श्रीरामायण पाठ — अयोध्याकाण्डे एकत्रिंशः सर्गः ॥२-३१॥
श्रीमद्वाल्मीकियरामायणे अयोध्याकाण्डे एकत्रिंशः सर्गः ॥२-३१॥
श्रीमद्वाल्मीकीय रामायण के अयोध्याकाण्ड के एकत्रिंश (३१वें) सर्ग (२-३१) के सभी ३७ श्लोकों का क्रमवार हिंदी एवं अंग्रेजी अनुवाद तथा व्याख्या नीचे प्रस्तुत है:
श्लोक १-३
एवं श्रुत्वा स संवादं लक्ष्मणः पूर्वमागतः। बाष्पपर्याकुलमुखः शोकं सोढुमशक्नुवन्॥ १॥ स भ्रातुश्चरणौ गाढं निपीड्य रघुनन्दनः। सीतामुवाचातियशां राघवं च महाव्रतम्॥ २॥ यदि गन्तुं कृता बुद्धिर्वनं मृगगजायुतम्। अहं त्वानुगमिष्यामि वनमग्रे धनुर्धरः॥ ३॥
- हिंदी व्याख्या: श्रीराम और सीता जी के इस संवाद को पहले से ही वहाँ उपस्थित लक्ष्मण ने सुन लिया था। उनके नेत्र आँसुओं से भर आए थे और वे उस भारी शोक को सहन करने में असमर्थ थे। रघुनंदन लक्ष्मण ने अपने बड़े भाई के चरणों को कसकर पकड़ लिया और अतियशस्वी सीता तथा महाव्रतधारी राघव से बोले—"यदि आप दोनों ने मृगों और हाथियों से भरे वन में जाने का पक्का निश्चय कर ही लिया है, तो हाथ में धनुष धारण कर मैं भी आगे-आगे आपके साथ वन में चलूँगा।"
- English Translation: Lakshmana, who had arrived earlier, heard this dialogue between Rama and Sita; his face was swimming in tears, and he was unable to endure the grief. Clasping the feet of his elder brother firmly, Raghava's scion Lakshmana addressed the exceedingly illustrious Sita and the great-vowed Raghava: "If you have resolved to go to the forest, teeming with deer and elephants, I too shall accompany you into the forest, walking ahead with bow in hand."
श्लोक ४-६
मया समेतोऽरण्यानि रम्याणि विचरिष्यसि। पक्षिभिर्मृगयूथैश्च संघुष्टानि समन्ततः॥ ३॥ (तथा ४) न देवलोकाक्रमणं नामरत्वमहं वृणे। ऐश्वर्यं चापि लोकानां कामये न त्वया विना॥ ५॥ एवं ब्रुवाणः सौमित्रिर्वनवासाय निश्चितः। रामेण बहुभिः सान्त्वैर्निषिद्धः पुनरब्रवीत्॥ ६॥
- हिंदी व्याख्या: "मेरे साथ रहकर आप चारों ओर पक्षियों और मृगों के झुंडों से गूँजने वाले रमणीय वनों में विहार करेंगे। मैं आपके बिना न तो देवलोक पर अधिकार पाना चाहता हूँ, न अमरत्व की इच्छा रखता हूँ, और न ही तीनों लोकों के ऐश्वर्य की कामना करता हूँ।" वनवास के लिए पूरी तरह निश्चित होकर ऐसा कहते हुए सौमित्रि (लक्ष्मण) को जब श्रीराम ने अनेक प्रकार की सांत्वना देकर रोकना चाहा, तो उन्होंने पुनः उत्तर दिया—
- English Translation: "Accompanied by me, you shall roam the delightful forests resounding on all sides with the calls of birds and herds of deer. I desire neither conquest of the divine realms, nor immortality, nor even sovereignty over the worlds if it is without you." Even as Saumitri spoke thus, firmly resolved on forest exile, and was repeatedly dissuaded by Rama with soothing words, he replied once more:
श्लोक ७-१०
अनुज्ञातस्तु भवता पूर्वमेव यदस्म्यहम्। किमिदानीं पुनरपि क्रियते मे निवारणम्॥ ७॥ यदर्थं प्रतिषेधो मे क्रियते गन्तुमिच्छतः। एतदिच्छामि विज्ञातुं संशयो हि ममानघ॥ ८॥ ततोऽब्रवीन्महातेजा रामो लक्ष्मणमग्रतः। स्थितं प्राग्गामिनं धीरं याचमानं कृताञ्जलिम्॥ ९॥ स्निग्धो धर्मरतो धीरः सततं सत्पथे स्थितः। प्रियः प्राणसमो वश्यो विजेयश्च सखा च मे॥ १०॥
- हिंदी व्याख्या: "जब आपने मुझे पहले ही (जाने के लिए) अनुमति दे दी है, तो अब आप फिर से मेरा निवारण (रोक-थोक) क्यों कर रहे हैं? हे अनघ! मैं आपके साथ वन जाने का इच्छुक हूँ, आप मुझे किस उद्देश्य से रोक रहे हैं, इसे मैं जानना चाहता हूँ, क्योंकि मेरे मन में संशय उत्पन्न हो रहा है।" तब महातेजस्वी श्रीराम ने अपने आगे हाथ जोड़े हुए, साथ चलने के लिए आग्रह कर रहे धीर लक्ष्मण से कहा—"तुम मेरे स्नेही, धर्मपरायण, धीर, सदा सत्पथ पर चलने वाले, प्राणों के समान प्रिय, वशवर्ती, अजेय और मेरे सच्चे सखा हो।"
- * English Translation: "Since you yourself previously gave me permission to accompany you, why are you now trying to hold me back once more? O sinless One, I wish to know the reason why my desire to come along is being prohibited, for doubt troubles my mind." Thereupon the exceedingly radiant Rama spoke to the resolute Lakshmana standing before Him with joined palms: "Affectionate, devoted to righteousness, steadfast, ever treading the noble path, dear as my very life, obedient, unconquerable, and my true friend—such are you to me."
श्लोक ११-१७
मयाद्य सह सौमित्रे त्वयि गच्छति तद्वनम्। को भजिष्यति कौसल्यां सुमित्रां वा यशस्विनीम्॥ ११॥ अभिवर्षति कामैर्यः पर्जन्यः पृथिवीमिव। स कामपाशपर्यस्तो महातेजा महीपतिः॥ १२॥ सा हि राज्यमिदं प्राप्य नृपस्याश्वपतेः सुता। दुःखितानां सपत्नीनां न करिष्यति शोभनम्॥ १३॥ न भरिष्यति कौसल्यां सुमित्रां च सुदुःखिताम्। भरतो राज्यमासाद्य कैकेय्यां पर्यवस्थितः॥ १४॥ तामार्यां स्वयमेवेह राजानुग्रहणेन वा। सौमित्रे भर कौसल्यामुक्तमर्थममुं चर॥ १५॥ एवं मयि च ते भक्तिर्भविष्यति सुदर्शिता। धर्मज्ञगुरुपूजायां धर्मश्चाप्यतुलो महान्॥ १६॥ एवं कुरुष्व सौमित्रे मत्कृते रघुनन्दन। अस्माभिर्विप्रहीणाया मातुर्नो न भवेत् सुखम्॥ १७॥
- हिंदी व्याख्या: "हे सौमित्रे! आज यदि तुम भी मेरे साथ उस वन में चले जाओगे, तो माता कौसल्या और यशस्वी सुमित्रा की देखभाल कौन करेगा? अश्वपतिकुमारी कैकेयी के पाश में बँधे हुए, पृथ्वी पर कामवर्षा करने वाले मेघ के समान वे महातेजस्वी महाराज दशरथ भी इस समय कामवश विवश हैं। वे राजा (भरत के माध्यम से) इस राज्य को पाकर दुखी सौतों का कभी भला नहीं करेंगे। कैकेयी के प्रभाव में स्थित भरत राजा बनकर कौसल्या और अत्यंत दुखी सुमित्रा का भरण-पोषण नहीं करेंगे। अतः हे सौमित्रे! तुम यहीं रहकर या राजा से आग्रह करके कौसल्या और सुमित्रा की रक्षा करो, यही मेरा निर्देश है। ऐसा करने से मुझमें तुम्हारी भक्ति भी भली-भांति प्रदर्शित होगी, गुरुजनों की सेवा का महान धर्म भी पूरा होगा, और हमसे बिछड़कर दुखी होने वाली हमारी माताओं को भी सुख प्राप्त हो सकेगा।"
- * English Translation: "O Saumitri, if you too depart with me to that forest today, who will serve and care for Kausalya and the illustrious Sumitra? Entangled in the meshes of desire, that mighty monarch Dasharatha—who showers the earth with desires like a rain-cloud—is presently powerless. Obtaining this kingdom, that daughter of the king of Ashvapati [Kaikeyi] will certainly not act kindly toward her distressed co-wives. Once Bharata secures the kingdom, under Kaikeyi's sway, he will neither sustain Kausalya nor the deeply sorrowful Sumitra. Therefore, O Saumitri, do you remain here and look after Kausalya either on your own accord or by securing royal favor; fulfill this task I ask of you. Thus shall your devotion to me be truly displayed, and you shall earn supreme spiritual merit by honoring our revered elders. Do this for my sake, O Saumitri, so that our mother, bereft of us, may not be plunged into utter misery."
श्लोक १८-२४
एवमुक्तस्तु रामेण लक्ष्मणः श्लक्ष्णया गिरा। प्रत्युवाच तदा रामं वाक्यज्ञो वाक्यकोविदम्॥ १८॥ तवैव तेजसा वीर भरतः पूजयिष्यति। कौसल्यां च सुमित्रां च प्रयतो नास्ति संशयः॥ १९॥ यदि दुःस्थो न रक्षेत भरतो राज्यमुत्तमम्। प्राप्य दुर्मनसा वीर गर्वेण च विशेषतः॥ २०॥ तमहं दुर्मतिं क्रूरं वधिष्यामि न संशयः। तत्पक्षानपि तान् सर्वांस्त्रैलोक्यमपि किं तु सा॥ १९॥ (तथा २१) कौसल्या बिभृयादार्या सहस्रं मद्विधानपि। यस्याः सहस्रं ग्रामाणां सम्प्राप्तमुपजीविनाम्॥ २२॥ तदात्मभरणे चैव मम मातुस्तथैव च। पर्याप्ता मद्विधानां च भरणाय मनस्विनी॥ २५॥ (तथा २३) कुरुष्व मामनुचरं वैधर्म्यं नेह विद्यते। कृतार्थोऽहं भविष्यामि तव चार्थः प्रकल्प्यते॥ २४॥
- हिंदी व्याख्या: श्रीराम के द्वारा कोमल वाणी में ऐसा कहे जाने पर, बातों के मर्म को जानने वाले चतुर लक्ष्मण ने उत्तर दिया—"हे वीर! आपके ही तेज के प्रभाव से भरतः संयमित होकर कौसल्या और सुमित्रा जी की पूजा (सेवा) करेंगे, इसमें कोई संदेह नहीं है। यदि वह दुर्मति और क्रूर भरत उस उत्तम राज्य को पाकर अहंकारवश कुमार्ग पर चले और उनकी रक्षा न करे, तो मैं उस दुष्ट को तथा उसके पक्ष के सभी लोगों को—यहाँ तक कि तीनों लोकों को भी—नष्ट कर दूँगा, इसमें कोई संदेह नहीं है। आर्या कौसल्या तो मुझ जैसे हजारों लोगों का भरण-पोषण करने में समर्थ हैं, क्योंकि उन्हें उपजीविका के रूप में हजारों ग्राम प्राप्त हैं। वे मनस्विनी माता अपने और मेरी माता के भरण-पोषण के साथ-साथ मुझ जैसे अन्य हजारों लोगों का भी भरण करने में पूरी तरह सक्षम हैं। इसलिए आप मुझे अपना अनुचर (सेवक) बनाकर साथ लें, इसमें कोई अधर्म नहीं है। इससे मेरा जीवन कृतार्थ हो जाएगा और आपके कार्य में भी सहायक सिद्ध होऊँगा।"
- * English Translation: "Through your very brilliance, O hero, Bharata will surely and devotedly honor both Kausalya and Sumitra, of that there is no doubt. But if that wicked and arrogant Bharata, intoxicated by sovereignty, fails to protect them properly, I shall slay that evil-minded wretch without a doubt—along with all his faction, aye, even the three worlds if need be! Noble Kausalya possesses thousands of villages yielding revenue; she is fully capable of sustaining thousands like me. That noble-minded mother has ample resources to support herself, my mother, and even many others. Therefore, make me your attendant; there is no unrighteousness in this. I shall attain my life's purpose, and your endeavors shall be well served."
श्लोक २५-२७
धनुरादाय सगुणं खनित्रपिटकाधरः। अग्रतस्ते गमिष्यामि पन्थानं तव दर्शयन्॥ २५॥ आहरिष्यामि ते नित्यं मूलानि च फलानि च। वन्यानि च तथान्यानि स्वाहार्हाणि तपस्विनाम्॥ २६॥ भवांस्तु सह वैदेह्या गिरिसानुषु रंस्यसे। अहं सर्वं करिष्यामि जाग्रतः स्वपतश्च ते॥ २७॥
- हिंदी व्याख्या: "मैं प्रत्यंचा चढ़े हुए धनुष को तथा हाथ में खनित्र (फावड़ा) और पिटका (टोकरी) को धारण करके आपके आगे-आगे चलूँगा और आपको मार्ग दिखाऊँगा। मैं आपके लिए प्रतिदिन कंद-मूल, फल तथा तपस्वियों के योग्य अन्य वन्या वस्तुएँ चुनकर लाऊँगा। आप वैदेही (सीता) के साथ पर्वतों की घाटियों में सुखपूर्वक विहार करेंगे, और आपके जागते या सोते समय की आपकी सारी सेवा-व्यवस्था मैं स्वयं करूँगा।"
- * English Translation: "Carrying a strung bow, a spade, and a basket in my hands, I shall walk ahead of you, showing you the path. I shall constantly gather for you roots, fruits, and other wild produce fit for the offerings of ascetics. While you sport with Vaidehi upon the mountain ridges, I shall perform all services for you whether you are waking or sleeping."
श्लोक २८-३१
रामस्त्वनेन वाक्येन सुप्रीतः प्रत्युवाच तम्। व्रजापृच्छस्व सौमित्रे सर्वमेव सुहृज्जनम्॥ २८॥ ये च राज्ञो ददौ दिव्ये महात्मा वरुणः स्वयम्। जनकस्य महायज्ञे धनुषी रौद्रदर्शने॥ २९॥ अभेद्ये कवचे दिव्ये तूणी चाक्षय्यसायकौ। आदित्यविमलाभौ द्वौ खड्गौ हेमपरिष्कृतौ॥ ३०॥ सत्कृत्य निहितं सर्वमेतदाचार्यसद्मनि। सर्वमायुधमादाय क्षिप्रमाव्रज लक्ष्मण॥ ३१॥
- हिंदी व्याख्या: लक्ष्मण के इस निष्ठावान वचन से अत्यंत प्रसन्न होकर श्रीराम ने उनसे कहा—"हे सौमित्रे! ठीक है, अब तुम जाओ और अपने सभी सुहृदजनों से विदा ले लो। महात्मा वरुण ने स्वयं जनक जी के महान यज्ञ में राजा दशरथ को जो दो भयंकर दिखने वाले दिव्य धनुष, अभेद्य दिव्य कवच, अक्षय बाणों से भरे दो तूणीर, और सूर्य के समान निर्मल तथा सोने से जड़े हुए दो तलवारें प्रदान की थीं, वे सब आदरपूर्वक आचार्य (वशिष्ठ) के भवन में सुरक्षित रखी हुई हैं। हे लक्ष्मण! तुम उन समस्त अस्त्र-शस्त्रों को लेकर शीघ्र लौट आओ।"
- * English Translation: Highly pleased with these words, Rama replied to him: "Go, O Saumitri, and take leave of all your friends and well-wishers. The two fierce-looking divine bows, the impenetrable divine armors, the two quivers with inexhaustible arrows, and the two golden-hilted swords bright as the sun—which the great-souled Varuna Himself gave of yore to the king during Janaka's grand sacrifice—all these have been reverently deposited in the preceptor's house. Fetching all those weapons, O Lakshmana, return swiftly."
श्लोक ३२-३७
स सुहृज्जनमामन्त्र्य वनवासाय निश्चितः। इक्ष्वाकुगुरुमागम्य जग्राहायुधमुत्तमम्॥ ३२॥ तद् दिव्यं राजशार्दूलः सत्कृतं माल्यभूषितम्। रामाय दर्शयामास सौमित्रिः सर्वमायुधम्॥ ३३॥ तमुवाचात्मवान् रामः प्रीत्या लक्ष्मणमागतम्। काले त्वमागतः सौम्य कांक्षिते मम लक्ष्मण॥ ३४॥ अहं प्रदातुमिच्छामि यदिदं मामकं धनम्। ब्राह्मणेभ्यस्तपस्विभ्यस्त्वया सह परंतप॥ ३५॥ वसन्तीह दृढं भक्त्या गुरुषु द्विजसत्तमाः। तेषामपि च मे भूयः सर्वेषां चोपजीविनाम्॥ ३६॥ वसिष्ठपुत्रं तु सुयज्ञमार्यम् त्वमानयाशु प्रवरं द्विजानाम्। अपि प्रयास्यामि वनं समस्तान् अभ्यर्च्य शिष्टानपरान् द्विजातीन्॥ ३७॥
- हिंदी व्याख्या: वनवास के लिए पूरी तरह निश्चित हो चुके लक्ष्मण ने अपने सुहृदजनों से विदा ली और इक्ष्वाकु कुल के गुरु (वशिष्ठ जी) के पास जाकर वे उत्तम अस्त्र-शस्त्र प्राप्त किए। राजर्षियों में श्रेष्ठ सौमित्रि (लक्ष्मण) ने उन सत्कृत और पुष्पमालाओं से भूषित समस्त दिव्य अस्त्र-शस्त्रों को लाकर श्रीराम को दिखाया। आत्मवान् राम ने प्रेमपूर्वक आए हुए लक्ष्मण से कहा—"हे सौम्य लक्ष्मण! तुम ठीक अभीक्षित समय पर आए हो। हे परंतप! अब मैं अपने पास जो भी धन है, वह सब तुम्हारे साथ मिलकर ब्राह्मणों और तपस्वियों को दान देना चाहता हूँ। जो द्विजश्रेष्ठ यहाँ गुरुजनों के प्रति दृढ़ भक्ति रखते हुए निवास करते हैं, तथा हमारे अन्य सभी आश्रित और उपजीवी जन हैं, उन सबको भी मैं दान देना चाहता हूँ। इसलिए तुम शीघ्र ही श्रेष्ठ ब्राह्मणों में अग्रगण्य वशिष्ठपुत्र आर्य सुयज्ञ को बुला लाओ। मैं समस्त शिष्ट तथा अन्य ब्राह्मणों का सत्कार करके ही वन के लिए प्रस्थान करूँगा।"
- * English Translation: Having bidden farewell to his friends and resolved upon forest exile, Lakshmana approached the preceptor of the Ikshvakus and received those supreme weapons. That tiger among princes, Saumitri, brought forth and displayed to Rama all those divine, honored, and garlanded weapons. The self-possessed Rama, full of affection, said to Lakshmana upon his return: "You have arrived at the exact opportune moment, O gentle Lakshmana. O tormentor of foes, I desire to bestow all this wealth of mine upon Brahmins and ascetics along with you, O tormentor of foes. The eminent Brahmins who dwell here with steadfast devotion to their preceptors, as well as all our dependents and servants—to them too I wish to give generously. Therefore, do you swiftly fetch the noble Suyajna, son of Vasistha and foremost among the twice-born. Having duly honored all these distinguished Brahmins and others, I shall then set out for the forest."
इत्यार्षे श्रीमद्रामायणे वाल्मीकीये आदिकाव्ये अयोध्याकाण्डे एकत्रिंशः सर्गः ॥२-३१॥ (इस प्रकार महर्षि वाल्मीकि रचित आदिकाव्य श्रीमद्वाल्मीकीय रामायण के अयोध्याकाण्ड का इक्तीसवाँ सर्ग पूर्ण हुआ।)