श्रीरामायण पाठ — अयोध्याकाण्डे सप्तचत्वारिंशः सर्गः ॥२-४७॥
श्रीमद्वाल्मीकियरामायणे अयोध्याकाण्डे सप्तचत्वारिंशः सर्गः ॥२-४७॥
श्रीमद्वाल्मीकीय रामायण के अयोध्याकाण्ड के सप्तचत्वारिंश (४७वें) सर्ग (२-४७) के सभी १९ श्लोकों का क्रमवार हिंदी एवं अंग्रेजी अनुवाद तथा व्याख्या नीचे प्रस्तुत है:
श्लोक १-३
प्रभातायां तु शर्वर्यां पौरास्ते राघवं विना। शोकोपहतनिश्चेष्टा बभूवुर्हतचेतसः॥ १॥ शोकजाश्रुपरिद्यूना वीक्षमाणास्ततस्ततः। आलोकमपि रामस्य न पश्यन्ति स्म दुःखिताः॥ २॥ ते विषादार्तवदना रहितास्तेन धीमता। कृपणाः करुणा वाचो वदन्ति स्म मनीषिणः॥ ३॥
- हिंदी व्याख्या: जब प्रातःकाल की रात्रि समाप्त हुई (सुबह हुई), तब वे सभी नगरवासी राघवेन्द्र (राम) के बिना शोक से आहत, निश्चेष्ट और हतचेत (सुध-बुध खो बैठे) हो गए। शोक के आँसुओं से दीन हुए वे लोग इधर-उधर देखते हुए अत्यधिक दुखी थे, किंतु उन्हें राम की एक झलक भी देखने को नहीं मिली। उस बुद्धिमान राम से बिछड़ जाने के कारण विषाद से जिनके मुख आर्त हो रहे थे, वे ज्ञानी (मनीषी) नागरिक भी दीन और करुणापूर्ण वचन बोलने लगे।
- English Translation: When the night gave way to dawn, those citizens, bereft of Raghava, grew motionless and paralyzed with grief, stripped of their senses. Overwhelmed by tears born of sorrow, gazing hither and thither, the distressed folk could not catch even a glimpse of Rama. Their faces marred by grief and wretchedness at being separated from that wise One, even the most wise among them uttered piteous and compassionate words.
श्लोक ४-७
धिगस्तु खलु निद्रां तां ययापहतचेतसः। नाद्य पश्यामहे रामं पृथूरस्कं महाभुजम्॥ ४॥ कथं रामो महाबाहुः स तथावितथक्रियः। भक्तं जनमभित्यज्य प्रवासं तापसो गतः॥ ५॥ यो नः सदा पालयति पिता पुत्रानिवौरसान्। कथं रघूणां श्रेष्ठस्त्यक्त्वा नो विपिनं गतः॥ ६॥ इहैव निधनं याम महाप्रस्थानमेव वा। रामेण रहितानां नो किमर्थं जीवितं हितम्॥ ७॥
- हिंदी व्याख्या: "धिक्कार है उस निद्रा को, जिसके वशीभूत होकर हम अपनी चेतना खो बैठे और आज चौड़े सीने तथा महाबाहु वाले राम के दर्शन नहीं कर पाए! वे महाबाहु राम, जिनकी प्रतिज्ञाएँ कभी मिथ्या नहीं होतीं, अपने भक्त जनों को छोड़कर किस प्रकार तापस वेष धारण कर वन चले गए? जो हम सबका औरौरस (सच्चे) पुत्रों की भाँति पिता के समान सदा पालन करते थे, वे रघुवंशियों के श्रेष्ठ राम हमको छोड़कर किस प्रकार वन में चले गए? राम से रहित हुए हम लोगों के लिए अब जीने से क्या लाभ? हम यहीं अपने प्राणों का अंत कर लें अथवा महाप्रस्थान (हिमालय की ओर प्राण-त्याग की यात्रा) पर ही निकल पड़ें!"
- English Translation: "Fie upon that slumber through which, our senses overpowered, we fail to behold today the broad-chested, mighty-armed Rama! How could that mighty-armed Rama, whose actions never fail, forsake His devoted people and depart into exile as an ascetic? He who ever nurtured us like a father caring for his true-born sons—how could that foremost of the Raghus abandon us and go to the forest? Bereft of Rama, of what avail is life to us? Let us meet our end right here or undertake the final journey (Mahaprasthana)!"
श्लोक ८-११
सन्ति शुष्काणि काष्ठानि प्रभूतानि महान्ति च। तैः प्रज्वाल्य चितां सर्वे प्रविशामोऽथवा वयम्॥ ८॥ किं वक्ष्यामो महाबाहुरनसूयः प्रियंवदः। नीतः स राघवोऽस्माभिरिति वक्तुं कथं क्षमम्॥ ९॥ सा नूनं नगरी दीना दृष्ट्वास्मान् राघवं विना। भविष्यति निरानन्दा सस्त्रीबालवयोऽधिका॥ १०॥ निर्यातास्तेन वीरेण सह नित्यं महात्मना। विहीनास्तेन च पुनः कथं द्रक्ष्याम तां पुरीम्॥ ११॥
- हिंदी व्याख्या: "यहाँ बहुत सी सूखी और बड़ी-बड़ी लकड़ियाँ मौजूद हैं, हम सब मिलकर उन्हीं से चिता प्रज्वलित करके उसमें प्रवेश कर जाते हैं (आत्महत्या कर लेते हैं)। जब महाबाहु, ईर्ष्यारहित और प्रिय बोलने वाले राम के संबंध में कोई पूछेगा, तो हम अयोध्या जाकर क्या कहेंगे? 'वह राघवेन्द्र हमारे द्वारा ही (इस विपत्ति में) लाया गया है'—ऐसा कहना हमारे लिए कैसे संभव होगा? वह नगरी—स्त्रियों, बालकों और वृद्धों सहित—हम सबको राम के बिना इस प्रकार लौटा हुआ देखकर निश्चय ही अत्यंत दीन और आनन्दहीन हो जाएगी। हम सब जिस वीर महात्मा राम के साथ उस पुरी से निकले थे, आज उन्हीं से रहित होकर हम उस नगरी को पुनः कैसे देख सकेंगे?"
- English Translation: "Abundant dry and massive logs lie scattered here; let us kindle a funeral pyre with them all and enter it together. What shall we say when questioned? How could it ever be uttered that 'We brought that mighty-armed, guileless, sweet-spoken Raghava away'? Surely that city—along with its women, children, and elders—will become utterly cheerless upon beholding us return without Raghava. Having departed from that city in the company of that heroic, high-souled One, how shall we ever bear to look upon that city again bereft of Him?"
श्लोक १२-१५
इतीव बहुधा वाचो बाहुमुद्यम्य ते जनाः। विलपन्ति स्म दुःखार्ता हृतवत्सा इवाग्र्यगाः॥ १२॥ ततो मार्गानुसारेण गत्वा किंचित् ततः क्षणम्। मार्गनाशाद् विषादेन महता समभिप्लुताः॥ ३१॥ (तथा १३) रथमार्गानुसारेण न्यवर्तन्त मनस्विनः। किमिदं किं करिष्यामो दैवेनोपहता इति॥ १५॥ (तथा १४) तदा यथागतेनैव मार्गेण क्लान्तचेतसः। अयोध्यागमन् सर्वे पुरीं व्यथितसज्जनाम्॥ १५॥
- हिंदी भाषा में व्याख्या: इस प्रकार वे दुःख से आर्त लोग अपने दोनों हाथों को उठाकर—बछड़ों से बिछड़ी हुई मुख्य गायों की भाँति—अनेक प्रकार से विलाप करने लगे। इसके बाद, कुछ क्षणों तक रथ के मार्ग का अनुसरण करते हुए वे आगे बढ़े, किंतु आगे चलकर रथ के चिह्नों (मार्ग) के नष्ट हो जाने के कारण वे भारी विषाद में डूब गए। वे मनस्वी लोग रथ के मार्ग के समाप्त हो जाने पर (जब आगे मार्ग नहीं दिखा) वापस लौट पड़े और विलाप करने लगे—"यह क्या हो रहा है? हम क्या करें? हम तो दैव द्वारा बुरी तरह ठगे गए हैं!" तब थके हुए चित्त वाले वे सभी नागरिक उसी मार्ग से वापस अयोध्या की ओर चल पड़े, जहाँ के सज्जन लोग पहले से ही अत्यंत व्यथित थे।
- English Translation: Raising their arms aloft, those grief-stricken people lamented in diverse ways, just like prime cattle forcibly separated from their calves. Thereafter, proceeding for a brief moment along the track, upon losing the trail, they were overwhelmed by a profound despair. Following the chariot's tracks until they vanished, those thoughtful men turned back, crying: "What is this? What shall we do? We are utterly crushed by fate!" Thereupon, their minds fatigued, all those citizens retraced their steps along the very same path back to Ayodhya, whose virtuous inhabitants were already plunged in anguish.
श्लोक १६-१९
आलोक्य नगरीं तां च क्षयव्याकुलमानसाः। आवर्तयन्त तेऽश्रूणि नयनैः शोकपीडितैः॥ १६॥ एषा रामेण नगरी रहिता नातिशोभते। आपगा गरुडेनेव ह्रदादुद्धृतपन्नगा॥ १७॥ चन्द्रहीनमिवाकाशं तोयहीनमिवार्णवम्। अपश्यन् निहतानन्दं नगरं ते विचेतसः॥ १८॥ ते तानि वेश्मानि महाधनानि दुःखेन दुःखोपहता विशन्तः। नैव प्रजग्मुः स्वजनं परं वा निरीक्ष्यमाणाः प्रविनष्टहर्षाः॥ १९॥
- हिंदी भाषा में व्याख्या: उस नगरी को देखकर उनके मन नाश के भय से व्याकुल हो उठे, और शोक से पीड़ित उनके नेत्रों से आँसू बहने लगे। वे आपस में कहने लगे—"राम के बिना यह नगरी ऐसी शोभा नहीं दे रही है, जैसे गरुड़ द्वारा सरोवर से नाग को निकाल लिए जाने पर वह सूनी हो जाती है।" चंद्रमा के बिना आकाश की तरह, और जल के बिना समुद्र की तरह, उस अचेत नागरिकों ने उस आनंद-रहित नगर को देखा। दुखों से संतप्त वे लोग अपने महामूल्यवान घरों में प्रवेश करते हुए भी, इस प्रकार विचर रहे थे कि मानो उनका सारा हर्ष नष्ट हो चुका हो; वे न तो अपने किसी स्वजन की सुध ले पा रहे थे और न ही किसी पराये की।
- English Translation: Beholding that city, their minds distraught with dread of ruin, tears streamed from their grief-afflicted eyes. "This city, bereft of Rama, shines no more," they cried, "just like a lake once its serpent has been extracted by Garuda." Like the sky stripped of the moon, or an ocean devoid of water, those bewildered folk beheld the city utterly drained of joy. Stricken with wave upon wave of misery, as they entered their opulent mansions, their happiness utterly destroyed, they could pay no heed to kinsman or stranger alike.
इत्यार्षे श्रीमद्रामायणे वाल्मीकीये आदिकाव्ये अयोध्याकाण्डे सप्तचत्वारिंशः सर्गः ॥२-४७॥ (इस प्रकार महर्षि वाल्मीकि रचित आदिकाव्य श्रीमद्वाल्मीकीय रामायण के अयोध्याकाण्ड का सैंतालीसवाँ सर्ग पूर्ण हुआ।)