श्रीमद्वाल्मीकियरामायणे अयोध्याकाण्डे षड्त्रिंशः सर्गः ॥२-३६॥

श्रीरामायण पाठ — अयोध्याकाण्डे षड्त्रिंशः सर्गः ॥२-३६॥

 श्रीमद्वाल्मीकियरामायणे अयोध्याकाण्डे षड्त्रिंशः सर्गः ॥२-३६॥

श्रीमद्वाल्मीकीय रामायण के अयोध्याकाण्ड के षड्त्रिंश (३६वें) सर्ग (२-३६) के सभी ३३ श्लोकों का क्रमवार हिंदी एवं अंग्रेजी अनुवाद तथा व्याख्या नीचे प्रस्तुत है:

श्लोक १-४

ततः सुमन्त्रमैक्ष्वाकः पीडितोऽत्र प्रतिज्ञया। सबाष्पमतिनिःश्वस्य जगादेदं पुनर्वचः॥ १॥ सूत रत्नसुसम्पूर्णा चतुर्विधबला चमूः। राघवस्यानुयात्रार्थं क्षिप्रं प्रतिविधीयताम्॥ २॥ रूपाजीवाश्च वादिन्यो वणिजश्च महाधनाः। शोभयन्तु कुमारस्य वाहिनीः सुप्रसारिताः॥ ३॥ ये चैनमुपजीवन्ति रमते यैश्च वीरगैः... (तथा वीर्यतः - श्लोक ४) तेषां बहुविधं दत्त्वा तानप्यत्र नियोजय॥ ४॥

  • हिंदी व्याख्या: तदनंतर, अपनी प्रतिज्ञा से बुरी तरह पीड़ित उन इक्ष्वाकुनंदन (राजा दशरथ) ने आँखों में आँसू भरकर और गहरी साँस लेते हुए सूत सुमन्त्र से पुनः यह वचन कहा—"हे सूत! रत्नों से परिपूर्ण और चारों अंगों (पैदल, घुड़सवार, रथ और हाथी) से युक्त हमारी चतुरङ्गिणी सेना को श्रीराम के साथ जाने के लिए शीघ्रता से तैयार करो। वैश्याएँ (रूपाजीवा), वादक, और महाधनवान व्यापारी लोग—कुमार राम की इस विशाल सेना की शोभा बढ़ाएँ। जो लोग राम पर आश्रित हैं और जिनकी वीरता के बीच वे आनंदित होते हैं, उन सबको प्रचुर धन देकर राम के साथ जाने के कार्य में नियुक्त करो।"
  • English Translation: Thereafter, that scion of Ikshvaku, tormented by his vow, shedding tears and sighing deeply, spoke these words once more to the charioteer: "O charioteer, let a four-fold army brimming with gems be swiftly prepared to accompany Raghava on His journey. Let courtesans, musicians, and wealthy merchants grace the prince's extensive forces. Those who depend upon Him and in whose valor He takes delight—bestow abundant wealth upon them and engage them to accompany Him as well."

श्लोक ५-९

आयुधानि च मुख्यानि नागराः शकटानि च। अनुगच्छन्तु काकुत्स्थं व्याधाश्चारण्यकोविदाः॥ ५॥ निघ्नन् मृगान् कुञ्जरांश्च पिबंश्चारण्यकं मधु। नदीश्च विविधाः पश्यन् न राज्यं संस्मरिष्यति॥ ६॥ धान्यकोशश्च यः कश्चिद् धनकोशश्च मामकः। तौ राममनुगच्छेतां वसन्तं निर्जने वने॥ ७॥ यजन् पुण्येषु देशेषु विसृजंश्चाप्तदक्षिणाः। ऋषिभिश्चापि संगम्य प्रवत्स्यति सुखं वने॥ ८॥ भरतश्च महाबाहुरयोध्यां पालयिष्यति। सर्वकामैः पुनः श्रीमान् रामः संसाध्यतामिति॥ ९॥

  • हिंदी व्याख्या: "मुख्य-मुख्य अस्त्र-शस्त्र, नगर के वाहन-शकटादिक (गाड़ियाँ), तथा अरण्य (वन) के मार्ग को भली-भांति जानने वाले व्याधगण भी काकुत्स्थनंदन राम के साथ जाएँ। वन में मृगों और हाथियों का शिकार करते हुए, वनों का प्राकृतिक मधु पीते हुए और भाँति-भांति की नदियों को देखते हुए वे राज्य का स्मरण ही नहीं करेंगे। मेरा जो भी धान्यकोश और धनकोश है, वे दोनों भी उस निर्जन वन में निवास करने वाले राम के पीछे-पीछे जाएँ। पवित्र देशों में यज्ञ करते हुए, प्रचुर दक्षिणा वितरित करते हुए और ऋषियों से मिलकर वे उस वन में सुखपूर्वक निवास करेंगे। और महाबाहु भरत इस अयोध्या का पालन करेंगे; इस प्रकार श्रीमान् राम के समस्त मनोरथ पूर्ण किए जाएँ।"
  • English Translation: "Let principal weapons, civic carriages, and hunters well-versed in forest tracks follow Kaakutstha. Slaying deer and elephants, drinking wild honey, and beholding diverse rivers, He will not even remember the kingdom. Whatever granaries and royal treasuries are mine, let them both follow Rama as He dwells in the desolate wilderness. Performing sacrifices in holy regions, bestowing generous sacrificial fees, and meeting with sages, He shall reside happily in the forest. As for the mighty-armed Bharata, he shall rule Ayodhya; let all the cherished desires of the glorious Rama be thus fulfilled."

श्लोक १०-१२

एवं ब्रुवाणे काकुत्स्थे कैकेय्या भयमागतम्। मुखं चाप्यगमच्छोषं स्वरश्चापि व्यरुध्यत॥ १०॥ सा विषण्णा च संत्रस्ता मुखेन परिशुष्यता। राजानमेवाभिमुखी कैकेयी वाक्यमब्रवीत॥ ११॥ राज्यं गतधनं साधो पीतमण्डां सुरामिव। निरास्वाद्यतमं शून्यं भरतो नाभिपत्स्यते॥ १२॥

  • हिंदी व्याख्या: काकुत्स्थनंदन राजा दशरथ के ऐसा कहने पर कैकेयी के मन में भय उत्पन्न हो गया; उसका मुख सूख गया और उसका स्वर भी रुँध गया। वह विषण्णा और संत्रस्त होकर, सूखे हुए मुख से सीधे राजा की ओर देखकर कैकेयी बोली—"हे साधो! जैसे मलाई (मण्ड) निकाल लेने के बाद बची हुई मदिरा स्वादहीन हो जाती है, उसी प्रकार धन-रहित (रिक्त) और शून्य हो चुके इस राज्य को भरत कभी स्वीकार नहीं करेंगे।"
  • English Translation: Even as Kaakutstha spoke thus, fear seized Kaikeyi; her face grew parched and her voice faltered. Dejected and terrified, her mouth drying up, Kaikeyi turned directly toward the king and said: "O noble lord, just like wine from which the rich froth has been drained, a kingdom stripped of its wealth and rendered desolate is entirely devoid of relish; Bharata will never accept such a state."

श्लोक १३-१७

कैकेय्यां मुक्तलज्जायां वदन्त्यामतिदारुणम्। राजा दशरथो वाक्यमुवाचायतलोचनाम्॥ १३॥ वहन्तं किं तुदसि मां नियुज्य धुरि माहिते। अनार्ये कृत्यमारब्धं किं न पूर्वमुपारुधः॥ १४॥ तस्यैतत् क्रोधसंयुक्तमुक्तं श्रुत्वा वराङ्गना। कैकेयी द्विगुणं क्रुद्धा राजानमिदमब्रवीत्॥ १५॥ तवैव वंशे सगरो ज्येष्ठपुत्रमुपारुधत्। असमञ्ज इति ख्यातं तथायं गन्तुमर्हति॥ १६॥ एवमुक्तो धिगित्येव राजा दशरथोऽब्रवीत्। व्रीडितश्च जनः सर्वः सा च तन्नावबुध्यत॥ १७॥

  • हिंदी व्याख्या: लज्जा त्यागकर अत्यंत दारुण वचन बोलने वाली कैकेयी से विशाल नेत्रों वाले राजा दशरथ ने कहा—"हे दुष्टे! मुझे इस भारी बोझ वाली धुरी पर जोतकर अब तुम क्यों कंटकित (पीड़ा) कर रही हो? जब यह अनुचित कार्य आरंभ किया जा रहा था, तब तुमने पहले ही इसे क्यों नहीं रोका?" कैकेयी के उस क्रोधयुक्त वचन को सुनकर वह वराङ्गना कैकेयी द्विगुणी क्रुद्ध होकर राजा से बोली—"तुम्हारे ही कुल में सगर ने अपने 'असमञ्ज' नामक ज्येष्ठ पुत्र को देश से निकाल दिया था (उपारुधत्), वैसे ही यह राम भी जाने योग्य हैं।" ऐसा कहे जाने पर राजा दशरथ ने 'धिक्' कहकर उसे कोसा; वहाँ उपस्थित सभी लोग लज्जित हो गए, किंतु उस कैकेयी को इस बात की कोई तनिक भी समझ या लज्जा नहीं हुई।
  • English Translation: To Kaikeyi, who had cast aside all shame and uttered such cruel words, the large-eyed King Dasharatha said: "O unrighteous one, why do you torment me, having yoked me to this heavy burden? When this wicked scheme was set in motion, why did you not halt it from the very beginning?" Hearing these wrathful words, that excellent woman Kaikeyi grew doubly enraged and said to the king: "In your very own lineage, King Sagara cast off his eldest son known as Asamanjas; just so does this Rama deserve to be sent away." Thus addressed, King Dasharatha cried out "Fie upon thee!", and all the people present were filled with shame, but she remained utterly devoid of any awareness or remorse.

श्लोक १८-२२

तत्र वृद्धो महामात्रः सिद्धार्थो नाम नामतः। शुचिर्बहुमतो राज्ञः कैकेयीमिदमब्रवीत्॥ १८॥ असमञ्जो गृहीत्वा तु क्रीडतः पथि दारकान्। सरय्वां प्रक्षिपन्नप्सु रमते तेन दुर्मतिः॥ १९॥ तं दृष्ट्वा नागराः सर्वे क्रुद्धा राजानमब्रुवन्। असमञ्जं वृणी्वैकमस्मान् वा राष्ट्रवर्धन॥ २०॥ तानुवाच ततो राजा किंनिमित्तमिदं भयम्। ताश्चापि राज्ञा सम्पृष्टा वाक्यं प्रकृतयोऽब्रुवन्॥ २१॥ क्रीडतस्त्वेष नः पुत्रान् बालानुद्‍भ्रान्तचेतसः। सरय्वां प्रक्षिपन्मौर्ख्यादतुलां प्रीतिमश्नुते॥ २२॥

  • हिंदी व्याख्या: उस सभा में राजा के परम पवित्र, सम्मानित और वृद्ध महामात्र (मंत्री) थे, जिनका नाम 'सिद्धार्थ' था। उन्होंने कैकेयी से कहा—"असमञ्ज मार्ग में खेलते हुए बालकों को पकड़कर सरयू नदी के जल में फेंक देता था और ऐसा करने में वह दुर्मति आनंदित होता था। उसे ऐसा करते देख नगर के सभी नागरिक क्रोधित होकर राजा सगर के पास पहुँचे और बोले—'हे राष्ट्रवर्धन! या तो अकेले असमञ्ज को चुन लीजिए या हम सबको (चुनिए)।' तब राजा ने उनसे पूछा—'यह किस बात का भय है?' तब प्रजाजनों ने राजा से कहा—'यह हमारे खेलते हुए अज्ञान बालकों को मूर्खतावश सरयू नदी में फेंककर अतुल आनंद प्राप्त करता है।'
  • English Translation: Thereupon an aged and highly esteemed minister of the king, named Siddhartha—pure and deeply respected by the sovereign—addressed Kaikeyi: "Asamanjas used to seize children playing along the highway and throw them into the waters of the Sarayu, taking perverse delight in doing so, the evil-minded one. Beholding this, all the enraged citizens approached the king and said: 'O enhancer of the nation, choose either Asamanjas alone or all of us!' The king then asked them: 'What is the cause of this terror?' And the citizens, thus questioned by the king, replied: 'Out of sheer foolishness, he seizes our innocent children while they are at play and casts them into the Sarayu, deriving matchless pleasure therefrom.'"

श्लोक २३-२६

स तासां वचनं श्रुत्वा प्रकृतीनां नराधिपः। तं तत्याजाहितं पुत्रं तासां प्रियचिकीर्षया॥ २३॥ तं यानं शीघ्रमारोप्य सभार्यं सपरिच्छदम्। यावज्जीवं विवास्योऽयमिति तानन्वशात् पिता॥ २४॥ स फालपिटकं गृह्य गिरिदुर्गाण्यलोकयत्। दिशः सर्वास्त्वनुचरन् स यथा पापकर्मकृत्॥ २५॥ इत्येनमत्यजद् राजा सगरो वै सुधार्मिकः। रामः किमकरोत् पापं येनैवमुपरुध्यते॥ २६॥ इत्येनमत्यजद् राजा सगरो वै सुधार्मिकः। (पाठभेद/द्विरुक्ति)

  • हिंदी व्याख्या: "प्रजाजनों की वह बात सुनकर उन नराधिप (सगर) ने प्रजा की प्रिय कामना पूरी करने के लिए उस अहितकारी पुत्र का परित्याग कर दिया था। पिता (सगर) ने उसे अपनी पत्नी और सामान सहित तुरंत एक वाहन (रथ) पर बिठाकर आज्ञा दी कि—'यह आजीवन देश से निर्वासित रहेगा।' तब वह पापकर्म करने वाले की तरह हाथ में फावड़ा-टोकरी लेकर दुर्गम पर्वतों और सभी दिशाओं में भटकता हुआ जीवन बिताने लगा। इस प्रकार परमार्मिक राजा सगर ने उस पुत्र का त्याग कर दिया था; किंतु राम ने ऐसा कौन सा पाप किया है, जिसके कारण उन्हें इस प्रकार रोका (निर्वासित किया) जा रहा है?"
  • English Translation: "Hearing those words of the citizens, that ruler of men [Sagara] abandoned that harmful son in order to fulfill the desires of the people. Placing him swiftly upon a vehicle along with his wife and belongings, the father decreed: 'He shall remain banished from the realm for the remainder of his life.' Thereupon, carrying a spade and basket like a common evildoer, he wandered across mountainous wildernesses and in all directions. Thus did the supremely righteous King Sagara renounce his son; yet what sin has Rama committed that He should be thus obstructed and exiled?"

श्लोक २७-३०

नहि कंचन पश्यामो राघवस्यागुणं वयम्। दुर्लभो ह्यस्य निरयः शशाङ्कस्येव कल्मषम्॥ २७॥ अथवा देवि त्वं कंचिद् दोषं पश्यसि राघवे। तमद्य ब्रूहि तत्त्वेन तदा रामो विवास्यते॥ २८॥ अदुष्टस्य हि संत्यागः सत्पथे निरतस्य च। निर्दहेदपि शक्रस्य द्युतिं धर्मविरोधवान्॥ २९॥ तदलं देवि रामस्य श्रिया विहतया त्वया। लोकतोऽपि हि ते रक्ष्यः परिवादः शुभानने॥ ३०॥

  • हिंदी व्याख्या: "हम तो राघव में किसी प्रकार का कोई अवगुण नहीं देखते; जिस प्रकार चंद्रमा में कलंक मिलना दुर्लभ है, उसी प्रकार राम में दोष मिलना असंभव है। अथवा हे देवि! यदि तुम्हें राम में कोई दोष दिखाई देता है, तो आज सत्य-सत्य बताओ, तभी राम को वन भेजा जाए। किसी भी अदुष्ट और सत्पथ पर चलने वाले व्यक्ति का परित्याग करना—धर्म के विरुद्ध होने के कारण—देवराज इंद्र के भी तेज को जला सकता है। अतः हे शुभानने! राम की इस हत (नष्ट की जाने वाली) श्री-संपदा से अब बस करो; कम से कम संसार में होने वाली अपनी इस बदनामी (परिवाद) से तो अपनी रक्षा करो।"
  • English Translation: "We perceive not a single fault in Raghava; just as blemishes are non-existent in the moon, so are flaws in Him. Or else, O Queen, if you perceive some fault in Raghava, declare it truly today, and only then let Rama be exiled. For the abandonment of one who is innocent and firmly established on the righteous path—being contrary to virtue—could scorch even the splendor of Shakra himself. Therefore, enough of this destruction of Rama's glory by you, O auspicious-faced one; at least shield yourself from the scandal of the world."

श्लोक ३१-३३

श्रुत्वा तु सिद्धार्थवचो राजा श्रान्ततरस्वरः। शोकोपहतया वाचा कैकेयीमिदमब्रवीत्॥ ३१॥ एतद्वचो नेच्छसि पापरूपे हितं न जानासि ममात्मनोऽथवा। आस्थाय मार्गं कृपणं कुचेष्टा चेष्टा हि ते साधुपथादपेता॥ ३२॥ अनुव्रजिष्याम्यहमद्य रामं राज्यं परित्यज्य सुखं धनं च। सर्वे च राज्ञा भरतेन च त्वं यथासुखं भुङ्क्ष्व चिराय राज्यम्॥ ३३॥

  • हिंदी व्याख्या: सिद्धार्थ के इन वचनों को सुनकर राजा दशरथ ने अत्यंत थके हुए स्वर में, शोक से आहत वाणी में कैकेयी से कहा—"हे पापरूपे! तुम मेरी इस बात को नहीं मानती हो, और न ही तुम अपना या मेरा हित जानती हो। तुच्छ मार्ग का आश्रय लेकर तुम्हारी ये कुचेष्टाएँ पूरी तरह से साधुजनों के मार्ग से डिगी हुई हैं। आज मैं राज्य, सुख और धन—सबका परित्याग करके राम के पीछे-पीछे वन चला जाऊँगा; और तुम राजा भरते के साथ इस संपूर्ण राज्य का चिरकाल तक अपनी इच्छा के अनुसार भोग करो!"
  • English Translation: Hearing Siddhartha's words, King Dasharatha, with a wearied voice and grief-stricken speech, said to Kaikeyi: "O sinful-formed one, you desire not this counsel, nor do you comprehend what is truly beneficial for me or yourself. Embracing a wretched path and vile machinations, your actions have strayed completely far from the path of the virtuous. Today I shall follow after Rama, abandoning sovereignty, happiness, and wealth; do you and King Bharata enjoy this entire kingdom at your own pleasure for long ages to come!"

इत्यार्षे श्रीमद्रामायणे वाल्मीकीये आदिकाव्ये अयोध्याकाण्डे षड्त्रिंशः सर्गः ॥२-३६॥ (इस प्रकार महर्षि वाल्मीकि रचित आदिकाव्य श्रीमद्वाल्मीकीय रामायण के अयोध्याकाण्ड का छत्तीसवाँ सर्ग पूर्ण हुआ।)

इत्यार्षे श्रीमद्रामायणे वाल्मीकीये आदिकाव्ये अयोध्याकाण्डे षड्त्रिंशः सर्गः ॥२-३६॥