मा — रथी।

जब यह क्रम उलट जाता है तो मनुष्य विषयों में खो जाता है। जब यह क्रम स्पष्ट होता है तो विषय उसके उपयोग में आते हैं।

इसीलिए इस मंत्र का सार यह नहीं कि “इन्द्रियों को दबाओ”, बल्कि यह है—

“इन्द्रियों की शक्ति को बुद्धि के निर्देशन में रखो और मन को ऐसी लगाम बनाओ जो रथ को लक्ष्य से भटकने न दे।”

और इसका जीवन-सूत्र—

अविज्ञान + असंयत मन → अनियंत्रित इन्द्रियाँ → विषयासक्ति → अस्थिर जीवन।

इसके विपरीत कठोपनिषद् अगले मंत्र में दूसरा पक्ष प्रस्तुत करेगा—

विज्ञानवान् + युक्त मन → वश्य इन्द्रियाँ → नियंत्रित जीवन → लक्ष्य की ओर गतिशील रथ।

यहीं से कठोपनिषद् यह दिखाएगा कि उसी शरीर, उन्हीं इन्द्रियों और उसी संसार के बीच रहते हुए भी दो मनुष्यों का जीवन इतना अलग क्यों हो जाता है।