श्रीरामायण पाठ — अयोध्याकाण्डे एकोनत्रिंशः सर्गः ॥२-२९॥
श्रीमद्वाल्मीकियरामायणे अयोध्याकाण्डे एकोनत्रिंशः सर्गः ॥२-२९॥
श्रीमद्वाल्मीकीय रामायण के अयोध्याकाण्ड के एकोनत्रिंश (२९वें) सर्ग (२-२९) के सभी २४ श्लोकों का क्रमवार हिंदी एवं अंग्रेजी अनुवाद तथा व्याख्या नीचे प्रस्तुत है:
श्लोक १-२
एतत् तु वचनं श्रुत्वा सीता रामस्य दुःखिता। प्रसक्ताश्रुमुखी मन्दमिदं वचनमब्रवीत्॥ १॥ ये त्वया कीर्तिता दोषा वने वस्तव्यतां प्रति। गुणानित्येव तान् विद्धि तव स्नेहपुरस्कृता॥ २॥
- हिंदी व्याख्या: श्रीराम के वन के इन भयंकर दोषों संबंधी वचनों को सुनकर दुखी हुई सीता जी ने बहते हुए आँसुओं वाले मुख से धीरे से यह वचन कहा—"हे राम! वन में निवास करने के संबंध में आपने जिन-जिन दोषों का वर्णन किया है, आपके प्रति मेरे स्नेह के कारण आप उन्हें 'गुण' ही मानिए (वे सब मेरे लिए दोष नहीं, बल्कि गुण हैं)।"
- English Translation: Hearing these words of Rama concerning forest life, the distressed Sita, her face streaming with tears, softly spoke these words: "O Rama, those very faults that you have described regarding dwelling in the forest—do recognize them purely as virtues, inspired by my deep affection for you."
श्लोक ३-६
मृगाः सिंहा गजाश्चैव शार्दूलाः शरभास्तथा। चमराः सृमराश्चैव ये चान्ये वनचारिणः॥ ३॥ अदृष्टपूर्वरूपत्वात् सर्वे ते तव राघव। रूपं दृष्ट्वापसर्पेयुस्तव सर्वे हि बिभ्यति॥ ४॥ त्वया च सह गन्तव्यं मया गुरुजनाज्ञया। त्वद्वियोगेन मे राम त्यक्तव्यमिह जीवितम्॥ ५॥ नहि मां त्वत्समीपस्थामपि शक्रोऽपि राघव। सुराणामीश्वरः शक्तः प्रधर्षयितुमोजसा॥ ६॥
- हिंदी व्याख्या: "मृग, सिंह, हाथी, बाघ, शरभ, चमर, सृमर (जंगली जीव) तथा अन्य जितने भी वनचर प्राणी हैं, वे सभी आपका स्वरूप पहले कभी न देखने के कारण, आपके उस अलौकिक रूप को देखते ही दूर भाग जाएंगे, क्योंकि वे सब आपसे भयभीत होंगे। गुरुजनों की आज्ञा से मुझे भी आपके साथ ही चलना चाहिए, क्योंकि हे राम! आपके वियोग में मुझे इस जीवन का त्याग ही करना पड़ेगा। हे राघव! आपके समीप स्थित मुझ स्त्री को तो देवताओं के स्वामी इंद्र भी अपने बल से प्रताड़ित (या पराजित) करने में समर्थ नहीं हैं।"
- English Translation: "Deer, lions, elephants, tigers, sharabhas, yaks, wild bisons, and all other forest-roaming beasts—never having beheld your divine form before, O Raghava, upon seeing your majestic presence they will all retreat, for indeed they are terrified of you. By the command of our elders, I too must accompany you; O Rama, separated from you I would simply have to abandon my life here. Even Shakra (Indra), the lord of the celestials, would lack the might to violate or overpower me when I am stationed by your side, O Raghava."
श्लोक ७-१०
पतिहीना तु या नारी न सा शक्ष्यति जीवितुम्। कामَمैवंविधं राम त्वया मम निदर्शितम्॥ ७॥ अथापि च महाप्राज्ञ ब्राह्मणानां मया श्रुतम्। पुरा पितृगृहे सत्यं वस्तव्यं किल मे वने॥ ८॥ लक्षणिभ्यो द्विजातिभ्यः श्रुत्वा वचनं गृहे। वनवासकृतोत्साहा नित्यमेव महाबल॥ ९॥ आदेशो वनवासस्य प्राप्तव्यः स मया किल। सा त्वया सह भर्त्राहं यास्यामि प्रिय नान्यथा॥ १०॥
- हिंदी व्याख्या: "पति के बिना कोई भी नारी जीवित रहने में समर्थ नहीं हो सकती—हे राम! इस प्रकार की बात आप स्वयं मेरे सामने सिद्ध कर चुके हैं (यानी मेरा जीवित रहना पति के बिना असंभव है)। हे महाप्राज्ञ! इसके अतिरिक्त मैंने पूर्वकाल में अपने पिता के घर में ब्राह्मणों के मुख से सुना था कि मुझे सत्य ही वन में निवास करना पड़ेगा। हे महाबल! घर पर सामुद्रिक शास्त्र के ज्ञाता (लक्षणज्ञ) ज्योतिषियों और ब्राह्मणों के मुख से ऐसी भविष्यवाणियाँ सुनकर ही मैं वनवास के प्रति सदा से उत्साहित रही हूँ। मुझे तो वनवास का आदेश अवश्य प्राप्त होना ही था; अतः हे प्रिय! मैं अपने पति आपके साथ ही वन जाऊँगी, इसके अतिरिक्त और कोई दूसरा मार्ग नहीं है।"
- English Translation: "A woman bereft of her husband can never manage to survive—O Rama, this very truth has been demonstrated by you to me. Furthermore, O highly wise one, I heard from Brahmins long ago in my father's house that I was destined indeed to dwell in the forest. O mighty-armed one, having heard such prognostications in our home from Brhaman astrologers skilled in physiognomy, my enthusiasm for forest dwelling has ever been intense. The decree of forest exile was indeed ordained for me; therefore, O beloved husband, I shall accompany you and none other."
श्लोक ११-१४
कृतादेशा भविष्यामि गमिष्यामि त्वया सह। कालश्चायं समुत्पन्नः सत्यवान् भवतु द्विजः॥ ११॥ वनवासे हि जानामि दुःखानि बहुधा किल। प्राप्यन्ते नियतं वीर पुरुषैरकृतात्मभिः॥ १२॥ कन्यया च पितुर्गेहे वनवासः श्रुतो मया। भिक्षिण्याः शमवृत्ताया ममा मातुरिहाग्रतः॥ १३॥ प्रसादितश्च वै पूर्वं त्वं मे बहुतिथं प्रभो। गमनं वनवासस्य कांक्षितं हि सह त्वया॥ १४॥
- हिंदी व्याख्या: "अब मेरा वह आदेश पूरा होने का समय आ गया है, और मैं आपके साथ वन जाऊँगी। वह अवसर अब आ उपस्थित हुआ है, अतः उन ब्राह्मण की बात सत्य होनी चाहिए। हे वीर! मैं जानती हूँ कि वनवास में अनेक प्रकार के दुख केवल उन पुरुषों को ही नियमित रूप से प्राप्त होते हैं, जिनका मन अनियंत्रित (अकृतात्मा) होता है (अर्थात जितेंद्रिय व्यक्तियों के लिए वन का दुख भी सुख बन जाता है)। कन्याकाल में पिता के घर में शांत स्वभाव वाली एक संन्यासिनी भिक्षुणी से मैंने मेरी माता के सामने वनवास के विषय में सुना था। हे प्रभो! मैंने बहुत पहले ही आपसे बहुत बार प्रार्थना करके प्रसन्न किया था, क्योंकि आपके साथ ही वनवास जाने की मेरी तीव्र इच्छा थी।"
- * English Translation: "Now I shall fulfill that destined decree and journey forth with you. This time has indeed arrived; let the words of those seers prove true! O hero, I know full well that various hardships in forest life are invariably experienced only by those whose souls are undisciplined. While yet a maiden in my father's house, I heard about forest exile from a peaceful female ascetic in the presence of my mother. O Lord, I had already besought you earnestly on many past occasions, for my heart has ever yearned to go into forest exile alongside you."
श्लोक १५-१९
कृतक्षणाहं भद्रं त्रे गमनं प्रति राघव। वनवासस्य शूरस्य मम चर्या हि रोचते॥ १५॥ शुद्धात्मन् प्रेमभावाद्धि भविष्यामि विकल्मषा। भर्तारमनुगच्छन्ती भर्ता हि परदैवतम्॥ ६१॥ (तथा १६) प्रेत्यभावे हि कल्याणः संगमो मे सदा त्वया। श्रुतिर्हि श्रूयते पुण्या ब्राह्मणानां यशस्विनाम्॥ १७॥ इहलोके च पितृभिर्या स्त्री यस्य महाबल। अद्भिर्दत्ता स्वधर्मेण प्रेत्यभावेऽपि तस्य सा॥ १८॥ एवमस्मात् स्वकां नारीं सुवृत्तां हि पतिव्रताम्। नाभिरोचयसे नेतुं त्वं मां केनेह हेतुना॥ १९॥
- हिंदी व्याख्या: "हे राघव! आपका कल्याण हो, मैं वन जाने के लिए पहले से ही पूरी तरह तैयार (कृतक्षण) हूँ। एक शूरवीर के साथ वनवास बिताना और उसकी सेवा करना ही मुझे प्रिय लगता है। हे शुद्धात्मन्! प्रेम-भाव के कारण पति का अनुसरण करने से मैं सभी पापों से रहित (विकल्मषा) हो जाऊँगी, क्योंकि पति ही स्त्री के लिए परम देवता हैं। परलोक (प्रेत्यभाव) में भी आपके साथ मेरा यह कल्याणकारी संगम सदा बना रहेगा—ऐसा यशस्वी ब्राह्मणों के मुख से मैंने पवित्र श्रुति के रूप में सुना है। हे महाबल! इस लोक में पिता ने विधिपूर्वक जल के साथ जिस स्त्री को जिसका दान कर दिया है, वह प्रेत्यभाव (परलोक) में भी उसी की होती है। ऐसी उत्तम आचरण वाली और पतिव्रता स्त्री को भी आप अपने साथ ले जाना क्यों नहीं चाहते? इसके पीछे आपका क्या कारण है?"
- * English Translation: "O Raghava, may auspiciousness attend you; I am fully prepared for the journey. To share the forest exile of a hero and serve Him is precisely what delights me. O pure-souled One, through the sentiment of pure love and by following my husband, I shall remain completely free from stain, for a husband is indeed a woman's supreme deity. In the afterlife too, my blessed union with you shall endure eternally—thus have I heard the holy sruti chanted by illustrious Brahmins. O mighty-armed one, whichever woman a father bestows upon a man in this world with sacred water according to ordinance, she remains his even in the realm beyond. Such being the case, why do you hesitate to take me—your virtuous, devoted, and chaste wife—along with you? For what reason do you deny this?"
श्लोक २०-२४
भक्तां पतिव्रतां दीनां मां समां सुखदुःखयोः। नेतुमर्हसि काकुत्स्थ समानसुखदुःखिनीम्॥ २०॥ यदि मां दुःखितामेवं वनं नेतुं न चेच्छसि। विषमग्निं जलं वाहमास्थास्ये मृत्युकारणात्॥ २१॥ एवं बहुविधं तं सा याचते गमनं प्रति। नानुमेने महाबाहुस्तां नेतुं विजनं वनम्॥ २२॥ एवमुक्ता तु सा चिन्तां मैथिली समुपागता। स्नापयन्तीव गामुष्णैरश्रुभिर्नयनच्युतैः॥ २३॥ चिन्तयन्तीं तदा तां तु निवर्तयितुमात्मवान्। क्रोधाविष्टां तु वैदेहीं काकुत्स्थो बह्वसान्त्वयत्॥ २४॥
- हिंदी व्याख्या: "हे काकुत्स्थ! सुख और दुख में समान रूप से साथ रहने वाली, आपकी भक्त, पतिव्रता, दीन और आपके सुख-दुख को बाँटने वाली मुझको अपने साथ ले चलना ही आपके लिए उचित है। यदि आप मुझ दुखी को इस प्रकार वन ले जाना नहीं चाहेंगे, तो मैं मृत्यु के लिए विषपान कर लूँगी, अग्नि में प्रवेश कर जाऊँगी अथवा जल में डूब जाऊँगी।" इस प्रकार सीता जी ने वन जाने के लिए उनसे अनेक प्रकार से प्रार्थना की, किंतु महाबाहु श्रीराम ने उन्हें निर्जन वन ले जाना स्वीकार नहीं किया। राम द्वारा ऐसा कहे जाने पर मैथिली (सीता) गहरी चिंता में डूब गईं, और उनके नेत्रों से गिरते हुए गर्म आँसुओं ने उनके मुख को मानोहह नहला सा दिया। उस समय चिंता में डूबी हुई और क्रोध (क्षोभ) से आविष्ट हुई वैदेही को समझाने के लिए आत्मवान् काकुत्स्थ (राम) ने उन्हें बहुत प्रकार से सांत्वना दी।
- * English Translation: "O Kaakutstha, you ought to take me along—me who am devoted, chaste, wretched, a sharer in your joys and sorrows, and a partner in every state. If you desire not to take me thus afflicted to the forest, I shall resort to poison, fire, or water to bring about my death for want of you." Thus in manifold ways she implored Him regarding the journey, but the mighty-armed Rama still remained reluctant to take her to the desolate forest. Thus addressed, Maithili fell into profound anxiety, her face seemingly bathed by the warm tears streaming from her eyes. As she sat thus pondering, the self-possessed Kaakutstha comforted the agitated and sorrowful Vaidehi with abundant gentle words.
इत्यार्षे श्रीमद्रामायणे वाल्मीकीये आदिकाव्ये अयोध्याकाण्डे एकोनत्रिंशः सर्गः ॥२-२९॥ (इस प्रकार महर्षि वाल्मीकि रचित आदिकाव्य श्रीमद्वाल्मीकीय रामायण के अयोध्याकाण्ड का उनतीसवाँ सर्ग पूर्ण हुआ।)